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Saturday, July 25, 2020

काश !

काश !


काश! मेरी जुबान की
कड़वाहट के पीछे
तुम मेरे हृदय की मिठास को
समझ पाते ।


काश! मेरे मुस्काते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे हृदय में दहकती
पीड़ा को समझ पाते।


काश ! मेरे बहते हुए
अश्कों के पीछे
तुम मेरे हृदय में बसी
मेरी कोमल भावनाओं को
समझ पाते।


काश! मेरे खिलखिलाते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे अंतर्मन की
चीखती चिल्लाहट को
समझ पाते।


राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।



Sunday, July 5, 2020

स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान

आंदोलन किसी बदलाव के लिए उठाया गया एक ऐसा कदम है , जिसमें स्त्री – पुरुष का विभेद कर के अगर एक भी वर्ग हाथ पर हाथ धर कर बैठजाये तो वह आंदोलन सफल नहीं होता । और, बात जब स्वतंत्रता जैसे महती यज्ञ के लिए हो तो हम कैसे सोच सकते हैं कि बिन महिला सहयोग के यह यज्ञ सम्पन्न हुआ होगा । स्वतन्त्रता हमारे आत्म सम्मान को बरकरार रखते हुए आत्म – उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करता है । क्रान्ति की ज्वाला केवल पुरुषों को ही नहीं उद्वेलित करती , बल्कि वीरांगनाओं को भी उसी तीव्रता से आकृष्ट करती हैं । भारत में नारी यदि श्रद्धा की देवी मानी जाती हैं तो समय पड़ने पर वही देवी रणचंडी बन जातीं हैं । स्त्रियोंकी दुनिया घर – गृहस्थी की देख – रेख तो है ही , पर सत्ता और युद्ध में भी जब – जब ज़रूरत हुई स्त्रियाँ कमर कस कर बाहर निकल पड़ीं । 


क्रांति की  लड़ाई से लेकर आज़ादी पाने तक वीरांगनाओं ने अपनी मेहनत से अंग्रेजों के चने चबवा दिये । इस लड़ाई में उन वीरांगनाओं का भी उतना ही योगदान है जिन्होंने बिन शमशीर अपनी वाणी के बल पर , या साहित्य के माध्यम से लोगों में जोश जगाने का काम किया । सरोजिनी नायडू ऐसी ही देश भक्त थीं । रानी लक्ष्मीबाई और रानी चेनम्मा जैसी वीरांगनाओं ने अंग्रेजों से लोहा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।1824 में कित्तूर की रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों को मार भगाने के लिए फिरंगियों भारत छोड़ो की ध्वनि गुंजित की और रणचंडी बन कर अपने अदम्य साहस से अंग्रेजों के छक्के छूटा दिये थे । दुर्गा बाई देशमुख ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और आज़ादी के बाद भी एक समाज सेविका और एक सक्रिय राजनेता की सक्रिय भूमिका निभाती रहीं । उन्होने महिलाओं के उत्थान के लिए पुनर्वास , शिक्षा की योजना और पोषण से जुड़ी कई योजनाएँ बनायीं । स्वतन्त्रता सेनानी उषा मेहता ने खुफ़िया काँग्रेस रेडियो चला कर क्रान्ति – युद्ध के समय भारतीय सेनानियों की खूब मदद की थी , अंत में जब उन्हे पकड़ा गया तो पुणे की जेल में भी रहना पड़ा था ।


मातादीन ने बैरकपुर में मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूसों की जानकारी दी थी , मातादीन को भी यह राज उसकी पत्नी लाजो ने ही बताया था । लाजो को यह जानकारी उसी अंग्रेज़ ऑफिसर के घर मिली थी , जिसके यहाँ वह काम करती थी ।  स्त्रियों ने जहां ज़रूरत हुई अपने मर्दों को कभी उलाहना भी दे कर तो कभी प्रेम से उनमें जोश भरी । लखनऊ में 1867 की क्रांति का नेतृत्व हज़रत महल ने किया । आलमबाग की लड़ाई के दौरान अपने जाँबाज सिपाहियों की उसने भरपूर हौसला आफजाई की और हाथी पर सवार होकर अंग्रेजों का मुक़ाबला भी करती रही। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे जाकर वहीं से क्रांति की चिंगारी सुलगाने का प्रयास करती रहीं ।


अपनी शौर्य – गाथा से जन – जन के मानस पटल में अपना विशेष स्थान बनाने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने 1855 में अपने पति की मृत्यु के बाद झांसी की सत्ता संभाली और ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी । घुड़सवारी और शस्त्र – कौशल में पारंगत रानी को 1857 की क्रांति की सूत्रधार भी कहा जाता है । उनकी मौत पर जनरल हयूग्रोज ने कहा था , “यहाँ वह औरत सोई है , जिसे विद्रोहियों में एकमात्र मर्द होने का दर्जा प्राप्त है ।”  मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की बेगम ज़ीनत महल ने भी सेनानियों के संगठन के लिए अथक प्रयास किया । बहादुर शाह को हिंदुस्तान के लिए काम करने के लिए वह उनकी प्रेरणा बनी रहीं । यहाँ गौर – ए – तलब है कि बेगम हज़रत और रानी लक्ष्मी बाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलाएं शामिल थीं । हज़रत महल द्वारा गठित दल की कमान रहीमी के हाथों थी जिसने फौजी वेश में महिलाओं को तोप व बंदूक चलाना सिखाया । हैदरीबाई एक तवायफ़ थीं जिसके लखनऊ के कोठे पर अनेक अंग्रेज़ अफसर आते थे और क्रांतिकारियों केखिलाफ़ योजनाओं पर बात – विमर्श करते थे । हैदरीबाई इन सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुंचा दिया करती और उनकी मदद करती। ऐसी ही एक देशभक्त ऊदा देवी थी जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए जान दे दी । इतिहास में ऊदा देवी का नाम अमर हो गया जब उसने लखनऊ के सिकंदराबाद चौराहा पर ब्रिटिश सैनिकों के साथ युद्ध करते हुए छत्तीस अंग्रेजों को मार गिराया और खुद भी शहीद हो गईं । साहित्यकार अमृतलाल नगर ने भी अपनी कृति ‘गदर के फूल’ मे ऊदा देवी का जिक्र किया है । कहा जाता है कि उसने पीपल के एक घने पेड़ पर छिपकर जब 36 सैनिकों को मार गिराया तब कैप्टन वेल्स की नज़र पेड़ पर होती हलचल पर पड़ी , उसने उसी दिशा में गोली चला दी तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी ।नीचे गिरने पर उसकी जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया , जिससे पता चला कि वह एक महिला है ।


 आशा देवी , शोभा देवी , वाल्मीकि महावीरी देवी ,नामकौर ,भगवानी देवी आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अङ्ग्रेज़ी सेना के खिलाफ लड़ाई की । अवध की वीरांगना राजेश्वरी देवी और बेगम आलिया भी महिला सेना को शस्त्र कला का प्रशिक्षण दिया करतीं तथा गुप्त भेदों के माध्यम से कई बार अवध से ब्रिटिश सैनिकों को निकाल भगाने में सफ़ल रहीं ।


झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी दुर्गादल के नाम से बनायी थी । इसका नेतृत्व धनुर्विद्या में पारंगत झलकारी बाई के हाथों था । झलकारीबाई ने कसम खाई थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगा वह शृंगार नहीं करेगी । अंग्रेजों ने जब किला को घेरा तब झलकारी बाई ने बहदुरी के साथ उनका सामना किया और रानी को महल के पिछवाड़े से निकल जाने तकस्वयं अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गई । कानपुर 1857 की क्रांति का मुख्य अड्डा रहा था । वहाँ की एक तवायफ़ अजीजन बाई ने क्रांतिकारियों के साथ मिल कर क्रांति की लौ जलायी । इसने चार सौ वेश्याओं की एक टोली बनाई जो मर्दाना वेश में रहतीं थीं । ये अपने हुस्न के दम पर अंग्रेजों से राज उगलवातीं थीं और उपयुक्त ठिकाने पर उन सूचनाओं को भेजा करतीं । बिठुर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तांत्या टोपे तो बच निकले पर अजीजन पकड़ी गई और अंततः मार दी गई । अप्रतिम सौंदर्य की मलिका मस्तानी बाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी इकट्ठा कर पेशवा को देतीं थीं । नाना साहब की मुंहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति से भरपूर थी । जब नाना साहब बिठुर से पलायन कर गए तब अंग्रेजों के लाख पूछने पर भी वह उनका पता नहीं बताती है , जिससे अंग्रेजों ने उसे आग में ज़िंदा ही झोंक दिया ।


1857 की क्रांति के बाद भी सतत चले आंदोलनों में महिलाओं ने बढ़ – चढ़ कर हिस्सा लिया । 1905 के बंग – भंग आंदोलन में पहली बार महिलाओं ने खुल कर सार्वजनिक रूप से हिस्सा लिया । स्वामी श्रद्धानंद की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने महिलाओं को संगठित कर विदेशी कपड़ों को जला डाला । 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान अरुणा आसफ अली  ने अकेले 1600 महिलाओं की गिरफ़्तारी दी तथा गांधी – इरविन समझौता के बाद उनपर बहुत दवाब बनाया गया । 1912- 14 में बिहार में जतरा भगत ने जनजातियों को लेकर टाना आंदोलन चलाया जिसे बाद में उसी गाँव की महिला देवमनियाँ उराऊँ ने संभाली । बिरसा मुंडा के सेनापति गया मुंडा की पत्नी माकी ने भी आंदोलन में खुल कर हिस्सा लिया ।


चन्द्रशेखर आज़ाद के अनुरोध पर ‘ द फिलोसफी ऑफ बम ’ दस्तावेज़ तैयार करने वाले क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा देवी वोहरा ने भगत सिंह को लाहोर जेल से छुड़ाने का प्रयास किया । लाला लाजपत रॉय की मौत का बदला लेने के लिए भी दुर्गा भाभी लगी रहीं ।हसरत मोहानी भी स्वतन्त्रता की लड़ाई में मरदाने वेश में कूद पड़ीं । उन्होने बाल गंगाधर तिलक के गरम दल का भी नेतृत्व किया । 1925 में काँग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर रही  भारत कोकिला के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को काँग्रेस का प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ । इन्होने अपनी कविताओं के माध्यम से युवा हृदय में आज़ादी की अलख जगा दी।


परोक्ष रूप से भी महिलाएं अपना योगदान देती रहीं । सरदार बल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि बारदोली सत्याग्रह के दौरान वहाँ की महिलाओं ने ही दिया । कस्तूरबा गांधी का भी सहयोग इस लड़ाई में उल्लेखनीय है । उनकी नियमित सेवा और अनुशासन के कारण ही गांधीजी पूरे मनोयोग से स्वतन्त्रता आंदोलन में जुड़े रहे ।


सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज में महिला विभाग की मंत्री तथा रानी झांसी रेजीमेंट की कमांडिंग कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आज़ादी में प्रमुख भूमिका निभाई । डाक्टरी पेशा छोड़कर  कैप्टन सहगल के साथ मिल कर आज़ादी की गतिविधियों में भाग लेती रहीं ।


भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन की गूंज भारत के बाहर भी सुनाई दी थी । विदेशों में रह रही अनेक भारतीयों ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो कर भारत और अन्य देशों में स्वतन्त्रता की अलख जगाई । लंदन में जन्मी ऐनी बेसेंट ने 1916 में भारतीय स्वराज लीग की स्थापना की जिसका उद्देश्य स्वशासन स्थापित करना था । ऐनी बेसेंट ने ही 1898 में बनारस में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की नींव रखी जिसे 1916 में महामना मदन मोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया । भारतीय मूल की फ्रांसिसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा ने लंडन ,जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर के भारत की स्वतन्त्रता के पक्ष में माहौल बनाया । उन्होने अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट काँग्रेस में प्रस्ताव भी रखा था कि भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम का कलंक है । उन्होने वंदे मातरम का ध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती भी दी थी । स्वामी विवेकानंद की शिष्य मारग्रेट नोबुल उर्फ़ भगिनी निवेदिता ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह मे लॉर्ड कर्जन द्वारा भारतियों का अपमान करने पर निर्भीकता से प्रतीकार किया था । मीरा बहन के नाम से मशहूर मैडेलीन ने भारत छोड़ो आंदोलन के समय महात्मा गांधी को भरपूर सहयोग दिया और स्वतन्त्रता के पक्ष में माहौल भी बनाया । उन्हें इसके लिए गिरफ्तार भी कर लिया गया था ।


स्वतन्त्रता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ जोड़ता है । इन वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्र प्रेम , अदम्य साहस और अटूट प्रतिबद्धता के बदौलत ही आज़ादी का संघर्ष सफल हुआ । पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने का प्रण ही संघर्ष पथ को सुगम बना सका । अनेक महिला सेनानियों का गौरवमयी बलिदान आज भी इतिहास की एक जीवंत दासता है । कहीं वे लोक चेतना में जीवित हैं तो कहीं राष्ट्रीय चेतना की संवाहक बन कर भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुईं हैं ।


 



Friday, June 26, 2020

व्यंग्य-ऑफिस से टपके, पंेशन में अटके

आदमी अक्सर जिं़दगी में कई तरह के झटके खाता है। कभी  बिजली के तो कभी बिजली के बिल के, कभी दिल के तो कभी डॉक्टर के बिल के। अब भूकंप के झटके तो आम हो गए हैं। दिल्ली वालों के लिए तो कोरोना के झटके हों या भूकंप के ....... हुण की  फरक पैंदा है जी ? जैसा मजदूर से लेकर मंत्री तक का एटीच्यूड हो गया है। 

 खर्चों में कटौती करने का बहाना बना कर , सरकार ने हमें 60 की बजाय 58 में ही नौकरी से टपका दिया जैसे आंधी में अधपके आम । सेवा मुक्त किया , पेंशन युक्त किया और  एक खूंटी मंेे टांग दिया। 

साल भर पहली पेंशन के  इंतजार के बाद  , मुंह पर मॉस्क लगाए , हाथों पर  ग्लॅव्ज़ चढ़ाए , हम बैंक के गेट पर जैसे ही पहुंचे, वहां के सिक्योरिटी गार्ड ने हमारा स्वागत वैसे ही किया जैसे हमारे जमाने में बारातियों का स्वागत उन पर गुलाब जल या केवड़ा छिड़क कर किया जाता था। श्राद्ध जीमने आए  पंडितों की तरह वह हर आने जाने वाले के हाथ - पैर सेनेटाइजर सें धुलवा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से अछूतों की तरह हमें दूर खड़ा किया गया। घ्ंाटे भर बाद नंबर आया तो पता ही नहीं चला कि किस बाबू के मत्थे लगना है। हर बाबू पिंगपांग की तरह हमें , एक काउंटर से दूसरे कांउंटर तक उछालने में लगा हुआ था।  पता चला पेंशन बाबू आज कोरोना पाजिटिव हो गए हैं और उनका काम काउंटर नंबर 30 पर  एक मोटे चश्में और भरी भरकम डील डौल वाली प्रौढ़ महिला एडीशनली कर रही हैं। हिम्मत कर के उनके सम्मुख  उपस्थित हुए जहां एक रस्सी की सहायता से तीन फुट की दूरी  बना कर रखी गयी थी। उनके चेहरे के भाव देखकर ऐसा लग रहा था मानों कह रही हों - तुझे भी आज ही मरना था ?

