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Tuesday, September 15, 2020

*"भाषा साहित्य और समाज समकालीन परिपेक्ष"* 

*"भाषा साहित्य और समाज समकालीन परिपेक्ष"*     

 

*परिचय:-* मातृभाषा किसी व्यक्ति,  समाज, भारत देश एक सांस्कृतिक देश है। जो पूरी दुनिया में अपनी प्राचीन संस्कृति और प्राचीन सभ्यता के लिए मशहूर है। आज के भारत देश को प्राचीन संस्कृति से बहुत कुछ विरासत में मिल है।

 

जैसे की त्योहार, धर्म, संस्कार, रहन-सहन, ज्ञान और ऐसे ही बहुत कुछ जो हमे प्राचीन समय से मिलता आ रहा है। अपने भारत देश में आज भी लोग कई सारी पुरानी परंपराये और पुरानी संस्कृति का पालन कर रहे है।

 

 *हर चीज में संस्कृति* 

पुरानी पीढ़ियों के लोग अपनी अगली पीढ़ियों के लिए अपनी संस्कृतियों और मान्यताओं को पारित करते हैं, इसलिए, यहां हर बच्चा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करता है, क्योंकि वह पहले से ही माता-पिता और दादा-दादी से संस्कृति के बारे में जानता था।

 

हम यहां हर चीज में संस्कृति को देख सकते हैं जैसे नृत्य, फैशन, कलात्मकता, संगीत, व्यवहार, सामाजिक मानदंड, भोजन, वास्तुकला, ड्रेसिंग सेंस आदि।

 

भारत एक बड़ा पिघलने वाला बर्तन है जिसमें विभिन्न मान्यताएं और व्यवहार हैं, जिसने यहां विभिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया।

 

 *विभिन्न धर्मों की उत्पत्ति* 

यहाँ के विभिन्न धर्मों की उत्पत्ति लगभग पाँच हज़ार वर्ष से बहुत पुरानी है। यह माना जाता है कि हिंदू धर्म की उत्पत्ति वेदों से हुई थी। सभी पवित्र हिंदू शास्त्रों को पवित्र संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

 

यह भी माना जाता है कि जैन धर्म की प्राचीन उत्पत्ति है और उनका अस्तित्व सिंधु घाटी में था। बौद्ध धर्म एक और धर्म है जो देश में भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के बाद उत्पन्न हुआ था। ईसाई धर्म बाद में लगभग दो शताब्दियों तक लंबे समय तक शासन करने वाले फ्रांसीसी और ब्रिटिश लोगों द्वारा यहां लाया गया था।

 

अपने देश में जो विभिन्न धर्म है, उसमे से कुछ धर्म की उत्पत्ति प्राचीन समय में हुई थी। इसलिए वो धर्म प्राचीन समय से चले आ रहे है। जैसे की हिंदू और जैन धर्म। इसके विपरीत कई सारे धर्म है जो, अपने देश में बाहर से आए है। मतलब कई सारे दूसरे देशों के संस्कृती से यहा आए है। इसमे सभी धर्म के लोग अपने अनुष्ठानों और मान्यताओं को प्रभावित किए बिना शांति से यहाँ रहते हैं।

 

 *संस्कृति का प्रभाव* 

युगों की विविधता आई और चली गई लेकिन हमारी वास्तविक संस्कृति के प्रभाव को बदलने के लिए कोई भी इतना शक्तिशाली नहीं था। युवा पीढ़ी की संस्कृति अभी भी गर्भनाल के माध्यम से पुरानी पीढ़ियों से जुड़ी हुई है।

 

हमारी जातीय संस्कृति हमेशा हमें अच्छा व्यवहार करने, बड़ों का सम्मान करने, असहाय लोगों की देखभाल करने और हमेशा जरूरतमंद और गरीब लोगों की मदद करने की सीख देती है।

 

  यह हमारी धार्मिक संस्कृति है कि हम उपवास रखें, पूजा करें, गंगाजल चढ़ाएं, सूर्य नमस्कार करें, परिवार में बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें, दैनिक रूप से योग और ध्यान करें, भूखे और विकलांग लोगों को भोजन और पानी दें। यह हमारे राष्ट्र की महान संस्कृति है जो हमें हमेशा अपने मेहमानों का स्वागत एक भगवान की तरह करना सिखाती है, यही कारण है कि भारत “अतीथि देवो भव” जैसे एक आम कहावत के लिए प्रसिद्ध है। हमारी महान संस्कृति की मूल जड़ें मानवता और आध्यात्मिक अभ्यास हैं।संस्कृति या राष्ट्र की पहचान होती है l वास्तव में भाषा एक संस्कृति है, उसके भीतर भावनाएं,  विचार  और सदियों की जीवन पध्दति समाहित होती है l मातृभाषा ही परम्पराओं और संस्कृति से जोड़े रखने की एक मात्र कड़ी है l राम-राम या प्रणाम आदि सम्बोधन व्यक्ति को व्यक्ति से तथा समष्टि से जोड़ने वाली सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हैं l उदाहरण के लिए प्रथम सम्बोधन के समय हम हाथ मिलाकर गुड मार्निंग नहीं करते हैं, बल्कि हाथों को जोड़कर राम या अन्य भगवान का नामोच्चारण करते हैं l यह नामोच्चारण एक तरफ हमें मर्यादा अथवा सम्बन्धित भगवान की विशेषता के कारण अर्जित युग-युगान्तकारी ख्याति की याद दिलाता है तो दूसरी तरफ राम जैसे शब्दों का उच्चारण हमारी अन्त:स्रावी (एंडोक्राइन) ग्रंथियों योग की भाषा में चक्रों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है l हाथ मिलाकर हम रोगकारी जीवाणुओं के विनिमय से भी बच जाते हैं l हाल ही में स्वाइन फ्लू से अपने नागरिकों को बचाने के लिए ओबामा दम्पति ने हाथ मिलाने से रोकने हेतु मुठ्ठी भिड़ाने (फिस्ट बम्प) अभियान चलाया था I अमेरिकी वैज्ञानिकों ने फिस्ट बम्प से भी दस प्रतिशत रोगाणुओं के विनिमय का खतरा बताया था यानी हाथ जोड़ना स्वत: ही श्रेष्ठ सिद्ध हो चुका है I

 

पहले घर के बाहर स्वस्तिक बनाते थे और सुस्वागतम् लिखा होता था और अब कुत्तों से सावधान I बोविस और उनके साथी वैज्ञानिक ने अध्ययन के बाद सिद्ध किया कि स्वस्तिक से सर्वाधिक सकारात्मक ऊर्जा निकलती है और यह विश्व की समस्त धार्मिक या अन्य आकृतियों के मुकाबले अनेक गुना ऊर्जा देने वाली आकृति है, जिससे एक मिलियन बोविस ईकाई की ऊर्जा निकलती है I इसीतरह पहले हमारे साथ कुछ अनपेक्षित घटित हो जाता था तो हम भगवान का नाम (हाय राम, या हे भगवान आदि) लेते थे I इसतरह हमारी अपेक्षा परमात्मा की कृपा पाने की होती थी, ताकि परमात्मा को याद दिला सकें कि तेरी कृपा की जरूरत है I जबकि इन दिनों नई पीढ़ी ऐसे अवसरों पर ओह शीट अर्थात् मानव मल को याद करती है, दूसरे शब्दों में कहें तो तत्कालीन अनपेक्षित स्थिति में उनकी अपेक्षा विष्ठा से मदद की हो गई है I भारतीय परम्पराओं के अनुसार तो ऐसे विकट या संकट की घड़ी में भगवान के नाम की तरह अशुभ वस्तु का स्मरण अनिष्ट को आमन्त्रित करने जैसा माना जाता है I विदेशों में सुबह के नमस्कार के लिए गुड मॉर्निंग शब्द का उपयोग होता है I वास्तव में यह गुड मार्निंग शब्द एक तरह से शुभकामना है कि आपको आज सूर्य के दर्शन हो जाएं, क्योंकि कई देशों में सूर्य भगवान साल में केवल 150 -200दिन ही दिखाई देते हैं l इसकारण वहां के लगभग 20% नागरिक सर्दियों में सीजनल अफेक्टिव डिसआर्डर (सेड)से ग्रस्त हो जाते हैं I हम पर तो सूर्य भगवान लगभग हर दिन ही कृपा करते हैं l हमारी मार्निंग तो उस दृष्टि से वैसे ही हर दिन गुड होती है l हाथ जोड़ने, नमन और झुकने की अपनी वैज्ञानिकता है l अर्थात् एक भाषा के नष्ट होने का अर्थ संस्कृति, विचार और एक जीवन पद्धति का मर जाना होता है l इसलिए भाषा को बचाना बहुत जरूरी है lइसे फौरीतौर पर नहीं लिया जाना चाहिए l

 

भारतीय भाषाओं की वैज्ञानिकता

फ्लोरिडा स्थित विश्वविद्यालय ने बताया था कि देवनागरी ऐसी भाषा है, जिसमें जीभ के सभी स्नायुओं का उपयोग होता है, रक्त संचार बढ़ता है, मस्तिष्क शान्त, (माइंड रिलेक्स), मस्तिष्क की बेहतर क्रियाशीलता (बेटर फंक्शनिंग ऑफ़ ब्रेन) और स्फूर्ति I इसके अतिरिक्त रोग रोधक शक्ति का विकास यानी बीमारियों से बचाव भी और रोग हो जाए तो उनसे रक्षा भी I

 

आत्मीयता बनाम आवश्यकता और उपयोगिता – नेशनल ब्रेन सेंटर में सम्पन्न एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार “हिन्दी या भारतीय भाषाएं पढ़ते और लिखते समय मस्तिष्क के दोनों तरफ के गोलार्द्ध सक्रिय होते हैं l जबकि अंगरेजी पढ़ते समय केवल बांया ही जागता है l” यह वैज्ञानिक मत है कि  बांया मस्तिष्क तर्क, विश्लेषण, खण्ड खण्ड दृष्टि और गणित से सम्बध्द है और दांया आत्मीयता, भावना, संवेदना, कला,दया, ममता, करुणा, संगीत, काव्य, वात्सल्य, वस्तु को समग्रता से देखने आदि का प्रतिनिधित्व करता है lउक्त अध्ययन के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि हिन्दी या भारतीय भाषा पढ़ने वाले व्यक्ति का विकास संतुलित रूप से होगा,  इसके सम्भावना अधिक रहती है l यह बात सौ प्रतिशत सही है कि तर्क और गणित यानी आवश्यकता और उपयोगिता प्रधान व्यक्ति दया, ममता, करुणा आदि गुणों कि दृष्टि से उतना सम्पन्न नहीं रहेगा l अंगरेजी भाषा से बांया मस्तिष्क ज्यादा सक्रिय और विकसित होता है अथवा नहीं, इस बात का निर्णय दो तीन उदाहरणों से आप तय कर सकेंगे I अंगरेजी भाषा वाले देशों में पति-पत्नी के बीच तलाक की नौबत जरा-जरा सी बातों के कारण आ जाती है I ऐसी छोटी छोटी बात कि विश्वास ही नहीं हो पाता है I कुछ साल पहले अखबार में खबर पढ़ी थी कि अमेरिकी दम्पति के बीच टूथ पेस्ट ज्यादा लगाने का विवाद इतना बढ़ा कि तलाक हो गया था I वैसे भी वहां विवाह तो बड़ी बात है, प्रेम और मित्रता तक तर्क और गणित यानी आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर होते हैं तथा इसीलिए ये पवित्र सम्बन्ध भी ज्यादा लम्बे नहीं चल पाते हैं I अमेरिका जैसे देशों में मां-बाप अपनी सन्तानों को 14 -15 साल की उम्र में आत्मनिर्भर होने के लिए कहने लगते हैं l कहीं-कहीं तो घर से ही निकाल दिया जाता है जबकि भारतीय मां-बाप अपने बच्चों को सुशिक्षित करने के बाद ही कमाने का आग्रह करते हैं, चाहे वे तीस साल के हो जाएं I मेडिकल के विद्यार्थी तो30 -32 साल की उम्र के पहले जीविकोपार्जन लायक नहीं हो पाते हैं l जहां तक अपने लाड़लों को घर से निकालने का प्रश्न है, वह तो सामान्यतया भारत में असम्भव है I भारत में भी अंगरेजी माध्यम से पढ़े बच्चे, बड़े होकर (तर्क और गणित को ध्यान में रखते हुए) मां-बाप को पैसा तो भेज देते हैं, पर बेटों से श्रवणकुमार जैसे एक प्रतिशत आत्मीयता के लिए मां-बाप मरते दम तक तरसते रहते हैं l आजकल तो विवाह का आधार आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर होने लगा है कि पति या पत्नी की शिक्षा-दीक्षा एकदूसरे के व्यवसाय के अनुकूल होगी या नहीं I दाम्पत्य जीवन में यदि आवश्यकता और उपयोगिता का सिद्धान्त हावी होगा तो फिर दम्पति में परस्पर आत्मीयता का आविर्भाव भला कैसे होगा I बोया हुआ आवश्यकता और उपयोगिता का बीज ही तो फलीभूत होगा I कहीं – कहीं तो वापरो और फेंको (यूज एंड थ्रो) का सूत्र काम करने लगा है l  मैं तो उक्त वैज्ञानिक अध्ययन को सौ प्रतिशत सही मानता हूं और मां-बाप को घर से बाहर करने की घटनाओं के पीछे अंगरेजी भाषा के हाथ को तर्क और गणित के आधार पर सही मानता हूं I फिर चाहे रेमंड कम्पनी के मालिक का मामला हो या फिर आशा साहनी के कंकाल की ही बात क्यों ना हो,सोचिए ना, क्या श्रवणकुमार के देश का एक बेटा अपनी अकेली रह रही ममतामयी माता की खैर खबर साल डेढ़ साल तक क्यों नहीं ले रहा था I हालांकि इतनी घोर वीभत्स और अनपेक्षित घटनाएं अपवाद हो सकती हैं, परन्तु माँ-बाप को जमीन-जायदाद और धन के लिए मार डालने का सिलसिला तो भारत में भी शुरू हो चुका है I

 *भाषा और मनोविज्ञान** 

अभी तक हुए अध्ययनों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों की यह स्पष्ट मान्यता है कि  सम्प्रेषण की भाषा वही होना चाहिए, जिस भाषा मे वह सोचता और चिन्तन मनन करता है l वे मानते हैं कि इससे संप्रेषणीयता सटीक और सहज तो होती ही है, साथ-साथ व्यक्ति की ग्रहण क्षमता और कार्य क्षमता भी अधिक होती है l हमारे महाविद्यालय (महात्मा गांधी स्मृति मेडिकल कॉलेज, इन्दौर) में सम्पन्न एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि विश्विद्यालयीन परीक्षाओं में मेरिट में आने वाले विद्यार्थियों में उन विद्यार्थियों का वर्चस्व रहता है, जिनकी मेडिकल में प्रवेश के पूर्व पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई थी I भारतरत्न स्व.डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम की स्पष्ट मान्यता थी कि मातृभाषा में शिक्षा सर्वोत्तम परिणामदायी होती है lउन्होंने 19 जनवरी 2011 को नागपुर के धर्मपीठ साइंस कॉलेज की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर कहा था कि मैंने अपनी दसवीं तक की पढ़ाई अपनी मातृभाषा में ही की थी I उन्होंने श्रोताओं को सलाह दी थी कि यदि बच्चों में रचनात्मकता का विकास करना है और उनकी ग्रहण क्षमता (ग्रास्पिंग पॉवर) विकसित करना चाहते हैं तो उसे मातृभाषा में ही पढ़ाना चाहिए I पाकिस्तान की एक प्रोफ़ेसर इरफ़ाना मल्लाह का कहना है कि मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने से बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं में वृद्धि होती है जबकि दूसरी भाषाओं में आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों की यह क्षमता सीमित हो जाती है। उनका कहना है कि जो बच्चे विदेशी भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करते हैं वह अपने इतिहास और सभ्यता से दूर हो जाते हैं।

 

 *मातृभाषा श्रेष्ठ क्यों ?* 

 

मातृभाषा सर्वश्रेष्ठ इसलिए है क्योंकि मातृभाषा विद्यार्थी को आत्मविश्वासी और योग्य बनाती है lमातृभाषा में पढ़ाई से कक्षाओं में शिक्षक – विद्यार्थी एवं विद्यार्थी – विद्यार्थी के मध्य पारस्परिक ज्ञान का विनिमय ज्यादा और अधिक प्रभावी होता है l अनेक अध्ययनों और अब तक सरकार द्वारा बिठाए गए भाषाई आयोगों के निष्कर्षों से ज्ञात हुआ है कि हिन्दी अथवा मातृभाषा में पढ़ रहे विद्यार्थी ज्यादा जिज्ञासु और आत्मविश्वासी होते हैं l शोध अध्ययनों और व्यक्तिगत अनुभवों में भी यह बात सामने आई है कि मातृभाषा से दूर करने पर या अंगरेजी थोपने से विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता हैl

 

वास्तव में बच्चों में भाषायी और व्याकरण सम्बन्धी समझ जन्मजात होती है। वे शब्दों के अर्थ भी जानते हैं, अर्थात् सहज और स्वाभाविक व्याकरण उनकी जन्मजात (आनुवांशिक) संवेदनशीलता का संकेत देती है । जिस तरह तैराकी सिखाए बिना ही व्यक्ति को पानी में कूदने को कह दिया जाए,  तो वह तैर नहीं सकता है, ठीक वैसे ही यदि विद्यार्थियों को ऐसी भाषा में निर्देश या उपदेश दिए जाएं जो उनकी समझ में न आती हो,  तो वे विषय को ठीक से नहीं समझ पाएंगे I

ख्यातिलब्ध विद्वानों का कहना है कि ऐसे बच्चें जो अपनी पैदायशी भाषा में शिक्षा नहीं ग्रहण करते हैं,  उन्हें सीखने में ढेर सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और उनमें बीच में ही पढ़ाई या शाला छोड़ने की दर भी ज्यादा होती है।

यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मातृभाषा में शिक्षा से बच्चे भी ज्यादा संवादात्मक रुख अपनाते हैं और सवाल-जवाब करने में दिलचस्पी लेते हैं। जो बच्चे अपनी मातृभाषा में ठोस आधार लेकर आते हैं, वे दूसरी भाषा में बेहतर योग्यता प्राप्त करते हैं, क्योंकि जो भी बच्चों ने अपने घर में अपनी मातृभाषा में सीखा है वह ज्ञान,  वे अवधारणाएं तथा कौशल अन्य भाषा में सहज ही सीख जाते हैं, अर्थात् मातृभाषा के उपयोग को रोकना बच्चे के विकास में कदापि सहायक नहीं होता है बल्कि कालान्तर में वह बच्चे के समग्र विकास में बाधा या अभिशाप सिद्ध हो सकता है ।  शिक्षण संस्थानों द्वारा किसी भी बच्चे को मातृभाषा को ठुकराने के लिए बाध्य करने से बच्चों को यह संदेश भी अपने आप ही चला जाता है कि अपनी भाषा के साथ-साथ अपनी संस्कृति भी संस्थान के बाहर छोड़ कर आना है I इसके कारण बच्चे अपनी अस्मिता और संस्कारों का कुछ हिस्सा भी धीरे धीरे बाहर छोड़ने लगते हैं । भाषा विज्ञानियों का मत है कि इसीलिए मातृभाषा में शिक्षा तथा उसका सम्मान संस्कृति की अस्मिता बचाए रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ऐसा नहीं है कि हमें विदेशी भाषाएं नहीं सीखनी चाहिए, अवश्य सीखनी चाहिए, लेकिन उसे एक उपयोगी विदेशी भाषा की तरह ही सीखना चाहिए ।

 

 *मातृभाषा में पढाएं – हिलेरी* क्लिंटन

 

बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने का समर्थन करते हुए अमेरिका की तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अपने भारत प्रवास में कहा था कि  अमेरिका में इस मुद्दे पर बहस जारी है। हिलेरी, जेवियर कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ खास पारस्परिक संवाद – सत्र में हिस्सा लेने आई थीं। शिक्षा के माध्यम पर हिलेरी का कहना था, न्यूयॉर्क सिटी में प्रमुख स्कूल स्पैनिश, चाइनीज, रशियन भाषा के हैं। समाज का बड़ा हिस्सा कहता है कि बच्चों को उन्हीं की भाषा में पढ़ाया जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि न्यूयॉर्क सिटी के स्कूलों में एक से अधिक भाषा जानने वाले टीचर ज्यादा नहीं हैं। अमेरिका में शिक्षा की चुनौतियों पर हिलेरी का कहना था कि अमेरिका में शिक्षा पर काफी पैसा खर्च होता है लेकिन हम उन बच्चों के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं जो पीछे रह जाते हैं। वहां बहुत ज्यादा असमानता है। उन्होंने कहा था कि भारत में तकनीकी शिक्षा दुनिया में सबसे श्रेष्ठ है।

