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Saturday, July 18, 2020

बहुरूपी प्रकृति 



 

जिस प्रकार 

बहरूपिया 

बदल लेता है नित

अपना रूप

इसी प्रकार 

प्रकृति भी 

लेती है बदल

नित नया रूप

कभी हवा सुहावनी

कभी धूल भरी आंधी

कभी शीत-लहर 

 कभी झुलसाती लू

कभी धुंध

कभी बरसात

कभी ओलावृष्टि

कितने रूप

बदलती है प्रकृति 

 

-विनोद सिल्ला



व्यंग्य - हमें भी सम्मानित करो 

           कल बाबू रामलाल, नाक पर नीली लुंगी [ मास्क की जगह अंगोछा ] लटकाए,गले में गोल्ड मेडल टांगे, हाथ में रंग बिरंगा साटीफिटक [  उनकी भाषा में ] थामे, शाल ओढ़े , सम्मान समारोह से डायरेक्ट हमारे दरवज्जे ,अपनी वीर गाथा सुनानेे लैंड कर गए और मारे खुशी के नॉन स्टॅाप चालू हो गए ,‘ भईया ! आजतक किसी ने हमें घास तक नहीं डाली, भला हो कोरोना का, हमें कई संस्थाओं ने  कोरोना वॉरियर  से सम्मानित होने का निमंत्रण दिया है। यही नहीं कई समाज सेवी संस्थाएं , ऑन लाइन सम्मानित करने वाली हैं।’

     हमारा माथा ठनका कि जो शख़्स चार महीने से लॉक डाउन के दौरान , घर में दुबका बैठा रहा, कभी अठन्नी तक नहीं खर्ची, व्हॉट्स एप पर बेकार सी डिश दिखा दिखा कर टाइम पास करता रहा, जब मजदूर नंगे पैर जलती सड़कों पर  अपने गांवों को दौड़ रहे थे, उस वक्त जिसके घर का माहौल ऐसा था मानो कह रहा हो- कारवां गुज़र गया टीवी देखते रहे , जो  कोरोना कैरियर तक नहीं था, आज कोरोना वारियर कैसे हो गया ?

      फिर समझ आया कि कुछ लोगों का धंधा ही सम्मानित करना है चाहे वह साहित्य का क्षेत्र हो या समाज सेवा का। ऐसे लोग कभी बेरोजगार नहीं रहते। लॉक डाउन में दूसरों के पैसों से लंगर, छबीलें लगा कर, मास्क सैनेटाइजर बांट कर  , अखबारों में फोटो छपवा कर, सोशल मीडिया में वाहवाही लूट कर अनलॉक होते ही सोचने लगे कि अब क्या किया जाए ?  वेरी सिंपल! सर्टीफिकेट छपवाओ, 50 रुपये वाले गोल्ड मेडल होलसेल में खरीदो, 125 रुपये की शाल आ जाती है, सोशल आर्गनाइजेशन के नाम पर सस्ते में हॉल बुक करवाओ और मामला फिट। बहुत से लोग तो खुद ब खुद ये आयटम्ज साथ लेकर ही चलते हैं।  एडीशनल खर्चा भी  बच जाता है ...सो अलग। मीडिया कवरेज....नो प्रॉब्लम ! सम्मान करने वाले भी खुश और होने वाले भी ’ फील ऑब्लाईज्ड’। आम के आम गुठलियों के दाम।

      एक सज्जन तो सम्मान समारोहों में इतने बिजी हैं कि कई हफ्तों से घर में खाना ही नहीं खाया। सुबह सम्मानित , शाम सम्मानित। चाय पानी , लंगर मुफ्त। जिन्होंने डक्का तक नहीं तोड़ा उनके घर  कोरोना वॉरियर के प्रमाण पत्रों, शाल दुशालों से सुसज्जित हैं। जो रात दिन सेवा करते रहे, वे मुंह ताक रहे हैं। एक सज्जन ने तो कोरोना सेवा भाव के लिए खुद ही अखबार में पदम श्री प्रदान करने की सिफारिश तक कर दी है। जमाना सेवा भाव का कम, ईवेंट मैनेजमेंट का अधिक है। जो न सीखे वो अनाड़ी है।