उसने ऐनक के निचले हिस्से से झांक कर हमारी श्री मती जी की तरह तुनक के पूछा ,‘ क्या है?‘

खैर ! हमने अपनी फरियाद रखी कि हमारी पहली पेंशन आ गई होगी ! 

वह गुर्राई ,‘ नाम ?’

हमने कहा -मास्टर राम लाल ।

कंप्यूटर में चेक कर के बोली,‘ आप मास्टर होकर धोखाधड़ी कर रहे हो ? तीन साल  पहले मास्टर रामलाल की डेथ हो चुकी है , आप उसकी पंेशन क्लेम कर रहे हो ?’

हम चौंके और रिक्वेस्ट की ,‘ मैम ! आपको गलती लग रही है। मैं तो आज पहली पेंशन लेने आया हूं।आप इस एकांउट में चेक करिए। ‘आर‘ से चेक करिए । उसने नाक भौं सिकोड़ते हुए माउस इधर उधर घुमाया और पूछा ,‘ नाम?‘

- राम लाल।

बाप  का नाम -  शाम लाल ?

- जी ! यही है।

आप स्कूल में मास्टर होंगे । रिकार्ड में केवल राम लाल हैं।

- जी पासबुक में पेंशन नहीं आई।

- आएगी कैसे ? जिंदा होंगे तो आएगी न ?

- अरे  मैम ! मैं जीता जागता आपके सामने खड़ा हूं । हाथ पकड़ कर देख लीजिए।’

बस इस बात पर वह और भड़क गई । हम सहमे कि  कहीं दफा 376 ही न लगवा दे। पंेशन भूल कर उससे क्षमा मांगी।

एक गिलास पानी पीकर  बोली,‘ रिकार्ड में जिन्दा होना जरुरी है।अपना लाइफ सर्टिफिकेट  का एफिडेविट लाइये कि आप वर्ष 2019 से लेकर आज की तारीख तक जिन्दा हैं।’

खुद के माथे पर हाथ फेरा। पसीना भी असली लगा और खुद भी। पंेशन तो नहीं मिली पर ,टेंशन पूरी मिल गई ।

इस दुर्घटना जिक्र जब हमने अभिन्न मित्र से किया तो वे बोले,‘ मास्टर रामलाल !  आज जमाना बदल गया है। जमाना लाइव दिखने का है। आप अलाइव हैं या नहीं पर फेस बुक , व्हॉट्स एप, ट्वीटर , इंस्टा वगैरा वगैरा पर लाइव दिखना  जरुरी है । लाइव होना इतना इर्म्पोंटंेट  नहीं है जितना दिखना ।’

हमने कहा,‘ भाई जी! हम तो हमेशा लाइवली और पाजिटिव ही रहते हैं।’

वे बोले ,‘ खबरदार जो आगे से ऐसे लफजों का इस्तेमाल किया । बड़ी मुसीबत में पड़ जाओगे। किसी को गलती से भी खुद को पाजिटिव न बता देना।  वक्त बदल गया है । हर चीज के मायने बदल गए हैं।परिभाषाएं बदल गई हैं। लोग मोबाइल तक ब्लॉक कर देंगे तुम्हारा कि कहीं तुम्हारे अंदर छिपा कोरोना निकल कर उनके कान में न घुस जाए।  जमाना कहीं का कहीं जा पहुंचा है। सब कुछ मोबाइल में हैं और सब लाइव है।‘

लॉक डाउन के पहले चरण में जो डेड हो गए थे , वे दूसरे चरण में लाइव हो गए। कोई किचन में कोई क्लास में। जिसकी रोटी कभी गोल नहीं बनी, वह कुकरी क्लासें लाइव ले रहा है। जिन्हें ज्योतिष का क ख ग नहीं पता ,वे एस्ट्र्ालॉजी के लाइव कोर्स चला कर जम कर पैसा कूट रहे हैं। महिलाएं पार्ट टाईम लाइव होकर टेरो कार्ड सिखा रही हैं । जिनकी दूकान पर मक्खी तक नहीं घुसती थी वे ऑनलाइन सड़ा माल बेच रहे हैं। बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं। मैडमें बच्चों के मोबाइल, लैपटॉप पर जीती जागती पूरे मेकप में हाजिर है। बुजुर्ग लाइव लूडो खेल रहे हैं या तंबोला में वक्त काट रहे हैं। कोई ऑनलााइन खाना बना रहा है तो गाना गा रहा है। कोई खा रहा है तो कोई बेच रहा है । 

जिन्हें चुटकला तक समझ नहीं आता था, वो वेबीनार पर लाइव होकर कविता पाठ कर रहे हैं, साहित्यिक चर्चा कर रहे हैं। ज्निहें यह नही मालूम कि भारत में कितने राज्य , कितने केंद्र शासित प्रदेश हैं , वे गलवान मुददे पर इंडो - चाइना रिलेशन, भारत की विदेश नीति क्या हो ...जैसे मुदद्ों पर बतिया रहे हैं छुटभइये चैनलों पर लाइव होकर एक दूसरे को गरिया रहे हैं।

जो आजकल किसी के मोबाइल पर लाइव नहीं दिखता तो लोग शक करने लगते हैं कि भाई कहीं पाजिटिव होकर चुपचाप निकल तो नहीं लिया ? दिल्ली जैसी जगह तो घर वालों को ही नहीं पता चलता कि आखिर हुआ क्या हैं

सो भइये ! आज लाइवली और पाजिटिव रहने की बजाय लाइव दिखना लाइव होने से ज्यादा इम्पोर्टेंट है। 

सो  बेशक लाइव हो , पर लाइव दिखो ।  

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- मदन गुप्ता सपाटू,

458, सैक्टर 1, पंचकूला.-134109 , हरियाणा।

Wednesday, June 17, 2020

व्यंग्य--आज खुश तो बहुत होगे तुम

  जैसे फर्स्ट डे फर्स्ट शो के कई दीवाने होते हैं, ‘यह खबर सबसे पहले हमारे चैनल’ पर या ‘देश का सबसे तेज चैनल’ या  , फर्स्ट फिंगर फर्स्ट वाली कैटेैगरी के प्राणी होते हैं, ठीक वैसे ही भक्तों की भी एक प्रजाति है जो मंदिर खुलने से पहले वहां पहंुच जाती थी या धार्मिक समागमों में भी रात के समय दरी बिछा कर अपनी सीट पक्की कर लेती थे । ऐसे कितने ही भगवान के दर्शनार्थी थे जो मंदिरों का लॉक ओपन होते ही सबसे पहले मैं की हाजिरी लगाने में पीछे नहीं थे।

    पहले दिन ,पहले मैं की दौड़ और होड़  में हमारे मित्र बाबू कोरोना प्रसाद गुप्ता थे । वैसे उनका नाम के.पी .गुप्ता है परंतु कोराना के आपातकाल में पुलिस ने उनके कई विश्ेाष अंग बार बार लाल किए, सड़कों पर डांडिया खिलाया, डड्डू डांस करवाया। रही  सही कसर उनके पड़ोसियों ने निपटा दी। उनका पड़ोसी कोरोना पाजिटिव निकला और के.पी जी तीन बार 14..- 14 दिनों के लिए हाउस अरेस्ट हो गए। तब से उनका शुभ नाम मुहल्ले में कोरोना प्रसाद हो गया।

   भगवान का लॉक खुलते  ही सबसे पहले इन्हांेने ही  भक्तों की सुपर कैटैगरी में अपना नाम दर्ज करवा दिया। जूते , जूता घर में सजाए, हाथ सेनेटाइज करवाए, मास्क लगाए, ग्लॅव्ज पहने , थर्मल स्क्रीनिंग से गुजरे, एक मशीन ने फूलों की जगह अन्य सैनेटाइजर की फुहार छोड़ी। मोबाइल में आरोग्य सेतु एप पर उनका स्टैटस चेक हुआ। बाबू के.पी,को  मूर्ति से दस फीट दूर बंधी रस्सी से भी दूर खड़ा किया गया । के .पी. को ऐसे लगा मानो  मंदिर में नहीं कोरोना संेटर जा रहे हैं।

   पंडित जी ने सोचा ,मन न ही मन ये भक्त, कोराना खत्म होने की प्रार्थना करेंगे परंतु कोरोना प्रसाद, बायां हाथ कमर पर टिका  कर और थोड़ा टेढ़ा होकर, अमिताभ बच्चन स्टाइल में शुरु हो गए ,‘ आज खुश तो बहुत होगे तुम........ कि आज तुम्हारे मंदिर से बैन उठा लिया गया है। लॉकअप से बाहर आ गए हो तुम। सतयुग में शनि की कुदृष्टि से बचने के लिए साढ़ेसाती के दौरान पानी में छुपना पड़ा आशुतोष  कहलाए और कलयुग में ,शनि कोरोना बन कर तुम्हें 80 दिन की सजा दे गया। और अभी आगे की कोई गारंटी नहीं। मैं तुम्हारे मंदिर की सीढ़ियों पर जिंदगी भर नाक रगड़ता रहा, प्रसाद चढ़ाता रहा, तालियां बजा बजा कर भजन करता रहा......... और तुमने मुझे क्या दिया ? 42 दिन का क्वारेंनटाइन ?’ 

    कोरोना प्रसाद चालू रहे,‘ मैं तुम्हें बड़ा शक्तिशाली समझता रहा। मेरी भूल थी। शक्तिशाली तो कोरोना देव निकला । हमने समझा तुम्हीं तांडव करते हो लेकिन इसने  तो सारे जहान में  तांडव मचा डाला। तुम बस डमरु बजाते रह गए, वो पूरे अमरीका , इटली, इंगलैंड समेत भारत का बैंड बजा गया और तुम देखते रहे, दुबक कर मंदिर में छिप गए।’

    अब तुम्हें भी सजा मिलेगी, बरोबर मिलेगी। न कोई प्रसाद चढ़ाएगा न पैसे। न जल चढ़ाएगा न फूल पत्ते। न कोई तुम्हारे नजदीक आएगा, न कोई तुम्हारे आगे नाचेगा। न कीर्तन मंडली की महिलाएं फिल्मी तर्जों पर भजन गाएंगी, न कोई नाचेगा। तुम्हें भी हमारी तरह वक्त का पाबंद रहना होगा। भक्त तुमसे 6 फुट दूर रह कर बात करेंगे। पहले भक्त तुम से डरता था, अब तुम उससे डरोगे कि कहीं तुम्हें संक्रमण न हो जाए। तुम अपने आप को बहुत बड़ा समझते थे। अब बताओ कोरोना बड़ा कि तुम ? आज इंसान प्रार्थना करेगा कि तुम भी शनि रुपी कोरोना से मुक्त हो जाओ और तुम्हारे भी अच्छे दिन आ जाएं।

तभी कोरोना प्रसाद को पुलिस वाले का डंडा दिखा और वे चुपचाप दूसरी पतली गली से निकल लिए।

मदन गुप्ता सपाटू, 458, सैक्टर 10, पंचकूला

Saturday, May 9, 2020

मैं आज भी वही हूं

बीत गया जो वक्त
तो अब क्यों
मुझे तलाश रहे हो।
जब थे आपके पास
तो बस आपके ही थे।
अब गैरों ने
जब बाहें पकड़ ली
तो क्यों अब
हताश और परेशान हो रहे हो?
क्या बीता हुआ बीता वक्त
अब याद आ रहा है,
या फिर बीते हुए लम्हों की
अपनी गलतियां
अब याद आ रही है?
तुम तो कहते थे
मुझे में बहुत कमियां है,
और मुझे में वो
काबिलियत नहीं
जो मोहब्बत करने वाले
आशिकों के पास होती है।
पर आज मुझ में
वो काबिलियत तुम्हें
कहाँ से दिखगी?
पर मैं तो आज भी वही हूं
नाजुक से दिल वाला
जो अपने दर्द से ज्यादा
दूसरों के दर्द को
ज्यादा महसूस करता हूं।


राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029


Tuesday, April 28, 2020

ये भारत है

ये भारत है

सीधा है सच्चा है कुछ कर गुजरने का जज्बा है

जितना है वो काफी है,जो है वो ही पर्याप्त है

संकट कोई भी या वक्त कैसा भी जब सामने आए

हमारे जज्बे से न लड़ पाए

ये भारत है

जिसके लिए ह्रदय भावनाओं से ओतप्रोत हो जाता है लेकिन

जिसकी व्याख्या के लिए शब्दकोष के शब्द कम पड़ जाते हैं

परिभाषाएँ संकीर्ण प्रतीत होने लगती हैं लेकिन

संभावनाएं असीमित दिखने लगती हैं

ये भारत है

अनेकों उम्मीदों को जगाता 

असंख्य आशा की किरणें दिखाता

ये भारत है

 

Saturday, April 18, 2020

आज की नारी 

सदियों से नारी शोषित दमित रही है और हमनें मांन लिया कि दर्द ही औरत की नियति है और कविताओं में कहानियों में भी उसके दर्द को महिमा मंडित करके प्रस्तुत करते रहे 

लेकिन आज की नारी वह नारी नहीं है जिसका चीर हरण भारी सभा में हुआ था ना ही वह नारी है जिसको उसका अपराध  बताये बिना त्याग कर बाल्मीकि जी  के आश्रम में छोड़ दिया गया था बल्कि आज की नारी का रूप रणचंडी का है जो अपनें अपमान का बदला वह स्वंय लेती है और जुल्म का प्रतिकार करती है 

आज की नारी वैज्ञानिक है डॉक्टर है इंजीनियर है एस पी है कलेक्टर है न्यायाधीश है  प्रगति के इस युग में वह हर छेत्र में अग्रिणि है पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है ऐसे में हम साहित्यकारों कवियों का कर्तव्य है कि हम उसके इन रूपों को भी अपनी कविताओं कहानियों में उजागर कर पूर्व में किए गये उसके साथ अन्याय का प्रायश्चित करें ना कि उसके दर्द को उसकी पीड़ा को महिमामंडित एवं डेकोरेटेड कर के उसे यह याद दिलाते रहें कि वह अबला है असहाय है पुरुषों पर आश्रित है हमें ऐसे समय में उसका साथ देंना चाहिए ताकि वह अपनें पैरों पर स्वंय खड़ी हो सके 

आज की नारी को स्वंय भी समझना चाहिए कि यह समय उसकी पारीक्षा का है और उसे स्वंय भी इस परीक्षI को अच्छे नंबरों से उतीर्ण होँना है ना कि फ़ैशन की अंधी दौड़ में अपने शरीर का भौंडा प्रदर्शन कर के नारी के  देवी रूप को लजाना हैं तभी हम गर्व से कह सकेंगे यत्र नारी पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता 

 

डॉ रमेश कटारिया पारस 30, गंगा विहार महल गाँव ग्वालियर म .प्र .