 

मातृभाषा परम्परा की धरोहर

प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक श्यामाचरण दुबे ने कहा था कि “शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य परम्परा की धरोहर को एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचाना है। इस प्रक्रिया में परम्परा का सृजनात्मक मूल्यांकन भी शामिल होता है, लेकिन क्या हमारी शिक्षा संस्थाएं भारतीय परम्परा की तलाश कर रही हैं ?”  ख्यात साहित्यकार प्रभु जोशी का कथा है कि एक तरफ तो ताजमहल और लाल किले जैसी राष्ट्रीय धरोहर की एक भी ईंट तोड़ने पर अपराध कायम हो जाता है, तो दूसरी तरफ भाषा जैसी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक धरोहर को पूरी तरह नष्ट किया जा रहा है  और हम चुप हैं l और तो और हम भी उसमें सम्मिलित हो चुके हैं l यह हमारी आत्महीनता की पराकाष्ठा है l

 

 *मातृभाषा और मानव विकास* 

 

मानव विकास के क्रम में भाषा का एक विशिष्ट अधिकार  है, उसकी अधिमानता है और वरीयता है। व्यक्ति जो भाषा अपने परिवार में बोलता है, जिस भाषा में अपने संदेशों को संप्रेषित करता है अथवा जो भाषा स्थानीय समुदाय में प्रभावशाली होती है, उसमें अगर कोई अनुदेश या उपदेश दिया जाता है तो उसके कई फायदे होते हैं। मानव मस्तिष्क मातृभाषा में दिए गए संदेश को ग्रहण करने के प्रति काफी संवेदनशील होता है।

मातृभाषा में शिक्षा न देना क्रूरता है

चीन ने यह शैक्षिक अवधारणा भी पूरी तरह मान ली है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए और ऐसा न करना बच्चों के साथ मानसिक क्रूरता है। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चे अन्य भाषा आनन्दपूर्वक सीखें तो यह सर्वथा न्यायसंगत तथा उचित होगा। लगभग सात दशक के अनुभव के बाद भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां बनी हुई हैं, जिनका निराकरण केवल दृढ़ इच्छाशक्ति से ही संभव है।

 

भारत में राजभाषा को कुएं में धकेलने का षड्यन्त्र

हमारे देश में हिन्दी को येन केन प्रकारेण जबान और चलन से गायब करने की जोरदार साजिश चल रही है और हम पूरीतरह बेखबर हैं I इसके समानान्तर अंगरेजी को भारत की मातृभाषा और राष्ट्रभाषा बना दिया जाए,  इसकी पूरजोर कोशिशें अनेक स्तर और विविध आयामी तरीकों से निरन्तर की जा रही है। दुनिया के अन्य देशों में उनकी अपनी मातृभाषा की क्या स्थिति है,  मातृभाषा के संरक्षण, उसकी समृध्दि के लिए कहां क्या हो रहा है,  इसका अध्ययन किए बिना ही हिन्दी को राष्ट्र से निर्वासित कर कूड़ेदान में फेंकने का काम निर्बाध गति से चुपचाप चल रहा है I टीवी चैनल्स और अखबार बहुत ही तेज गति से पढ़ने-लिखने और बोलचाल में हिन्दी के सरल शब्दों को चुपचाप हाशिए पर डाल अंगरेजी के शब्दों को भारत के आम नागरिक के दिलोदिमाग में डालने में निरन्तर सफल होते जा रहे हैं, यह बहुत ही गम्भीर चिन्तन, मनन का विषय है और कुछ सार्थक तथा ठोस रणनीति की अनिवार्यता का स्पष्ट सन्देश और संकेत देता है I सरकारों से लेकर कार्पोरेट और कार्पोरेट-हित-साधक अखबार, उसके प्रवक्ता बनकर लिखने वाले सब के सब इस जुगत में हैं कि मातृभाषा शब्द ही भारतीय मानस और बुध्दि से बाहर हो जाए ।

ज्ञान नहीं अज्ञान की ओर अग्रसर

तमाम बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्वानों की गुहार को दरकिनार कर सरकारों ने कक्षा एक से अंग्रेजी पढ़ाना शुरू कर दिया, जबकि यह सिध्द हो चुका है कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। वैसे भी अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालकों में विषय को ग्रहण करने की क्षमता समान नहीं होती है । उनके लिए अंगरेजी में पढ़ाए जाने पर और भी अधिक कठिनाई होती है। जिनका पूरा परिवेश ही अंगरेजी भाषामय हो, ऐसे परिवार देश में बहुत कम हैं I  यह बात सभी जानते हैं और साक्षी भी हैं कि हिन्दी अथवा मातृभाषा के माध्यम से जब पढाया जाता है तो बालकों के चेहरे प्रफ्फुलित दिखाई देते हैं।

 

अपनी भाषा अपना स्वाभिमान

रुमानिया,  डेनमार्क, मिश्र जैसे पिछड़े देश तक अपनी भाषा में शिक्षा देने को राष्ट्रीय गौरव मानते हैं l स्पेन और लातिन अमेरिका के ज्यादातर देशों मे स्पेनिश भाषा मे शिक्षा देते हैं l जापान और जर्मनी जैसे छोटे-छोटे देश जब अपनी भाषा में शिक्षा देकर तकनीकी और गैर तकनीकी क्षेत्रों में दुनिया के सिरमौर बने हुए हैं I रुस, चीन  फ्रांस आदि सब देशों में उच्च शिक्षा भी अपनी मातृभाषा में दीk जाती है, तथा अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण कर इन देशों के नागरिक अपने देश को शक्तिशाली बना रहे हैं l नये-नये आविष्कार कर रहे हैं । लेकिन दुनिया को ज्ञान-विज्ञान, गणित, योग, आध्यात्म देकर जगदगुरु कहलाने वाले देश के बुद्धि सम्पन्न नागरिक विदेशी भाषा पढ़ कर कोई आविष्कार करना तो दूर की बात, कालिदास की तरह अपनी संस्कृति सभ्यता का ही नाश करने में जुटे हुए हैं । यक्ष प्रश्न यह है कि जब दुनिया भर के देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा देकर अपने देश को शक्तिशाली बना रहे हैं, तो भारत में ऐसा क्यों नही हो रहा है? देश के युवकों को उनकी मातृभाषा में उच्च तकनीकी, विज्ञान और चिकित्सा शिक्षा देने की व्यवस्था आजादी से अब तक नहीं की गई और न ही इस दिशा में आशा की कोई किरण दिखाई दे रही है । जापान और जर्मनी जैसे छोटे-छोटे देश जब अपनी भाषा में शिक्षा देकर तकनीकी और गैर तकनीकी क्षेत्रों में दुनिया के सिरमौर बने हुए हैं l और हम अपनी जमीन खोने और अपनी जड़ों को नष्ट लारने के लिए उतावले हो रहे हैं I

हमारे देश के नागरिकों को यह बताया जाना चाहिए कि स्पेन, पुर्तगाल, फ़्रांस,  इटली,  जर्मनी, हालैंड, रूस, चीन, जापान,  अरब देश आदि में शिक्षा का माध्यम अंगरेजी नहीं है I इन देशों में प्रति 5 -7लाख व्यक्तियों में से एकाध ही टूटी फूटी अंगरेजी जानता है | अर्थात् वहाँ सबने अपनी अपनी भाषा के माध्यम से प्रगति की है और वे विश्व में किसी से पीछे नहीं है l अंगरेजी की अनिवार्यता के कारण क्या हमारी प्रतिभा कुंठित नहीं हो रही है ? अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा था कि अमेरिका के प्राथमिक विद्यालयों में हिंदी और अरबी पढ़ाना शुरू करना चाहिए l क्योंकि इन भाषाओ को न जानने के कारण वहां के लोग क्या सोच रहे हैं, हम समझ नहीं पाते l अंग्रेज, अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत के समक्ष अपने को हीनतम मानने की हमारी प्रवृत्ति सदियों पुरानी है, लेकिन व्यवस्था ने अभी भी उसे बनाए रखा है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अनेक देश स्वतंत्र हुए थे तथा इनमें से अनेक ने अभूतपूर्व प्रगति की है। उसके पूर्व चीन,सोवियत संघ और जापान के उदाहरण हैं। जिस भी देश ने अपनी भाषा को महत्व दिया वह अंग्रेजी के कारण पीछे नहीं रहा। रूस ने जब अपना पहला अंतरिक्ष यान स्पुतनिक अंतरिक्ष में भेजा था तब अमेरिका में तहलका मच गया था। उस समय रूस में विज्ञान और तकनीक के जर्नल केवल रूसी भाषा में प्रकाशित होते थे। पश्चिमी देशों को स्वयं उनके अनुवाद तथा प्रकाशन का उत्तरदायित्व लेना पड़ा। चीन की वैज्ञानिक प्रगति कभी भी अंगरेजी भाषा पर निर्भर नहीं रही है ।

अस्तु, अंगरेजी को अपना कर और उसको राष्ट्रीय तथा राजकीय स्तर पर बढ़ावा देना का सीधा सीधा अर्थ यही है कि हम अंग्रेजी के व्यामोह में पतंगों की तरह आत्मघात कर रहे हैं I

राष्ट्र, संस्कृति और अपनी अस्मिता के लिए कटिबद्ध महानुभावों से करबद्ध निवेदन है कि आपसी मतभेदों को दरकिनार कर अपनी भाषा को बचाने के लिए जी जान से ठोस, सार्थक और सफल प्रयास करें Iअभी नहीं तो कभी नहीं ।                         भारत देश एक सांस्कृतिक देश है। जो पूरी दुनिया में अपनी प्राचीन संस्कृति और प्राचीन सभ्यता के लिए मशहूर है। आज के भारत देश को प्राचीन संस्कृति से बहुत कुछ विरासत में मिल है।

 

जैसे की त्योहार, धर्म, संस्कार, रहन-सहन, ज्ञान और ऐसे ही बहुत कुछ जो हमे प्राचीन समय से मिलता आ रहा है। अपने भारत देश में आज भी लोग कई सारी पुरानी परंपराये और पुरानी संस्कृति का पालन कर रहे है।

 

 *हर चीज में संस्कृति* 

पुरानी पीढ़ियों के लोग अपनी अगली पीढ़ियों के लिए अपनी संस्कृतियों और मान्यताओं को पारित करते हैं, इसलिए, यहां हर बच्चा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करता है, क्योंकि वह पहले से ही माता-पिता और दादा-दादी से संस्कृति के बारे में जानता था।

 

हम यहां हर चीज में संस्कृति को देख सकते हैं जैसे नृत्य, फैशन, कलात्मकता, संगीत, व्यवहार, सामाजिक मानदंड, भोजन, वास्तुकला, ड्रेसिंग सेंस आदि।

 

भारत एक बड़ा पिघलने वाला बर्तन है जिसमें विभिन्न मान्यताएं और व्यवहार हैं, जिसने यहां विभिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया।

 

 *विभिन्न धर्मों की उत्पत्ति* 

यहाँ के विभिन्न धर्मों की उत्पत्ति लगभग पाँच हज़ार वर्ष से बहुत पुरानी है। यह माना जाता है कि हिंदू धर्म की उत्पत्ति वेदों से हुई थी। सभी पवित्र हिंदू शास्त्रों को पवित्र संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

 

यह भी माना जाता है कि जैन धर्म की प्राचीन उत्पत्ति है और उनका अस्तित्व सिंधु घाटी में था। बौद्ध धर्म एक और धर्म है जो देश में भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के बाद उत्पन्न हुआ था। ईसाई धर्म बाद में लगभग दो शताब्दियों तक लंबे समय तक शासन करने वाले फ्रांसीसी और ब्रिटिश लोगों द्वारा यहां लाया गया था।

 

अपने देश में जो विभिन्न धर्म है, उसमे से कुछ धर्म की उत्पत्ति प्राचीन समय में हुई थी। इसलिए वो धर्म प्राचीन समय से चले आ रहे है। जैसे की हिंदू और जैन धर्म। इसके विपरीत कई सारे धर्म है जो, अपने देश में बाहर से आए है। मतलब कई सारे दूसरे देशों के संस्कृती से यहा आए है। इसमे सभी धर्म के लोग अपने अनुष्ठानों और मान्यताओं को प्रभावित किए बिना शांति से यहाँ रहते हैं।

 

 *संस्कृति का प्रभाव* 

युगों की विविधता आई और चली गई लेकिन हमारी वास्तविक संस्कृति के प्रभाव को बदलने के लिए कोई भी इतना शक्तिशाली नहीं था। युवा पीढ़ी की संस्कृति अभी भी गर्भनाल के माध्यम से पुरानी पीढ़ियों से जुड़ी हुई है।

 

हमारी जातीय संस्कृति हमेशा हमें अच्छा व्यवहार करने, बड़ों का सम्मान करने, असहाय लोगों की देखभाल करने और हमेशा जरूरतमंद और गरीब लोगों की मदद करने की सीख देती है।

 

 *निष्कर्ष* 

यह हमारी धार्मिक संस्कृति है कि हम उपवास रखें, पूजा करें, गंगाजल चढ़ाएं, सूर्य नमस्कार करें, परिवार में बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें, दैनिक रूप से योग और ध्यान करें, भूखे और विकलांग लोगों को भोजन और पानी दें। यह हमारे राष्ट्र की महान संस्कृति है जो हमें हमेशा अपने मेहमानों का स्वागत एक भगवान की तरह करना सिखाती है, यही कारण है कि भारत “अतीथि देवो भव” जैसे एक आम कहावत के लिए प्रसिद्ध है। हमारी महान संस्कृति की मूल जड़ें मानवता और आध्यात्मिक अभ्यास हैं।                                 

 *सन्दर्भ सूची:-*                           

1.  समकालीन भारतीय साहित्य।               

2. साक्षात्कार पत्रिका।                     

3. भाषा साहित्य रामविलास शर्मा।                                               

4. भारतीय संस्कृति और हिन्दी खण्ड डा0 रामविलास शर्मा।         

 

 प्रो 0 बाबुलाल भूरा                           

ग्रंथपाल                                       

शासकीय महाविद्यालय चंद्रशेखर आजाद नगर भाबरा जिला अलिराजपुर मध्य प्रदेश 457882

हिंदी  प्रगीत का समाजशास्त्र 


हिंदी  प्रगीत का समाजशास्त्र 

 

काव्य  में  विचार  की अपेक्षा  भाव की प्रमुखता  होती  है।यह विधा अनुभूति  प्रधान  है ;इसलिए  काव्य  साहित्य  के समाजशास्त्र  के लिए  एक चुनौती  है। काव्य  के समाजशास्त्र  पर लुकाच,गोल्डमान, लियो लावेंथल  ,रेमंड  विलियम्स विचार  करते हैं। 

समाजशास्त्र और साहित्य  परस्पर  परिपूरक हैं। साहित्य  समाज  के मूल्यों,मानों,परिवर्तनों और उपलब्धियों  को स्वर  देता  है और समाजशास्त्र  उनकी व्याख्या के साथ  मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन  करता  है। "समाज  व्यक्तियों  का समूह  न हो कर मनुष्य  के बीच  होने  वाली अंतर्क्रियाओं और इनके  प्रतिमानों का प्रतिरूप है।"1

समाजशास्त्र सामाजिक अंत्क्रियाओं और प्रतिमानों  की व्याख्या करता  है।"प्रतीकों  की सुविधा और सूखता,उनकी उत्पत्ति संबंधी वैधता से अधिक  महत्वपूर्ण  है समाज  के लिए  जिसकी सार्थकता  का विवेचन  समाजशास्त्र करता  है।"2 समाजशास्त्रसाहित्य  में  व्यक्त समाज,सामाजिक संबंधों, सामाजिक  अंतर्क्रियाओं,और परिवर्तनों  का अध्ययन  करता  है।"वह साहित्य में व्यक्त समाज  का समग्र  रूप  में व्यवस्थित वर्णन  और व्याख्या   करता है।"3 दुर्खीम  सामूहिक प्रतिनिधानों का विज्ञान  मानते  हैं  समाजशास्त्र को।" यह उन मानसिक संबंधों का अध्ययन  है जो व्यक्तियों  को परस्पर  बांधते हैं।" 4

समाजशास्त्र साहित्य  की विविध विधाओं  में  व्यक्त  जीवन-यथार्थ  और मूल्यों का विश्लेषण -मूल्यांकन करता  है।

 

काव्य  में  भाषाई संरचना उपन्यास  और नाटक  से अधिक  महत्वपूर्ण  होती  है।सेंट जान पर्सी काव्य  की अनुभूति और भाषाई संरचना  का विश्लेषण  करते हैं। कवि की संवेदना  गौण है।

काव्य  में  भी यथार्थवाद का अंकन  होता  है,लेकिन  वर्णनात्मक और कथात्मक  काव्य  में  यथार्थ  की अभिव्यक्ति  अधिक  होती  है। प्रगीतात्मक काव्य  में  यथार्थ  गौण  और अनुभूति  प्रधान  होती  है। प्रगीत  के आत्मपरक, रोमांटिक, बिंबाश्रित और प्रतीकात्मक  होने पर यथार्थ  गौण  होता  है। नागार्जुन  के प्रगीत  कथात्मक  हैं,  इसलिए  अनुभूति  कम, विचार  अधिक  हैं। नागार्जुन  की 'अब तो बंद  करो देवी इस चुनाव  का प्रहसन' या 'तुम रह जाते दस साल औ'र या' सत्य को लकवा  मार  गया  है'जैसी कविताओं का सामाजिक  अर्थ और अभिप्राय यथार्थ  से युक्त  है।लेकिन ' कालिदास सच सच बतलाना 'या 'श्याम घटा हित बिजुरी रेह','सुजान नयन मनि','मेघ बजे 'आदि  कविताओं की कला यथार्थ  की सीमा  से बाहर पड़ती  है। कविता  में  व्यंजना  की पद्धति प्रायः  प्रतीकात्मक अधिक  होती  है।

काव्य  में  यथार्थ  और अनुभव की सीधी अभिव्यक्ति  नहीं  होती। उसमें  पुनर्रचित यथार्थ और अनुभव  की अभिव्यक्ति  होती  है;इसलिए काव्य  का यथार्थ  जीवन के यथार्थ  से भिन्न  होता  है। कविता  में  कभी-कभी  मानवीय वास्तविकता  से जीवनाकांक्षा की व्यंजना  अधिक  होती  है, लेकिन काव्य  की   नितांत निजी अनुभूति  में  भी समाज की आकांक्षा  निहित होती  है। काव्य  के सौन्दर्य  का एक रूप भाषिक सृजनशीलता के सौन्दर्य  में  होता  है। पाब्लो नेरूदा काव्य  को यथार्थ-विरोधी  मानते  हैं। समाजशास्त्र  जीवन के सामाजिक यथार्थ  और मूल्यों  से संबद्ध  है ।यह संबंधों  और व्यवहारों  पर निर्भर  है। वह समाज की वास्तविकता  के अमूर्तन  का सैद्धांतिक  सार है। उसमें  समाज  से स्वतंत्र व्यक्तियों की सत्ता  का कोई  विशेष महत्त्व  नहीं  होता। अडोर्नो का कहना  है कि काव्य  समाज  का विरोधी  और व्यक्ति  का पक्षधर  होता  है। वह भौतिक  जीवन के दमनकारी  प्रभावों और उपयोगितावादी दबावों  से बचाने  का माध्यम  है ।वह मानवता  और मूल्य  ,मानवीय अस्मिता और स्वाधीनता  का पक्षधर  है।यही इसकी  मानवीयता और सामाजिकता है।

ओडोर्नो का कहना  है कि "प्रगीत की पुकार  का मर्म  वही  समझ  सकता  है जो उसकी  आत्मपरकता में  निहित मानवीयता  की आवाज  सुन पाता  है।"5

मुक्तिबोध  'कामायनी' की समाजशास्त्रीय व्याख्या  करते हैं  लेकिन  सौंदर्य  -बोध  रहित।

समाजशास्त्र  की वस्तुपरकता और प्रगीत की आत्मपरकता  में  समन्वय  का अभाव  होता  है, लेकिन  प्रत्येक  महत्वपूर्ण  प्रगीत में वस्तु  से चेतना  का और समाज  से व्यक्ति  का ऐतिहासिक  संबंध  व्यक्त  होना अपेक्षित  है। प्रगीत में यह संबंध  जितना  प्रच्छन्न  होगा प्रगीत  उतना  ही अर्थपूर्ण  होगा। इसमें  समकालीन  जीवन की संवेदना  होती  है। काव्य और प्रगीत में आत्मीयता  और संश्लेषणात्मकता होती  है। प्रतीक,बिंब फैंटेसी आदि काव्य  की संप्रेषणीयता  के साधन होते हैं। लय,प्रवाह और संगीत  काव्य  के वैशिष्ट्य  हैं। इसमें  भाषा  की भूमिका  निर्णायक  और महत्वपूर्ण  होती  है।इसकी भाषाई संवेदनशीलता  में सामाजिक  संवेदनशीलता  निहित होती  है।अडोर्नो  का कहना  है कि "उदात्त  प्रगीत वे होते हैं जिनमें  कवि  अपनी भाषा  में खुद  को इस तरह विलीन कर देता है कि उसकी उपस्थिति  का आभास  नहीं  होता और भाषा का अपना  स्वर काव्य  में  गूंजने लगता है। इसी प्रक्रिया  में जब भाषा  के स्तर  पर काव्य  समाज  से जुड़ता  है तब उसकी भाषा  केवल कवि -मानसिकता  को ही व्यक्त नहीं  करती ,वह अपने  समय और समाज की मानसिकता  को भी व्यक्त करती है।"6 ऐसी स्थिति  में  कवि की भाषा-चेतना उसके जीवन -बोध  का पर्याय  बन जाती है। कवि त्रिलोचन  का कहना  है-

भाषा की लहरों  में  जीवन का हलचल है

ध्वनि  में  क्रिया  भरी है और क्रिया में बल है।

कवि दिनकर, प्रसाद,निराला और नागार्जुन  के अनेक  प्रगीत सामाजिक  जीवन -बोध  और सौंदर्य  -बोध  से युक्त हैं  ।ये सामाजिक -राजनीतिक यथार्थ के साथ  मानवता और मानवीय अस्मिता-स्वाधीनता को व्यक्त  करते हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची-।

1 Sociology ,Lapier R.T.P 37

2Principal of Sociology-Harbert Spencer,Prefece

3 समाजशास्त्र-जी के अग्रवाल,एस बी पी डी पब्लिकेशन्स,आगरा ,पृष्ठ 3

4 वही  पृष्ठ 7

5 साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका -डाॅक्टर मैनेजर पाण्डेय  हरियाणा  ग्रंथ अकादमी पृष्ठ  334.