कोरोना कब जाएगा ये तो चीन को भी नहीं पता परंतु कोरोना  कैरियर्ज से ज्यादा कोरोना वारियर्ज की संख्या में लगातार वृद्धि हो ़ रही है। वह दिन दूर नहीं जब 15 अगस्त या 26 जनवरी को पदम श्री  की तरह कोरोना श्री जैसे अलंकरणों से ऐसे लोगों को सम्मानित किया जाएगा! 

व्यंग्य - हरी चाय पर चर्चा

व्यंग्य

हरी चाय पर चर्चा

 

    गुलाब तो गुलाब है , उसे गेंदा कहने से उसकी खुशबू में क्या फर्क पड़ता है ? नाम में क्या रखा है, ऐसे विषयों पर अंग्रेजों से लेकर अपन के साहित्यकारों तक ,सबने अब तक काफी  कलम घिसाई कर ली है। लेकिन आज  आप चाय को महज  चाय नहीं कह सकते। चाय के रंग ढंग बिल्कुल बदल गए हैं।

   21वीं सदी में हमें यह जरुर समझ आ गया कि चीन से चली  और अब भारत में उगाई चाय में बहुत कुछ रखा है। अब तो यह जुमला भी घिस चुका है कि चाय वाला कैसे पी.एम बन गया ? इस एपीसोड के बाद  फुटपाथ पर चाय बनाने वालों की तो निकल पड़ी, साथ साथ पकोैड़े वालों का भी स्टेट्स अपडेट हो गया और  रातों रात ,मार्किट वेल्यु में भी उछाल आ गया।

   पहले बुद्धिजीवी, साहित्यकार, फिल्मकार, अफसर, मंडी हाउस के और  नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा स्ट्र्ग्लर ,यहां तक कि नेता लोग कॉफी हाउस में कॉफी पर चर्चा करते या कभी कभी भड़ास निकालते हुए अक्सर दिख जाते थे। क्नाट प्लेस का इंडियन कॉफी हाउस इसका गवाह रहा है। बहुत से पत्रकारों व लेखकों ने अपनी रचनाओं का मसाला इसी जगह ढूंढा है।

   किसी दफतर में चाय फुटपाथ सें मंगवाई जाए तो पीने और पिलाने वालों का स्टैंडर्ड , गिरा गिरा सा लगता है। वही चाय, टी बैग वाली आ जाए तो दोनों की गर्दनें  कुछ तन कर एक दूसरे को देखने लग जाती हैं। और जब आपसे पूछ लिया जाए कि सर ग्रीन टी लेंगे , या लेमन टी, तुलसी - जिंजर वाली ...... ब्लैक टी   या दूध वाली...फीकी या शुगर- फ्री वाली  तो कहीं अंदर ही अंदर लगने लगता है कि भई ऐंवें ही नहीं , अपना भी कोई स्टेट्स है ! ऐसा नहीं है कि टी ग्रीन है या ब्लैक या 10- 12 उबाले वाली , अदरख डाली हुई, च्वाईस पूछने से अगले का स्टेट्स , बढ़ जाता है। मलाई मार के या दुद्ध वाली या कटिंग चाय या चीनी रोक के - पत्ती ठोक के वाली चाय से बंदा खुद को सड़क छाप सा महसूस करने  लगता है।

 कोरोना काल में ग्रीन टी का खूब प्रचार किया गया। चाय की  भी टी. आर. पी बढ़ गई। हमें तो अब पता चला कि इसमें तो कोरोना से लड़ने की सारी गोलियां भरी पड़ी हैं। व्हॉट्स एप पर हमारे एक बंधु ने फॉरवर्डिड मैसेज घुमाया कि दिन में और कुछ करो न करो  बस सारा दिन ग्रीन टी पीते रहो ....कोरोना की ऐसी कम तैसी। भाग जाएगा जहां से आया । सबको मालूम है कि चाय और कोरोना कहां से आया।