जीवन का सार (डिप्रेशन , निराशा , अवसाद से उबरने का महामंत्र )

 हर समस्या का हल है बशर्ते आप ईमानदार हो 

तुम्हारे करने से कुछ नहीं होनें वाला तुम होते कौन हो कुछ करनें वाले 

जो भी करता है ईश्वर ही करता है और ईश्वर जो करता है अच्छा ही करता है 

 

हाँ ये बात हो सकती है उस वक़्त तुम्हे समझ में ना आये जिस वक़्त आपका बुरा समय चल रहा हो .स्थिति सामान्य होते ही यह बात आपको अच्छी तरह समझ में आ जाती है 

कि ईश्वर जो भी करता है अच्छा ही करता है .हर हाल में ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए 

जब सब रास्ते बन्द हो जाएँ और समस्या का कोई हल ना सूझ रहा हो अक़्ल काम ना कर रही हो तब सब ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए 

और इसे अपनें कर्मों का फल समझ कर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और उसके लिए ईश्वर से क्षमा माँगनी चाहिऐ और उस का प्रायश्चित करना चाहिए 

 

जिस स्थिति. परिस्थिति .अथवा व्यक्ति को आप बदल नहीं सकते उसे उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए 

दूरस्थ और संदिग्ध कार्यों को छोड़ कर सन्निकट और निश्चित कार्यों को ही हाथ में लेना ही हमारा मुख्य ध्येय होँना चाहिए 

 

विगत और आगत का भार ढोकर चलने  वाला प्रचंड पराक्रमी भी लड़खड़ा जाता है 

 

हे प्रभु केवल आज का भोजन जुटा दे कल की  चिन्ता छोड़ दो कल अपनी सुध आप लेगा 

आज की कठनाइयाँ ही क्या आज के लिए कम हैं 

कल पर विचार अवश्य कीजिए , उस पर मनन कीजिए योजनाएँ बनाइये तैयारियाँ कीजिए किन्तु उसके लिए चिन्तित मत होईये 

भूत सपना है और भविष्य कल्पना सुखद वर्तमान से ही भूत के  सुखद भविष्य की सृष्टि  होती है और आनें वाला कल आशा मय बन  जाता है

 

यदि हम हर वक़्त मीठा मीठा ही खाएँगे तो कड़वा कौन खायेगा अतः हमें कड़वा खानें के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ 

यदि आप हर वक़्त अपनी ही बात मनवायेगे तो लोग आपसे सलाह लेंना बन्द कर देंगे 

बीती हुई बातों को याद करके दुःखी होकर वर्तमान को कटु ना बनाएँ 

अपनें आप से पूछिए संभावित अनिष्ट क्या हो सकता है,  यदि अन्य कोई उपाय ना हो तो उसे स्वीकार कीजिए , 

डरें नहीं भय से चिन्ता होती है और चिन्ता आपको हताश और निराश बना देती है .

जो व्यवसाई चिन्ताओं से लड़ना नहीं जानते उन्हे अकाल मृत्यु का ग्रास बनाना पड़ता है   आज की परिधि में रहिए भविष्य की चिन्ता छोड़िए रोज नई जिन्दगी का श्रीगणेश कीजिए .

चिन्ता के कारण जो भारी मूल्य आपको चुकाना पड़ेगा जरा उसका ख़याल कीजिए चिन्ता का कारण क्या है , क्या उपाय हो सकता है मैं क्या कर सकता हूँ .प्रयास कब शुरू करूँगा समस्या क्या है समस्या का हेतु क्या है संभावित समाधान क्या है .

चिन्ता आपको मिटा दे उससे पहले आप उसे कैसे ख़त्म किया जाये ये सोचो 

हथेली पे सरसों उगाने की कोशिश ना करें व्यस्त रहकर चिंताओं के जमघट को दूर हटाइये  घुल घुल कर मरने वालों के लिए ये सर्वोत्तम औषधि है तुच्छ बातों पर सिर मत धुनिये ये बातें जीवन की दीमक हैं होंनी को स्वीकार कीजिए जिसे आप बदल नहीं सकते कहिए ठीक है अपनी चिंताओं को सीमित कीजिए उनका मूल्य निश्चित कीजिए अधिक मूल्य मत चुकाईये .

बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले 

मस्तिष्क भी अपनी जगह एक ही है यह अपनें में ही स्वर्ग को नर्क और नर्क को स्वर्ग बना सकता है .

आप स्वयं ही अपनें लिए शान्ति प्राप्त कर सकते हैं सुख अपनें अन्दर ही है वर्तमान में ढलने का प्रयास कीजिए .

अपने शरीर की हिफाज़त कीजिए 

इसका निरादर मत कीजिए इसका दुरुपयोग मत कीजिए ताकि यह स्वस्थ बना रह कर तुम्हारी उन्नति में सहायक हो अपना स्वभाव अच्छा रखिए सुंदर दिखने का प्रयास कीजिए दूसरों की प्रशंसा कीजिए. धीरे बोलिए. विनम्र रहिए किसी में दोष मत निकालिए .किसी को नियमित करने का प्रयास मत कीजिए .वर्तमान की समस्यायों को सुधारने का प्रयास कीजिए .जो काम जीवन भर करना है उसे ख़ुश होकर कीजिए .

आराम कीजिए परमात्मा का सुमरन कीजिए उसका ध्यान कीजिए ताकि जीवन के विषय में अन्तर्दृष्टि प्राप्त कर सको आनद पूर्ण ढंग से सोचिए तथा व्यवहार कीजिए आप आनन्द का अनुभव करेंगे जैसे के साथ तैसा करके हाँनि मत उठाइये .शत्रु को झोंकने के लिए भाड़ को इतना ज्य़ादा तेज मत करो कि तुम स्वयं  जल जाओ .यदि हम चाहें तो हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता ना नीचा दिखा सकता है जो व्यक्ति  आपको पसन्द नहीं उसके बारे में सोच विचार  कर एक भी पल नष्ट ना करें कृतघ्नता के बारे में चिन्ता ना कर हमें उसे स्वीकार कर लेंना चाहिए ईसा नें एक बार सौ व्यक्तियों को ठीक किया था उनमें से केवल एक धन्यवाद देनें आया था जितनी कृत्यग्यता ईसा  को मिली थी  इससे ज्य़ादा की आशा ना करें

तुम इसलिए दुःखी क्यों होते हो कि तुम्हारे पास जूते नहीं हैं वे भी तो लोग हैं जिनके पास पाँव ही नहीं हैं जब तक आपके पास पीनें  के लिए स्वच्छ पानी  खानें के लिए भोजन है आपको अन्य किसी बात की शिक़ायत नहीं होनीं  चाहिए .अपनें वरदानों को याद रखिए कठनाइयों  को भुला दीजिए .दूसरों की नक़ल ना कीजिए अपनें को पहचानिए और जो आप हैं वही बने रहिए जीवन की खटास को मिठास में बदल दो .दो क़ैदी एक साथ जेल से बाहर आये एक नें सर ऊपर कर के तारे देखे दूसरे नें सर नीचे कर के कीचड़ देखी .एक बार सुप्रसिद्ध वायलिन वादक आलेबुल पेरिस में अपना कार्यकम दे रहे थे यकायक वायलिन का एक तार टूट गया किन्तु आलेबुल नें तीन तारों पर ही अपनी धुन को सफ़लता पूर्वक पूरा किया .विशेषता इसी में है कि यदि एक तार टूट जाए तो तीन तारों पर ही अपना काम चला लिया जाए इसी में जीवन की सफ़लता है 

उन उड़ते हुए पच्छीयों को देखो वे अपना अनाज बोते नहीं हैं फ़सल नहीं काटते भण्डार नहीं करते फ़िर भी परमपिता परमात्मा उनका पोषण करता है फ़िर तुम तो उनसे अच्छी स्थिति में हो पहले उस अध्यात्म एवं सत्य की साधना करो अन्य सभी वस्तुएँ तुम्हे  स्वतः  मिल जाएंगी .अपनी आलोचना की भरसक उपेक्षा करनें का प्रयास करो अनुचित आलोचना परोक्ष रूप से हमारी प्रशंसा ही होती है प्रायः उसका अर्थ ये ही होता है कि आपनें दूसरों में स्पर्धा एवं ईर्ष्या को भड़काया है याद रखिए मरे हुऐ कुत्ते को कोई लात नहीं मारता .आराम कीजिए ताकि आप अधिक काम कर सकें अपनें कार्य का क्रम उसके महत्व के अनुरूप निर्धारित कीजिए यदि आप सो ना सकें तो उठ कर बैठ जाइये जब तक नींद ना आये पढ़ते रहिए या कोई काम करते रहिए .याद रखिए नींद की कमी से आज तक कोई नहीं मरा 

प्रायः अनिद्रा से भी अधिक हानि अनिद्रा की चिन्ता से होती है प्रार्थना कीजिए .यदि आपके पास समस्या पर निर्णय लेनें के लिए आवश्कत तथ्य हों तो उसे वहीं उसी समय उसी क्षण कीजिए अपने काम का वितरण कीजिए उसे व्यवस्थित कीजिए देखरेख कीजिए कभी जुआ मत खेलिए नियमित आय का स्रोत बनाए रखिए हींन भावना मत पालिए जिसनें हमें  इस दुनियाँ में भेजा है वो मेरे साथ है उस परमेश्वर नें मुझे अकेला नहीं छोड़ा है .

समस्याओं को ठीक से  समझ लो समस्या का कारण ज्ञात करो समस्या सुलझाने के लिए शीघ्र ही कोई सक्रिय क़दम उठाओ उठ कर परिस्थियों का मुकाबला करो जितना समय और शक्ति तुम समस्या की चिन्ता करनें में करते हो यदि उसका आधा भी तुम उसे सुलझाने में लगाओ तो तुम्हे चिन्ता कभी हो ही नहीं चिन्ता करनें की आदत मत डालो .

अपने को व्यस्त रखिए अपनें सुख दुःख की चिन्ता करना ही तुम्हारे दुःख का कारण है .

और हाँ जीवन में कोई भी चीज मुफ़्त नहीं मिलती बन्द घड़ी भी दिन में दो बार ठीक समय बताती है इसलिए कुछ भी बेकार नहीं होता हर चीज का सदुपयोग किया जा सकता है किसी भी ऐसे काम की शुरुआत ना  करें जिसे आप ख़त्म ना कर सकते हों 

यदि आप नहीं जानते कि बोलना कैसे है तो बेहतर है कि आप चुप रहें 

 

खाली बोरी कभी भी सीधी खड़ी नहीं हो सकती 

जो झिझकते हैं वे हारते हैं 

 

कनेक्शन ना होनें पर अधिकतर तार बेजान हो जाते हैं 

 

किसी के पीछे मत चलिए लेकिन सीखिए सबसे 

जब दूसरों को बदलना सम्भव ना हो तो ख़ुद को बदलिए 

 

किसी पर अंधविश्वास मत करो जब हम अंधविश्वास करते हैं तभी धोखा खाते हैं जब तक कोई ईमानदार सिद्ध ना हो जाए तब तक उसे संदेह के घेरे में ही रखे यदि वह जब तक बेईमान ना सिद्ध हो जाए तो उसे ईमानदार समझोगे तो निश्चित धोखा खाओगे  ये तुम्हारी योग्यता की कसौटी है 

ग़जल

सूरज के संग टकरा जाना खेल नहीँ होता 

शोलों पर चल कर दिखलाना खेल नहीँ होता 

 

खेल नहीँ होता कोई लहरों से अठखेली करना खेल नहीँ होता 

तूफानों में नाव चलाना खेल नहीँ होता 

 

ऊँची ऊँची बाते तो सब लोग यहाँ पर करते है 

कह कर उसको कर दिखलाना खेल नहीँ होता 

 

फूलों के संग गुजर बसर तो कोई भी कर लेता है 

कांटों के संग दिल बहलाना खेल नहीँ होता 

 

अपनो को ही गले लगा कर गाँधी वादी बनते हो 

दुश्मन कोभी गले लगाना खेल नहीँ होता 

 

भारी भरकम शब्द सजाकर गीतकार बन बैठे हो 

सहज सरल शब्दो से रिझाना खेल नहीँ होता 

 

अपने मन में इर्षाओ की गाँठ लिए बैठे है लोग 

कुंठाओं की बर्फ गलाना खेल नहीँ होता 

 

मैल ह्रदय में भरा हुआ हो वह फ़िर भी छुप सकता है 

धवल वस्त्र पर दाग़ छुपाना खेल नहीँ होता 

 

इक दूजे को प्यार करेंगे आपस में समझौता है 

समझौते को सही निभाना खेल नहीँ होता 

 

उल्टी सीधी कूद फांद तो कोई भी कर लेता है 

ग़ज़ल सुनाकर रंग जमाना खेल नहीँ होता 

 

ग़ज़ल 

 

चरणों का इक दास भी होना मँगता है 

कुछ तो अपने पास भी होना मँगता है 

 

अल्लम गल्लम बहुत भर लिया झोली मेंं 

अब थोड़ा सा ख़ास भी होना मँगता है 

 

काजू और बादाम रखे हैँ प्लेटों मेंं 

हाथों मेंं अब ग्लास भी होना मँगता है 

 

काँपते हाथों से क्या क्या कर पाओगे 

ज़ीवन मेंं कुछ पास  भी होँना मँगता है 

 

पतझड़ ही पतझड़ अपने ज़ीवन मेंं 

ज़ीवन मेंं मधुमास भी होँना मँगता है 

 

मीरा राधा  रुकमणि सब आ गईं यहाँ 

व्रन्दावन मेंं रास भी होना मँगता है 

 

 

ऊपर वाला पार लगायेगा तुमको 

इतना तो विश्वास भी होना मँगता है 

 

जिन गुनाहों की सज़ा मिली है तुमको 

उन सब का एहसास भी होना मँगता है 

 

कब तूफ़ान मचेगा अपने ज़ीवन मेंं 

इसका कुछ आभास भी होना मँगता है

 

राम नें फ़िर से जन्म लिया है धरती पर 

अब के फ़िर बनवास भी होना मँगता है 

 

जानें क्या क्या हज़म कर गये नेता जी 

अब तो इक उपवास भी होना मँगता है 

 

कौन किसी को याद रखेगा पारस जी 

अपना इक इतिहास भी होना मँगता है

 