वही  पृष्ठ  335.

 


सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह ,हिंदी  विभाग,

 बी एन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा



Monday, August 10, 2020

   हम न मरैं मरिहैं संसारा : कबीर

       किसी व्यक्ति को कमज़ोर करना हो तो उसका चारित्रिक हनन कर दिया जाय, व्यक्ति खुद गिर जाएगा। जिसका नैतिक मूल्य ही निराधार हो, जिसके बारे में सिर्फ अफ़वाह फैलाई जा रही हो, जहाँ उसका इतिहास इस तरह से पेश किया जा रहा हो जो केवल किवदंती मात्र बनकर रह जाए, वैज्ञानिकता का दूर- दूर तक कोई संबंध ही न हो, उसकी बात कोई क्यों मानेगा! सांस्कृतिक बनावट किसी भी विचारधारा की रीढ़ होती है जिसके आधार पर वह टिका रहता है, यही काम हुआ कबीर के मरने के बाद। कबीर अपने समय के एक ऐसे युगदृष्टा थे जिन्होंने समाज के उपेक्षित वर्गों की लड़ाई लड़ी, उन्हें सही राह दिखाने की कोशिश की, सही और ग़लत में फ़र्क देखने का नज़रिया विकसित किया, जो एक सच्चे सामाजिक नागरिक होने का फ़र्ज़ निभा रहे थे, उनके बारे में हमें आज अगर कुछ पता है तो सिर्फ़ अफ़वाफ। उनके जन्म, मृत्यु, संप्रदाय एवं गुरु सब कुछ अफवाहों के आधार पर पेश किया गया। यह बात यहीं नहीं रुकी, कबीर को समझने की जो सबसे ज़रूरी और अहम मुद्दा है उनकी रचनाएं उन्हें तक नहीं छोड़ा गया, जिसमें कबीर के नाम से क्या- क्या नहीं लिखा गया। कभी 'कबीरा' और 'होरी' के नाम पर अश्लीलता फैलाई जा रही है तो कभी उनको वैष्णव धर्म और रामानंद का शिष्य बताया गया, कबीर के नाम से कई ऐसे दोहे बनाए गए जो कबीर के चरित्र को पूरी तरह से शंशय में डाल देते हैं जिसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। बचपन से हम एक ऐसे महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ अफ़वाह सुनते अा रहे हैं जिसका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी से हुआ, जिसको रामानंद ने आशीर्वाद दिया था। यह बात एक ऐसे साहित्यकार ने लिख कर घोषित कर दिया जिसको पहली बार एक मुकम्मल हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का गौरव प्राप्त है। जब हम चरित्रों के बारे में जानना शुरू किए उस उम्र में इस महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ कपोल कल्पना परोसी गई है। यह ज्ञान यहीं नहीं रुका है बल्कि विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं तक यही मान्यता प्रचलित है और उसी के आधार पर छात्रों और नौजवानों का भविष्य तय किया जाता है।
             जिस कबीर के बारे में ब्रिटेन के अखबारों में १८१२ में ही चर्चा शुरू हो गई और १८४१ तक उनके बारे में गंभीरता पूर्वक लेख प्रकाशित होने लगे थे, उसी कबीर के बारे में उनके अपने देश के लोगों ने बहुत देर में जानने का प्रयास किया। सबसे पहला प्रयास श्यामसुंदर दास ने कबीर की मूल हस्तलिपियों के आधार पर 'कबीर ग्रंथावली' के माध्यम से १९२८ में किया जिनमें कबीर के दोहे सम्मिलित हैं, लेकिन कबीर के व्यक्तित्व से संबंधित किसी मुकम्मल किताब के आने में और भी समय लगा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने १९४० में 'कबीर' लिखा। इन दोनों लेखकों ने आम जन के बीच कबीर के प्रति जागरूकता पैदा की और अलोचकीय दृष्टि से उनका विश्लेषण किया, लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ बातों को उन्होंने अपने पूर्वर्ती साहित्य इतिहासकार से ही स्वीकार कर ली, उदारहरण के लिए उनका पंथ वैष्णव संप्रदाय का होना। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का 'हिंदी साहित्य का इतिहास' एक ऐसा ग्रंथ है जिसके आधार पर कई परवर्ती आलोचकों और इतिहासकारों ने उनके दिए गए उद्धरण को सहर्ष स्वीकार कर लिया, खुद से उन पर विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई। कबीर से संबंधित सबसे तार्किक लेखन हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद अगर किसी ने किया है तो वह हैं डॉ. धर्मवीर। डॉ. धर्मवीर ने कबीर पर कई किताबें लिखी और उनके सत्य को तलाशने की कोशिश की। इससे पहले १९१५ में कबीर के सौ दोहों का अंग्रेजी अनुवाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'कबीर्स पोयम्स' नाम से किया। हालांकि उसमें कबीर के कुछ दोहे प्रक्षिप्त बताए जाते हैं, लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति कबीर के उन्हीं दोहों की वजह से हुई। तत्कालीन ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों में रविन्द्र नाथ टैगोर की साहित्यिक दुनिया में खूब चर्चा हुई, इसमें मिस इवेलिन अंडरहिल और मैकमिलन का सहयोग रहा। 
           आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी किताब 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (पृष्ठ ४९) में कबीर के बारे में लिखा है - "कहते हैं कि आरम्भ से ही कबीर में हिन्दू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाले माता- पिता न दबा सके। वे 'राम राम' जपा करते थे और कभी- कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे।" वहीं दूसरी तरफ (पृष्ठ ५०) लिखा कि "अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था।" श्यामसुन्दर दास की 'कबीर ग्रंथावली' के अनुसार रामानंद की मृत्यु १४१०ई. में हो चुकी थी, साथ ही रेवरेंड जी. एच. वेस्टकॉट ने प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ रामानंद की मृत्यु १४०० ई. ही मानी है। कबीर के जन्म के बारे में शुक्ल जी ने भी लिखा है और कबीरपंथी भी मानते हैं कि उनका जन्म १३९८ -९९ ई. में हुआ था। अगर इन तिथियों को देखें तो पता चलता है कि कबीर के जन्म लेने और रामानंद की मृत्यु के बीच में जो फासला है वह मात्र १२ वर्ष का था। इतनी छोटी सी अवधि में रामानंद ने कबीर को ऐसा कौन सा ज्ञान पिला दिया जिससे उनके गुरु हो गए जिसके बारे में कबीर ने कुछ लिखा ही नहीं है, और शुक्ल जी ने लिखा भी है कि अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था। कबीर की उम्र जो देखते हुए यह बात तो और भी असत्य लगती है। दरअसल रामानंद सिर्फ कबीर के ही गुरु नहीं थे, कबीर के समकालीन और परवर्ती जितने भी प्रगतिशील संत कवि थे उनके भी गुरु थे जिसमें बनारस के समकालीन संत रविदास, राजस्थान के संत पीपा, मुंबई के संत धन्ना जाट और गुजरात के संत दादू आदि शामिल हैं। इनके कार्यकाल पर गौर करें तो हम पाते हैं कि रामानंद का कार्यकाल कई सदियों तक चलता रहा। जबकि विचारधार को ध्यान दिया जाए तो सभी उनसे भिन्न और विरोधी थे। "समय और विचार की खाई को परखने की संभवत सबसे पहली कोशिश डॉ राकेश गुप्ता ने की थी जिन्होंने 1944 में सम्मेलन पत्रिका में 'क्या कबीर रामानंद के शिष्य थे?' शीर्षक से लेख लिखकर इस संबंध में गंभीर सवाल उठाया।" (कबीर हैं कि मरते नहीं पृष्ठ ५१,५५) इस आधार पर कबीर को रामानंद का शिष्य नहीं माना जा सकता। कबीर को रामानंद का शिष्य घोषित करने के लिए भक्तमाल में कई किवदंतियाँ लिखी गई जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई मेल जोल नहीं है। वे सारी किवदंतियाँ चमत्कार मात्र पर आधारित हैं जो सत्य हो ही नहीं सकती। कबीर के बारे दोहा भी प्रचलित किया गया - 'हम काशी में प्रकट भए, रामानंद चेताय।' जबकि कबीर की चेतना 'ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहि' की रही है।
             कबीर को रामानंद का समकालीन साबित करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए गए उनके जन्म को लेकर। कबीर का जन्म १३९८ माना जाता है। उनके समकालीन नानक और पूर्ववर्ती गोरखनाथ के बारे में कई जानकारी स्पष्ट मिल जाएगी लेकिन उनसे ज्यादा प्रखर, स्पष्ट और प्रगतिशील कवि के बारे में सब कुछ किवदंती मात्र बनाकर रख दिया गया है। कबीर के जन्म के बारे में कई दोहे देखने को मिलते हैं जिनमें उनका समय अलग- अलग बताया गया है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। कबीर के प्रभाव का एक उदाहरण यह भी माना जा सकता है कि कबीर की प्रसिद्धि सुनकर ही नानक ने उनसे मुलाकात की। निर्विवाद सत्य है कि नानक का जन्म १४६९ ई. में हुआ था, जन्म के २७ साल बाद वे कबीर से मिले, जाहिर है १४९६ तक कबीर जीवित रहे होंगे। कबीर का सिकंदर लोदी के साथ भी जिक्र आता है, सिकंदर लोदी ने बनारस के पास शर्की शासक हुसैन शाह (१४९३- १५१८) को पराजित किया और छ: महीने तक जौनपुर में रहा। नानक ने भी लिखा है की सिकंदर लोदी (१४८९- १५१७) हर वर्ष जौनपुर घूमने आता था। कबीर के बारे में एक कहानी यह भी मिलती है कि उनकी शादी तीस वर्ष की उम्र में हुई, उनकी बीस वर्षीय पुत्री ने कबीर को एक पंडित से मिलवाया, उस समय कबीर की उम्र ५० साल रही होगी। अगर इसे सही मान लिया जाए तब कबीर से संबंधित सिकंदर लोदी और नानक का प्रसंग ही छूट जाएगा। कबीर के जन्म के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है लेकिन कुछ विदेशी अखबार और चिन्तक कबीर का जन्म इस प्रकार मानते हैं - जी. एच. वेस्टकॉट ने कबीर का समय १४४० से १५१८ई. माना है, न्यूयार्क टाइम्स ने बुनकर कबीर को मुसलमान दम्पत्ति द्वारा १४४०ई. में पैदा हुआ बताया है, एस. ए. ए. रिजवी ने कबीर का जीवनकाल १४२५ से १५०५ई. माना है। तात्कालिक समय को देखा जाय तो (१३९८- १५१८) १२० साल किसी भी समाज सुधारक का जीवन नहीं रहा, उस पर भी कबीर जैसे विद्रोही चेतना वाले कवि का, जिसको सिकंदर के द्वारा कई बार मारने के प्रयासों का भी जिक्र मिलता है। इसको देखते हुए कबीर के जन्म के बारे में दो समय प्राप्त होते हैं - १३९८- १५२० ई. और १४४०- १५१८ ई.।
           कबीर के माता- पिता और धर्म को लेकर तमाम तरह की विसंगतियाँ हैं जिनमें कई दोहे एक दूसरे के विरोधी ठहरते हैं 'काशी का मैं वासी बाम्हन, मेरा नाम परवीना' - 'तू बाम्हन मैं काशी का जुलाहा'। कबीर के माता- पिता और धर्म सभी को जोड़कर उन्हें ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया जाना कोई अनायास बात नहीं हो सकती। उस समय धार्मिक आडंबरों के केंद्र में ब्राह्मणवाद का विस्तार था, हर ज्ञानी पुरुष का जन्म सिर्फ ब्राह्मण कुल में ही हो सकता था। क्योंकि ब्राह्मण जाति ही सबसे श्रेष्ठ जाति थी, निचली जाति में पैदा होकर कोई ज्ञानी कैसे हो सकता है। इसलिए कबीर को ब्राह्मण के रूप में दिखाने की कोशिश की गई। जबकि कबीर ने अपने कई दोहों में स्वयं को जुलाहा और कोरी कहा है। उनके दोहों का जो स्वर है वह किसी भी पाखंडी संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखता। 'जाति जुलाहा मतिकौ धीर,  हरषि- हरषि गुन रमै कबीर'/ मेरे राम की अभै पद नगरी कहै जुलाहा कबीर/ हरि को नांव अभै- पद- दाता, कहै कबीरा कोरी। कोरी जाति धर्मपरिवर्तन करके जुलाहा जाति में शामिल हुई थी यह बात आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी मानते हैं। किंवदंतियों को ध्यान से देखा जाए तो कबीर का पूरा परिवार नदी में बहता हुआ मिला था। कबीर को नीरू- नीमा ने तालाब में पाया था जब कबीर बहते हुए चले अा रहे थे। कबीर की पत्नी लोई जो ऊन की लोई में लिपटी हुई नदी में एक वैरागी को मिली थी। जिसके आधार पर उसका नाम लोई रखा गया। एक कहानी में कबीर और उनके गुरु शेख तकी नदी के किनारे टहल रहे थे, नदी में एक मेरे हुए बच्चे की लाश अाई, कबीर उसके कान में कुछ कहा और बच्चा जीवित हो उठा, कबीर ने उसका नाम कमाल रख दिया।  इन भ्रामक पाखंडियों का वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं है लेकिन सच यही है कि कबीर के बारे में अगर कुछ जुटा कर रखा गया है बाद के लोगों को जानने के लिए तो सिर्फ़ अफ़वाह और लगातार यही प्रचारित भी हो रहा है। जिन पाखंडियों के सामने कबीर झुके नहीं, जिसने हिंसा, मंदिर- मस्जिद, मूर्तिपूजा, वाह्य आडंबर, ऊँच- नीच, छुआ- छूत आदि का विरोध किया उसे तोड़ने के लिए दुनिया भर के मिथक बनाए गए, उनके बारे में कोई सही जानकारी उपलब्ध ही नहीं है। कबीर के जन्म या मृत्यु के इन चमत्कारिक आख्यानों को विदेश के किसी भी समाचार पत्र या लेखक ने नहीं माना है।
             कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध दर्शन का प्रभाव था। जिस प्रकार कबीरपंथी निम्न जातियों से संबंधित हैं उसी प्रकार गोरखनाथ के अनुयायी भी उन्हीं जातियों से आते हैं। लोगों को जाति हीनता की कीलें चुभा- चुभाकर इतना त्रस्त कर दिया गया कि उन्हें किसी दूसरे पंथ की शरण में जाना ही पड़ा, जहाँ उन्हें सम्मान मिल सके और जहाँ उनके मन को शांति, जहाँ पर ज्ञान की वर्षा मात्र से ही सुकून मिलता हो, किसी पुराण का पाठ या मंदिर के दर्शन से नहीं। कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध धर्म का प्रभाव इसलिए भी स्वीकरा जा सकता है कि उनके विचारों का मेल उनसे अक्सर होता दिखाई देता है। ब्राह्मणवाद का जो छद्म चारित्रिक दावा कबीर को अपने खेमे में मिलाने के लिए किया गया उसका कोई भी मेल नहीं है- 'मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ होइ'। कई जगह कबीर और गोरख नाथ के विचार एकदम नज़दीक देखे जा सकते हैं। गोरखनाथ - 'वेदे न सास्त्रे कतेब न कुरांने पुस्तके न बांच्या जाई,/ ते पद जांनां बिरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई।' वहीं कबीर कहते हैं - 'पोथी पढ़- पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय,/ ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' 
              बौद्ध, सिद्ध और नाथ के पंथ की प्रवृतियों को देखकर तथा कबीर के मूल काव्य रचना का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि उनके ऊपर बौद्ध दर्शन और गोरखनाथ का प्रभाव था न कि वैष्णव संप्रदाय का। विरोध में उन्होंने कट्टरपंथियों और मुल्लाओं को चेताने की कोशिश की है। उन पर रामानंद का बिल्कुल भी प्रभाव नहीं था। हर धर्म के रक्षकों को यह डर होता है कि उनके पंथ के लोग किसी दूसरे धर्म में परिवर्तित न हो जाएं और धर्म के रक्षक वही बने हैं जो जाति श्रेष्ठता में ऊँचे हैं अगर इसी तरह परिवर्तित होते रहे तो उनकी गुलामी कौन करेगा क्योंकि जातीय हीनता से त्रस्त होकर धर्मांतरण निम्न जाति के लोग ही करते हैं। धार्मिक नफरत फैलाने का एक मतलब यह भी हो सकता है कि दूसरे धर्म के बारे में इतनी नफ़रत भर दी जाए कि व्यक्ति को तात्कालिक धर्म में जाति हीनता के कारण जीना भले ही दूभर हो जाए लेकिन वह धर्म परिवर्तन करने के लिए सोचे ही न। यही कारण है कि गोरखनाथ और कबीर के अनुयायी वही लोग हुए जो जाति हीनता के आधार पर कुचले गए थे। कबीर ने एक ऐसी प्रथा को नकारा जहाँ पढ़ने का अधिकार शूद्रों को नहीं था, उनके ज्ञान का रास्ता सिर्फ सुनने तक सीमित था, इसलिए कबीर ने उनके लिए यह रास्ता अपनाया और उनको अपनी बानियों के माध्यम से सही गलत का फ़र्क समझाया। पाखंडों के नाम पर शोषण की तरफ़ आगाह किया।
              इतिहास में भारतीय नवजागरण का दौर एक ऐसा समय था जब सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक आदि प्रकार के सुधार हुए। जिसके आधार पर समाज में फैली कुरीतियाँ, ढोंग, पाखंड, आदि को उखाड़ फेकने की एक मुहिम चली। उस आंदोलन में लोगों ने अपने आप को पूरी तरह से समर्पित किया। उनका चरित्र उनके काम से अलग नहीं था। यही रूप हम कबीर में देखत हैं। समाज की भलाई के लिए उन्होंने अपने जीवन संघर्ष में कभी किसी चीज से समझौता नहीं किया, उन्होंने जो बोला वही किया, कबीर के विचार इतने क्रांतिकारी थे कि उनको सच बोलने में किसी की परवाह नहीं थी, उन्होंने अपनी कविता का प्रयोग समाज की भलाई के लिए किया। जो लोग भी आडंबरों के नाम पर शोषित, पीड़ित थे उनके हक में लड़ाई लड़ी। 'लिखी लिखा की है नहीं देखा देखी बात की'। कबीर के विचार हर एक विषय पर स्पष्ट थे। उनके भगवान निर्गुण राम थे जिनको कभी देखा नहीं जा सकता, जिनको मंदिरों ,मस्जिदों और मूर्तियों में स्थापित नहीं किया जा सकता। प्रेम के विषय में उनकी स्थापना एकदम अचूक थी, उन्हें पता था समाज में समरसता सिर्फ़ प्रेम के जरिए ही लाया जा सकता है - 'कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहि/ प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।' कई जगह कबीर को स्त्री विरोधी दिखाने की कोशिश की गई, ऐसा लगता है कबीरपंथियों ने उन्हें स्त्री विरोधी दर्शाने की सबसे अहम भूमिका निभाई जिसका उल्लेख 'कबीर कसौटी' में मिलता है। जबकि कबीर ने जिन विषयों को छुआ उन सभी में तात्कालिक दृष्टियों के आधार पर वे प्रगतिशील रहे - 'नारी निंदा ना करो, नारी रतन की खान। नारी से नर होत हैं, साधु, संत, सुजान।।'
               'कबीर हैं कि मरते नहीं' किताब कबीर के ऊपर लगाए आरोपों का जवाब है। परंपरागत रूप से जो अफवाह पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित किया जाता रहा है उसे इतिहास, समाचार पत्रों, पूर्ववर्ती आलोचकों और साहित्य इतिहास लेखकों के हवाले से सच को उघाड़ने की कोशिश की गई है। कबीर की प्रक्षिप्त रचनाओं को उनकी भाषा और दर्शन के आधार पर चिन्हित किया जा सकता है। कबीर की वही चेतना जो जन मानस को सचेत करने की कोशिश करती है, जो तमाम आडंबरों का विरोध करती है, सच मायने में वही उनका साहित्य है। इसमें कबीर की सच्चाई से रूबरू कराने के लिए कई सारे विदेशी समाचार पत्र और विदेशी लेखकों के तार्किक और दोषमुक्त उद्धरणों को शामिल किया गया है। कबीर के लगभग उन सभी पक्षों पर बात की गई है जो उनसे संबंधित है। आधुनिक काल में कबीर के ऊपर किया गया यह एक वैज्ञानिक शोध है, जिससे कबीर के विचारों में स्पष्टता मिलेगी। भक्ति काल में समाज की उन्नति, सभी वर्गों में समन्वय, समरसता और वैज्ञानिक नज़रिए का विकास निर्गुण संत काव्य धारा में होता है लेकिन भक्ति काल के ज्यादातर आलोचकों ने उसका श्रेय लोगों की भावना के आधार पर सगुण भक्ति को दिया। जिन्होंने खुद को समर्पित करके आडंबरों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई उनके साथ चारित्रिक छेड़- छाड़ करके उनको कमज़ोर बनाया गया। बुद्ध को बुद्धू और गोरखनाथ को गोरखधंधा के नाम से दुष्प्रचारित किया गया। लेकिन जिनका नज़रिया स्पष्ट है, जिनका उद्देश्य स्पष्ट है उनको कभी मारा नहीं जा सकता वे समाज में तब तक जिंदा रहेंगे जब तक उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन की ज़रूरत वर्तमान रहेगी। 
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पुस्तक - कबीर हैं कि मरते नहीं
लेखक - सुभाष चन्द्र कुशवाहा
प्रकाशक - अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज 
प्रकाशन वर्ष - २०२०
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परिचय____
जुगेश कुमार गुप्ता
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(आधुनिक हिन्दी रंगमंच के विकास में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का योगदान) विषय पर शोधरत
 बनास जन, शिवना साहित्यिकी, रचना उत्सव, सुबह की धूप, पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख।