  ग्रीन टी एक - फायदे अनेक। दूध की बचत, नकली दूध का कोई खतरा नहीं। चीनी का खर्चा बंद। इलैक्ट्र्कि कैटल में तीन मिनट पानी उबाला, कप में टी बैग डाला और मामला ओवर। न चाय वाले की इंतजार में मेहमान को ज्यादा देर  बर्दाश्त करने की जरुरत । सामने वाला भी कुर्सी से दो ढाई ईंच उपर कि साहब ने चाय अपने  पर्सनल हाथों से सर्व की बेशक उसे गटकने में उसे पत्नी याद आ रही हो लेकिन मजाल है उसके चेहरे पर कोई शिकन  नजर आए,  फीलिंग हाईली ऑब्लाइज्ड की मुख मुद्रा बना कर रखेगा और ग्रीन टी के दो चार फायदे और जोड़ जाएगा।

  ग्रीन टी को हरी चाय बोलने में जुबान को वैसी ही तकलीफ होती है जैसे इंडिया को भारत बोलने में होती है। कभी आपने हरी चाय कहते किसी को सुना ? क्योंकि आज ग्रीन टी स्टेटस सिंबल है। दो घूंट जाते ही दिमाग की बत्ती जल जाती है और आप विशुद्ध  बुद्धिजीवी , क्रिटिक,  विचारक, चिंतक, टिप्पणीकार, साहित्यकार बन जाते हैं और देश के ज्वलंत विषयों के महारथी बन जाते हैं। आप बताते हैं कि दुर्दांत बदमाश का एन्कांउटर था या सरेंडर, सरकार को क्या करना चाहिए था क्या नहीं, मंहगाई को कैसे रोका जा सकता है, भारत की अर्थव्यवस्था कब ठीक होगी, कोरोना कब जाएगा, वैक्सीन कब बनेगी, इंडिया को चाईना से कैसे लड़ना चाहिए, परमाणु बम कब काम आएगा.......... वगैरा वगैरा। बेशक घर में आप की चूं तक न निकलती हो पर चाय पर चर्चा ऐसे ही विषयों पर चलती है।

  अब तो ग्रीन टी इतनी पापुलर होने लगी है कि कल कुछ राजनीतिक पार्टियां हरी चाय और  केसरिया सी दिखने वाली ब्राउन चाय के मामले में धार्मिक रंग ही न लेले और बैठे ठाले हर टी वी चैनल पर हरी , लाल ,काली , सफेद चाय पर राजनीतिक चर्चाएं छिड़ जाएं। चाय पर चर्चा के समय लोकतंत्र, असहिष्णुता, देश प्रेम, कश्मीर, अर्थव्यवस्था, आपसी खुंदकें  जैसे विषय बैंक के ए .टी .एम से उगलते हुए नोटों की तरह बाहर आने लगें।

  यह बात भी दीगर है कि ग्रीन टी पर चर्चा वाले , घर आते ही दूध में 10 - 12 उबाले वाली, कुटी अदरख सहित, चीनी रोक के पत्ती ठोक के , दूध - पत्ती वाली चाय, पिर्च- प्याले में सुड़क सुडक़  कर पीते हुए ,आन्ने वाली थां  ; औकात द्ध पर बीवी का आदेश मानते हुए, लॉक डाउन में असाईन की गई डयूटी को अनलॉक होने के बावजूद वॉश बेसिन की ओर प्रस्थान कर जाते हों ......।

- मदन गुप्ता सपाटू

बाल कविता - कालू बन्दर

बाल कविता - कालू बन्दर


कालू बंदर है  बहुत परेशान,
भारी गर्मी से वो होता हैरान।
बादल कभी - कभी है दिखते,
ना जाने फिर क्यों नही टिकते।


प्रभु से फिर करने लगा गुहार,
प्रभु कर दो बारिश की बौछार।
उमड़ - घुमड़ कर बादल आये,
कालू झूम-झूम कर नाचे गाये।


तन - मन कालू के हो गए तृप्त,
बारिश जंगल मे हुई जबरदस्त।
दूर हो गयी जंगल से गर्मी की मार,
कई  दिन  बरसे  बादल  बारम्बार।


नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).