ग़ज़ल 

 

कभी तो ऊपर जाकर देखो 

दिल मेंं भी समाकर देखो 

 

बहुत खुला आकाश मिलेगा 

अपने पर फैला कर देखो 

 

मुद्दत हुईं ज़मी पर चलते 

स्वर्ग मेंं जगह बना कर देखो 

 

नाच  रहे हो जिनके  इशारों पर 

उनको भी कभी नचा कर देखो 

 

गुमसुम से क्यूँ पड़े हुवे हो 

कभी तो रास रचा कर देखो 

 

सबकी सुनता है  ऊपर वाला 

दिल से शोर मचाकर देखो 

 

मीठा मीठा खाया अब तक 

अब कड़वा भी खा कर देखो 

 

हरदम  क्यूँ रूठे रहते हो 

सबसे  हाथ मिला कर देखो 

 

दिलसे दिल मिल जाएँ शायद 

कभी  तो हाथ बढ़ा  कर देखो 

 

सपनों मेंं खोये रहते हो 

सच से आँख मिला कर देखो 

 

ग़ज़ल 

 

नदिया जब भी उफान पर आई 

खेत की मिट्टी कटान पर आई 

 

खड़ी फ़सल की देख भाल करने को 

रात की रोटी मचान पर आई 

 

फूल की तरह खिल गए चेहरे 

फ़सल जब खलियाँन पर आई 

 

हमने पूरी की है अपने बचचौ की 

जो भी ख्वाइश जुबान पर आई 

 

लोग उसका मोल भाव करने लगे 

अस्मत जब भी दुकान पर आई 

 

मरते दम सिकंदर भी हो गया बौना 

जब उसकी मिट्टी कब्रिस्तान पर आई 

 

हमने सर भी कटा दिए पारस 

बात जब आन बान पर आई 

 

 

ग़ज़ल 

 

 

अपनों से जब दूर पिताजी होते हैँ 

बेबस और मज़बूरपिताज़ी  होते हैँ 

 

बेटे साथ खड़े होते हैँ जब उनके 

 

हिम्मत से भरपूर पिताज़ी होते हैँ 

 

दादाजी से मिलनें जब भी जाते हैँ 

 

थक कर के तब चूर पिताज़ी होते हैँ 

 

अम्मा जबभी कोई फरमाईश करतीं हैँ

 

तब कितने मज़बूरपिताज़ी होते हैँ 

 

बेटे बहुएँ मिलकर सेवा करते हैँ 

 

ऐसे भी मशहूर पिताज़ी होते हैँ 

 

बच्चों के संग मेंं बच्चे बन जाते हैँ 

 

खुशियों से भरपूर पिताज़ी होते हैँ 

 

पूरा कुनबा एक जगह जब होता है 

 

रौशन सा इक नूर पीताज़ी

होते हैँ 

 

हर ग़लती पर सबको टोका करते हैँ 

 

आदत से मज़बूर पिता ज़ी होते हैँ 

 

बहन बेटियों के लिऐ है प्यार बहुत 

 

पर पाकिट से मज़बूर पिता ज़ी होते हैँ 

 

बच्चे जब उनकी बात नहीँ सुनते 

 

हिटलर से भी क्रूर पिता ज़ी होते हैँ 

 

उदास देखते हैँ किसीको जब अपने घर मेंं 

 

तब ग़म से रन्जूर पिता ज़ी होते हैँ 

 

जब कोई अच्छी कविता लिख लेते हैँ 

 

कबिरा और कभी सूर पिताज़ी होते हैँ 

 

सारा दिन मेहनत करते हैँ दफ़्तर मेंं 

 

कभी अफ़सर कभी मज़दूर पिताज़ी होते हैँ  

 

डॉ रमेश कटारिया पारस 30,गंगा विहार महल गाँव ग्वालियर म .प्र .

Thursday, April 16, 2020

इंसानियत (कविता )

क्यों कहा जाता है कि 



इंसान बनों 

और इंसान बनकर 

इंसानियत को अपनाओ 

खुद के मन में

सवाल उठता है 

क्या हम 

इंसान नहीं? 

क्या हमारा 

कर्म?

इंसानियत वाला

नहीं? 

अपने कर्म का

आत्मविश्लेषण 

चला। 

 

तो पाया 

इंसान का

मुखौटा ओढ़ कर 

 

कर्म हैवानियत 

के हो वह इंसान 

नहीं। 

मुखौटे की 

ओट में

नफरतों की 

शमशीरे

छुपाना 

 

इंसानियत नहीं

 

कर्म होवे इंसान 

जैसे

मुखौटे में

छिपे समदृष्टि

समभाव 

वही 

वास्तव में

इंसानियत 

 

हीरा सिंह कौशल गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी 


यज्ञ है मुश्किल पर मुमकिन नहीं

 


यज्ञ है मुश्किल




पर मुमकिन नहीं



कठिन है परीक्षा की घड़ी

संयम से घरों में रह कर

टूटने ना देंगे जीत की कड़ी

 

हार नहीं हरा कर मानेंगे

हर कष्टों का हवन करेंगे

जन जन जय घोष करेंगे

अदृश्य गरल को धो डालेंगे

 

दीपों की माला से अलंकृत

भारत वर्ष को लौ से सुसज्जित

गम के तिमिर हर ,कर दें उदित

फिर से हर मुख हो मुदित

 

 

काले बादल से झाँकेगा चंदा

अमावस दूर करेगी पूर्णिमा

जगमग ज्योति की उष्मा से

कर्मवीरों की श्रम साधना से

 

नव विहान प्रकाश पुंज की लड़ियों से

अंधकार को उजाले के विश्वास से

आओ मिटाए अंधतमस को

मिल जुल रख फ़ासले के प्रयास से...

 

सविता गुप्ता 

राँची-झारखंड

कविताएं

धरती और अंबर


सुनों,
स्वीकार करना होगा तुमको

मेरा ये

मौन और निशब्द प्रेम ही ,

क्योंकि

चाहकर भी नहीं मिलते

धरती-अंबर कभी !!

 

सुनों,

करती हूं स्पर्श तुम्हें

अद्रश्य हवाओं से ,

और..

बरस जाते हो तुम भी

अतृप्त मेघ से !!

 

 

शीर्षक - एक बीज अपने लिए..

 


कब से भींचे हुए थी

ये मुट्ठी

बहुत कसकर,

..संभाल रखे थे

अनगिनत बीज

और उनके अनगिनत जंगल ,

पर कब तक..

लो, गिरने लगे एक-एक कर

सब कहीं

इधर-उधर !!

 

हां, जरूरी था..

बहुत जरूरी था

अंकुरित होना इन बीजों का

कि उपजने लगी थी

कंक्रीट-कल्चर चारों ओर !

 

पर, रहनें देती हूं एक बीज

अपने लिए

.. सिर्फ अपनें लिए

बिना पर्यावरण की चिंता किए हुए !!

 

 

शीर्षक - पुरानें पन्नें

 


क्यों ढूंढ रही हूं

अब भी

पुराने "शब्द"

बरसों से बंद अलमारी में !!

 

एक दिन ,

फ़ाड़ दिये थे सब

वो कुछ पन्नें..

पुरानी डायरी..

पर, छूट गया था

"थोड़ा कुछ" कि

कर रही हूं कोशिश

उन्हें "पढ़ने" की ,

और..

समझने की

वो सारे "अर्थ"

जो होने लगे थे धुंधले

समय की गर्त में !!

 

..खोज रही हूं मायने

उनके होनें के !!

 

 

शीर्षक - नाम उसका..

 






उस दिन

नम होकर

ओस की नमी में

आखिर लिख ही दिया न

.."नाम" उसका !!

 

सुनों..

गीलेपन में उसके

सुलग रहा है

भीतर ही भीतर

अब तक "कुछ" ,

..महसूस किया क्या ??

 

हलचल मन की

स्पष्ट दिखी थी

उंगलियों में तुम्हारी

कि सिमट सा गया था

कुछ.. बहुत कुछ

हां, उसी ओस में !!

 

 

शीर्षक - तेरे ये शब्द..

 


..ये शब्द

हां, यही शब्द.. अक्सर

ढक लेते हैं मुझको

आवरण से ,

..कि नितांत असमर्थताओं में भी

जन्मनें लगती हैं

आकांक्षाएं !!

 

..ये शब्द

हां, यही शब्द.. अक्सर

बचा लेते हैं मुझको

सुरक्षित

प्रत्येक अवरोधों से ,

..कि लौट आती हूं मैं वापस

अपनी कविताओं में

कुछ कहने को नया !!

 

Namita Gupta"मनसी"











Monday, April 13, 2020

कोरोना को हराना है

 

चाहे छाये हर और सूनापन,मिलना हो जाये एक दूजे से कम।

कितना भी मन घबराए,चाहे कितनी भी दहशत बढ़ती जाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।* 

 

व्यवसाय कैसे चल पाएंगे और अब कैसे बच्चे पढ़ पाएंगे।

चाहे कितनी भी विपदाएं आये,घर मे मन कितना भी घबराए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

देश की लड़ाई लड़ते जाए,किसी तरह कोरोना को मार भगाए।

अंधकार से लड़ते जाए,नए उजाले की और बस बढ़ते जाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

जब अकेले कुछ ना हो पाए,एक दूजे से क्यों ना मिल जाए।

एक दूजे हम समझाए,कोई भी बस घर से बाहर जाने ना पाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

कीमती मौत

अस्पताल में जिधर दृष्टि जाती उदास मुरझाए चेहरे ही नज़र आ रहे थे। कन्हैया को आज आभास हो रहा था संसार में कितना दुख है। वरना मां उसे आभास ही कहाँ होने देती की उसकी स्थिति कितनी दयनीय है। 16 वर्षीय कन्हैया अपनी माँ सीता का लाडला था। खेतों में मजदूरी कर वह जो कुछ भी पाती उसे बड़े जतन से पका कर उसके सामने रख देती। उसे भी अपनी माँ से कम स्नेह नहीं था वह भी पहला कौर उन्हें खिला कर ही खुद खाता। कभी कभी उसे बहुत दुख होता कि माँ को कितना दुख उठाना पड़ता है। वह भी मजदूरी करना चाहता मगर माँ हमेशा मना कर देती। कहती, तू अभी बच्चा है । थोड़ी पढ़ाई लिखाई कर ले फिर खूब कमाना। वह उसे ज़बरदस्ती स्कूल भेजती। माँ को बड़ी इक्छा थी कि वह पढ़े लिखे। जो कमाती उसी की देखभाल और  कॉपी किताब में समाप्त। सुनती सरकारी स्कूल में पैसे मिलते हैं किताबों के लिए। मगर सरकारी पैसा कभी समय पर मिला है क्या। सो जो कमाती सब इसी में समाप्त। घर में एक ढेला भी ना बचा रखी थी। ऐसे में यह आफत टूट पड़ी। छह महीने पहले ही सरकारी अस्पताल के किसी डॉक्टर ने बताया था कि किडनी में सूजन हो गया है अच्छे से इलाज न करवाया तो किडनी खराब भी हो सकती है। मगर सीता ने यह बात सुनी अनसुनी कर दी। मगर इस आफ़त की घड़ी में आँख मूंदे पड़ी थी। बगल में उसका एकलौता बेटा बैठा सुबक रहा था। साथ में उसका एक मात्र मित्र रवि था जिसकी ऑटो में माँ को लेकर आया था। रवि उसे ढाढस बंधा रहा था मगर अस्पताल की हालत देख कर मन तो उसका भी विचलित हो रहा था । हर तरफ एक चीख़ पुकार मची थी। रोते बिलखते परेशान लोग। कहराते मरीज़ बेड के अलावा फ़र्श पर भी पड़े थे। सीता को भी बेड कहाँ मिल पाया था। दोनों बच्चे उसे लिए एक कोने में बैठे थे। कुछ समय बाद डॉक्टर आए चेक किया और साथ खड़ी नर्स को कुछ समझा कर जाने लगे तो कन्हैया हाथ जोड़ कर सामने खड़ा हो गया।
डॉक्टर साहब हमारी माँ को बचा लें।
मैंने नर्स को समझा दिया है। बेड अरेंज होने के बाद इनका इलाज़ शुरू हो जाएगा। अभी जो ज़रूरी है नर्स कर देगी।। कहते हुए डॉक्टर साहब अगले मरीज़ की तरफ बढ़ गए।
नर्स ने वहीं मरीज़ को लिटाने को कहा और पानी का एक बोतल लगा दिया। बोतल लगाने का स्टैंड भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा था इसलिए कन्हैया को हाथ में ही बोतल ले कर खड़ा होना पड़ा।
दोपहर से शाम हो गई। उसके हाथ सुन्न हो जाने के कारण
अब रवि बोतल पकड़े खड़ा था। फर्श पर बैठा कभी को अपनी माँ की ओर देखता तो कभी दूसरे मरीज़ों की ओर। उसका मन फूट फूट कर रोने का हो रहा था मगर वो सिसकियों में खुद को संभालने का प्रयत्न कर रहा था।
इतना बड़ा अस्पताल और मरीज़ों को रखने की जगह नही। उसने दुख से कहा
अरे सरकार भी क्या करे देखते नही कितने मरीज़ हैं। जितनी भी व्यवस्था कर ले कम ही पड़ जाती है।
हूँ... कन्हैया ने हुंकारी भरी।
याद नही है स्कूल में मैडम जी ने क्या पढ़ाया था सारी समस्या की जड़ ये जनसंख्या है। रवि ने फिर कहा
हाँ ठीक ही कहते हो। सरकार भी कितनी व्यवस्था करे। कन्हैया ने सहमति जताई।

वह पूरी रात यूँही बीत गई। बेड की कोई व्यवस्था नही हो पाई। हाँ नर्स ने पानी का बोतल लगाने के लिए एक स्टैंड ज़रूर ला दिया था। 10 बज गए थे डॉक्टर का अभी कुछ बता नहीं था नर्स ने ही बताया कि डॉक्टर साहब 12 बजे आएंगे। कन्हैया का मुख काला पड़ गया क्योंकि सुबह से उसने दो व्यक्ति को इंसान से लाश बनते देखा था।
मौत बड़ी सस्ती हो गई है ना रवि और जीवन बड़ी क़ीमती। कितनी आसानी से मर रहे हैं लोग। कन्हैया ने डूबते स्वर में कहा।
हिम्मत ना हार... हमें लगता है माँ का इलाज़ यहाँ ठीक से नही हो पायेगा। इन्हें प्राइवेट अस्पताल में ले जाना चाहिए। यहाँ तो डॉक्टर भी ना आया अभी तक। और आए भी जाने कब तक देखें मरीज़ो की संख्या देख। रवि ने चिंता भरे स्वर में कहा।
हाँ सो तो ठीक है। लेकिन वहाँ तो बहुत पैसे लगते हैं।
हाँ पर क्या यहाँ बैठे बैठे इंतज़ार करेगा। कोई न कोई उपाय तो करना ही होगा। माँ की हालत तो देख।