 


 


Tuesday, July 14, 2020

श्रम के सहभाव से जन्मी किस्सागोई कला  

श्रम के सहभाव से जन्मी किस्सागोई कला        
                          - ललित कुमार सिंह
                       रंगकर्मी , शोधार्थी - दिल्ली विश्वविद्यालय ( हिन्दी विभाग )


  जब मनुष्य पहली बार सामाजिक भावना के चलते सामूहिक रूप से जीने के लिए संगठित हुआ था ,तभी से कहानी है और कहानी कहने की परंपरा है । मनुष्य ने जब अपने शिकार किए अनुभव को अपने कबीले में आकर उत्साह के साथ विभिन्न भाव- भंगिमाओं के द्वारा बताया होगा, अनजाने ही सही लेकिन वह कला का ही एक रूप था । उस अभिव्यक्ति को हम कला के किसी भी रुप का नाम दे सकते हैं। कोई भी कलाएं निर्वात में पैदा नहीं हुई । दुनिया की प्रायः सभी कलाएं श्रम के सहभाव और  अभिव्यक्ति के निकष  से ही जन्मी हैं । इन दोनों का मूल था उत्पादन कार्य में लगा श्रम । "लोक ,संगीत और कविता आदिमानव के श्रम से पैदा हुई। शारीरिक परिश्रम उस दशा में अत्यंत आसान हो उठता था जब कार्य एक लय के साथ किया जाता था। हाथ के सामूहिक रूप में काम करते समय शक्ति का संग्रहित रूप उपस्थित हो जाता था और इस प्रकार मांसपेशियों के कार्य में जब अधिकतम शक्ति लगने लगी थी तो अपने आप एक स्वर फूट पड़ा था। इन स्वरों पर आदिमानव ने शब्दों का पर्दा चढ़ा दिया और वह संगीत बन गया।"1 इस प्रकार कहना होगा कि उत्पादन कार्य करते हुए घटने वाली घटनाओं और उनसे प्राप्त अनुभवों की अभिव्यक्ति  ने ही कलाओं को विकसित किया है। कला के स्वभाव के संदर्भ में कहें तो चाहे वह कला के जिस रूप में हो उसकी पहली प्राथमिकता सामाजिकता और अभिव्यक्ति है । यह श्रम के सहभाव में ही संभव थी। 'कला के सामाजिक उद्गम' में  'गिओर्गी प्लेखानोव' कहते हैं कि "उत्पादन कार्य  कला से पहले अस्तित्व में आया। आमतौर पर मनुष्य ने वस्तुओं और घटनाओं को पहले उपयोगितावादी दृष्टि से देखा और बाद में जाकर ही उसने सौन्दर्यात्मक दृष्टि से देखना शुरू किया।"2सौन्दर्यात्मक दृष्टि के और उसको अभिव्यक्ति करने के कोई निरपेक्ष मानदंड नहीं हैं। हर समाज के अपने अलग-अलग मानदंड हैं। वह तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। समय के अनुसार उनमें भी परिवर्तन होता गया है। हर समाज की अपनी कहानी है,और उस कहानी ने विकसित होते समाज में कहनी का रूप धर लिया है। "कोई कहानी कहनी तब बनती है जब उसे कहने वाले का नाम खो जाय और कहानी जीवित रहे। इस कहानी का असल क़िस्सागो और इसके सभी प्राथमिक पात्र समय की तहों में अलोपित हो गए, तब भी यह सदियों से जीवित रही।
अलग-अलग लोग अपनी याददाश्त और अपने अनुभव से इसे कहते रहे-किसान पिता, मां- बाबा, दादी-नानी और खेतिहर मजूर - पूस की रात में धान अगोरते हुए जेठ की दुपहरिया  में नाती -पोतों को सुलाते हुए और आद्रा की बारिश में किसी अपने को जोहते हुए। उन्होंने एक कहानी को अपनी आंच दी अपने आंसू ,इंतजार, विचार षड्यंत्र और समझदारी ,मेहनत और किस्मत और कोसना , बतकही, चुप्पी और अपना सबसे सघन गुस्सा दिया..... और सबसे बड़ा दुलार भी। लोगों ने एक कहानी में अपना करेजा लगा दिया। किसी ने गीत रचे,किसी ने किस्से, किसी ने बंद गढे़ तो किसी ने शब्द। इसलिए कहानी किसी एक व्यक्ति या एक समय की नहीं होती बल्कि बहुत से कहने वाले और अलग-अलग समय उसमें एक साथ बिला जाते हैं। अगर आज हम किसी कहनी को  कहना चाहें तो हमें यहां से शुरू करना होगा कि अनेक समय की बात है-"3 कहानी और कहानी कहने के स्वरूप ,परिस्थितियों और पात्रों में थोड़ा बहुत फेरबदल होता गया लेकिन कहानी का मर्म समयान्तराल में भी वही रहा। 'कोमल कोठारी'अपने लेख 'लोक कथाओं को समझने का उपक्रम' में लिखते हैं कि "अभिप्राय वस्तुतः एक घटना मात्र है,जो निरंतर अनेक कथाओं में ज्यों की त्यों प्रयुक्त मिलती है। एक कथा में एक अभिप्राय से लेकर अनेक अभिप्राय का गुंफन हो जाता है।"4 इसी 'अभिप्राय'शब्द को कुछ स्पष्ट करते हुए लोक कथाओं के अध्येता विजयदान देथा अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि "दुनिया भर की कहानियों में जो कॉमन चीज  होती है उसको 'मोटिफ'बोलते हैं जैसे सारी कारगुजारी छोटा भाई करेगा, बड़े पांच भाई हैं, तीन भाई हैं लेकिन छोटा भाई ही हमेशा जीतेगा। लोक कथाओं के भीतर छोटा भाई ही सफलता प्राप्त करता है। और राक्षस हमेशा आदमी से मात खाएगा। कित्ता भी भयंकर और कित्ता भी प्रबल और उसकी शक्तियां कितनी भी अपार हो,आखिर के अंदर जीतेगा मानव। यह लोक कथाओं के ढांचे से जुड़ी हुई बात है।"5
                    
                         किस्सागोई की परंपरा वहीं से शुरू हुई जहां कोई मनुष्य उन भावनाओं और विचारों को पुनः अपने भीतर जगाता है जिन्हें उसने अपने यथार्थ परिवेश  के प्रभाव में अनुभव  किया था। वह उन अनुभवों को संवाद अदायगी के द्वारा सुनिश्चित बिम्बों में व्यक्त करता है। 'राधावल्लभ त्रिपाठी' अपने लेख 'भारतीय कथा  परंपरा ' में कहते हैं कि "भारतवर्ष कथा की जन्मभूमि है ,यह कहानी का आदि देश है। मनुष्य ने जिस क्षण इस देश की धरती पर पहली बार पांव रखा होगा, कदाचित उसी समय से कहानी का प्रचलन हमारे यहां हुआ होगा। ऋग्वेद विश्व साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है जिसकी रचना ईसा से  कुछ हजार वर्ष पहले हो चुकी थी । ऋग्वेद  में अनेक स्थलों पर तत्कालीन समाज में कहानी या किस्सागोई की लोकप्रियता और एक प्रचलित विधा होने के प्रमाण मिलते हैं। इंद्र उस समय का महानायक था। इंद्र को लेकर ही ऋग्वैदिक समाज में अनेक मिथक या किंवदन्तियां गढ़ी जा चुकी थीं। कहानी इन मिथकों और कथाओं में अन्तर्गर्भित थी।"।6 भारतीय जीवन पद्धति के इतिहास को देखें तो मिथक और कथा हमेशा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के साथ मौजूद रही हैं, और आज भी हैं।मिथ की कथाएं ही कई बार किसी बात की तथा जीवन संस्कार के सामाजिक स्वीकार्यता का आधार रही हैं। चरित गाथा में कल्पनाशीलता,कथा का रहस्य और रोमांच किस्सागोई की भंगिमा और मानवीय संबंधों की भंगिमा मिलती है। उपज के तत्व के द्वारा कहानी को आकर्षक और रोमांचक भी बनाया गया है। ये  अलग बात है कि वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता के चलते उन पर प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं। मिथक  के संदर्भ में ही 'अर्नेस्ट फिशर' अपनी किताब 'कला की जरूरत' में लिखते हैं कि "मिथक पहले उस समष्टि का दर्पण हुआ करता था, जिसमें व्यक्ति समष्टि का एक अनाम अंश मात्र होता था। धीरे-धीरे वही मिथक वैयक्तिक अनुभव को व्यक्त करने का एक रूपात्मक आवरण बन गया।"7
           
                भारतीय समाज का विकास कहानियों के आगोश में हुआ है ।यहां हर आस्था ,विश्वास, संस्कार ,पर्व-त्यौहार के पीछे  एक कहानी है। हर समाज के जन्म लेने,विकसित होने और नष्ट होने की अपनी -अपनी कहानी है। सभी के जीवन जीने की अलग-अलग कहानियां है।सभी समाजों की कहानियां लोक में मौखिक रूप में ही मौजूद थी।एक पीढ़ी अपने जातीयबोध  को दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित करने के लिए कला के अलग-अलग माध्यमों का प्रयोग करती थी। जिनमें किस्सागोई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। किस्सागोई के संदर्भ में कहा जाता है कि इतिहास, परंपरा, व्यवहार ,सांस्कृतिक प्रतीकों एवं मिथकों  को संग्रहणीय बनाने तथा उनका अन्वेषण विश्लेषण करने के लिए बौद्धिकों  एक ओर जहां शास्त्रीय ग्रंथों की रचना की वहीं उन्हें लोकमानस तक पहुंचाने और जनजीवन का हिस्सा बनाने के साथ-साथ लोकरंजन के लिए किस्सागोई की कला का  विकास हुआ‌। 'राधावल्लभ त्रिपाठी' अपने लेख 'भारतीय कथा परंपरा' में लिखते हैं कि "ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधियां बताने के प्रसंग में अर्थवाद की दृष्टि से इतिहास,पुराण या आख्यानों की कहानियां प्रस्तुत की गई हैं ,जिनसे कथा कहने की प्राचीन शैली का पहली बार परिचय मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में पुरुरवा और उर्वशी की कथा इसी प्रकार आई है। इसी तरह मैत्रयणी संहिता में रात्रि और पर्वतों के पंखों को लेकर दो सुंदर कहानियां मिलती है। इसमें रात्रि की सृष्टि की कथा इस प्रकार बताई गई है-यम की मृत्यु हो गई थी। देवता प्रयास कर रहे थे कि यमी उसे भूल जाए। जब कभी यमी से पूछा जाता वह यही बताती कि यम आज ही मरा है। देवताओं ने कहा कि इस तरह तो वह यम को कभी भी न भूल पाएगी। तो हम लोग रात्रि की सृष्टि करें तब देवताओं ने रात्रि बनाई। रात्रि के बाद जो दिन आया वह अगला दिन कहलाया, और यमी यम को भूल गए। इसलिए लोग कहा करते हैं कि रात और दिन के क्रम में मनुष्य अपना दु:ख भूल जाता है।"8
 
              भारत में श्रुति की समृद्ध परंपरा है। रामचरितमानस में तुलसीदास काकभुशुण्डि से ही संवाद करवाते हैं ,महाभारत में श्रीकृष्ण के मुख से अर्जुन को गीता उपदेश देना और शिव जी के द्वारा पार्वती जी को हुंकारे के साथ कहानी सुनाना किस्सागोई का ही एक रूप है ।अब अगर बात करें गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पर तो वह भी मौखिक परंपरा पर ही आधारित थी । लोक संस्कार और ज्ञान -मीमांसा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक परंपरा में ही पहुंचाई जाती थी। पुरानी पीढ़ी ,बड़े बुजुर्ग अपने आजमाये नुस्खों और निरंतर बढ़ते प्रायोगिक ज्ञान के सागर को नई पीढ़ियों को हस्तांतरित करते रहे हैं।कई बार यही आधुनिक विज्ञान व ज्ञान का आधार भी होता है। मौखिक परंपरा का ज्ञान सामाजिक मूल्य और आध्यात्मिक दर्शन ,इतिहास ,जटिल वैज्ञानिक और पर्यावरणीय ज्ञान का विश्लेषण और संरक्षण के साथ ही आचार- नीति का भी संचालन करता रहा है ।शास्त्रों का अस्तित्व तो बाद में आया। रंगकर्मी 'देवेंद्र राज अंकुर' अपनी किताब 'दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज 'में लिखते हैं कि "कोई शास्त्र तभी अस्तित्व में आता है जब उससे पूर्व उसी वर्ग की गतिविधि की अपनी सुधीर्घ की परंपरा न हो, वह अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर पतन की ओर अग्रसर न हो चुकी हो- ऐसे संकट के समय ही उस परंपरा को सुधारने ,निखारने और उसके लिए कुछ निश्चित मानदंड बनाने की आवश्यकता अनुभव होती है। हम मानव जाति के क्रमिक विकास का भी अध्ययन करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कैसे एक स्वच्छन्द आदिम अवस्था से मनुष्य ने आज तक की व्यवस्थित जीवन पद्धति तक की यात्रा तय की है।"9 बहरहाल अगर गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की ही बात करें तो शास्त्रों,उपनिषदों का अध्ययन तो अपने को श्रेष्ठ समझने वाली जाति के द्वारा ही किया जाता था ।वहीं एक व्यापक शोषित ,वंचित जनसमुदाय था जिसके लिए शास्त्रों का अध्ययन करना पूर्णतया वर्जित था। उनके लिए लोक संस्कार और श्रम सहभाव के बीच की कड़ी किस्सागोई ही थी। उनके यहां श्रम से जुड़ी कहानियां थी, जो श्रम में राग और जीवन में आनंद पैदा करती थी। 'प्रभात'अपने लेख 'बच्चों के लिए मौखिक कहानियों की परंपरा' में लिखते हैं कि "कोई किस्सा कहो तो रैन फटे- यह उक्ति किस्से-कहानियों की जरूरत और उनकी शक्ति का भी पता देती है। जिस तरह भोर का उजास आते ही अंधेरा फट जाता है। किस्सों से मिलने वाली जीवनी शक्ति और जीवन दृष्टि से जीवन के संताप सहनीय हो जाते हैं। बिहार में बेगारी में रात-रात भर जागकर मक्का छीलते मजदूरों को ग्रीष्म की उमस भरी रात काटना बहुत भारी पड़ता था। श्रम  की थकान भुलाने के लिए लंबे-लंबे किस्से कहा करते थे। राजस्थान में रातों में खेतों में पानी देते या जाड़े की रातों में गेहूं की रखवाली करते किसान रात काटने के लिए कहानियां कहते हैं।"10 आज के तकनीकी युग की तरह मनोरंजन के साधनों की भरमार नहीं थी,ये अलग बात है कि  साधनों के विकल्प बढ़ रहे हैं लेकिन आदमी अकेला हो रहा है। हम यह नहीं कह सकते कि उस समय मनोरंजन के साधनों का अभाव था लेकिन वह सभी सामूहिकता और जनसंवाद की कला पर निर्भर थे। काम की थकान मिटाने और जीवन संस्कार देने के लिए किस्सागोई की चौपालें लग जाती थी। चौपाल संस्कृति कृषि समाजों की पहचान रही है इन चौपालों में कृषि समाज की कहानियां ,समाज में घट रही घटनाओं की कहानियां तथा उन पर व्यंग करने की कहानियां, जातक कथाएं ,पंचतंत्र की कहानियां ,जनसमुदाय के आस्था,विश्वासों की कहानियां सुनाई जाती थीं। जिसमें गद्य और पद्य दोनों प्रकार की प्रस्तुतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। पद्य रचनाओं में रचनाओं में ढोला-मारु ,आल्हा ,रामायण आदि प्रमुख थे तो  गद्य  में किस्से सुनाए जाते थे। जिनमें अलिफ-लैला ,किस्सा तोता मैना ,सहस्त्र रजनी चरित्रा ,दास्ताने चार दरवेश ,सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी ,कथासरित्सागर आदि ।


                        किस्सागोई कल्पना के रसात्मक कहन की कला है ।यह सामाजिक होते हुए भी कल्पना प्रधान होती है। किस्सागोई इतनी लालित्यपूर्ण होती है की कल्पना करके कही गई बात भी प्रमाणिक सी लगती है । किस्सागो कहानियों को इतने रसमय और जीवन्त ढंग से सुनाता है कि श्रोता उसके प्रवाह में बहता  चला जाता है। किस्सागो एक यूटोपिया ही तो गढ़ता है  जिसमें इतिहास से सीख,वर्तमान में  सवाल और संबल तथा भविष्य में जीने की प्रेरणा मिलती है। लोकमानस में व्याप्त किस्सागोई की परंपरा ही शास्त्रीय भाषा में आख्यान बन जाती है।


                    जनसंस्कृति  में किस्से कहानियों का भंडार है । कई बार यही किस्से कहानियां जीने का माध्यम और आधार बन जाती थी। कुछ शासकों के शासन काल में किस्सागो को राजकीय सेवा के लिए नियुक्त किया जाता था। 'विजयदान देथा' अपनी कहानी 'चौबोली' में किस्सागोई कला की महत्ता बहुत अच्छे से रेखांकित करते हैं। बहरहाल जो समाज प्रकृति के और लोक के जितना करीब रहा है वह उतना ज्यादा ही मानवीय और कहानियों के समाज में जिया है। आदिवासी समाज आज भी प्रकृति को एक कहानी के रूप में ही जीता है। उनके सुख-दुख, पर्व-त्योहार प्रकृति की कहानी पर ही निर्भर रहते हैं। कहानियां प्रकृति के प्रति हमारे नजरिए के पुनर्मूल्यांकन के लिए दरवाजे खोलती हैं। अक्सर यह जटिल से जटिल पर्यावरणीय और दीर्घकालिक मुद्दों से जुड़ी चुनौतियों के बारे में संकेत दे देती हैं। इस मामले में जनजाति कहावतों ने हमें बहुत कुछ दिया है। उदाहरण के द्वारा इनकी महत्ता को रेखांकित कर सकते हैं- हर साल अप्रैल-मई के महीने में करीब 15 दिनों तक मनाए जाने वाले उत्सव उभौली (जिसे सकेला या सकेवा भी  कहा जाता है )के  दौरान किरांत के सदस्य समुदाय के लोगों से कहते हैं कि मछलियां मत मारो क्योंकि पवित्र कथाओं में इस दौरान मछली मारना वर्जित  किया गया है। यहां यह जानना दिलचस्प है कि इस समय मछलियां अंडे देने के लिए नदी की ऊपरी धारा में आ जाती हैं ,इस कारण मछली मारना वर्जित है। इसमें एक कहानी ही बनाई गई है जो भावात्मक आस्था से जुड़ी है,जबकि हकीकत कुछ और है। खैर एक और उदाहरण  के द्वारा हम समझ सकते हैं - मुंडन में एक पवित्र कथा के अनुसार कोईंच जनजाति (जो की किरांत समूह  से ताल्लुक रखते हैं ) के एक सदस्य को अनुमति दी जाती है कि वह घर बनाने के लिए एक पेड़ काट सकता है। इसके बदले में मातृभूमि के प्रति आभार जताने के लिए उसे 10 पेड़ लगाने होंगे। प्रकृति आदिवासी समाज में भावात्मक आस्था से जुड़ी है। आज कंक्रीट में तब्दील होते समाज को जरूरी है इन कहानियों को आत्मसात करने की।