 "सावन की घटा"

 "सावन की घटा"
सावन की छाई है घटा घनघोर,जाने कहाँ पर बरसे!
अ बदरी! तू बरसे वहां, जहाँ पिया मिलन को तरसे!!
तन मन उसका झुलस रहा है,तप्त हवा के झोकों से!
शीतल समीर तलाश रहा,वो आसपास के झरोखों से!!
प्रेमी मन तो होता बावरा, चित कहीं भी ना लग पाए!
हरी भरी हरियाली भी, उनके मन को ना कत्तई सुहाए!!
सावन की रिमझिम फुहारें, छूने लगी मेरे अंतर्मन को!
जाके बरस उस आंगन में, भिगो देना तू उसके तन को!!
दिल मे तो मची उथल पुथल, जुबां फिर भी है खामोश!
भीड़ इर्द-गिर्द खड़ी है, पर खाली है उसका आगोश!!
भिगो उसके तन मन को, लौट आना तू मेरे आंगन में!
अधरों की प्यास मिटा देना, उसकी बरसते सावन में!!
चन्द लम्हे ये जुदाई के, लगे जैसे हो गए हों कई अरसे!
चौक गलियारे लगे सूने, निकल गए जब हम घर से!
सावन की छाई है घटा घनघोर,जाने कहाँ पर बरसे!
अ बदरी! तू बरसे वहाँ, जहां पिया मिलन को तरसे!!


सुषमा मलिक "अदब"
रोहतक (हरियाणा)



Tuesday, July 14, 2020

युद्धों को नकारते गीत

                                                                 

 

                  कुछ मंज़र जो इतिहास में दोहराए जाने के लिए बार- बार काम में आते हैं, ऐसी दहशत और नफ़रत की स्थितियाँ धार्मिक चोला ओढ़ कर जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ती हैं। उत्तरआधुनिकता के दौर में यह राजनीति की धार्मिक समांगी मिश्रण का घोल अशिक्षा और उन्माद के रूप में पिलाया जा रहा है, जिसे खैरात और भावना का प्रसाद समझ कर ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं समझी जाती। युद्ध, जेल और दहशत ये तीनों बाह्य और आंतरिक हुक़्मरानों के हथियार हैं जो उन्हें तख़्त पर काबिज़ रहने में भारी मदद पहुँचाते हैं। इसका संचालन राजनीतिक चरित्र पर पड़े पर्दे के पीछे से किया जाता है। देश की राजनीति में इनका बहुत योगदान है। जर्मनी का नाजीवाद और यहूदियों की दशा से लगभग सभी वाकिफ़ हैं जिसका सफ़र आज भी कई देशों में जारी है। 