दोनों ने विचार किया और निकल गये। बगल में ही बड़ा सा निजी अस्पताल था। माँ को लेकर वहाँ पहुंचे। मगर वहाँ जा कर पता चला  इलाज के लिए 2 लाख रुपए लगेंगे।सुनकर दोनों का सर चकरा गया। 200कमाती है उसकी माँ रोज़। यह 2 लाख कहाँ से लाये। रवि ने उसे गाँव जा कर कोई व्यवस्था करने को कहा वरना माँ को बचा ना पाएगा।
रवि की बात मान वो गाँव जाने को निकला। गाँव जा कर कोई उपाय हो जाय शायद। मगर कर्ज़ भी ले तो चुकता कैसे करेगा?? फिर इतने पैसे देगा कौन?? यही सोचते हुए वो सड़क पर बढ़ा जा रहा था कि तभी सामने से एक ट्रक आता दिखा । वो हड़बड़ा कर एक ओर भागना चाहा मगर अचनाक दिमाग मे कुछ कौंधा और वो अपनी जगह पर ही ठहर गया। "माँ सस्ती मौत नहीं मरेगी।" उसने आँखे मूंद ली। तब तक  ट्रक उसे टक्कर मरते आगे बढ़ गया।
                               हर तरफ एक शोर मच गया। लोग दौड़ पड़े। कन्हैया के सर से खून की धारा बह निकली। शरीर खून से लहूलुहान था और ज़ुबान ख़ामोश...
अरे ट्रक तो घेरो, अरे एम्बुलेंस बुलाओ, सड़क जाम करो।
हर तरफ हंगामा मच गया। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई। भीड़ को चीरते हुए रवि कन्हैया के पास आ खड़ा हुआ। दिमाग़ में एक से घंटी बजी। तू तो बड़ा कीमती मौत मरा रे... उसकी आँखों से आँसू के दो कतरे कन्हैया के मुख पर गिर पड़ा.... जो मुस्कुरा कर कह रहा था " देख कर दिया न पैसे का इंतजाम"।

चाँदनी समर
मुज़फ़्फ़रपुर बिहार 


जलप्रपात के स्वर

चित्रकूट में जो राग सुनी धीरे-धीरे,


तार तार से बनती है धार यह धीरे धीरे


खुद ब खुद छोड़ देती तान, बड़ी-बड़ी पत्थरों को यहां


परिचित से लगते हैं यह स्वर


जब प्रकृति स्वयं जाती है गुनगुनाती है|


लोग मदहोश हो जाते हैं प्रपात कि इस धार में


ढूंढता नहीं कोई उसमें भाषा जातीय अपना देश


जब प्रकृति स्वयं गाती है गुनगुनाती है|


गरजती उफनती प्रपात के फुहारों में अंतर्मन भिगो रहे होते हैं


तब हमें याद नहीं आता संगीत के सप्त स्वर, कान सप्तक सुन रहे होते


जब प्रकृति स्वयं गाती है गुनगुनाती है----


श्रीमती आशा रानी पटनायक,


स्टेट बैंक कॉलोनी लालबाग जगदलपुर जिला बस्तर छत्तीसगढ़


Saturday, April 11, 2020

मेरा बस्तर

मेरा बस्तर


लहलहातीहरियाली से सजा है मेरा बस्तर


सोंधी सी खुशबू बिखरे हुए हैं मेरा बस्तर


जहां सूरज भी रोज इंद्रावती में नहाता है


आज भी जहां मुर्गा ही बांग लगाकर जगाता है


जहां गाय चराने वाला ग्वाला कृष्ण स्वरूप है


जहां हर पनहरन मटकी लिए धरे राधा का रूप है ऐसा सजा है मेरा बस्तर---


जहां सर्दी की रातों में आले तापते बैठे किसान


और गर्मी की रातों में खटिया बिछाए बैठे किसान


जहां राम राम की ध्वनि सुबह शाम है, जहां चले ना हाय हेलो,


हर आने जाने वालों को राम-राम और जुहार है


ऐसा सजा है मेरा बस्तर-----


जहां लोग अमिया की छांव तले, मरिया पेज भी मजे से पीते हैं


वह मजे खाना खाने के इन होटलों में कहां आते हैं


यहां ईश्वर की हर सौगात से भरा हुआ है ऐसा सजा है मेरा बस्तर-----


कोयल के गीतों मैना के नृत्य से, संगीत भरा हुआ है मेरा बस्तर


जहां मिट्टी की है महक और पंछियों की है चहक


जहां भंवरों की गुंजन से गूंज रहा है मेरा बस्तर


यह मेरे देश की आन बान और शान है, मेरा अभिमान है मेरा बस्तर—


श्रीमतीआशा रानी पटनायक


स्टेट बैंक कालोनी, लालबाग आमागुड़ा जगदलपुर जिला बस्तर


छत्तीसगढ़


श्रृंगार

मनोहर लाल कई दिनों से जिस प्रश्न को लेकर परेशान, व्यग्र, व्यथित और चिंतित थे। जिसका जवाब उनके दोस्त-रिश्तेदार यहाँ तक कि विद्वजन भी न दे सके। फ़कीर और महात्मा भी अपना हाथ ऊपर कर दिये। यहाँ आकर पंडितों और ज्ञानियों का ज्ञान भी क्षीण जान पड़ा। जैसे इस गहन समस्या के अंधकार में ज्ञान भी भटक गया हो, मार्ग विहीन हो गया हो, अपने को गुमराह और पराजित मान लिया हो। चारों तरफ़ से थक-हार कर वहीं सवाल पत्नी से जाकर पूछा-“अच्छा प्रिय, मैं कुछ दिनों से एक प्रश्न को लेकर बड़ी दुविधा में हूँ, डूब-उतरा रहा हूँ। इस प्रश्न को जानने की मेरी उत्कंठा बलबली होती जा रही है। इसके समाधान के लिए बहुत प्रयत्न किया किन्तु चारों तरफ़ से निराशा ही मिली। निष्पक्ष और सत्य जवाब की आशा से तुम्हारे पास आया हूँ।”


आनन्दी ख़ुशी से फूले न समायी। मुझ अशिक्षिता को पति इस योग्य समझते हैं कि जीवन के कठिन प्रश्नों का उससे उŸार की आशा रखते हैं। वह प्रश्न जान कर उŸार देने को उतावला हो गयी; किन्तु अपने उतावलेपन को दबाते हुए मुख पर आदर्श की रेखा को अंकित करती हुई बोली-“ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसका उŸार बड़े-बड़े ज्ञानी पुरुष भी न दे सके ? भला क्या मैं दे सकूँगी !”


“मुझे उम्मीद है इसका जवाब तुम्हारे ही पास है। यह नारियों से संबंधित प्रश्न है इसलिए पुरुष दुविधा में हो जाता है। नारी-मन को आज तक कोई समझ सका है ?यहाँ त्रिलोकी भी अपने को असमर्थ पाते हैं।”


आनन्दी कटाक्षपूर्ण बड़ी-बड़ी लोचनों से देखकर बोली-“अच्छा ! मगर वह प्रश्न क्या है ?”


“पहले वादा करो, सही और निष्पक्ष जवाब दोगी।”


“पहले प्रश्न तो सुनू कि उसके बारे में कुछ जानती भी हूँ या नहीं।”


“मुझे विश्वास है तुम उसका उŸार जानती हो। अब वादा करो कि मेरे सभी सवालों का जवाब सही दोगी, कुछ भी छुपाओगी नहीं।”


“हाँ, मैं वादा करती हूँ, अपनी संज्ञान में सब सच कहूँगी। अब आप अविलम्ब प्रश्न कीजिए।”


“देखों, बाद में मुकरना नहीं। मैं जानता हूँ, तुम्हें उसका उचित उŸार पता है। मगर मुझे तुम्हारी निष्पक्षता पर संदेह हो रहा है।”


“भला संदेह क्यों होने लगा ?मैं पहले कभी आपसे झूठ बोली हूँ। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास पर टिका होता है। जहाँ प्रेम और अटूट विश्वास हो, वहाँ शंका और अविश्वास जैसी तुच्छ भावनाओं का स्थान नहीं होता।”


“यही तो डर है, प्रेम निष्पक्षता और सत्य मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। प्रेम और स्नेह के अंधेपन में बस्तियाँ वीरान हो गयी, देश तबाह हो गये, रक्त की नदियाँ बह गयी।”


“आपके मन में मेरे प्रति क्या भाव है, यह आज विदित हो गया ।”


“तुम इसे अपने ऊपर न लो, मैंने वही कहा जो इतिहास ने हमें दिखाया है।”


डबडबायी आँखों से देखते हुए-“क्या आपको मुझपर रŸाीभर भी विश्वास नहीं ? क्या अबतक मैं अंधकार में जी रही थी ?”


“देखों प्रिय, तुम ग़लत न समझो। मैंने अनुभव किया है, कई बार सच्चाई रिश्तें, जाति और समुदाय की बलिवेदी पर चढ़ जाती है। कुŸो और बिल्ली की दोस्ती चाहे कितनी ही गहरी हो किन्तु जब जाति की बात आएगी तो कुŸाा अपने ही दल की तरफ़दारी करेगा। यहाँ दोस्ती का महत्व नगण्य हो जाएगा। तुम देखती हो आये दिन जाति, धर्म, सम्प्रदाय, रिश्तें-नाते, प्रीति, धन-वैभव, दबंगयी आदि के नाम पर सत्य का गला घोट दिया जाता है।”


“मुझे आपकी गूढ़ बातें समझ में नहीं आती। आप सीधे-सीधे प्रश्न करें। मैं अपने जाने में बिल्कुल सही जवाब दूँगी।”


“तुम मुझसे कभी झूठ नहीं बोली हो; किन्तु यह प्रश्न कुछ अलग तरह का है, मैं दावा कर सकता हूँ, इस प्रश्न का उŸार कोई स्त्री निष्पक्ष होकर नहीं दे सकती।”


“जब सब जानते ही है तो व्यर्थ में प्रश्न करने की जिद्द क्यों कर रहे हैं ?”


“क्योंकि मन नहीं मानता और अंदर से एक टूटा हुआ विश्वास भी पैदा हो रहा है। कभी-कभी प्रकाश की झूठी, काल्पनिक चिंगारी भी लक्ष्य तक पहुँचाने में हमारी मदद कर देता है।”


हाथ जोड़ती हुई-”देखिये, इसे और रहस्यमयी न बनाते हुए प्रश्न करने की कृपा करें।“


“तो तैयार हो जाओं। थोड़ा समय लेना मगर सोच-समझ कर जवाब देना। जल्दबाज़ी में यथार्थ से दूर न चली जाना। कई बार बना-बनाया काम शीध्रता के कारण बिगड़ जाता है।”


“पूछना है पूछिये, नहीं मैं जा रही हूँ। मेरी व्याकुलता पराकाष्ठा की अति कर रही है। आपकी तरह सैर-सपाटा नहीं करना है, चूल्हा-चैकी भी देखना है। मैं जानती हूँ, यहाँ से जाकर भी मुझे शांति न मिलेगी। प्रश्न को जानने की उत्कंठा मेरे अंदर बनी रहेगी।”


“अच्छा बैठो मैं पूछता हूँ। तुम....।”


बात काटकर-“बिना किसी भूमिका के प्रश्न करने की महान् अनुकम्पा करें।”


“तो बताओं, स्त्रियाँ अपना शृंगार किसके लिए करती हैं ?”


आनन्दी हँस पड़ी-”बस इसी प्रश्न के लिए कब से रहस्यमयी भूमिका बना रहे थे। यह तो कोई भी बता सकता है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। कोई और प्रश्न कीजिए।“


“जितना आसान समझती हो इसका उŸार उतना आसान नहीं है। बताओं किसके लिए शृंगार करती हो ?”


“पति के लिए, अपने सुहाग के लिए और किसके लिए ?”


“पति घर पर, बाहर या किसी काम में कही और होता है और पत्नी बाजार जाती है तो उसके शृंगार को देखने वाला कौन होता है, उस समय किसके लिए शृंगार होता है ?पुरुष बाहर परदेश में होता है और स्त्री घर में बनाव-शंृगार कर बैठी रहती है।”


“किसके लिए का क्या मतलब पति के लिए ही होता है और किसके लिए ! हम वैवाहिक, पतियुक्त स्त्रियाँ पति के नाम पर ही शृंगार करती हैं। वे चाहे कहीं रहे, सात समुन्दर ही क्यों न रहे, शंृगार उन्हीं के लिए, उन्हीं के नाम पर होता है।”


“यह तो वैसा ही हुआ कि ईश्वर के नाम से महंगे, मीठे, स्वादिष्ट, ताज़े मिठाई चढ़ाकर, सुन्दर वस्त्र और आभूषण चढ़ाकर उसका उपभोग स्वंय किया जाए।”


“यह कह आप तमाम पतिव्रत बहनों के साथ अन्याय कर रहे हैं।”


“पति जब शृंगारिक वस्तुओं को मना करता है, तो पत्नी क्यों जिद्द पर अड़ती है ?जबकी देखना पति को ही है, उसी को दिखाने और उसी के ख़ुशी और संतुष्टि के लिए यह सब होता है। फिर आये दिन इस बात को लेकर पति-पत्नी में वैमनस्य क्यों होता है ? बिना शृंगार के भी बाजार जाया जा सकता है।”


“हाँ, जा सकती है मगर बदनामी पति की ही होगी। साथ की औरतें और बाहर के लोग क्या सोचेंगे ?आपको......।”


“इसका मतलब बाहरवालों और साथ के औरतों को दिखाने, उनसे तुलना करने के लिए यह सब किया जाता है पति के लिए ज़रा भी नहीं। मैंने पहले ही शंका व्यक्त किया था कि तुम जानते हुए भी निष्पक्ष जवाब न दे सकोगी। अपनी और अपनी जाति के पक्ष में बोलोगी।”


“आप यह कहकर वैधब्य का दुःख झेलती उन सारी औरतों को कलंकित कर रहे हैं, जो पूरी उम्र शृंगार विहीन, सादगी में काट लेती है। जो कभी सजती-सँवरती नहीं, जो शृंगार को हेय और तुच्छ समझती है।”


“इसका अर्थ तो यही हुआ कि पति की आड़ में अपना निजी शौक़ पूरा किया जाता है। अपने सजने और शृंगार की लालसा को तृप्त किया जाता है। वैधव्य नारियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं होता जिसके आड़ में वह अपना काम निकाल सके। हाँ, वे चाहे तो ऐसा कर सकती है अब तो इस दिशा में समाज भी उदासीन हो गया है। तो क्या मैं यह मान लूँ कि स्त्रियों का शृंगार पूर्णतः पति को समर्पित नहीं।”


“यह कैसा कुतर्क है ?चित भी आपकी पट भी आपकी। साज-शृंगार नारी की वृŸिाक शौक़ होती है। शादी के पहले ही लड़कियों में इसका बीजारोपड़ हो जाता है। पर सुहागिन स्त्रियों का असली गहना उसका पति ही होता है।”


“युवतियाँ तो किसी को आधार, आड़ या बहाना नहीं बनाती, शादी-शुदा औरतें यह क्यों कहती है कि सारा बनाव-शृंगार, रूप-लावण्य पति के लिए ही होता है। यह क्यों नहीं कहती कि मेरी वृŸिा या मेरा शौक़ है ?यदि पति ही गहना है तो फिर दूसरे गहने के लिए इतना ज़ोर-ज़बरदस्ती और झगड़ा क्यों ? इस मामले में पति के बातों की अनदेखी, अनसुनी क्यों की जाती है ?”