               साहित्य  चाहे वह किसी भी देश समाज अथवा भाषा का हो वह अपने लोक साहित्य और उसमें मौजूद जनसंवाद की कला का सदैव ऋणी रहा है। समाज की परंपराओं, गीतों, त्योहारों ,भोजन, वस्त्र ,जीवन शैली का गंभीरता से अध्ययन करें तो हम पाएंगे कि उनकी प्रत्येक परंपरा श्रम के सहभाव  और सामूहिकता से  निर्मित हुई है। प्रत्येक समाज का श्रम और जातीयबोध अलग-अलग था इस कारण उनकी कहानियां और जीवन संस्कार अलग-अलग हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि थोड़ी बहुत फेरबदल के बावजूद इनका राग और नाद सौंदर्य एक सा ही प्रतीत होता है। सभी समाजों द्वारा अपने मानवीय अनुभवों को अगली पीढ़ी तक सहजता से पहुंचाने का सबसे पुराना तरीका है  मौखिक प्रथा। 'राधावल्लभ त्रिपाठी' अपने लेख 'भारतीय कथा परंपरा' में लिखते हैं कि "आपबीती को कथा के रूप में कहने की यह परंपरा कितनी पुरानी है इसका साक्ष्य भी हमें ऋग्वेद से ही मिलता है। ऋग्वेद के सूक्त (10/34) एक जुआरी की आपबीती ही तो है। जुआरी अपनी जिंदगी का हाल बताते हुए कहता है - मेरी पत्नी (पहले) मुझे डांटती नहीं थी। मेरे ऊपर रिसाती भी नहीं थी। वह मुझ पर और मेरे मित्रों पर दयालु थी। मैंने पैसों के चक्कर में अपनी उस साध्वी पत्नी को घर से बाहर निकाल दिया। अब तो मेरी सास मुझसे घृणा करती है। मेरी स्त्री अब मुझसे अलग रहती है। दुखियारे का सचमुच कोई सगा नहीं होता। मेरी स्थिति बूढ़े घोड़े की तरह है जिसे कोई घास नहीं डालता। बार-बार सोचता हूं कि अब नहीं खेलूंगा जुआ और जुआरियों की संगत छोड़ दूंगा। पर भूरे रंग के पासे (जुआ घर में ) फिंकने लगते हैं,तो मैं अपने आप को रोक नहीं पाता, उसकी आवाज सुनते ही चल देता हूं, जैसे कोई नायिका प्रिय से मिलने चल देती हो।"11 दुनिया में कोई भी ऐसी संस्कृति नहीं है जहां मौखिक साहित्य लिखित साहित्य से पहले न आया हो।


                      किस्सागोई लोकाचार का एक अनिवार्य हिस्सा है। इस कारण किस्सागो से अपेक्षा की जाती है कि वह लोक रुचि और लोक भावना का पारखी हो। किस्सागो में यह गुण तभी विकसित हो पाते हैं जब वह उस समाज के श्रम के सहभाव से जुड़ा हुआ हो। उनके सुख-दुख का  साझीदार हो। इस भावना के आने पर ही उसके कहन के भीतर से जनसमुदाय के प्रति संबोधन की भावना मुखर होती है।  लियो टॉलस्टॉय कहते हैं कि "कला सारत: मनुष्य के भावात्मक संसर्ग  का एक माध्यम है।"12 किस्सागो यह मानकर चलता है कि वह दूसरों के,जो असल में उसके अपने ही समाज का हिस्सा है,कल्याण का हेतु है। तभी वह प्रस्तुतीकरण के लिए अक्सर बगैर किसी लालच के अपनत्व एवं सौहार्द भावना के साथ प्रस्तुत करता है। जनकल्याण की भावना और उसके लिए नि:कलुश समर्पण ही किस्सा और किस्सागोई को सर्वस्वीकार्य और उपयोगी बनाता है। एक सचेत क़िस्सागो अपने किस्सागोई के द्वारा सामाजिक यथार्थ को दर्शाता है, उसकी विसंगतियों पर व्यंग करता है तथा समाजिकों को जीने का संबल देता है। 'कला की जरूरत' में 'अर्नेस्ट फिशर'  लिखते हैं कि "कला स्वयं एक सामाजिक यथार्थ है। समाज के लिए कलाकार सबसे बड़ा जादूगर है और समाज को सबसे बड़े जादूगर की जरूरत होती है, इसलिए समाज को यह मांग करने का अधिकार है कि कलाकार अपने सामाजिक काम के प्रति सचेत हो।"13


                   किस्सागोई का विकास श्रम के सहभाव के द्वारा सामूहिक मनोरंजन की कला के रूप में हुआ है।उसमें सामूहिकता के साथ-साथ सार्वलौकिकता की भावना भी सम्बद्द होती है। यद्यपि दुनिया के विभिन्न देशों-समाजों की भौगोलिक तथा परिस्थितिगत कारणों से अपनी कुछ खास विशिष्टताएं होती हैं। वही  बाकी देशों और समाजों से अलग सिद्ध करती हैं। इसके बावजूद अलग-अलग देशों और समाजों में रह रहे लोगों के स्वभाव में कुछ समानताएं भी होती हैं। किस्सागोई में व्याप्त शाश्वत  जीवनमूल्य और सार्वलौकिकता की भावना ही एक दूसरे को करीब लाती है। 'कला की जरूरत' में 'अर्नेस्ट फिशर' कहते हैं कि "कला एक जादुई उपकरण थी और प्रकृति पर अधिकार करने तथा सामाजिक संबंधों का विकास करने में मनुष्य के काम आती थी।"14 किस्सागोई की कला समाज में महत्वपूर्ण भूमिका के साथ विद्यमान थी, हैं कहने में थोड़ा संकोच हो रहा है क्योंकि यह कला विलुप्त प्राय होने को शुमार है। किस्सागोई को पुनः समाज में संजीवनी देने की जरूरत है। समाज की दशा और दिशा दोनों की निर्मिति में किस्सागोई की महत्वपूर्ण भूमिका है। किस्सागोई  से प्राप्त अनुभूतियां हमें विवेक से अधिकतम काम लेने के लिए प्रेरित करती हैं,और किस्सागोई से निर्मित हमारा विवेक हमारी अनुभूतियों को परिशुद्ध  करता है।


संदर्भ ग्रंथ -
1.बुशर कार्ल, रीदमस-(लोक संस्कृति आयाम एवं          परिप्रेक्ष्य)-सं०-महावीर अग्रवाल ,शंकर प्रकाशन-दुर्ग, पृष्ठ संख्या -29
2.  प्लेखानोव गिओर्गी (कला के सामाजिक उद्गम)अनु०-विश्वनाथ मिश्र, राजकमल प्रकाशन-नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-17
  3. शिवेंद्र  (चाकलेट फ्रेंड्स और अन्य कहानियां )आधार प्रकाशन -पंचकूला(हरियाणा), पृष्ठ संख्या -120
4.कोठारी कोमल(लोक कलाओं को समझने का उपक्रम)भूमिका -बातां री फुलवाड़ी भाग-10, साहित्य अकादमी प्रकाशन-नई दिल्ली ,पृष्ठ संख्या-19
5. देथा विजयदान से प्रभात ,शिवकुमार,विश्वभंर की बातचीत, शिक्षा-विमर्श, सितम्बर-अक्टूबर  2011
  6. त्रिपाठी राधावल्लभ (भारतीय कथा परम्परा)www.hindisamay.com
  7. फिशर अर्नेस्ट ( कला की जरूरत )अनुवाद -रमेश उपाध्याय, राजकमल प्रकाशन-नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-50
  8. त्रिपाठी राधावल्लभ (भारतीय कथा परम्परा)www.hindisamay.com    
   9.अंकुर देवेन्द्रराज (दूसरे नाट्यशास्त्र की खोज)राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली ,पृष्ठ संख्या -11
   10.प्रभात (बच्चों के लिए मौखिक कहानियों परम्परा ) शिक्षा -विमर्श (मई- जून) 2016 पृष्ठ संख्या- 32
    11. त्रिपाठी राधावल्लभ (भारतीय कथा परम्परा)www.hindisamay.com
    12. प्लेखानोव गिओर्गी (कला के सामाजिक उद्गम)अनु०-विश्वनाथ मिश्र, राजकमल प्रकाशन-नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-23
    13 .फिशर अर्नेस्ट ( कला की जरूरत )अनुवाद -रमेश        उपाध्याय, राजकमल प्रकाशन-नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या-41
     14.वही , पृष्ठ संख्या -40


Thursday, June 4, 2020

कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना

कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना


                                                                                                                                 विजयलक्ष्मी यादव


                                                                                                                                  शोधकर्त्री हिंदी


                                                                                                           राजस्थान विश्वविद्यालविद्यालय, जयपुर


                                                                                                                               मो.9799964305


शोधपत्र-सारांश:


 


कोई भी रचनाकार एवं रचना विधा समाज से विलग हो ही नहीं सकती। समाज की रीति - नीति, परंपराओं, आदर्शों, मूल्यों, सिद्धांतों आदि रचना की संपत्ति हैं। इस दृष्टि से कमलेश्वर की कहानियों के मूल्यांकन के फलस्वरूप यह स्पष्ट हो जाता है कि वह समाज चेता एवं युग दृष्टा कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में न केवल तत्कालीन समाज का चित्रण है बल्कि एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर इशारा भी है जो वे बनाना चाहते थे। समाज, सामाजिक संबंध एवं सामाजिक समस्याओं तथा उन समस्याओं के निराकरण के उपायों पर विचार किया गया है।


 संकेताक्षर : नई कहानी, समांतर कहानी , यथार्थ,  भोगा हुआ यथार्थ,  काल्पनिक दुनिया,  समाज,  समाज चेतना, युग चेतना,  युगधर्म


 


कमलेश्वर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्यकारों में प्रमुख हस्ताक्षर हैं। कमलेश्वर की स्वतंत्रता की संधि स्थल के प्रमुख कथाकारों में अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति दर्ज है।  स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय क्रांतिकारियों के साथ रहकर अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति, सहभागिता रखने वाले एवं उन समस्त गतिविधियों में  सम्मिलित रहकर देश प्रेम, समाज सेवा आदि के पुनीत यज्ञ में आहूति देने वाले बहुत कम साहित्यकार होंगे। उन विरले साहित्यकारों में से एक हैं -  कमलेश्वर। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय 1940 से 1950 के दशक के मध्य अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। इस समय हिंदी कहानी साहित्य में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलते हैं। अब कहानी केवल मनोरंजन का साधन न रहकर सामाजिक संदेश, आम आदमी के दु:ख-दर्द, पीड़ा, हताशा, कुंठा, सत्रांस को प्रकट करती है। अब तक यथार्थ जीवन के साथ काल्पनिक दुनिया की कहानियों को तरजीह दी जाती थी। 1940 के दशक बाद हिंदी कहानी साहित्य में 'नयी कहानी' का जन्म हुआ। इस 'नयी कहानी'  आंदोलन के प्रमुख त्रयी थी - कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और एक मित्र थे दुष्यंत कुमार। इस त्रयी ने हिंदी साहित्य में एक जबरदस्त हलचल पैदा कर दी। उन्होंने कहानी विधा में रोचकता, शैलीगत, प्रयोग तथा विषयवस्तु की नवीनता से पाठकों, आलोचकों और साहित्य के अलम्बरदारों को आईना दिखाया। तीनों ही प्रमुख नाम न केवल युवा थे, बल्कि अच्छे दोस्त भी थे। इन तीनों में कमलेश्वर सबसे अधिक सक्रिय एवं मंचों एवं बहसों में करारा जवाब देने वाले थे। कमलेश्वर ने साहित्यिक मंचों पर अपनी 'नयी कहानी'  की प्रमुख 'थीम'  को न केवल समझाया बल्कि 'नयी कहानी की भूमिका'  नामक आलोचना पुस्तक लिखकर 'नयी कहानी' की संवैधानिक पृष्ठभूमि भी तैयार की।


कमलेश्वर ने लगभग सैकड़ोंं लघु लंबी, कहानी लिखकर हिंदी साहित्य में अपनी गुरु गंभीर उपस्थिति दर्ज करवायी। पहले 'नयी कहानी' और तत्पश्चात् 'समांतर कहानी' के माध्यम से मध्यमवर्गीय आम आदमी की जीवन शैली, रीति-नीति, परंपराएं तथा सामाजिक समस्याओं को रखकर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। कमलेश्वर ने अनेक कालजयी कहानियों की सृजना की। मसलन - राजा निरबंसिया, मांस का दरिया, चप्पलें, देवा की मां, सुबह का सपना, दिल्ली में एक मौत, दिल्ली में एक और मौत, बयान, आजादी मुबारक, जार्ज पंचम की नाम, इतने अच्छे दिन, खोई हुई दिशाएं, तलाश, नागमणि, बदनाम बस्ती, कोहरा, कस्बे का आदमी, उस रात वह मुझे ब्रीच कैण्डी मिली थी, इतिहास कथा, कितने पाकिस्तान आदि।


कमलेश्वर की इन तमाम कहानियों में कस्बाई, नगरीय एवं महानगरीय जीवन की तमाम गतिविधियों, लोगों के सहज मनोविज्ञान को देखा जा सकता है। कमलेश्वर मूलत: मैनपुरी (उत्तरप्रदेश) में जन्में होने के कारण और बाद में नौकरी के सिलसिले में दिल्ली बंबई में रहने से उनकी कहानियों में कस्बाई जीवन का चित्रण अधिक है।


समाज


 


समाज शब्द सम् उपसर्ग पूर्वक अज् धातु से बना है। अर्थात् अकर्तरिच कारके संज्ञायाम। सम्यक् अजन्ति जन: अस्मिन् इति समाज:। इस प्रकार जहाँ सभी लोग अच्छी तरह से रहें, वह समाज हैं।1 अनेक समाज शास्त्रियों ने समाज की परिभाषाएं दी है। मैकाइवर के अनुसार 'समाज'  शब्द में हर तरह का तथा हर अंग का वह संबंध आ जाता है, जो दूसरे मनुष्यों तथा किन्हीं भी अन्य सामाजिक प्राणियों द्वारा एक-दूसरे के साथ स्थापित किए जाते हैं।2 प्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक राइट के अनुसार 'समाज का अर्थ केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, समूह में रहने वाले व्यक्तियों के आपस में जो संबंध है, उन संबंधों के संगठित रूप को समाज कहते हैं।"3 भारतीय समाजशास्त्री सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं कि - ''मनुष्यों के जीवन में एक दूसरे के साथ संबंधों का जाल सा बिछा हुआ है, समाजशास्त्र में उसी को समाज कहा जाता है।"4


समाज को विभिन्न विद्वानों द्वारा परिभाषित किया है। इन समस्त परिभाषाओं से यह देखने को मिला की समाज एक ऐसा समूह है जिसमें लोग अपने सामाजिक, पारिवारिक आदि संबंधों के चलते संगठित है, समाज में व्यक्ति की प्रतिभा का पूर्ण विकास होता है। उसकी बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता एवं सौष्ठव का विकास होता है। 


सामाजिक चेतना


 


समाज चेतना से तात्पर्य है - समाज के लोगों में चेतना। अर्थात् व्यक्ति के चारों तरफ फैले हुए जन-जीवन के यथार्थ, रीति-नीति, परंपराएं आदि से परिचित होना और उसे आत्मसात् करके सबके प्रति संवेदनशील बनना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, विभिन्न समस्याओं, कुंठाओं, सत्रांस आदि को लेकर अलग नही कर सकता। तमाम तरह के बदलावों को महसूस करना तथा अनुभूति के साथ अभिव्यक्ति के धरातल पर इन बदलावों को रेखांकित करना समाज के प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य है। यह एक सामान्य सी अनुभूति एवं सोच है। अब एक साहित्यकार की सोच क्या हो सकती है। यह देख लेना अत्यावश्यक है।


समाज चेतना संबंध उपर्युक्त अनुभूति के पश्चात् यह कहना जरूरी है कि एक साहित्यकार की समाज चेतना क्या हो सकती है। एक साहित्यकार समाज के प्रति जो सोचता है, चिंतन करता है, बदलावों को महसूस करता है आदि को अभिव्यक्ति देता है, वह उसकी सामाजिक चेतना मानी जाती है। इस सामाजिक चेतना के आलोक में कमलेश्वर की कहानियों का अध्ययन करना हमारा अभीष्ट है। कमलेश्वर स्वतंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में एक क्रांतिकारी बदलाव के फलस्वरूप उपजी 'नयी कहानी'के न केवल प्रवर्तक हैं, बल्कि पुरोधा भी हैं। कमलेश्वर की समस्त कहानियां स्वातंत्र्योत्तर सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, समस्याएं, कुंठाएं, सत्रांस, पराजित मानसिकता के साथ नयी परिस्थितियों के मध्य उपजा जीवन राग हैं। मध्यमवर्गीय हताशा, निराशा, बैचेनी, व्याकुलता, आकुलता, टीस, दुरभिसंधियां, संबंधों की टूटन, संबंधों के निवर्हण, रूढिय़ों- रीतियों दूषित परंपराओं को देखा जा सकता है। कोई भी साहित्यकार समाज से कटकर साहित्य सृजन कर ही नहीं सकता। ठीक ही कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। इस कथन की सार्थकता एवं व्यावहारिकता कमलेश्वर की कहानियों में स्पष्टत: परिलक्षित होता है। कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय समाज ठाठे मारता नजर आता है।


कमलेश्वर एक समाजचेता कहानीकार हैं, तो भला उनकी कहानियाँ समाज की गतिविधियों से कैसे वंचित रह सकती हैं। कमलेश्वर ने जहां समाज में एक तरफ सामाजिक विषमता को देखा, दूसरी तरफ उस वैषम्य स्थिति को भोगा भी। 'कस्बे का आदमी' कहानी में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति है, तो 'देवी की  मां' कहानी में एक स्त्री के आत्म सम्मान एवं दयनीयता को देखा जा सकता है। यह आत्म सम्मान की कहानी है जिसमें देवा युवाओं को एक आदर्श रूप दिखाता है। यह देवा की सामाजिक सक्रियता तथा बलिदान की कहानी है। 'खोई हुई दिशाएँ' कहानी में महानगरीय जीवन के अकेलेपन, अजनबीयता, सत्रांस तथा विवशता, खोखलेपन को चित्रित करती है। सीधे, ईमानदार तथा दयनीय व्यक्ति का शोषण किन-किन स्तरों पर होता है, यह इस कहानी में स्पष्ट दिखाया हैं।


कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय आम आदमी को अभिव्यक्त किया है। आम आदमी को परिभाषित करते हुए कमलेश्वर लिखते हैं ''यह आदमी न जैन संशयवाद का शिकार है, न बौद्ध दु:खवाद, का न हिंदू भाग्यवाद का, वह चाहे अतिशय अकिंचन और अति सा धारण हो, चाहे नितांत भौतिक आवश्यकताओं का मारा हुआ, पर है वह मात्र आदमी। अपने यथार्थ परिवेश में साँस लेता, जिजीविषा से सम्पन्न व्यक्ति।5 इस आदमी का कोई धर्म, संप्रदाय, जाति नहीं होती। यह सभी धर्मों, समुदायों, जातियों में मिलता है। इस आम आदमी की अभिव्यक्ति कमलेश्वर की अनेक कहानियों में दिखलायी पड़ती है। मसलन - बेकार आदमी, युद्ध, दिल्ली में एक मौत, पराया शहर, खोई हुई दिशाएँ, दु:खभरी दुनिया, एक थी विमला, मांस का दरिया, चप्पलें आदि। 'जार्ज पंचम की नाक' कहानी में आम आदमी की इज्जत से बड़ी है मूर्ति की हिफाजत। यहां दिखाया है कि भले एक व्यक्ति की नाक कटी पर देश की नाक कटने से बच गयी। स्पष्ट है कि आम आदमी का कोई महत्व नहीं। कमलेश्वर ने 'अपने-अपने अजनबी' लोक सेवकों की 'लोकसेवा' शब्द के माध्यम से गंभीर, तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। लोकसेवा के उद्देश्य से इन लोकसेवकों की शोषण एवं विलासिता की प्रवृति पर गहरा व्यंग्य किया है। कहानीकार लिखते हैं - ''हिंदुस्तान में दो ही तरह के तबके हैं - अमीरों के और गरीबों के सोचने वालो और काम करने वालो के। और यह अच्छी बात है कि सोच रहा है, वह काम नहीं कर रहा है और जो काम कर रहा है, वह सोच नहीं रहा है।6