               २६ जनवरी की सुबह नहाने के बाद गलियों से होते हुए मुख्य चौराहे की ओर बढ़े, तभी रास्ते में लगे साउंड सिस्टम में जावेद अख्तर का लिखा हुआ गाना सुनाई पड़ा- 'मेरे दुश्मन, मेरे भाई, मेरे हम साए' यह बात कितनी बड़ी है कि कोई अपने दुश्मन को अपना भाई कहे। जो हुआ उन सबको भुला कर जंग को हमेशा के लिए रोक देने की अपील किसी भी अमनपरस्त व्यक्ति को अच्छी लगेंगी। हालांकि यह अपील व्यक्तिगत है, यह किसी सामूहिक प्रक्रिया का भी काम हो सकता है अगर इसके बारे में जागरूकता फैलाई जाए। गाने की एक- एक लाइन पर अगर गौर किया जाए तो उसमें जंग के बाद की भयावाह स्थिति का विस्तृत वर्णन किया गया है। 'जंग तो चंद रोज़ होती है/ ज़िन्दगी बरसों तलक रोती है'! दरअसल ये बात नई नहीं है, दुनिया में जितनी भी जंगे हुई हैं सभी के परिणाम से आप रूबरू हैं। हालांकि की यह बात कम विश्वसनीय है कि बिना जंग के किसी भी मसले का निपटारा कैसे हो सकता। बहुत करेंगे कि हम अपनी तरफ़ से लड़ाई नहीं करेंगे लेकिन क्या ज़रूरी है कि सामने वाला भी यह विचार रखता हो। लेकिन आप सोच कर देखिए और यह बात सच है कि अगर दुनिया में किसी भी मसले का निपटारा बिना लड़े, बिना खून बहाए, बिना घर उजाडे़, बिना जेल गए किया जा सके तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। ऐसा सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि बाहरी देशों के भी कुछ चिन्तक विचार दे चुके हैं।

              भयानक स्थिति का दौर है जब नेताओं के द्वारा खुले आम गोली मारने के नारे लगवाए जा रहे हों और देश के सबसे बड़े और सबसे मजबूत नेता शांति और सद्भावना का परिचय देते हुए अंतरराष्ट्रीय मेहमान का महत्मा गांधी से परिचय करा रहे हैं। वैसे बिना युद्ध के किसी भी मसले का निपटारा करना इस समय संभव नहीं लगता क्योंकि हम अपने ही घर में धर्म की राजनीति में फंसकर धर्मयुद्ध पर निकल चुके हैं। शायद कुछ लोगों को याद होगा टीवी पर एक आदमी चिल्ला- चिल्ला कर कह रहा था कि अपने बच्चों पर नज़र रखिए वे कहीं दंगाई न बन जाएं कुछ लोगों ने उसकी बात पर अमल किया लेकिन कुछ लोगों ने अपने बच्चों को देशभक्ति के नाम पर इस युद्ध में झोंकने का पूरा प्रयास किया। देश इससे भी भयानक स्थिति के दौर से गुज़र रहा है जब किसी की मौत पर कुछ लोग जश्न भी मना रहे हैं। मानवता की हत्या का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। नेताओं का क्या है चाहे धर्मयुद्ध हो या सीमाओं का युद्ध उनके अपने कभी नहीं मरते हैं। मरता तो हमारे और आपके बीच का सदस्य है। 

              इतिहास में एक घटना हमेशा याद रखी जाएगी जो शिक्षण संस्थान को ध्वस्त करने के काले कारनामों में शामिल है। २६ दिसंबर २०१४ में पाकिस्तान के पेशावर में एक आर्मी पब्लिक स्कूल पर अतंकवादी हमला हुआ, जिसमें छात्रों और अध्यापकों को मिलाकर कुल १४९ लोग मारे गए उसमें १३२ स्कूल के छात्र थे। ISPR की तरफ़ से एक गीत 'मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है' प्रकाश में आया और विरोध प्रदर्शित करने का अनूठा तरीका तलाशा गया। बदला लेने जैसी कोई बात नहीं है इस गाने में। क्योंकि बदला लेना एक परंपरा जैसे बन जाता है जो कभी रुकने का नाम नहीं लेगा। इसलिए दुश्मन के बच्चों को पढ़ाने की बात कही गई, उनकी आने वाली पीढ़ियों को जागरूक करने की बात हुई ताकि भविष्य में वे सब इस भयानक परम्परा को छोड़कर अमन के रास्ते पर चलें, सभी को प्यार करें। इसी चैनल की तरफ़ से एक गीत २०१८ में पब्लिश हुआ जिसमें दहशत फैलाने वालों पर लानत भेजता हुआ देखा जा सकता है, 'मै ऐसी क़ौम से हूं जिसके वो बच्चों से डरता है/ बड़ा दुश्मन बना फिरता है जो बच्चों से लड़ता है!' और सबसे ख़ास बात ध्यान देने वाली यह है कि जिस देश के उपर सबसे ज़्यादा आतंकवादी गतिविधियों का ठप्पा लगा है यह गीत उसे देश में बनाया गया। नफ़रत, ख़ून- खराबा, जेल, दहशत से सभी को आज़ादी चाहिए। देश में रहने वाले लोग इंसान होते हैं जो अमन की चाह रखते हैं, किसी भी देश को आतंकवादी देश कह देने से हम वहाँ की मज़लूम आवाम के साथ नाइंसाफी होगी, क्योंकि वहाँ भी हमारे मुल्क़ की तरह मजदूर, किसान, बूढ़े और बच्चे रहते हैं जिन्हे ऐसी गतिविधियों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता सभी को उसी में समेट लेना बर्बरता है।