“मुँहज़ोरी से चाहे आप मान लो किन्तु यह सत्य नहीं है। नारियाँ अपने पति के लिए ही सजती-सँवरती हैं।”


“तो मेरे जैसे कितने ही ऐसे पति हैं, जो पत्नी का सादगीपूर्ण रूप ही पसंद करते हैं। फिर ज़बरदस्ती यह क्यों बताया जाता है कि पति को पत्नी का शृंगारिक रूप ही पसंद है, सादगी वाला नहीं।”


“आपने कभी बताया नहीं ?”


“मैंने कब कहा कि तुम्हारा बनाव-शृंगार मुझे पसन्द है। तुम स्त्रियाँ ख़ुद ही यह मान लेती हो।”


तुनककर-“तो यह कहो कि यह सारा तंज मुझपर है ? ठीक है आगे से मैं चूड़ी, बिन्दी और मंगलसूत्र के सिवा कुछ न पहनूँगी। पैरों में पायल भी नहीं। सिंगार बाक्स को गंगा में डूबो आऊँगी।“ जो न कह पायी वह शब्द यह था कि-तब तो आपके कलेजे को ठंडक मिल जाएगी। वह धीरे-धीरे वहाँ से उठकर चली जा रही थी। मानों उसे अभी उम्मीद हो कि मनोहर उसे बुलाकर मनाएगा। अंत में दरवाज़े पर खड़े होकर बोली-”शादी से पहले तो मेरा बनाव-शंृगार आपको ख़ूब भाता था, अचानक अब क्या हो गया !” यह कहकर डबडबायी आँखें दिखाकर चली गयी।


                उसी दिन शाम को आनन्दी के भाई आये। उनकी माँ की तबियत बहुत ख़राब है। आनन्दी को ले जाने आया है। मनोहर घर लौटा तो देखा, आनन्दी पूरे शृंगार किये भाई के साथ जाने को तैयार है। माँ की तबियत ख़राब है तो सज के जाने की क्या ज़रूरत है। मैं तो यही रहूँगा फिर दिखाना किसे है ? क्या सुबह का वादा इतनी जल्दी भूल गयी ! पति की आड़ में पत्नियाँ कबतक शंृगार-स्वार्थ की सिद्धि करती रहेंगी।


उधर आनन्दी सोच रही थी, अगर बिना गहनों के गयी तो वहाँ लोग क्या सोचेंगे, कितनी जग हँसायी और बदनामी होगी। इन्हें क्या, लोग मुझसे सवाल-जवाब करेंगे। भाभियाँ और सहेलियाँ पूछेगी तो क्या कहूँगी ? बिना शृंगार का ऐसे लगता है मानों प्राण हो किन्तु शरीर नहीं। शरीर रहीत प्राण का क्या महत्व है ! यह गहन बात है जो पुरुष नहीं समझ सकता। स्त्रियों के बनाव-शृंगार में उसे केवल अपने कोष की चिंता लगी रहती है या फिर यह कि मेरे सिवा कोई दूसरा न देखे। किन्तु शृंगार तो देखने-दिखाने की वस्तु होती ही है। पर इन मूर्ख पतियों को कौन समझाएँ कि इस शृंगार किये शरीर को कोई देखता है तो यही लगता है कि मेहनत सार्थक हुआ। प्रदर्शनी दिखाने के लिए ही कि जाती है। यदि कोई देखने वाला ही नहीं हो तो प्रदर्शनी का महत्व कुछ नहीं, जितने अधिक दर्शक देखेंगे उसकी सार्थकता उतनी ही सिद्ध होगी। पुरुष के मन में सदैव छल-कपट भरा रहता है। शादी से पहले हमारा शंृगार उन्हें ख़ूब भाता है, हमें सुन्दर दिखना उन्हें अच्छा लगता है। किन्तु शादी के बाद हमें सुन्दर दिखने से उन्हें जलन और डाह होती है। शादी से पहले जो चीजें़ अच्छी लगती थी अब क्यों नहीं लगती ? इसलिए न की अब घोड़ी खूँटे से बंध गयी है, कहीं भाग नहीं सकती। जितना कम लागत में गुज़ारा हो सके कर लो।


(विधा-कहानी)


लेखक-धर्मेन्द्र कुमार


ग्राम-भवानीपुर (बढैयाबाग), पोस्ट-बाजार समिति तकिया


थाना-सासाराम, जिला-रोहतास, राज्य-बिहार, भारत


 


न्यायपालिका और हिन्दी: अवरोध और चुनौतियाँ

न्यायपालिका और हिन्दी: अवरोध और चुनौतियाँ


लोकतांत्रिक सरकार के तीन अंग हैं = विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इनमें न्यायपालिका की  अहम एवं सशक्त भूमिका रहती है। लोकतंत्र की सफलता मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिका पर आधारित होती है। इस के लिए सजग और सतर्क रूप से न्याय व्यवस्था का विकास करने की आवश्यकता होती है। न्यायपालिका की सहायता के लिए जागरूक विधायिका की ज़रूरत होती है जो समाज के सर्वांगीण विकास और कल्याण के लिए विधि-निर्माण करती है ताकि कार्यपालिका उन क़ानूनों का पालन करते हुए देश में सुशासन और प्रबंधन ईमानदारी से कर सके। देश और समाज में कानून और व्यवस्था के पालन के लिए न्याय व्यवस्था एक कारगर साधन के रूप में काम करती है। इस न्याय वावस्था के प्रति सामाजिक जागरूकता होना ज़रूरी है, जिससे समाज उसे ठीक तरह से समझ सके और उसकी सही रूप से पालन कर सके। इस लिए जनता को न्याय दिलाने के लिए जनता की अपनी भाषा की विशेष भूमिका रहती है। भाषिक दूरी से कानून को समझने के रास्ते में कई प्रकार की कठिनाइयाँ और अड़चनें आती हैं। अत: न्याय व्यवस्था का अनुपालन और कानून का सार्थक कार्यान्वयन तभी सही रूप से संभव हो पाए गा, यदि इनमें अपनी भाषा, राजभाषा अथवा राष्ट्रभाषा का प्रयोग किया जाए। जन-सामान्य तक त्वरित और निष्पक्ष न्याय सुलभ कराने के लिए अपनी भाषा का होना अनिवार्य है। ‘रूल ऑफ लॉं’ सभ्य समाज की आत्मा होता है और कानून से ही देश की न्याय-व्यवस्था मजबूत होती है, सुशासन सशक्त बना रहता है जिससे राष्ट्र का विकास संभव हो पाता है।   


    प्राय: यह कहा जाता है कि कानून अंधा है अर्थात न्याय की देवी ने आँखों पर पट्टी बांध रखी है। आज़ादी से पहले भारत माता जंजीरों से जकड़ी हुई थी। किंतु स्वतंत्रता के बाद भारत माता परतंत्रता की जंजीरों से तो मुक्त हो गई लेकिन उसके मुँह पर अंग्रेज़ी की पट्टी बांध दी गई है ताकि वह  गूंगे, मूक और बेज़ुबान की भाँति चुपचाप सब कुछ देखती रहे और कुछ भी बोल न सके कि उसके सामने क्या हो रहा है। अब समय आ गया है कि भारत माता के मुँह को अंग्रेज़ी के पाश से छुड़ाया जाए, तभी न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हट पाए गी और न ही बेज़ुबान तथा गूँगा होगा लोकतंत्र। अब भारत को उसकी अपनी ज़ुबान चाहिए, अपनी भाषा चाहिए, न कि विदेशी भाषा चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो न्यायतंत्र खुले नेत्रों से न तो न्याय दे पाए गा, न ही दूसरों की भाषा में कुछ समझा पाए गा और न ही लोकतंत्र को अपनी अभिव्यक्ति देने की स्वतंत्रता मिल पाए गी।


   इसी स्थिति के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार अपना दर्द व्यक्त करते हुए  कहा था, यह क्या कम ज़ुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ़ पाना है तो मुझे अंग्रेज़ी भाषा का उपयोग करना पड़े। उन्हों ने दु:खी हो कर आगे कहा कि बैरिस्टर होने पर भी मैं अपनी भाषा ही न बोल सकूँ। दूसरे आदमी को मेरे लिए तर्जुमा कर देना चाहिए। यह कुछ दंभ है? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमें मैं अंग्रेज़ी का दोष निकालूँ या अपना? हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेज़ी जानने वाले लोग हैं।


  हमारे देश में संसद, राज्य विधान सभाएँ, विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा पंचायत से ले कर उच्चतम न्यायालय तक न्याय-व्यवस्था के प्रमुख अंग हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इनमें देश की अपनी हिन्दी का प्रयोग नहीं होता। वास्तव में अखिल भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए संविधान में जो संतुलित और सुव्यवस्थित भाषा नीति बनाई गई है, उनपर न तो गंभीरता से विचार किया गया और न ही परीक्षण करने की आवश्यकता समझी गई। इसी कारण विधि कॉलेजों के भाषा-प्रश्न की ओर सोचा ही नहीं गया जो विधि व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 120 लोक सभा में प्रयुक्त भाषा के संदर्भ में विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त संविधान के 17वें भाग के अनुच्छेद 348 में स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था की गई है कि लोक सभा की कार्यवाही हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी में होगी। इसका अभिप्राय यह हुआ कि अनुच्छेद 120 में दी गई व्यवस्था के होते हुए अनुच्छेद 348 के अधीन कार्य चले गा अर्थात लोक सभा की कार्यवाही या तो हिन्दी में होगी या अंग्रेज़ी में। इसके साथ यह भी व्यवस्था है कि यदि कोई सांसद अपना वक्तव्य हिन्दी या अंग्रेज़ी में अच्छी तरह अभिव्यक्त नहीं कर सकता तो वह अपनी मातृभाषा में सदन को  संबोधित कर सकता है, लेकिन उसे इसके लिए लोकसभा के अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति से या उस समय सदन के पीठासीन अधिकारी से, जैसी भी स्थिति हो, सहमति लेनी होगी। इससे स्पष्ट है कि मातृभाषा को महत्व दिया गया है, क्योंकि सदस्य अपनी मातृभाषा में सहजता से अच्छी अभिव्यक्ति कर सकता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अगर सांसद मातृभाषा की अपेक्षा अपनी प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय भाषा में अच्छी अभिव्यक्ति कर सकता है, तो फिर भी उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त करने के लिए अध्यक्षता करने वाले अधिकारी की सहमति या अनुमति मिले गी। इसका यह भी आशय हो सकता है कि संविधान-निर्माताओं ने प्रादेशिक भाषा और मातृभाषा में अंतर न कर उन्हें एक ही श्रेणी में रखा हो, जिसे सत्तारूढ़ दल ने या तो समझा नहीं है या समझने का प्रयास ही न किया हो  अन्यथा संसद मातृभाषा के साथ-साथ प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय भाषा को जोड़ सकती थी। दूसरा, अनुच्छेद 120 के अनुसार यदि संसद से अंग्रेज़ी हटा दी जाती है तो इसका आशय होगा कि सांसद को अब हिन्दी में अच्छी अभिव्यक्ति न कर पाने के कारण अपनी मातृभाषा में बोलने की सहमति अध्यक्ष या अधिकारी से लेनी होगी। अनुच्छेद 120 की उपधारा में यह प्रावधान भी है कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष की समाप्ति पर अर्थात 26 जनवरी 1965 के बाद अगर कोई विधेयक पारित न हुआ तो अनुच्छेद 120 से अंग्रेज़ी शब्द अपने-आप निकला गया माना जाए गा। लेकिन दुर्भाग्य से संसद में राजभाषा अधिनियम 1963  में संशोधन किया गया जिसमें पहले की व्यवस्था ही रखी गई कि अंग्रेज़ी तदनुसार संसद के कामकाज में पहले की तरह बनी रहे गी। इस प्रकार अनिश्चित काल के लिए संसद में द्विभाषिक स्थिति बनी हुई है।


   संविधान में ऐसा कोई विशेष अनुच्छेद नहीं है जिसमें उच्चतम न्यायालय की भाषा का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा अनुच्छेद 343 में अंग्रेज़ी के बारे में 15 वर्ष की जो अवधि रखी गई थी वह उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय पर लागू नहीं होती, क्योंकि इन न्यायालयों के संबंध में कोई कालावधि नहीं रखी गई। इसका आशय यह भी हो सकता है कि विधि के अनुसार संसद की इच्छा पर, किंतु वास्तविकता के आधार पर संघ के मंत्रिपरिषद अर्थात प्रधान मंत्री की इच्छा पर यह बात छोड़ दी गई हो कि कब ऐसा कानून बनाया जाए जिससे उपर्युक्त मामलों में अंग्रेज़ी भाषा के स्थान पर हिन्दी भाषा को रखा जाए। अनुच्छेद 348 से यह झलकता है कि अंग्रेज़ी-समर्थकों की अंदरूनी इच्छा थी कि संघ के राजकाज के लिए अंग्रेज़ी भाषा को सदैव बनाए रखा जाए। इस प्रावधान के कारण जिन राज्यों में अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं भी होता था, उनमें भी वैधानिक रूप से अंग्रेज़ी को विधि और न्याय की भाषा के रूप में अनिवार्य कर दिया गया। इसी अनुच्छेद के खंड (3) में यह व्यवस्था की गई कि यदि किसी राज्य का विधान मंडल अंग्रेज़ी से भिन्न भाषा में कानून बनाता है अथवा उस राज्य का राज्यपाल अंग्रेज़ी से भिन्न भाषा में अध्यादेश जारी करता है तो उस अध्यादेश या कानून का अंग्रेज़ी अनुवाद राज्यपाल के प्राधिकार से उस राज्य के राजपत्र में प्रकाशित किया जाए गा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि हिन्दी के संघ की राजभाषा घोषित होने के बावजूद नियमों-विनियमों, क़ानूनों, अध्यादेशों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेज़ी में ही माने जाएँ गे, जब तक संसद इस बारे में कोई अन्य प्रावधान पारित नहीं करता। यही कारण है कि अंग्रेज़ीदाँ लोग इस बात पर तुले हुए थे और आज भी हैं कि जहाँ तक संभव हो स्वतंत्र भारत में कानून और न्याय की भाषा अंग्रेज़ी को ही बनाए रखा जाए। यह भी उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 345 में राज्यों को यह प्राधिकार दिया गया है कि वह जनता द्वारा बोले जाने वाली भाषा या हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपना सकती है। यह सही है कि कोई भी राज्य अपनी भाषा की उपेक्षा नहीं कर सकता। इसलिए वह अपनी भाषा के साथ हिन्दी को भी दूसरी भाषा के रूप में अपना सकता है। वस्तुत: गुजरात राज्य के अलावा अन्य किसी राज्य ने हिन्दी को अपनी दूसरी भाषा के रूप में नहीं अपनाया। यह भी दुर्भाग्य है कि किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता ने इस बारे में विचार ही नहीं किया। विधि मंत्रालय ने भी यही सोचा कि इस बारे में कौन मुसीबत ले।           