सामाजिक संबंध


 


समाज निर्माण के साथ समाज के विभिन्न स्तरों पर संबंधों की निर्मित हो जाती है। जिनको सामाजिक संबंध कहते हैं। इसमें पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय संबंधों का मिश्रित रूप सामाजिक संबंधों के अभिधान से जाना जाता है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवार एवं समाज के निरंतर परिवर्तन के फलस्वरूप संबंधों में दरार, बिखराव, टूटन आदि देखने को मिलता है। एक समाज चेता साहित्यकार इस बदलते परिवेश को अपनी कलम से देश एवं समाज के पाठकों को परिचित कराता है। कमलेश्वर ऐसे कलमजीवी हैं, जिनका साहित्य समाज के सूक्ष्म बदलाव को भी चित्रित करता है। कमलेश्वर की कहानी 'शोक समारोह' में प्रियजनों की मृत्यु को दु:ख की बेला को अपने बड़प्पन दिखाने हेतु आधुनिक सभ्य लोगों द्वारा बाह्य खोखले सामाजिक संबंधों का व्यंग्यपूर्ण चित्रण उपलब्ध है- ''बित्रा की विधवा दीपा और बहु मृत्यु पर आने वाले तार पर आत्म गौरव का अनुभव करती हैं और उन्हें उनकी संख्या की जानकारी भी है। साथ ही शोक प्रकट करने आने वाले लोगों की अधिकता से सतर्क रहने की बात करती है। - ''तार पर तार' मैं तो देखते - देखते थक गई। डेथवाले दिन के तार से आलमारी भरी पड़ी हैं।7


कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत'आधुनिक सामाजिक संबंधों की विलक्षणता एवं गैर मानवीय स्थिति को रूपायित करती है। नगरीय जीवन शैली एवं दिखावे की प्रवृति को उजागर किया है। नगरों में सामाजिक, मानवीय संबंधों की क्रूरता मानवीयता का चित्रण किया गया है। कहानी के मुख्य नायक सेठ दीवानचंद की अंत्येष्टि के माध्यम से नगर के लोगों की संवेदनहीनता, स्वार्थपरकता तथा अमानवीय औपचारिकता को प्रकट करती है। अपनी व्यवस्तता के बीच दीवानचंद की अंत्येष्टि में लोग कपड़ों के आयरन करके सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं। यानी किसी को पैदल चलने की फुर्सत और हिम्मत नहीं। सज धज कर, बूट पॉलिस, कोट पेंट, टाई आदि लगाकर, महिलाएं सज संवरकर घर पहुंचती है। एक बार कोरा दिखावा करके वापस अपने कार्यस्थल पहुंचकर अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं जिस सेठ दीवानचंद ने अपने जीवन में सभी की मदद, सहायता की उनकी अंत्येष्टि में कुछ समय निकालकर पैदल चलने में गुरेज हैं। यह है आज का नागर जीवन। जब तक सेठ दीवानचन्द जीवित थे, उनके आगे-पीछे लोग घूम रहे थे। आज उनकी अंतिम क्रिया कर्म पर महज औपचारिकता की जा रही है। ''सामने बारजे पर मुझे मिसेज वासवानी दिखाई पड़ती है। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब - सी सफेदी है। और होठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद है। गाउन पहने हुए ही वह निकली है और अपना जूड़ा बांध रही है। उनकी आवाज सुनाई पड़ती है, डार्लिंग जरा मुझे पेस्ट देना प्लीज।8


बदलते सामाजिक संबंधों का चित्रण


 


आधुनिक कहानीकार अपने परिवेश के प्रति सजग तथा विशेष रूप से जागरूक है। वह भोगा यथार्थ को रेखांकित करता है। अनुभूति की सच्चाई आज के कहानीकार की प्रमुख विशेषता है। किसी भी कहानी की श्रेष्ठता के पीछे उसके परिवेश से जुड़े होना बहुत अधिक महत्व रखता है। इस परिवेश या वातावरण के सभी प्रमुख पक्षों को उद्घाटित करना आवश्यक हो जाता है। मसलन - राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक पक्ष अंतनिर्हित होते हैं।


भारत में सामाजिक, पारिवारिक संबंधों में बदलाव या विघटन के अनेक प्रमुख कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं - बेकारी, गरीबी, स्वार्थता, खेती का स्रास, मूल्यों में गिरावट, भौतिकता, आधुनिकता की अंधी दौड़ एकल परिवार व्यवस्था। डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा इनके ह्रास के प्रमुख कारण मानती है - ''आठवें दशक तक आते-आते महानगरीय जीवन में परिवार की संस्था नहीं के बराबर है। आधुनिकीकरण, नगरीकरण एवं औद्योगिकीकरण मात्र परिवार के आपसी संबंधों में ही परिवर्तन नहीं लाए किंतु परिवर्तन समाज के सभी सदस्यों के जीवन में प्रतिबिंबित हुआ। बल्कि दूसरा तीव्रतम प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर ही पड़ा लक्षित होता है।"9


कमलेश्वर ने इस पारिवारिक, सामाजिक बदलाव और विघटन को अपनी कहानियों में उद्घाटित किया है। मेरी प्रेमिका, आत्मा की आवाज, दु:खों के रास्ते, जो लिखा नहीं जाता, अपना एकांत, तलाश, आदि कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ बदलते सामाजिक रिश्तों को चित्रित किया है। 'मेरी प्रेमिका'  कहानी में प्रेम के वास्तविक रूप पर व्यंग्य किया है। प्रेम की अमरता और जान देने का दावा करने वाली कमला बड़े भाई की एक डाट पर उस प्यार से इंकार कर देती है और भाई को सूचना देने वाले रतन के पत्र में अपने प्रेमी विरेन्द्र को भला बुरा कहकर उससे नफरत करने की बात कहने लगती है। मैं बहुत परेशान हो गई। मेरा चैन मुझसे छिन गया। मैं क्या थी और क्या घबराकर शादी कर ली। और क्या कर सकती थी, यह उस समय समझ के बाहर था। यह मेरे जीवन की कितनी भयानक बिडंबना थी।10


सामाजिक समस्याएँ


 


समाज निर्माण के साथ-साथ नीति नियंताओं की कमजोर नीतियों के चलते कुछ समस्याएँ भी घर कर जाती हैं। आधुनिक काल में सबसे अधिक समस्याएँ उभरकर सामने आयी है। इनमें प्रमुख हैं - बेरोजगारी, भूखमरी, अकाल, गरीबी, आवास, नारी के प्रति दृष्टिकोण आदि। आजादी के बाद भारतीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पश्चात् कुछ तो हमें पहले ही से मिली समस्याएँ थी और कुछ आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण के चलते मजदूरों, किसानों, कामगारों के सामने आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन सबको साहित्यकारों ने समय-समय पर उजागर किया है और समाज निर्माण का कार्य करने में अहम भूमिका अदा की है।


कमलेश्वर आधुनिककालीन उन कहानीकारों में से एक है, जिन्होंने अपने समय के समाज की समस्याओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इन समस्याओं के उद्घाटन में कही उन्होंने सपाटबयानी का प्रयोग किया है, तो कहीं व्यंग्य एवं विडंबना की भाषा को चुना है। आजादी के पश्चात् शिक्षित बेरोजगारों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानी 'दूसरे' की सुनीता के माध्यम से शिक्षित बेकारी की समस्या को उद्घाटित किया है - ''जिन दिनों कोई काम उनके हाथ में नहीं होता, तब न जाने क्यों घर पराया - सा लगने लगता है। इसलिए नहीं कि घर में कोई कुछ रहता है, बल्कि इसलिए कि इस संबंध में कोई कुछ नहीं कहता।11 'राजा निरबंसिया'  कहानी के जगपति के माध्यम से एक मनुष्य अपने मन में यह सोच बैठता है कि यह बेकारी उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर बैठेगी। यहां मानव मन की अभिव्यक्ति है - ''उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिल्कुल लंगड़ा है। एक रेंगता हुआ कीड़ा जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।12


शिक्षित बेरोजगारी के साथ निर्धनता, गरीबी भी सभ्य समाज के लिए एक फोड़ा है। एक सामाजिक कोढ़ है, जो समाज में बहुत जल्दी पैर पसारता है, औद्योगिक क्रांति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो सामने आया वह है - गरीबी। अनेक कामगार, कारीगर, मजदूर इससे न केवल बेरोजगार हुए बल्कि गरीबी के दल-दल में डूबते चले गए। 'देवा की माँ' कहानी में एक परित्यक्ता स्त्री की व्यथा-कथा है, जो सभ्य समाज के मुंह पर जोरदार तमाचा है। एक स्त्री स्वयं एवं अपने पुत्र की जिंदगी बसर करने के लिए दरी-पट्टी बुनकर गरीबी से संघर्ष करती है। यह गरीबी का तांडव है, जिससे गरीब व्यक्ति और अधिक गरीब बनता चला गया। अब भला गरीब व्यक्ति समाज के निर्माण में अपना क्या योगदान दें सकता है। उसका जीवन तो दो समय के भोजन जुटाने में व्यतीत हो जाता है।


बरोजगारी, गरीबी के साथ आवास की समस्या भी बहुत बड़ी समस्या है। अधिकांश लोग बिना आवास के अपनी पूरी जिंदगी व्यतीत कर देते हैं। आवास के अभाव में खानाबदोश जीवन व्यतीत करने पर अभिशप्त हैं। गाडिय़ा लुहार, झोंपड़ पट्टी में रहने वाले लोग, गंदी बस्तियों, सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वाले अपने दिल में एक आवास का सपना लिये मर जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता हैं, परंतु एक मकान नहीं बना सकते। अस्पतालों, राशन डिपो, सिनेमाघरों, यातायात के साधनों आदि में अत्यधिक जनसंख्या के चलते मकान का सपना पूर्ण नहीं हो पाता । महानगरों के विस्तार, कस्बो की तंग गलियों के चलते ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन से शहरों पर बहुत दबाव बढ़ता गया।  शुद्ध पेयजल, खाद्य पदार्थ आदि पर ध्यान नहीं गया। नतीजन गरीबों की संख्या दिनों दिन वृद्धि करती गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में आवास की समस्या को भी आकार दिया है। 'राजा निरबंसिया'  कहानी का नायक जागपति काम की तलाश में भटकता है। जगपति मानसिक उत्पीडऩ का शिकार होता है और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।


कमलेश्वर समाजचेत्ता कहानीकार हैं। उनकी प्रत्येक कहानियों में सामाजिक सत्य का उद्घाटन हुआ है। सामाजिक समस्याओं, संबंधों तथा समाज निर्माण के प्रमुख घटकों को मद्देनजर रखते हुए आकार दिया है। समाज कमलेश्वर की कहानियों में हिलौरे लेता नजर आता है। कमलेश्वर का संपूर्ण कथा साहित्य इस बात का सबूत हैं। नयी कहानी, समांतर कहानी आंदोलन के पुरोधा कमलेश्वर सार्वजनिक भूमिका में एक कुशल शिल्पकार साबित होते हैं। समाज की रीति, नीतियों, परंपराओं की सूक्ष्म पड़ताल करने में कुशलता हासिल करते हैं।


संदर्भ:—



  1. डॉ. सीताराम 'झा' श्याम - भारतीय समाज का स्वरूप, पृ. 76

  2. मेकाइवर एण्ड पेज - सोसाइटी (ए टेक्स्ट बुक ऑफ सोशियोलॉजी) पृ. 6

  3. राइट - एैलिमैण्ट ऑफ दा सोसाइटी, पृ. 21

  4. सत्यकेतु विद्यालंकार - समाजशास्त्र, पृ. 36

  5. कमलेश्वर और कमलेश्वर- पृ. 171-172

  6. कमलेश्वर - समग्र कहानियां, पृ. 643, 664

  7. वही, पृ. 282

  8. वही, पृ. 385

  9. डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा - समसामयिक हिंदी कहानी के बदलते पारिवारिक संबंध, पृ. 109

  10. कमलेश्वर - समग्र कहानियाँ, पृ. 325-326

  11. वही, पृ. 276-277

  12. वही, पृ. 143


 


Saturday, May 9, 2020

गीता दर्शन और गाँधी जी

श्री मद्भगवतगीता एक ऐसा अनुपम ग्रंथ है जिसके माहात्म्य का शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है। इसकी संस्कृत इतनी सुन्दर और सरल है कि थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है परन्तु इसका आशय इतना गंभीर है कि आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहने पर भी उसको संपूर्ण रूप से आचरण में लाना संभव नहीं प्रतीत होता। प्रतिदिन नए-नए भाव उत्पन्न होते रहते हैं इससे यह सदैव नवीन बना रहता है। श्रद्धाभक्ति से विचार करने से इसके पद-पद मंे रहस्य भरा हुआ प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। जितना ही मनुष्य इसका अध्ययन करता है उतना उसका जीवन दैवीय गुणों से भरता जाता है। वह मानव से महात्मा बनने लगता है। यह गीता का ही प्रभाव था जिसने गांधी जी को साधारण मानव से महात्मा बना दिया। अपने ऊपर गीता के प्रभाव को स्वयं गांधीजी ने अपनी आत्म कथा में जगह-जगह स्वीकार किया है। यूँ तो उनके घर मंे शुरू से ही आध्यात्मिक वातावारण था परन्तु गीता के प्रति गांधी जी का विशेष झुकाव कैसे हुआ उसके विषय मंे उन्होंने लिखा है-
   विलायत मंे रहते हुए मुझे कोई एक साल हुआ होगा। इस बीच दो थियाॅसोफिस्ट मित्रों से मेरी पहचान हुई। दोनों सगे भाई थे और अविवाहित थे। उन्होंने मुझसे गीता की चर्चा की। वे एडविन आर्नल्ड का गीता का अनुवाद पढ़ रहे थे पर उन्होंने मुझे अपने साथ संस्कृत में गीता पढ़ने के लिए न्यौता दिया। मैं शरमाया क्योंकि मैंने गीता संस्कृत मंे या मातृभाषा में पढी ही नहीं थी। मुझे उनसे कहना पड़ा कि मैंने गीता पढी ही नहीं है पर मंै आपके साथ पढ़ने को तैयार हूँ। इस प्रकार मैंने उन भाइयों के साथ गीता पढ़ना शुरू किया-
ध्यायतः, विषयान् पंुसः, सग्ङ, तेषु, उपजायते, ।
            सग्ङात्,सञजायते,कामः,कामात्,क्रोधः,अभिजायते ।। अ० 2 श्लोक
अर्थ- ‘विषयों का चिन्तन करने वाले पुरूष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
इन श्लोकों का मेरे मन पर गहरा असर रहा। उनकी भनक मेरे कानों में गूँजती ही रही। उस समय मुझे लगा कि भग्वदगीता अमूल्य ग्रन्थ है। यह मान्यता धीरे-धीरे बढ़ती गई, और आज मैं तत्वज्ञान के लिए उसे सर्वोत्तम ग्रन्थ मानता हूँ। निराशा के समय इस ग्रन्थ ने मेरी अमूल्य सहायता की है।
1903 के समय से मंैने नित्य एक दो श्लोक कंठस्थ करने का निश्चय किया। अपनी दिनचर्या का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा- 
  ‘प्रायः दातुन और स्नान के समय का उपयोग गीता के श्लोक कंठस्थ करने में किया। दातुन में पन्द्रह और स्नान में बीस मिनट लगते थे। दातुन मैं अंग्रेजी ढ़ंग से खडे़-खड़े करता था, सामने की दीवार पर गीता के श्लोक लिखकर चिपका देता था और आवश्यकतानुसार उन्हंे देखता तथा पढ़ता जाता था। ये पढ़े हुए श्लोक स्नान करने तक पक्के हो जाते थे। इस बीच पिछले कंठस्थ किए हुए श्लोकों को भी मैं एक बार दोहरा जाता था। इस प्रकार तेरह अध्याय कंठस्थ करने की बात मुझे याद है।‘
गीता पाठ का मेरे साथियों पर क्या प्रभाव पड़ा ये तो वे जानें परन्तु मेेरे लिए तो वह पुस्तक आचार की एक प्रौढ़ मार्गदर्शिका बन गई। वह मेरे लिए धार्मिक कोष का काम देने लगी जिस प्रकार नए अंग्रेजी शब्दों के हिज्जों या उनके अर्थ के लिए मैं अंग्रेजी शब्दकोष देखता था, उसी प्रकार आचार संबंधी कठिनाइयों और उनकी अटपटी समस्याओं को गीता से हल करता था। उसके अपरिग्रह, समभाव, आदि शब्दों ने मुझे पकड़ लिया। समभाव का विकास कैसे होे, उसकी रक्षा किस प्रकार की जाए? अपमान करने वाले अधिकारी, रिश्वत लेने वाले अधिकारी, व्यर्थ विरोध करने वाले कल के साथी इत्यादि और जिन्होंने बडे़-बड़े उपकार किए हैं ऐसे सज्जनों के बीच भेद न करने का क्या अर्थ है? अपरिग्रह किस प्रकार पाला जाता होगा? देह का होना ही कौन कम परिग्रह है? स्त्री-पुत्रादि परिग्रह नहीं तो और क्या हैं? गीता शास्त्र के अध्ययन के फलस्वरूप ‘ट्रस्ट्री‘ शब्द का अर्थ विशेष रूप से मेरी समझ में आया। कानून शास्त्र के प्रति मेरा आदर बढ़ा, मुझे उसमें भी धर्म के दर्शन हुए।‘ट्रस्ट्री‘ के पास करोड़ों रूपयों के रहते हुए भी एक भी पाई उसकी नहीं होती। मुमुक्ष को ऐसा ही बरताव करना चाहिए, यह बात मैंने गीता से समझी। मुझे यह दीपक की तरह स्पष्ट दिखाई दिया कि अपरिग्रह ही बनने में समभावी होने में हेतु का, हृदय परिवर्तन आवश्यक है।


गाँधी जी का सम्पूर्ण जीवन संघर्षपूर्ण रहा। एक ओर परतन्त्रता मेें जकड़ी हुई भारत माँ को आज़ाद कराने की लड़ाई थी तो दूसरी ओर भारतीय समाज़ तथा जनमानस में व्याप्त अंधविश्वास, जाति संघर्ष, छुआ छूत, अस्पृश्यता, वर्ग भेद जैसी कुरीतियाँ थीं। गाँधी जी ने नैतिक और राजनैतिक दोनांे क्षेत्रोें का विशद् अध्ययन किया। यूँ तो उन्होंने अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया परन्तु जैसा कि स्वयं उन्होंने अपनी आत्म कथा तथा भाषणों में कहा है कि गीता ने उनके जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया। आज भी यदि हम कहें कि गीता सम्पूर्ण आर्ट आॅफ लिविंग का सार है तो अतिश्योक्ति न होगी। गीता पढ़ते तो बहुत लोग हैं परन्तु गाँधी जी ने उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया जिसमंे वह सफल भी रहे। गीता के संदर्भ में यदि हम गाँधी जी के विचारों और कार्यों का विवेचन करें तो संक्षेप वह इस प्रकार है-
विषयाः विनिवर्तन्ते, निराहारस्य, देहिनः,
             रसवर्जम रसःअपि,अस्य,परम्,दृष्ट्वा,निवर्तते ।। अ० 2,श्लोक 59


ईश्वर में अटूट आस्था-  गाँधी जी की ईश्वर में अटूट आस्था थी। मानव सेवा को वह ईश्वर सेवा का ही रूप समझते थे। 
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते
                   तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। अ० 9,श्लोक 22
जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते है, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरूषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ। गाँधी जी कहना था कि मैं अनुभव करता हूँ कि ईश्वर मेरी रग-रग में समाया हुआ है। वही सत्य और प्रेम है। ईश्वर प्रकाश है। वह कहते थे कि अपने कार्याें को ईश्वर में अर्पण कर दो, ईश्वर सबकी रक्षा करने वाला है। गीता में कहा गया है-
मन्मनाः भव मदभक्तः मद्या जी माम् नमस्कुरू
माम एक एष्यसि ते सत्यम् प्रतिजाने मे प्रियः असि
मुझमें मतवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा । यह मैं तुझसे सत्यप्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।