                जब हम अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं उस समय हमसे दर्शक यह उम्मीद करते हैं कि हमारे पास दर्शकों में बैठे हुए लोगों से कुछ बेहतर विचार है जो हम उनके साथ बांटना चाहते हैं, और कला का यह रूप इंसानियत को बचाए रखने के साथ कलात्मक अभिव्यक्ति के ज़रिए आम व्यक्ति को जागरूक किया जाय। यह बात अपने आप में बहुत बड़े मन से निकली है जो अपने गीत के माध्यम से यह अपील करते हैं 'मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है', वे चाहते तो उनसे बदला लेने के लिए भी सोच सकते थे या इसी दिशा में लोगों को जागरूक करते लेकिन सच कहा जाए तो अमन कायम करने के लिए इससे बेहतर और कोई तरीका हो ही नहीं सकता। यह वैश्विक स्तर पर प्रचारित होने पर कारगर हो सकती है। हम रजाई ओढ़ कर मोबाइल पर आईटी सेल के द्वारा बनाए गए एसएमएस और फोटोशॉप बिना ध्यान दिए फॉर्वर्ड करने में लगे हुए हैं। दरअसल हम युद्ध की पृष्ठिभूमि तैयार करने में लगे हुए हैं। 

                  कुछ सालों से युद्ध को लेकर लोगों में कई धारणाएं पनप रही हैं। आज कल यह राजनीतिक हो चुका है। लोग इस बात को समझने का प्रयास कर रहे हैं कि नेताओं के अपने स्वार्थ के चलते कई युद्धों के संकेत प्रायः दिखाई पड़ जाते हैं। वैसे इस तरह की बात १९३६ में 'बरी द डेथ' नाटक के जरिए इरविन शॉ ने भी कहने की कोशिश की थी, जबकि उस समय के समाचार पत्रों ने भी शुरुआत में आज की तरह ही सत्ता की गुलामी करने की कोशिश की और इसे राष्ट्रद्रोह के नजरिए से प्रेषित किया। आज भी देश में लोगों को न्यायपालिका और सेना पर अटूट विश्वास बना है, लेकिन अंधराष्ट्रवाद के शिकंजे में बहुत कुछ मानवता के विनाश और अंधभक्ति की ओर ढकेलने का प्रयास जारी है।