  उच्चतम न्यायालय को समूचे देश के लिए एक इकाई के भाँति काम करना होता है। इस लिए उसे अपनी कार्यवाही एवं विवेचना करने के साथ-साथ न्याय-निर्णय, डिक्री, आदेश आदि देने के एक ही भाषा का प्रयोग करना पड़ता है और वह है अंग्रेज़ी। इस संबंध में अगर संसद कानून बनाती है तभी उच्चतम न्यायालय में हिन्दी अंग्रेज़ी का स्थान ले पाए गी। इस संबंध में कुछ विधि-विशेषज्ञों में मतभेद है। उनका कथन है कि उच्चतम न्यायालय में हिन्दी का प्रयोग तभी संभव है, अगर देश के सभी उच्च न्यायालयों में हिन्दी के प्रयोग का प्रावधान हो। अगर उच्च न्यायालयों या निचली अदालतों में अपनी भाषा में निर्णय, डिक्री, न्याय आदि देने का प्रावधान किया जाता है तो उनके द्वारा हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने पर उन अनूदित पाठों के आधार पर कानून का और कार्यवाहियों का स्पष्टीकरण करने या उनकी व्याख्या करने में ही उच्चतम न्यायालय का बहुत समय लग जाए गा। उच्चतम न्यायालय में एक भाषा  हिन्दी के प्रयोग के संबंध में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और हिंदीतर भाषी स्वर्गीय गोपाल राव एकबोटे ने अपना मत (राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र, 1987) देते हुए यह कहा है कि अगर देश की समूची न्याय प्रणाली में एकत्व स्थापित किया जाता है और समूचे देश में कानून के निर्माण में और उच्च न्यायालयों तथा निचली अदालतों के न्याय, निर्णय, डिक्रियों, आदेशों आदि के लिए एक ही माध्यम या भाषा होती है तभी देश की न्याय-व्यवस्था को एकसंघीय ढांचे में लाया जा सकता है । न्यायाधीश एकबोटे के इस मत के अनुसार उच्चतम न्यायालय में हिन्दी का प्रयोग संभव तो है, लेकिन इसमें बहुत-सी कानूनी पेचीदगियाँ उठ खड़ी होंगी या खड़ी की जाएँ गी। इस लोकतांत्रिक और बहुभाषी भारत में हिंदीतर भाषी राज्य अड़चनें पैदा कर सकते हैं और इसी कारण सत्तारूढ़ दल इस मामले में हाथ डालने से कतराते है। हालांकि संसदीय राजभाषा समिति ने भी संकल्प संख्या 1/20012/4/92 रा भा (नी-!) की मद संख्या 5(13) में अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की है कि अब उच्चतम न्यायालय में अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी का प्रयोग प्राधिकृत होना चाहिए। प्रत्येक निर्णय दोनों भाषाओं में उपलब्ध हो। साथ ही समिति ने मद संख्या 5(14) में भी कहा है कि उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और अन्य अधिकारियों को अपने प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करने के संबंध में प्रोत्साहित करने के लिए एक योजना शुरू की जानी चाहिए। इस प्रयोजन के लिए संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि का आयोजन किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित आदेश भी निकले हैं, किंतु विडंबना यह है कि इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इस पर अभी तक न तो कोई कार्रवाई की गई है और न ही विचार किया गया है।


   अनुच्छेद 348 की उपधारा (2) के अधींन कुछ राज्यों के राज्यपालों के आदेश से उच्च न्यायालयों की कार्यवाहियों में हिन्दी का प्रयोग अधिकृत हो गया है। कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में अंग्रेज़ी के साथ-साथ अपनी प्रादेशिक भाषा का प्रयोग भी अधिकृत है। सन् 1950 में राजस्थान सरकार, 1970 में उत्तर प्रदेश सरकार, 1971 में मध्य प्रदेश सरकार और 1972 में बिहार सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने उनके उच्च न्यायालयों में हिन्दी प्रयोग को अधिकृत किया था। इन राज्यों में हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी के प्रयोग का भी प्रावधान है। इसके अतिरिक्त निम्न एवं माध्यमिक न्यायालयों में अंग्रेज़ी के स्थान पर प्रादेशिक भाषाओं के प्रयोग की प्रवृत्ति तो बढ़ रही है, लेकिन अंतिम निर्णय, न्याय, डिक्रियाँ आदि अंग्रेज़ी में जारी करने की प्रथा अभी भी प्रचलित है।  इधर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसलों के हिन्दी अनुवाद की व्यवस्था करने के लिए हरियाणा सरकार और पंजाब सरकार भी विचार कर रही हैं। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने निर्णय हिन्दी और कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की व्यवस्था की है। इसी संबंध में माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी केरल उच्च न्यायालय की हीरक जयंती के अवसर पर 28 अक्तूबर, 2017 को कहा था कि अदालत के फैसले अंग्रेज़ी में दिए जाते हैं जबकि हमारा देश अनेक भाषाओं का देश है। इसलिए एक ऐसी व्यवस्था की जाए जिसमें उच्च न्यायालयों के अपने न्याय-निर्णयों का प्रमाणित अनुवाद स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए। जनता को न्याय देना महत्वपूर्ण है लेकिन वह वादी और प्रतिवादी की भाषाओं में दिया जाए ताकि जो न्याय दिया गया है वह उनकी समझ मे आ जाए। वास्तव में न्यायालयों में अनिवार्य रूप से अंग्रेज़ी में निर्णय देने के कारण जन सामान्य को देरी से न्याय मिलता है, जो नितांत चिंता का विषय है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को न्याय मिलता भी है तो उसे यह पूरी तरह से मालूम नहीं होता कि उसने अपने मुकदमे में जो दस्तावेज़ अथवा कागज-पत्र दाखिल किए हैं, उनमें क्या लिखा है। उसके मुकदमे में वकीलों में जो बहस हुई थी, उसमें क्या-क्या तर्क दिए गए थे, क्या वे तर्क सही भी थे और अंत में जो फैसला हुआ, उसमें क्या-क्या कहा गया है? उसे वकील के भरोसे रहना पड़ता है और वकील अंग्रेज़ी के भरोसे रहता है। इस लिए जब तक न्यायपालिका में अंग्रेज़ी का वर्चस्व रहता है तब तक देश के गरीब, पिछड़े, दलित, वंचित, मजदूर और ग्रामीण किसान सबसे ज़्यादा हानि उठाते रहे गे। एक तो उन्हें फैसला देर से मिलता है, दूसरा उनका पैसा भी बहुत खर्च होता है और तीसरा मुकदमे के फैसले की पूरी जानकारी भी उन्हें नहीं मिल पाती। राष्ट्रपति जी की यह चिंता वाजिब है कि अंग्रेज़ी के वर्चस्व से गरीब जनता और भारतीय भाषाओं के साथ व्यवहार नहीं हो पा रहा, अत: न्यायालयों के निर्णय का अनुवाद उनकी भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। लेकिन यहाँ यह स्पष्ट करना असमीचीन नहीं होगा कि विधि अर्थात कानूनी भाषा तकनीकी-प्रधान भाषा है और इसी कारण यह भाषा अन्य विषयों की भाषा की अपेक्षा अधिक एकार्थी, जटिल और विशिष्ट होती है। इसकी शब्दावली और व्याकरणिक संरचना अपनी अलग विशिष्टता रखती है, इस लिए दूसरी भाषा में अनुवाद करने से अशुद्धि और संदिग्धता की संभावना प्राय: बनी रहती है। यदि मातृभाषा अथवा प्रादेशिक भाषा में न्याय, निर्णय आदि दिया जाए तो वह शुद्ध और असंदिग्ध हो गा। इस लिए अनुवाद की व्यवस्था कानूनी भाषा में पूरी तरह से कारगर भूमिका नहीं निभा पाए गी। केवल यही नहीं, न्यायालय के अंग्रेज़ी में दिए गए निर्णय की अपेक्षा उसके अनुवाद में और अधिक विलंब होने की पूरी-पूरी संभावना है, क्योंकि अंग्रेज़ी में दिए गए निर्णय के सटीक एवं सही अनुवाद में और समय लगे गा। साथ ही, अनुवाद के लिए अधिक धन खर्च करने की व्यवस्था भी करने होगी जो अंतत: जनता पर ही पड़े गा।   


   सिविल कोर्ट, ज़िला कोर्ट, विशेष न्यायालय के अतिरिक्त संसद तथा राज्य विधान सभाओं के विधेयक द्वारा गठित राजस्व, आबकारी, बिक्रीकरण, सहकारी आदि अधिकरण एवं न्यायाधिकरण की कार्यवाहियों, न्याय-निर्णयों, आदेशों तथा डिक्रियों के भाषा-माध्यम का प्रश्न भी विचारणीय है। दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) में भी व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 345 के अंतर्गत राज्य विधान मंडलों को अनुमति दी गई है कि वे कानून बना कर एक से अधिक भाषाओं को अथवा हिन्दी को अपने सभी या किन्हीं सरकारी कामकाज में लागू कर सकते हैं। इसके साथ ही सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code) की धारा 137 के उस दफा पर विचार करना होगा जिसमें न्यायालयों की वह भाषा जारी रहे गी जो इस कोड के लागू होने के समय लागू हुई थी। इससे राज्य सरकार को किसी दूसरी भाषा का प्रयोग करने के बारे में निर्देश देने का अधिकार प्राप्त होता है। राज्य सरकार यह घोषणा कर सकती है कि इस प्रकार के न्यायालय की भाषा क्या हो, किस लिपि में आवेदन पत्र आदेश दिए जा सकते हैं और न्यायालय की कार्यवाही आदि के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाए।   


   न्यायपालिका के सबसे निचले सोपान अर्थात ग्राम पंचायत के लिए स्थानीय भाषा के प्रयोग का प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद के अंतर्गत कुछ ग्राम-पंचायतों को दीवानी तथा फ़ौजदारी न्याय संबंधी सीमित अधिकार मिले हुए हैं। ऐसे न्यायालयों अर्थात ग्राम-पंचायतों को भी अपना निर्णय स्थानीय भाषा में देने का प्रावधान है।


   संविधान-निर्माताओं ने न्यायपालिका की भाषिक आवश्यकताओं के निर्धारण के लिए संविधान में जो संकल्पना रखी थी, उससे स्पष्ट होता है है कि कुछ कालावधि तक अंग्रेज़ी में और बाद में अंतत: हिन्दी में ही काम करना होगा। यह व्यवस्था निचली अदालतों से ले कर उच्चतम न्यायालय की कार्यवाहियों में लागू हो सकती है। इससे केंद्र और राज्य दोनों की न्याय प्रणाली में ऐक्य लाने में सहायता मिले गी। जब कभी भारतीय ज़िला न्यायधीशों के संवर्ग (Cadre) का गठन किया जाए गा अथवा वह अस्तित्व में आए गा तभी अखिल भारतीय न्याय सेवाओं में भाषिक एकात्मकता स्थापित होगी। इससे भारतीय भाषाओं अर्थात प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में न्यायालयों की कार्यवाही हो पाए गी। संविधान सभा की तदर्थ समिति के सदस्य के रूप में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने यह टिप्पणी दी थी कि उच्चतम न्यायालय के कानून विषयक एक ही व्याख्या करने और एक ही प्रभाव बनाए रखना आवश्यक है। न्यायालयी एकात्मकता और राष्ट्रीय एकता के लिए कानूनी एकात्मकता और एक-सी व्याख्या प्रभावी सिद्ध होगी और देश की संघीय पद्धति सहज तथा सरल होगी। संविधान सभा की प्रारूप समिति के संयोजक डॉ. भीम राव अंबेडकर ने इस बात पर बल देते हुए कहा था कि संविधान ने एकसंघीय न्याय-प्रणाली की व्यवस्था की है और दीवानी या फ़ौजदारी मामलों में उठने वाली समस्याओं को अधिकार पद्धति मे रख कर तथा उसमें परिष्कार करने के लिए उसे प्राधिकृत भी किया है। मुंशी जी और डॉ अंबेडकर की इन भावनाओं का आदर न करना और जानबूझ कर उनकी गलत व्यख्या करना वास्तव में देश का अहित करना है।      


   यह कल्पना करना पूर्णतया गलत है कि न्यायपालिका के सभी सोपानों में या स्तरों में अर्थात पंचायत से उच्चतम न्यायालय तक भविष्य में अंग्रेज़ी अनंत काल तक चलती रहे गी। लेकिन इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि वर्तमान न्याय प्रणाली में जो भाषिक प्रक्रिया विद्यमान है उसमें पूर्ण रूप से परिवर्तन लाने  की नितांत आवश्यकता है। इसके लिए सरकार में पहले दृढ़ संकल्प होना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए उसे अत्यधिक प्रयास करने पड़ें गे और सुविचारित योजना बनानी पड़े गी। इस अभियान में राजनीतिक दलों को भी पूरा-पूरा सहयोग देना पड़े गा। केंद्र और राज्य सरकारों में हिन्दी के प्रयोग के बारे में जो झिझक और हिचकिचाहट विद्यमान है, उसे दूर करना होगा, उसे समाप्त करना होगा। स्वतंत्रता-पूर्व देसी राज्यों के अनुभवों को देखते हुए यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि न्यायपालिका में भाषिक परिवर्तन कोई कठिन कार्य नहीं है। हैदराबाद रियासत में उर्दू, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि हिन्दी राज्यों के अनेक उदाहरण हैं जहाँ अपनी-अपनी भाषा में न्याय-व्यवस्था थी।