गाँधी जी नित्यप्रति पूजा पाठ के अतिरिक्त जब भी उन्हें समय मिलता था वह ईश्वर की ही आराधना करते थे। जेेल में रहते हुए भी वह ईश पूजा में ही मन रमाते थे। सत्याग्रह के समय भी वह लोगों से ईश पूजा के लिए ही कहते थे। ईश्वर का ध्यान करने से मन का भटकाव कम हो जाता है। वह  कहते थे-
‘मन का मैल तो विचार से ईश्वर के ध्यान से और आखिरी ईश्वरी प्रसाद से छूटता है।‘
गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति अंत समय में भी ईश्वर का नाम लेते ही शरीर त्यागता है वह सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है। सर्व विदित है, गाँधी जी को जब गोली मारी गई तो वह शाम की पूजा के लिए ही जा रहे थे। गोली लगते ही ‘हे राम‘ कहा और वे गिर गए। गीता का यह श्लोक कि जो निरन्तर मुझे याद करता है, अंतिम समय भी मंै उसके साथ होता हूँ, गाँधी जी पर पूर्णतः चरितार्थ हुआ।


कर्तव्यपराणयता- गीता वास्तव में कर्म योग का ग्रंथ है। कर्मयोग का अर्थ है कर्म करते हुए भगवत्प्राप्ति की ओर अग्रसर होना। गाँधी जी के विचार से कर्तव्यपरायणता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। गीता के उपदेशों का उद्देश्य अर्जुन को उसके कर्तव्य का ज्ञान कराना था-
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम् जित्वा वा मोक्ष्यसे महीम्
               तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय यु़द्धाय कृतनिश्चयः अ० 2,श्लोक 37
‘या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा । इस कारण हे! अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा।‘ गाँधी जी के सामने भी स्वतंत्रता प्राप्ति का लक्ष्य किसी महाभारत से कम नहीं था। तत्कालीन परिस्थितियों में सोए हुए जनमानस में चेतना जाग्रत करने के लिए ऐसे ही प्रेरक विचारों की आवश्यकता थी।
जीवन के किसी भी क्षेत्र मंे सफलता पाने के लिए निष्काम कर्म की आवश्यकता होती है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः
           मा कर्मफल हेतुःमा भूःते अकर्मणि संग मा अस्तु अ० 2,श्लोक 47
‘तेरा कर्म करने में अधिकार है उसके फल मेें कभी नहीं।  इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म करने में भी आसक्ति न हो।‘
मनोवैज्ञानिक सत्य भी यही है कि काम करते समय अगर केवल परिणाम के बारे में ही सोचा जाएगा तो काम में पूर्ण तन्मयता से ध्यान नहीं लगेगा। किसी भी कार्य को करने में सफलता तभी मिलती है जब उसे लगनशीलता से किया जाए। बिना प्रयास के कार्य सिद्ध नहीं हो सकता कोई कार्य छोटा-बड़ा अच्छा बुरा नहीं होता। हर काम में कुछ न कुछ अच्छाई है तो कुछ न कुछ बुराई भी होगी।
             सहजं कर्म कौन्तेय सदोषम् अपि न त्यजेत्
          सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेन अग्निःइव आवृताः अ० 18,श्लोक 48
दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुंए से अग्नि की भांति सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त हैं।


गाँधी जी ने स्वयं कभी किसी कार्य को छोटा नहीं माना। उन्होंने हरिजनांे की बस्ती में जाकर वहाँ सफाई करने तक का कार्य किया। वह अपना हर कार्य स्वयं करते थे और दूसरों को भी शिक्षा देते थे स्वावलम्बी बनो। अपना कार्य स्वयं करो। अध्ययन के समय से लेकर राज नैतिक जीवन तक, गृहस्थी के कार्यों से लेकर बागवानी, हस्तशिल्प, कृषि कार्यों को स्वयं करते थे। चरखा और करघा गाँधी जी का पर्याय बन गए। अफ्रीका के टालस्टाय फार्म में रहकर उन्हांेने चप्पल जूते बनाने की कला सीखी। उनके कार्याें और व्यवहार की उनके विदेशी मित्र भी प्रशंसा करते थे। जनरल स्मट्स ने गाँधी जी के बारे में कहा था-मेरे भाग्य में बदा था कि मैं उस व्यक्ति का विरोधी बना जिसके प्रति विरोध के दिनों में भी मेरे मन में आदर का सर्वोच्च स्थान था। जेल में मेरे लिए उन्होंने चप्पल जोड़ी बनाई और रिहा होने पर मुझे भेंट की। अच्छे दिनांे में मैंने उन चप्पलों को बरसों पहना है और मन ही मन कहा है कि क्या मैं उस महान व्यक्ति की कृति के योग्य हूँ।
गीता के इस ज्ञान को यदि आज की पीढ़ी आत्मसात करले तो बेरोजगारी, असंतोष, भ्रष्टाचार,की समस्याएं स्वतः हल हो जाएगी। आज का युवा गाँव से शहर की ओर पलायन कर रहा है। शहरों का युवा व्हाइट कालर जाव की तलाश में दौड़ रहा है। बडे़ लोग कोई अलग कार्य नहीं करते हैं। मसाले पीस कर कोई पूरे देश में नाम कमा सकता है तो एम डी एच मसाले वालों से पूछों। धीरू भाई अम्बानी ने अपना काम पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल भरने से शुरू किया था। ऐसे अनेक उदारहण हैं। सफलता के लिए शार्टकट की जरूरत नहीं होती, कार्य में आस्था की जरूरत होती है। गाँधी जी ने लिखा है-
‘मनुष्य और उसका काम ये दो भिन्न वस्तुएंे हैं। अच्छे काम के प्रति आदर और बुरे काम के प्रति तिरस्कार होना ही चाहिए। भले बुरे काम करने वालों के प्रति आदर अथवा दया रहनी चाहिए। यह चीज सम्भव है, ये सरल है पर इसके अनुसार आचरण कम से कम होता है। इसी कारण इस संसार में विष फैलता जा रहता है। इसलिए हर कार्य को निष्काम भाव से पूर्ण निष्ठा के साथ करने पर ही सफलता एवं आत्मसंतोष मिलता है।‘


बाहय आडम्बर का अभाव- ईश्वर की आराधना के लिए किसी भी आडम्बर की आवश्यकता नहीं होती, गीता में लिखा है-
पत्रं पुष्प फलं तोयं यो मे भक्त्था प्रयच्छति
तत् अहम् भक्त्युपहृतम् अश्नानि प्रश्तात्ममः


‘जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्रं, पुष्प, फल, जल, आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र, पुष्पादि मैं सगुन रूप से प्रकट होकर प्रीति पूर्वक खाता हूँ।‘


वे नित्य भजन कीर्तन, संध्या भगवत ध्यान में विश्वास करते थे। इन सब कार्याें के लिए व्यक्ति, स्थान, समय की बाध्यता नहीं रहती थी। स्वयं गाँधी जी ने लिखा है-‘तीर्थ स्थलों में जहाँ मनुष्य ध्यान और भगवान चिन्तन की आशा रखता है वहाँ उसे कुछ नहीं मिलता। यदि ध्यान की जरूरत हो तो वह अपने अंतर से पाना होगा।‘
विद्या विनयसम्पन्ने, ब्राह्यमणे,गवि, हस्तिानि
                शुनि,च रस,श्वपाके,च पण्डिताःसमदर्शिनः अ०5,श्लोक 18


‘ज्ञानी विद्या और विनययुक्त ब्राहमण मंे तथा गौ, हाथी, कुत्ते, और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।‘ गाय को माता इसलिए कहा गया है कि वह हमें दूध पिलाती है और ऐसे बछडेे़ जनती है जो हमारा साथी बनकर कृषि और वाणिज्य में सहायक होता है। गाय हिन्दू जीवन की अहिंसकता और सादगी की प्रतीक है। जीवों पर दया करनी चाहिए, सब मनुष्य बराबर हैं।
तीर्थस्थलों में जहाँ मनुष्य ध्यान और भगवत चिन्तन की आशा रखता है वहाँ उसे इनमें से कुछ नहीं मिलता । यदि ध्यान की जरूरत हो तो वह अपने अंतर से पाना होगा।


सर्वभूत सर्वात्मा-
सर्वभूतस्थम्, आत्मानम्, सर्वभूतानि च आत्मनि
             ईक्षते, योगयुक्तात्मा, सर्वत्र, समदर्शनः अ०6,श्लोक 29 


‘सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप  योग से युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है।‘


गाँधी जी सम्पूर्ण प्राणी मात्र को समान भाव से देखते थे। वे जाति पांति की दीवारों को मानव जाति की प्रगति के लिए अभिशाप मानते थे। उनका कहना था कि केवल जन्म के कारण कोई व्यक्ति अछूत नहीं माना जा सकता । उनकी दृष्टि में स्वराज्य का अर्थ था- देश के हीन से हीन लोगों की आज़ादी। वे हरिजनों की बस्ती मेें जाकर रहे उन्होंने कहा-
‘मैं अश्पृश्यता के कलंक से अपने को मुक्त करके आत्मशद्धि के अर्थ में हरिजन कार्य में लगा हुआ हूँ।‘


आत्मा की अमरता में विश्वास-
गीता, आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध जोड़ने वाली एक कड़ी है। गीता में कहा गया है कि आत्मा अज़र अमर और शाश्वत है। गाँधी जी कहते थे कि जन्म और मृत्यु दो भिन्न स्थितियाँ नहीं हैं परन्तु एक ही स्थिति के दो अलग-अलग पहलू हैं। मृत्यु नवजीवन और पुराने चोले का संधि स्थल है- गीता में कहा गया-
वासंासि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहयाति नरः अपराणि
तथा शरीराय विहाय जीर्णानि
               अन्यानि, संयाति, नवानि देही अ०2,श्लोक 22
‘जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीर को प्राप्त होता है। आत्मा का विकास करने का अर्थ है, चरित्र का निर्माण करना, ईश्वर का ज्ञान पाना, आत्मज्ञान प्राप्त करना।‘
अपनी आत्मा की आवाज़ पर कार्य करना चाहिए। आत्मा मनुष्य को सही और गलत का ज्ञान कराती है। अपनी अंतरात्मा के निर्देशों का पालन करते हुए यदि कोई अपना जीवन जीता है तो उसको किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं होता क्योंकि आत्मा कभी गलत कार्य के लिए प्रेरित नहीं करती।


नेताओं को श्रेष्ठ आचरण करना चाहिए- 
यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरः जनः
              अःयत् प्रमाणम् कुरूते लोकः अनुवर्तते अ०3,श्लोक 21
‘श्रेष्ठ पुरूष जो जो आचरण करता है अन्य पुरूष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लगता है।‘ मनुष्य का स्वभाव होता है कि जिसे वह श्रेष्ठ समझता है उसका अनुकरण करने का प्रयास करता है। उच्च, ख्याति प्राप्त लोगों को श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। लोकसेवा करने वालों को कभी कोई बहुमूल्य वस्तु भेंट स्वरूप नहीं स्वीकार करनी चाहिए। गाँधीजी को अफ्रीका में अनेक बहुमूल्य वस्तुएं उपहार में मिली मगर उन्हांेने सब वापस कर दीं। गाँधी जी ने यह भी कहा कि अफसरांे को बिगाड़ने में नागरिकों का भी हाथ होता है। क्या कारण हैं कि जो अंग्रेज अफसर स्वेज के उस पार भलामानस होता है यहाँ आकर कुछ दिनों में अभद्र हो जाता है। गाँधी जी के इन विचारों का यदि पालन हो जाए तो इस देश से भ्रष्टाचार, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी, जैसी बुराइयाँ स्वतः मिट जाएं। आज बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अपना झूठा दम्भ दिखाने के चक्कर में नेता मंचों पर सार्वजनिक रूप से नोटों की माला पहनते हैं जो लोकतंत्र में भ्रष्टाचार का सबसे निकृष्टतम् रूप है। उनके येनकेन प्रकारेण से प्राप्त किए गए पद, झूठेदम्भाचरण को देखकर दूसरे लोग भी वैसा ही करने का प्रयास करते हैं जिससे अनीति को ही बढ़ावा मिलता है। यह संसार नीति पर टिका हुआ है । नीति मात्र का समावेश सत्य में है।


धार्मिक मन्थन- गाँधी जी ने विलायत में रहकर पढ़ाई के अतिरिक्त गीता, बुद्धचरित, और बाइबिल का अंग्रेजी अनुवादांे के माध्यम से अध्ययन किया। कार्लाइल लिखित वीर पैगम्बर (हज़रत मुहम्मद) निबंध को ध्यान से पढ़ा। थियोसोफी रहस्य नामक पुस्तक पढ़कर अपने धर्म के प्रति उत्साह अनुभव किया। वहीं रहकर हिन्दू धर्म का गहरा अध्ययन किया और निष्पक्ष भाव से विचार कर पाया कि हिन्दू धर्म में जो सूक्ष्म और गूढ़ विचार हैं, आत्मा का निरीक्षण है, दया है, वह दूसरे धर्मों में नहीं। हिन्दू धर्म की त्रुटियों पर मनन किया और लगा कि यदि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अंग है तो वह सड़ा हुआ और बाद में जुड़ा हुआ अंग जान पड़ा।
टालस्टाय की पुस्तक स्वर्ग तेरे हृदय में तथा रस्किन की अनटू द लास्ट पुस्तक ने उनके हृदय को सर्वाधिक प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त पंचीकरण, मणि रत्नमाला, योग वाष्ठिका, मुमुक्ष प्रकरण, हरिभाद्र सूरिका, षड़दर्शसमुच्चय पुस्तकंे भी पढ़ीं।


सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर उन्होंने पाया कि वे हिन्दू हैं और उन्हंे हिन्दु धर्म ही श्रेष्ठ लगा क्योंकि कोई धर्म ऐसा नहीं जिसमें सारी अच्छाई हो तथा कोई धर्म ऐसा नहीं जिसमें केवल बुराइयाँ हों। गीता में कहा गया-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
                स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः अ०3,श्लोक 35
‘अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। इसलिए-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
               स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्  अ०18,श्लोक 47
‘अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।‘
वे सम्पूर्ण धर्मों का आदर करते थे परन्तु हिन्दू धर्म में उनकी अगाध श्रद्धा थी क्योंकि वे जन्म से हिन्दू ही थे।


त्याग की भावना- 
आसक्ति अनभिष्वअः पुत्रदार गृहादिषु
               नित्यम् च समचित्वम् इष्टा निष्टोंपपत्तिपु  अ०13,श्लोक 1
‘पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना।‘
गाँधी जी सारी जनता को पुत्रवत मानते थे। दक्षिण अफ्रीका के स्कूल में उनके बच्चों को दाखिला देने को तैयार थे परन्तु गाँधी जी ने यही सोचकर अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से मिलना चाहिए। भले ही इससे उनके बच्चों की विधिवत शिक्षा नहीं हो सकी। वह कहते थे सबै भूमि गोपाल की फिर स्थान का मोह क्यों ?


धन का संचय उन्होंने जीवन में किया नहीं वरन् वकालत जो उनकी आजीविका थी उसके लिए भी उन्हेें अपने मुवक्किल से फीस लेना अच्छा नहीं लगता था।
विषया विनिवर्तन्ते निराहरस्य देहिनः
               रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवां निवर्तते अ०2,श्लोक 59
‘इंद्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरूष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरूष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत हो जाती है।‘


गाँधी जी का कहना था कि मनुष्य को अपने आहार पर संयम रखना चाहिए,व्रत, उपवास रखने से मन में कुछ संयम की भावना अवश्य आती है। उपवास की सच्ची उपयोगिता वहीं होती है जहाँ मनुष्य का मन भी देह दमन मेें साथ होता है। तात्पर्य यह है कि मन मंे विषय भोग के प्रति विरक्ति आनी चाहिए। विषय की जड़ें मन में रहती हैं। उपवास आदि साधनों से यद्यपि बहुत सहायता मिलती है, फिर भी वह अपेक्षाकृत कम ही होती है। कहा जा सकता है कि उपवास करते हुए भी मन विषयासक्त रह सकता है। पर बिना उपवास के विषयासक्ति को जड़ मूल से मिटाना संभव नहीं। अतएव ब्रह्यमचर्य के पालन में उपवास अनिवार्य अंग है। ब्रहमचर्य का अर्थ है, मन-वचन क्रम से समस्त इंद्रियों का संयम। आत्मार्थी के लिए रामनाम और रामकृपा ही अंतिम साधन है। गाँधी जी शाकाहारी भोजन को ही उत्तम मानते थे। उनका कहना था कि अपने मुख केे स्वाद के लिए किसी जीव की हत्या करना पाप है। गीता में भी कहा गया है कि-
आयुः सत्व बलारोग्य सुखप्रीति विवर्धनाः
              रस्याःस्निग्धाःस्थिराःहृद्या आहाराःसात्विकप्रियाः अ०17,श्लोक 8
‘आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय ऐसे आहार अर्थात भोजन सात्विक पुरूष को प्रिय होते हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी यह सिद्ध किया है कि शाकाहारी भोजन ही श्रेष्ठ होता है।‘


सेवा की भावना- अपनी आत्म कथा में गाँधी जी ने लिखा-
मैंने सेवाधर्म अपना लिया क्योंकि मेरी समझ से ईश्वर साक्षात्कार का यही एक उपाय था। मेरी दृष्टि में लोकसेवा भारत माता की सेवा थी। सेवा करनेवाले साधक का सिद्धान्त वाक्य होता है- ‘मोहि कहाँ विश्राम‘।
सेवा की अभिरूचि कुकुरमुत्ते की तरह बात की बात में उत्पन्न नहीं होती। उसके लिए इच्छा चाहिए और बाद में समय। दिखावे या लोकलाज से सेवाधर्म अपनाने से साधक की प्रगति रूक जाती है और उसका मन भर जाता है। सेवा मंे आनन्द का अनुभव न हुआ तो सेवा और सेव्य में से किसी का कुछ भला नहीं होता। लेकिन मन से सेवा की जाए तो सेवक को ऐसा आनन्द आता है कि अन्य सब प्रकार की सम्पदा और सुख भोग फीके पड़ जाते हैं।


गाँधी जी के अफ्रीका में दक्षिण टंªासवाल मंे 14 अगस्त 1908.......................के दिन का सत्याग्रह का वर्णन एक विदेशी ने यूँ किया -
‘तेरह हज़ार निशस्त्र प्रवासी भारतीय एक शक्तिशाली सरकार को चुनौती दे रहे थे। प्रवासी भारतीय के अस्त्र शस्त्र हैं सत्याग्रह और भगवान के न्याय में विश्वास। जिनके लिए मनुष्यता, नैतिकता और ईश्वरीय न्याय की व्यवस्था संसार से उठ नहीं गई है उन्हें इन अस्त्र शस्त्रों की सामथ्र्य में इतना विश्वास है।‘ दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी के सत्याग्रह की विजय की टिप्पणी में प्रोफेसर गिल्बर्ट मरे ने लिखा था-
‘अत्याचारियों को सावधान होकर सीख लेनी चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का सामना करना कठिन है, जिसे इंद्रियों के भोग, धन, दौलत सुविधा की रंचमात्र परवाह नहीं है और जो सत्य पर आसक्त रहने का दृढ़ निश्चय कर लेता है । उससे लड़ना खतरनाक होता है ।उसके शरीर पर हावी हुआ जा सकता है लेकिन उसकी आत्मा पर नहीं।‘ 