                 साहिर ने अपनी ज़िन्दगी के तमाम अनुभवों और अध्ययन के आधार पर एक ऐसी दुनिया की कल्पना की जिसको सुनने के बाद हम सोचते पर मजबूर हो जाते हैं- 'जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी/ वो सुबह कभी तो आएगी!' और आखिर पंक्ति में उन्होंने खुद को शामिल करते हुए लिखा 'वो सुबह हमीं से आएगी!' पता नहीं कितने लोग इस बात पर यक़ीन करेंगे कि ऐसा सम्भव भी हो सकता है लेकिन साहिर लुधियानवी ने इस बात की कल्पना कर ही दी। एक ऐसा समाज बनाया जाए जिसमे दौलत के लिए औरत की अस्मत न लूटी जाए। जाहिर सी बात है हम जब इन बातों का खुलासा करते हैं तब रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह संस्मरण 'रूस की चिट्ठी' कैसे भूल सकते हैं जो साहिर से पहले की बात की पुष्टि करता है 'जहाँ की जेलें भी स्वर्ग हैं'। टैगोर ने रूस में ऐसा देखा था और साहिर ने अपने देश में बिना जेल के नियमन की कल्पना करते हैं। 'जंग तो खुद ही एक मसला है/ जंग क्या मसअलों का हल देगी/ खून और आग आज बरसेगी/ भूंख ओर एहतियाज कल देगी!' महात्मा गांधी जी सत्य और अहिंसा के द्वारा समाज को नई ऊंचाई देने का रास्ता अख्तियार करते हैं, उनके तमाम योगदानों में एक पहलू लोगों अंदर से जेलों का भय समाप्त करना भी अति महत्वपूर्ण रहा है। इसे हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। 

                 धर्म को लेकर नफ़रत बढ़ती जा रही है जो किसी आग की तरह है, जो सिर्फ बढ़ना जानती है और इस बढ़ने के क्रम में बहुत कुछ नष्ट करते हुए बढ़ती ही जाती है जहाँ इंसानियत या धार्मिक होना कोई मायने नहीं रखता। उसका एकमात्र लक्ष्य विनाश ही होता है। हम जब युद्ध की बात करते हैं तब हमें इसके दूरगामी विनाश को हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि युद्ध होने पर तात्कालिक प्रभाव जितना होता है उससे कहीं ज्यादा उसके बाद दिखाई पड़ता है। युद्ध की भेंट कई पीढ़ियां ऐसे चढ़ती हैं जिसकी भरपाई शायद संभव नहीं है। बीमारियों का अंबार उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को ग़मगीन कर देती हैं।

                 द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थिति इतनी भयानक थी जिसका ख़ामियाजा आज भी उसके आस- पास के लोग भुगत रहें हैं। ऐसा ही एक गीत जो युद्ध की विनाशकारी स्थिति को दर्शाता है। 'गांधी टू हिटलर' फिल्म का वह गीत जिसे पल्लवी मिश्रा ने लिखा है - 'हर ओर तबाही का मंज़र/ गरजा विनाश का बादल है/ कहीं सहमा- सहमा बचपन है/ कहीं रोता मां का आंचल है!' यह एक ऐसा गीत है जो मानव सभ्यता के सबसे बड़े युद्ध का दर्द बयां करता है। हिटलर की सोच और राष्ट्रवादी सोच को चरम पर ले जाने का नशा कितना भयनाक हो सकता है इस गीत में साफ झलकता है। 'जो चले जीतने दुनिया को क्या खबर नहीं है यह उनको/ जब जंग जीत कर आएंगे सब कुछ न मुकम्मल पाएंगे!' यह बात जग ज़ाहिर है कि युद्धों से कितना बड़ा नुकसान होता है। इस नुकसान की भरपाई में सबसे अहम इंसानी सभ्यता के विनाश को कैसे पूरा किया जा सकता है। इस साल के आंदोलनों में प्रदर्शनकारियों ने सिपाहियों को फूल बाँट कर अमन की गुज़ारिश की है। यह संकेत है कि हम अमन चाहते हैं। हमें किसी भी प्रकार का दंगा या फसाद नहीं चाहिए।