   मुग़ल शासन मे अरबी-प्रधान फारसी भाषा राजभाषा के रूप में थी, इस लिए उस काल की जनता को यह  भाषा सीखनी पड़ी। बाद में इस भाषा के अपभ्रंश रूप का प्रयोग होने लगा। ब्रिटिश शासन में सन् 1882 में उत्तर और मध्य भारत में पेशावर से बिहार तक निचले न्यायालयों की कार्यालयी भाषा तो उर्दू को बना दिया गया और शेष समूचे न्यायतंत्र में पूर्णतया अंग्रेज़ी का प्रयोग प्रारंभ हो गया। दूसरा, तत्कालीन भारत में विधि, विज्ञान, चिकित्सा आदि ज्ञानानुशासनों का शिक्षा-माध्यम अंग्रेज़ी भाषा थी। इस लिए हमारे अंदर यह धारणा बैठ गई कि अंग्रेज़ी माध्यम से ही आधुनिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। तीसरा, अनुवाद से अधिक समय और राशि खर्च होने की आशंका से अंग्रेज़ी को ही जारी रखने की व्यवस्था की गई। इस लिए अंग्रेज़ीवादी लोग  यह तर्क देते हैं कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएँ इतनी विकसित नहीं हैं कि न्यायपालिका में वे सुचारु रूप से अपनी भूमिका निभा सकें। उनका यह तर्क नितांत निराधार है। वास्तव में अंग्रेज़ी मानसिकता वाले इन लोगों का या तो मात्र बहाना है या भारतीय भाषाओं के प्रयोग में बाधा पहुँचाना है। वास्तव में भाषा अविकसित नहीं होती है, अविकसित होता है स्वयं भाषा-प्रयोक्ता और इसी लिए वह अपना दोष मढ़ देता है भाषा पर। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा कि देश के विकास और समृद्धि के लिए समूचे देश की न्याय-प्रणाली में एक ही भाषा का होना आवश्यक है और यह भूमिका कारगर ढंग से निभा सकती है हिन्दी ही। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, इटली, चीन, जापान, इराक, ईरान, अमेरिका आदि विकसित, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्रों की अदालतों में अपनी भाषा का प्रयोग होता है न कि विदेशी भाषा का। पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, मारिशस आदि कुछ ऐसे देश हैं, जो भारत की तरह ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे हैं, उनमें अंग्रेज़ी अर्थात विदेशी भाषा में कानून बनाए जाते हैं, न्यायालयों में मुकदमे की बहसों और फैसलों में भी विदेशी भाषा का प्रयोग होता है। एक कारण यह भी है कि ये देश विकसित और समृद्ध नहीं बन पाए हैं।


   देश में उच्च शिक्षा की जो भाषायी स्थिति है, वही स्थिति विधि शिक्षा की भी है। इस समय देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विधि शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी ही  है। संविधान में न्याय-प्रणाली को प्रभावकारी बनाने के लिए अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी को लागू करने की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई है, उसके समाधान के लिए विधि शिक्षा का माध्यम हिन्दी होना आवश्यक है। राष्ट्र की विधि प्रणाली और एकसंघीय न्याय व्यवस्था की एकात्मकता को बनाए रखने के लिए विधि शिक्षा में अंग्रेज़ी या अनेक भाषाओं के शिक्षा- माध्यम की कल्पना नहीं की जा सकती। इस लिए हिन्दी को माध्यम के रूप में प्रयोग करने से उच्च श्रेणी के विधिज्ञ पैदा होंगे। हिन्दी के प्रयोग पर आपत्ति करते हुए कुछ अंग्रेज़ी-समर्थक विशेषज्ञों का कथन है कि हिन्दी के प्रयोग से विधिज्ञ (Bar) और बेंच (Bench) का स्तर गिर जाए गा जो बिलकुल निराधार और निरर्थक सिद्ध होता है, क्योंकि स्वतंत्रता-पूर्व हैदराबाद रियासत का उत्कृष्ट उदाहरण हमारे सामने है जहाँ न्याय-प्रणाली के साथ-साथ विधि कॉलेजों में एक ही शिक्षा-माध्यम उर्दू भाषा थी। उस समय विधि कॉलेजों में कानून की पढ़ाई के अतिरिक्त सभी न्यायालयों में, जिनमें उच्च न्यायालय और ज्युडिशियल कमेटी भी शामिल थी, उर्दू भाषा का प्रयोग सफल रहा। ज्युडिशियल कमेटी हैदराबाद रियासत में एक प्रकार का उच्चतम न्यायालय था। रियासत के सभी कानून भी उर्दू में थे। इस लिए अब समय आ गया है कि भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय, विधि और न्याय मंत्रालय, राज्य सरकारों तथा सभी विश्वविद्यालयों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह कितनी दु:खद स्थिति है कि भारतीय विधि मंडल (Bar Council of India) ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान ही नहीं दिया। यदि हिन्दी और भारतीय भाषाओं में कानून की शिक्षा दी जाती है तो विधि स्नातक न्यायालयों में, यहाँ तक कि उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय में अपनी वकालत सुचारु रूप से कर सकें गे जो वादी और प्रतिवादी के लिए सहज, सुगम तथा संप्रेषणीय भी होगा। अनेक समितियों और आयोगों ने दृढ़ता से इस बात पर बल दिया है कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होने से छात्रों में रटंत की आदत पड़ जाए गी और मौलिक शोध, अन्वेषण तथा स्वतंत्र चिंतन-मनन  करने की शक्ति क्षीण हो जाए गी। विधि की शिक्षा के संदर्भ में संसदीय राजभाषा समिति के संकल्प की मद संख्या 19 और 24 नवंबर, 1998 के राष्ट्रपति के आदेश में भी हिन्दी माध्यम में विधि की शिक्षा के बारे में कहा गया है ‘’हिन्दी के माध्यम से भी स्नातक स्तर और स्नातकोत्तर स्तर पर विधि की शिक्षा व्यवस्था पूरे देश में तथा अन्य विधि के क्षेत्र में कार्यरत सभी विश्वविद्यालयों, अन्य संस्थाओं को करनी चाहिए।‘ लेकिन शिक्षा के कर्णधारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हिंदीतर भाषी न्यायाधीश गोपाल राव एकबोटे ने तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं का समर्थन करते हुए कहा है कि आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विधि कॉलेजों में हिन्दी और अपनी प्रादेशिक भाषा दोनों को शिक्षा माध्यम के रूप में व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन इन दोनों शिक्षा-माध्यमों के लिए विश्वविद्यालयों को अनिवार्यत: एक-समान सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। साथ ही यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि जिन कॉलेजों में प्रादेशिक भाषा शिक्षा-माध्यम के रूप में लागू किया जाता है उनमें छात्रों को  हिन्दी का पर्याप्त ज्ञान देना भी ज़रूरी होगा। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली का ज्ञान भी देना होगा ताकि ये छात्र विधि स्नातक होने के बाद उच्चतम न्यायालय में भी वकालत कर सकें, क्योंकि उच्चतम न्यायालय में सभी न्याय-निर्णय हिन्दी में ही देने होंगे। भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिन्दी में विधि की पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन करना होगा।                       


     भारत के न्यायालयों में जो करोड़ों मुकदमे अधर में लटके पड़े रहते हैं, उनके प्रमुख कारणों में एक कारण अपनी भाषा में मुकदमे की सुनवाई न होना है। एक ब्रिटिश विद्वान और चिंतक जॉन स्टुअर्ट ने सही कहा है कि विलंब से दिया गया निर्णय नहीं के बराबर होता है। प्रश्न उठता है कि वादी या प्रतिवादी को उसे अपनी भाषा या अपने देश की भाषा में न्याय क्यों नहीं मिलता? लोकतंत्र में उसके अधिकार को सीमाओं में बांध रखा है जो वास्तव में उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। जनता को जनता की भाषा में न्याय मिलना चाहिए।


 स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए स्वभाषा, क्षेत्रीय भाषा, देश की भाषा या राष्ट्र भाषा में निर्णय देने की व्यवस्था की जाए। वस्तुत: बहुभाषी राज्य में न्याय व्यवस्था के एकीकरण के लिए, विशेषकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के लिए विशेष दूरदर्शिता तथा सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।  


   भारत की अधिकतर संख्या अपना भाषा-व्यवहार अपनी भाषा में करती है। फिर भी न्यायालयों की भाषा अंग्रेज़ी बनी हुई है। न्याय-व्यवस्था में पारदर्शिता की आवश्यकता रहती है। यदि अपनी भाषा में न्याय प्रक्रिया नहीं चले गी तो पारदर्शिता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। बड़ी दु:खद स्थिति है कि अपनी भाषा इस न्यायालयों के दरवाजे के बाहर यह आशा ले कर चुपचाप खड़ी रहती हैं, शायद उसे कभी न्यायालय के अंदर बुला लिया जाएगा। यह कैसी विडंबना है कि जनता ने जिस संसद को चुना, वह संसद जनता की भाषा में कानून न बना कर विदेशी भाषा अंग्रेज़ी में बनाती है। इससे हमारे जजों और वकीलों को मनमानी करने का मौका तो मिले गा ही, साथ ही लोकतंत्र के साथ छल और धोखा भी होगा। अगर जन-सामान्य को अपनी भाषा में न्याय मिलता है तो न्यायालयों को वह बेहतर ढंग से समझ पाएगा और उसे आत्मसात कर पाए गा। अत: भाषा अभियान चलाने की आवश्यकता है, क्योंकि मातृभाषा अर्थात अपनी भाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता, यह वैज्ञानिक सत्य है। यूनाइटेड अरब एमीरात (यू.ए.ई) के आबूधाबी में अपने न्यायालयों के लिए अरबी, अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ हिन्दी को तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया है, ताकि वहाँ बसे भारतीयों को सुविधा मिल सके। यह विडंबना ही है कि विदेश में प्रवासी भारतीयों को न्यायालयों में हिन्दी का प्रयोग करने की सुविधा मिल रही है जबकि भारत में अपने भारतीयों को ही न्यायालयों में अपनी भाषा का प्रयोग करने की सुविधा नहीं दी गई है।         


                                                 प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी,


                                          1764, औट्रम लाइन्स, डॉ. मुखर्जी नगर,


                                              (किंग्ज़्वे कैंप), दिल्ली – 110 009


बाल कविता  ( *चीन की बीमारी कोरोना* )

बाल कविता 

 

 *चीन की बीमारी कोरोना* 

 

मैं  चीन  की  बीमारी

बनी जग में महामारी ।

छींक हैं मेरी  लक्षण

मेरा जीवाणु विलक्षण ।।

 

सारी दुनिया भयभीत

खांसी, सिरदर्द में छाई ।

सांस लेने में तकलीफ

समझ लेना कोरोना आई ।।

 

मॉस्क,सेनिटाइजर,हैंडवॉश

थोडी  दूरी , साफ -  सफाई ।

हमारी सावधानी, सर्तकता

देख कोरोना हो हवा-हवाई ।।

 

           ✍ *गोपाल कौशल* 

        नागदा जिला धार मध्यप्रदेश

कविता

कविता:-

      *"इश़्क की इबादत"*

"इश़्क की इबादत से ही साथी,

चलता है-

यह संसार।

इश़्क हो साथी साथी से,

मिलती सुशियाँ-

जीवन में आपार।

इश़्क की इबादत हो प्रभु संग,

मिटते जीवन के विकार-

सपने होते साकार।

प्रकृति से हो इश़्क तो साथी,

लगाये वृक्ष -

मिलेगा जीवन को आधार।

इश़्क की इबादत से ही साथी,

चलता है-

यह संसार।।"

 

कविता:-

 

      *" बजरंगबली"*

 

" राम भक्त हनुमान ही,

कहलाते जग में-

बजरंगबली।

अमर हैं जग में राम कृपा से,

सबके कष्ट हरते-

महावीर बजरंगबली।

महिमा उनकी अपार जग मे,

जो जन जाने-माने-

करते बेढ़ापार बजरंगबली।

संकटहरण मंगल मूरत रूप हैं,

जो शरण गया उनके-

नैया पार लगाते बजरंगबली।

हरे पीड़ा तन मन की,

राम भक्त हनुमान-

कहलाते वही बजरंगबली।

अष्टसिद्धि नव निधि के दाता,

हरते जीवन का दु:ख-

बजरंगबली।

राम भक्त हनुमान ही,

कहलाते जग में-

बजरंगबली।।"

 

कविता:-

    *"जीवन जग में"*

"गम की बदली छाई ऐसी,

घिर आया अंधकार मन में।

आशाओं का सूरज चमके,

तरस गया ये जीवन जग में।।

धैर्य से ही इस जीवन में फिर,

दे जाता है-साहास मन में।

हर सके गम अपनों के यहाँ,

ऐसी शक्ति मिले फिर जग में।।

ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हम जग में,

खोया मेरा मैं जीवन में।

मिली जो छाया नेह की फिर,

भूला मैं-मैं जीवन जग में।।"

 

कविता:-

     *"मन की बातें"*

"सोचते-सोचते साथी,

मन की बातें-

बीत गई कितनी रातें?

मिलना-मिलकर बिछुड़ना,

जीवन में-

दे गया कई सौगातें।

अपनत्व की धरती पर,

रह गई -

कही-अनकही बातें।

ठहर कर कुछ पल साथी,

होती जो उनसे-

कुछ मीठी बातें।

मिटती कटुता जीवन से,

छाता मधुमास-

पूनम की होती रातें।

सोचते-सोचते साथी,

मन की बातें-

बीत गई कितनी रातें ?"

 

कविता:-

     *" मोक्ष का सागर"*

"प्रभु भक्ति संग मानव जग में,

फिर मिला जीवन आधार।

प्रभु भक्ति संग ही जीवन में,

यहाँ हुए सपने साकार।।

भक्ति की शक्ति से ही जग में,

प्रभु लेते यहाँ अवतार।

पर पीड़ा की अनुभूति संग,

हरते जीवन के विकार।।

सत्य पथ पर ही चल जग में,

फिर मिलता सुख का गागर।

सागर मंथन से ही जग में,

मिलता मोक्ष का सागर।।"

 

कविता:-

      *"सुख का साथ"*

"समुंद्र मंथन होता मन में,

कुछ भी जग में न लगता हाथ।

विचारो की अनुभूति में फिर,

क्या-रह पाता उनके साथ?

छोड़े न स्वार्थ यहाँ जग में,

कहाँ -फिर बन पाती ये बात?

अनचाहे संबंध संग वो,

कब-तक निभाए साथ?

जीवन ऐसी पहेली यहाँ,

कौन- सुलझा पायेगा पार्थ?

मिलकर चले दो कदम जग में,

हर पल होगा सुख का साथ।।"

ःःःःःःःःःःःःःःःःः          सुनील कुमार गुप्ता

S/0श्री बी.आर.गुप्ता

3/1355-सी,न्यू भगत सिंह कालोनी,

बाजोरिया मार्ग, सहारनपुर-247001(उ.प्र.)

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Aksharwarta International Research Journal - October - 2026 Issue