                युद्धों का विरोध न सिर्फ भारतीय चिंतकों ने किया बल्कि अन्य देश के लेखकों, दार्शनिकों, और गीतकारों ने भी किया। हम युद्ध की शक्ल अक्सर सिर्फ सीमाओं पर होने वाले युद्ध के आधार पर बनाने का प्रयास करते हैं। जबकि हमारे आस- पास न जाने कितने युद्ध हो रहे हैं जिसे हम देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं। उसका असर हमारे मन पर तो पड़ ही रहा है उससे कहीं ज्यादा आने वाली अनजानी पीढ़ियों में भी संचित होता जा रहा है जिसका असर सांप्रदायिक दंगे और धार्मिक उन्माद के रूप में सामने आता है। बदले की यह भावना कभी भी युद्ध से ख़तम नहीं की जा सकती है। इसके लिए आपसी सद्भाव और सामंजस्य आवश्यकता है।

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संकल्प पर्व के उपलक्ष्य में "मानव जीवन में प्रकृति का महत्त्व" विषय पर काव्य पाठ (वेबिनार) का आयोजन 

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संकल्प पर्व के उपलक्ष्य में "मानव जीवन में प्रकृति का महत्त्व" विषय पर काव्य पाठ (वेबिनार) का आयोजन 



















दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार का अनुसरण करते हुए, प्रकृति के प्रति अपनी सद्भावना प्रकट करने हेतु दिनांक 28  जून 2020 से 12 जुलाई 2020 तक संकल्प पर्व मनाया जा रहा है । इसी उपलक्ष्य में दिनांक 12 जुलाई 2020 को संकल्प पर्व के अंतिम दिवस पर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा "मानव जीवन में प्रकृति का महत्त्व" विषय पर काव्य पाठ (वेबिनार) का आयोजन किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. रामशरण गौड़, अध्यक्ष, दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड द्वारा की गयी तथा सुश्री रजनी अवनी, कवयित्री व श्रीमती अंजना अंजुम, कवयित्री एवं समाज सेविका वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं । इस कार्यक्रम का प्रसारण सुदर्शन टी.वी द्वारा करवाने का संयोजन श्री प्रवीण आर्य द्वारा किया जायेगा  ।

सुश्री रजनी अवनी ने अपने काव्य के माध्यम से वृक्षों की मानव जीवन में भूमिका व आवश्यकता बतायी।  साथ ही, उन्होंने अपने गीतों के द्वारा श्रोताओं से प्रकृति की रक्षा करने, उससे प्रेम करने तथा उसके प्रति संवेदनशीलता रखने का आह्वाहन किया।

श्रीमती अंजना अंजुम ने काव्य पाठ द्वारा सभी श्रोताओं से लकड़ी का खनन रोकने, वृक्ष लगाने, तथा रोज़ एक वृक्ष को पानी देने का संकल्प कर धरा को संवारने में अपना योगदान देने का निवेदन किया ।

श्री प्रवीण आर्य द्वारा अपने वक्तव्य में कहा कि प्रकृति से छेड़-छाड़ के भयावह परिणाम हो सकते हैं उनमें से एक का हम कोरोना महामारी के रूप में सामना कर ही रहे हैं इसलिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है की हम प्रकृति के प्रति स्नेहपूर्ण भाव रखें, उसकी रक्षा करें।

डॉ. रामशरण गौड़ ने श्रोताओं को बताया कि मानव शरीर पञ्च तत्वों- मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और शून्य से निर्मित है जोकि उसे पोषित करते हैं। इन पांच तत्वों का संतुलन ही हमारे तन व मन को स्वस्थ रखता है। यह पांच तत्व प्रकृति के महत्त्वपूर्ण अंग हैं अतः मनुष्य हेतु इनका संरक्षण करना, न्यायिक उपयोग करना तथा इनके प्रति संवेदनशीलता रखना अतिआवश्यक है। उन्होंने सभी श्रोताओं से आग्रह किया कि वह संकल्प पर्व को अपने जीवन का अंग बनाये और निरंतर समयानुसार तथा स्थानुसार एक वृक्ष लगाने का प्रयास करें और वृक्षारोपण को अपने जीवन का अंग बनाये I