अहिंसा-
  अहिंसा,सत्यम्, अक्रोधः, त्यागः, शान्तिपैशुनम्
              दया, भूतेष्वलोलुप्त्वं्, मार्दवं, हृीरचापलम् अ०16,श्लोक 2
मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्रकार किसी को भी कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना उपकार करने वाले पर भी क्रोध न होना, कर्माें में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अंतःकरण की उपरति अर्थात चित्त की चंचलता का अभाव, किसी की भी निन्दा न करना, सब भूत प्राणियांे में हेतुरहित दया इंद्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र के विरूद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। सत्य की शोध के मूल मंे ऐसी अहिंसा है। जब तक ऐसी अहिंसा हाथ नहीं आती तब तक सत्य नहीं मिल सकता। व्यवस्था या पद्धति के विरूद्ध झगड़ा करना शोभा देता है, पर व्यवस्थापक के विरूद्ध झगड़ा करना तो अपने विरूद्ध झगड़ने के समान है क्योंकि हम सब एक ही कूंची से रचे गए हैं, एक ही ब्रहमा की संतान हैं। व्यवस्थापक में अनन्त शक्तियाँ निहित हैं। व्यवस्थापक का अनादर या तिरस्कार करने से उन शक्तियोें का अनादर होता है और वैसा होने पर व्यवस्थापक को और संसार को हानि पहुँचती है।
चम्पारन में रहकर गाँधी जी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह आंदोलन किया था, जो सफल रहा। गाँधी जी ने लिखा-
‘चम्पारन में मैंने ईश्वर का, अहिंसा का, और सत्य का साक्षात्कार किया। जब मैं इस साक्षात्कार के अपने अधिकार की जाँच करता हूँ तो मुझे लोगों के प्रति प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। इस प्रेम का अर्थ है, प्रेम अथवा अहिंसा के प्रति मेरी अविचल श्रद्धा।‘
अहिंसा व्यापक वस्तु है । हम हिंसा की होली के बीच घिरे हुए पामर प्राणी हैं। अहिंसा की तह में ही अद्वैत भावना निहित है। प्राणि मात्र में जो भेद है, तो एक के पाप का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है, इस कारण भी मनुष्य हिंसा से बिलकुल अछूता नहीं रह सकता। समाज में रहने वाला मनुष्य समाज की हिंसा में, अनिच्छा से ही क्यों न हो, साझेदार बनता है। दो राष्ट्रों के बीच युद्ध छिड़ने पर अहिंसा में विश्वास रखने वाले व्यक्ति का धर्म है कि वह युद्ध को रोके। आज सम्पूर्ण विश्व ऐसे युद्ध के ढेर पर बैठा है जिसमें  एक  चिंगारी  सम्पूर्ण विनाश  करने  के लिए काफी है। आज अपनी बात मनवाने के लिए जरा-जरा सी बात में हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। हड़ताल करना, तोड़-फोड़ करना, आगजनी करना, इन सब से नुकसान तो जनता का ही होता है। फिर जनता कोई और तो नहीं । चीजें भी किसी और की नहीं। यह सब हमारी ही चीजें हैं, हमारे ही पैसे से, इन्कम टैक्स, सेल टैक्स, रोड़ टैक्स से ही तो सरकार बनवाती है। ऐसी हिंसा से जनता की गाढी कमाई का ही अहित होता है। हर व्यक्ति यदि शांत भाव से सोचे तो समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी।
यदि राष्ट्रों के बीच अहिंसा का भाव जन्म ले तो युद्ध की संभावना ही नहीं होगी। महाविनाश स्वतः टल जाएगा।
सत्य-
अभयम् सत्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
              दानम्,दमः,च,यज्ञः,च,स्वाध्यायः,तपः,आर्जवम् अ०16,श्लोक 1
भय का सवर्था अभाव, अंतकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्वज्ञान के लिए ध्यान, योग में निरन्तर दृढस्थिति और सात्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरूजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेदशास्त्रों का पठन पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्मपालन के लिए कष्ठ सहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता।
जहाँ सत्य की ही साधना और उपासना होती है वहाँ भले परिणाम हमारी धारणा के अनुसार न निकले, फिर भी जो अनपेक्षित परिणाम होता है, वह अकल्यााणकारी नहीं होता और कई बार अपेक्षा से अधिक अच्छा होता है।‘
लोकसेवा के माध्यम से सत्य की आराधना की जा सकती है । सत्य एक विशाल वृक्ष है ज्यों-ज्यों उसकी सेवा की जाती है त्यों-त्यों उस पर नए-नए फल आते हैं  जिनका कोई अन्त नहीं । सत्य एक ऐसी खान के समान है जिसमें जितना गहरा पैठा जाए उतने ही रत्न गहराई मंे दिखाई देते हैं जिनके आलोक मंे सेवा के नए-नए मार्ग सूझ जाते हैं।
मानवीय मूल्यांे पर पूर्ण आस्था-मन को यदि वश में कर लिया जाए तो दुःखों का स्वतः नाश हो जाएगा
यो न हृष्यति ने द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स में प्रियः।।
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता ह,ै न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त पुरूष मुझको प्रिय है।
समः शत्रौ च मित्रे तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदः खेषु समः सग्ङविवर्जितः
जो शत्रु-मित्र मेें और मान अपमान में सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखदि द्वन्द्वों मंे सम है और आसक्ति से रहित है।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।
जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही सन्तुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है-वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरूष मुझको प्रिय है।
गाँधी जी ने मित्र और शत्रु दोनों का भेद मिटा दिया। उनका कहना था- पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। सम्पूर्ण जीवन त्याग और बलिदान का उदाहरण रहा। गाँधी जी के समय मेे हमारे देश मे अत्याधिक निर्धनता थी, लोगों के पास पहनने को कपड़े तक नहीं थे। चम्पारन में रहकर उन्होंने गरीबी की पराकाष्ठा देख उन्होंने यह व्रत लिया कि जब तक सम्पूर्ण देशवासियों के पास तन ढंकने के लिए वस्त्र नहीं हो जाएगंे वे सिर्फ एक धोती में ही तन को ढकूंगा। देश की आज़ादी के बाद भी उन्होंने कोई पद नहीं लिया। हिन्दु-मुस्लिम एकता, अछतुोद्धार पर जीवन भर निःस्वार्थ भाव से लगे रहे।
उनके मन में किसी प्रकार की कामना नहीं थी, वह प्राणियों के दुःखों का निवारण चाहते थे।
न त्वम् कामये राज्यम् स्वर्गम् न पुर्नभवम्।
कामये दुःख तत्वानां प्राणी नामाशाय नाशनम्।।
गीता में कहा गया है-
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मांन सृजाम्यहम्।।
जब जब धर्म की हानि और अर्धम की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।
वह परत्रन्त्रा की बेडियों में जकडी मातृभूमि को आज़ाद कराने तथा लोगों के मन में वैचारिक क्रान्ति जगाने आए थे। महात्मा गाँधी के जीवन को यदि हम यूँ कहें कि उन्होंने गीता को चरितार्थ किया तो अतिश्योक्ति न होगी। उनका जीवन दर्शन गीता का दर्शन था। 
                                    
स्नेह लता
लेखाधिकारी (उ०रे०)
1/309,विकास नगर,लखनऊ
मो०नं० 9450639976


स्नेह लता
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गीता दर्शन और गाँधी जी
श्री मद्भगवतगीता एक ऐसा अनुपम ग्रंथ है जिसके माहात्म्य का शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है। इसकी संस्कृत इतनी सुन्दर और सरल है कि थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है परन्तु इसका आशय इतना गंभीर है कि आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहने पर भी उसको संपूर्ण रूप से आचरण में लाना संभव नहीं प्रतीत होता। प्रतिदिन नए-नए भाव उत्पन्न होते रहते हैं इससे यह सदैव नवीन बना रहता है। श्रद्धाभक्ति से विचार करने से इसके पद-पद मंे रहस्य भरा हुआ प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। जितना ही मनुष्य इसका अध्ययन करता है उतना उसका जीवन दैवीय गुणों से भरता जाता है। वह मानव से महात्मा बनने लगता है। यह गीता का ही प्रभाव था जिसने गांधी जी को साधारण मानव से महात्मा बना दिया। अपने ऊपर गीता के प्रभाव को स्वयं गांधीजी ने अपनी आत्म कथा में जगह-जगह स्वीकार किया है। यूँ तो उनके घर मंे शुरू से ही आध्यात्मिक वातावारण था परन्तु गीता के प्रति गांधी जी का विशेष झुकाव कैसे हुआ उसके विषय मंे उन्होंने लिखा है-
   विलायत मंे रहते हुए मुझे कोई एक साल हुआ होगा। इस बीच दो थियाॅसोफिस्ट मित्रों से मेरी पहचान हुई। दोनों सगे भाई थे और अविवाहित थे। उन्होंने मुझसे गीता की चर्चा की। वे एडविन आर्नल्ड का गीता का अनुवाद पढ़ रहे थे पर उन्होंने मुझे अपने साथ संस्कृत में गीता पढ़ने के लिए न्यौता दिया। मैं शरमाया क्योंकि मैंने गीता संस्कृत मंे या मातृभाषा में पढी ही नहीं थी। मुझे उनसे कहना पड़ा कि मैंने गीता पढी ही नहीं है पर मंै आपके साथ पढ़ने को तैयार हूँ। इस प्रकार मैंने उन भाइयों के साथ गीता पढ़ना शुरू किया-
ध्यायतः, विषयान् पंुसः, सग्ङ, तेषु, उपजायते, ।
            सग्ङात्,सञजायते,कामः,कामात्,क्रोधः,अभिजायते ।। अ० 2 श्लोक
अर्थ- ‘विषयों का चिन्तन करने वाले पुरूष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
इन श्लोकों का मेरे मन पर गहरा असर रहा। उनकी भनक मेरे कानों में गूँजती ही रही। उस समय मुझे लगा कि भग्वदगीता अमूल्य ग्रन्थ है। यह मान्यता धीरे-धीरे बढ़ती गई, और आज मैं तत्वज्ञान के लिए उसे सर्वोत्तम ग्रन्थ मानता हूँ। निराशा के समय इस ग्रन्थ ने मेरी अमूल्य सहायता की है।
1903 के समय से मंैने नित्य एक दो श्लोक कंठस्थ करने का निश्चय किया। अपनी दिनचर्या का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा- 
  ‘प्रायः दातुन और स्नान के समय का उपयोग गीता के श्लोक कंठस्थ करने में किया। दातुन में पन्द्रह और स्नान में बीस मिनट लगते थे। दातुन मैं अंग्रेजी ढ़ंग से खडे़-खड़े करता था, सामने की दीवार पर गीता के श्लोक लिखकर चिपका देता था और आवश्यकतानुसार उन्हंे देखता तथा पढ़ता जाता था। ये पढ़े हुए श्लोक स्नान करने तक पक्के हो जाते थे। इस बीच पिछले कंठस्थ किए हुए श्लोकों को भी मैं एक बार दोहरा जाता था। इस प्रकार तेरह अध्याय कंठस्थ करने की बात मुझे याद है।‘
गीता पाठ का मेरे साथियों पर क्या प्रभाव पड़ा ये तो वे जानें परन्तु मेेरे लिए तो वह पुस्तक आचार की एक प्रौढ़ मार्गदर्शिका बन गई। वह मेरे लिए धार्मिक कोष का काम देने लगी जिस प्रकार नए अंग्रेजी शब्दों के हिज्जों या उनके अर्थ के लिए मैं अंग्रेजी शब्दकोष देखता था, उसी प्रकार आचार संबंधी कठिनाइयों और उनकी अटपटी समस्याओं को गीता से हल करता था। उसके अपरिग्रह, समभाव, आदि शब्दों ने मुझे पकड़ लिया। समभाव का विकास कैसे होे, उसकी रक्षा किस प्रकार की जाए? अपमान करने वाले अधिकारी, रिश्वत लेने वाले अधिकारी, व्यर्थ विरोध करने वाले कल के साथी इत्यादि और जिन्होंने बडे़-बड़े उपकार किए हैं ऐसे सज्जनों के बीच भेद न करने का क्या अर्थ है? अपरिग्रह किस प्रकार पाला जाता होगा? देह का होना ही कौन कम परिग्रह है? स्त्री-पुत्रादि परिग्रह नहीं तो और क्या हैं? गीता शास्त्र के अध्ययन के फलस्वरूप ‘ट्रस्ट्री‘ शब्द का अर्थ विशेष रूप से मेरी समझ में आया। कानून शास्त्र के प्रति मेरा आदर बढ़ा, मुझे उसमें भी धर्म के दर्शन हुए।‘ट्रस्ट्री‘ के पास करोड़ों रूपयों के रहते हुए भी एक भी पाई उसकी नहीं होती। मुमुक्ष को ऐसा ही बरताव करना चाहिए, यह बात मैंने गीता से समझी। मुझे यह दीपक की तरह स्पष्ट दिखाई दिया कि अपरिग्रह ही बनने में समभावी होने में हेतु का, हृदय परिवर्तन आवश्यक है।


गाँधी जी का सम्पूर्ण जीवन संघर्षपूर्ण रहा। एक ओर परतन्त्रता मेें जकड़ी हुई भारत माँ को आज़ाद कराने की लड़ाई थी तो दूसरी ओर भारतीय समाज़ तथा जनमानस में व्याप्त अंधविश्वास, जाति संघर्ष, छुआ छूत, अस्पृश्यता, वर्ग भेद जैसी कुरीतियाँ थीं। गाँधी जी ने नैतिक और राजनैतिक दोनांे क्षेत्रोें का विशद् अध्ययन किया। यूँ तो उन्होंने अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया परन्तु जैसा कि स्वयं उन्होंने अपनी आत्म कथा तथा भाषणों में कहा है कि गीता ने उनके जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया। आज भी यदि हम कहें कि गीता सम्पूर्ण आर्ट आॅफ लिविंग का सार है तो अतिश्योक्ति न होगी। गीता पढ़ते तो बहुत लोग हैं परन्तु गाँधी जी ने उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया जिसमंे वह सफल भी रहे। गीता के संदर्भ में यदि हम गाँधी जी के विचारों और कार्यों का विवेचन करें तो संक्षेप वह इस प्रकार है-
विषयाः विनिवर्तन्ते, निराहारस्य, देहिनः,
             रसवर्जम रसःअपि,अस्य,परम्,दृष्ट्वा,निवर्तते ।। अ० 2,श्लोक 59


ईश्वर में अटूट आस्था-  गाँधी जी की ईश्वर में अटूट आस्था थी। मानव सेवा को वह ईश्वर सेवा का ही रूप समझते थे। 
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते
                   तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। अ० 9,श्लोक 22
जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते है, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरूषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ। गाँधी जी कहना था कि मैं अनुभव करता हूँ कि ईश्वर मेरी रग-रग में समाया हुआ है। वही सत्य और प्रेम है। ईश्वर प्रकाश है। वह कहते थे कि अपने कार्याें को ईश्वर में अर्पण कर दो, ईश्वर सबकी रक्षा करने वाला है। गीता में कहा गया है-
मन्मनाः भव मदभक्तः मद्या जी माम् नमस्कुरू
माम एक एष्यसि ते सत्यम् प्रतिजाने मे प्रियः असि
मुझमें मतवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा । यह मैं तुझसे सत्यप्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।


गाँधी जी नित्यप्रति पूजा पाठ के अतिरिक्त जब भी उन्हें समय मिलता था वह ईश्वर की ही आराधना करते थे। जेेल में रहते हुए भी वह ईश पूजा में ही मन रमाते थे। सत्याग्रह के समय भी वह लोगों से ईश पूजा के लिए ही कहते थे। ईश्वर का ध्यान करने से मन का भटकाव कम हो जाता है। वह  कहते थे-
‘मन का मैल तो विचार से ईश्वर के ध्यान से और आखिरी ईश्वरी प्रसाद से छूटता है।‘
गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति अंत समय में भी ईश्वर का नाम लेते ही शरीर त्यागता है वह सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है। सर्व विदित है, गाँधी जी को जब गोली मारी गई तो वह शाम की पूजा के लिए ही जा रहे थे। गोली लगते ही ‘हे राम‘ कहा और वे गिर गए। गीता का यह श्लोक कि जो निरन्तर मुझे याद करता है, अंतिम समय भी मंै उसके साथ होता हूँ, गाँधी जी पर पूर्णतः चरितार्थ हुआ।


कर्तव्यपराणयता- गीता वास्तव में कर्म योग का ग्रंथ है। कर्मयोग का अर्थ है कर्म करते हुए भगवत्प्राप्ति की ओर अग्रसर होना। गाँधी जी के विचार से कर्तव्यपरायणता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। गीता के उपदेशों का उद्देश्य अर्जुन को उसके कर्तव्य का ज्ञान कराना था-
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम् जित्वा वा मोक्ष्यसे महीम्
               तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय यु़द्धाय कृतनिश्चयः अ० 2,श्लोक 37
‘या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा । इस कारण हे! अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा।‘ गाँधी जी के सामने भी स्वतंत्रता प्राप्ति का लक्ष्य किसी महाभारत से कम नहीं था। तत्कालीन परिस्थितियों में सोए हुए जनमानस में चेतना जाग्रत करने के लिए ऐसे ही प्रेरक विचारों की आवश्यकता थी।
जीवन के किसी भी क्षेत्र मंे सफलता पाने के लिए निष्काम कर्म की आवश्यकता होती है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः
           मा कर्मफल हेतुःमा भूःते अकर्मणि संग मा अस्तु अ० 2,श्लोक 47
‘तेरा कर्म करने में अधिकार है उसके फल मेें कभी नहीं।  इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म करने में भी आसक्ति न हो।‘
मनोवैज्ञानिक सत्य भी यही है कि काम करते समय अगर केवल परिणाम के बारे में ही सोचा जाएगा तो काम में पूर्ण तन्मयता से ध्यान नहीं लगेगा। किसी भी कार्य को करने में सफलता तभी मिलती है जब उसे लगनशीलता से किया जाए। बिना प्रयास के कार्य सिद्ध नहीं हो सकता कोई कार्य छोटा-बड़ा अच्छा बुरा नहीं होता। हर काम में कुछ न कुछ अच्छाई है तो कुछ न कुछ बुराई भी होगी।
             सहजं कर्म कौन्तेय सदोषम् अपि न त्यजेत्
          सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेन अग्निःइव आवृताः अ० 18,श्लोक 48
दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुंए से अग्नि की भांति सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त हैं।


गाँधी जी ने स्वयं कभी किसी कार्य को छोटा नहीं माना। उन्होंने हरिजनांे की बस्ती में जाकर वहाँ सफाई करने तक का कार्य किया। वह अपना हर कार्य स्वयं करते थे और दूसरों को भी शिक्षा देते थे स्वावलम्बी बनो। अपना कार्य स्वयं करो। अध्ययन के समय से लेकर राज नैतिक जीवन तक, गृहस्थी के कार्यों से लेकर बागवानी, हस्तशिल्प, कृषि कार्यों को स्वयं करते थे। चरखा और करघा गाँधी जी का पर्याय बन गए। अफ्रीका के टालस्टाय फार्म में रहकर उन्हांेने चप्पल जूते बनाने की कला सीखी। उनके कार्याें और व्यवहार की उनके विदेशी मित्र भी प्रशंसा करते थे। जनरल स्मट्स ने गाँधी जी के बारे में कहा था-मेरे भाग्य में बदा था कि मैं उस व्यक्ति का विरोधी बना जिसके प्रति विरोध के दिनों में भी मेरे मन में आदर का सर्वोच्च स्थान था। जेल में मेरे लिए उन्होंने चप्पल जोड़ी बनाई और रिहा होने पर मुझे भेंट की। अच्छे दिनांे में मैंने उन चप्पलों को बरसों पहना है और मन ही मन कहा है कि क्या मैं उस महान व्यक्ति की कृति के योग्य हूँ।
गीता के इस ज्ञान को यदि आज की पीढ़ी आत्मसात करले तो बेरोजगारी, असंतोष, भ्रष्टाचार,की समस्याएं स्वतः हल हो जाएगी। आज का युवा गाँव से शहर की ओर पलायन कर रहा है। शहरों का युवा व्हाइट कालर जाव की तलाश में दौड़ रहा है। बडे़ लोग कोई अलग कार्य नहीं करते हैं। मसाले पीस कर कोई पूरे देश में नाम कमा सकता है तो एम डी एच मसाले वालों से पूछों। धीरू भाई अम्बानी ने अपना काम पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल भरने से शुरू किया था। ऐसे अनेक उदारहण हैं। सफलता के लिए शार्टकट की जरूरत नहीं होती, कार्य में आस्था की जरूरत होती है। गाँधी जी ने लिखा है-
‘मनुष्य और उसका काम ये दो भिन्न वस्तुएंे हैं। अच्छे काम के प्रति आदर और बुरे काम के प्रति तिरस्कार होना ही चाहिए। भले बुरे काम करने वालों के प्रति आदर अथवा दया रहनी चाहिए। यह चीज सम्भव है, ये सरल है पर इसके अनुसार आचरण कम से कम होता है। इसी कारण इस संसार में विष फैलता जा रहता है। इसलिए हर कार्य को निष्काम भाव से पूर्ण निष्ठा के साथ करने पर ही सफलता एवं आत्मसंतोष मिलता है।‘


बाहय आडम्बर का अभाव- ईश्वर की आराधना के लिए किसी भी आडम्बर की आवश्यकता नहीं होती, गीता में लिखा है-
पत्रं पुष्प फलं तोयं यो मे भक्त्था प्रयच्छति
तत् अहम् भक्त्युपहृतम् अश्नानि प्रश्तात्ममः


‘जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्रं, पुष्प, फल, जल, आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र, पुष्पादि मैं सगुन रूप से प्रकट होकर प्रीति पूर्वक खाता हूँ।‘


वे नित्य भजन कीर्तन, संध्या भगवत ध्यान में विश्वास करते थे। इन सब कार्याें के लिए व्यक्ति, स्थान, समय की बाध्यता नहीं रहती थी। स्वयं गाँधी जी ने लिखा है-‘तीर्थ स्थलों में जहाँ मनुष्य ध्यान और भगवान चिन्तन की आशा रखता है वहाँ उसे कुछ नहीं मिलता। यदि ध्यान की जरूरत हो तो वह अपने अंतर से पाना होगा।‘
विद्या विनयसम्पन्ने, ब्राह्यमणे,गवि, हस्तिानि
                शुनि,च रस,श्वपाके,च पण्डिताःसमदर्शिनः अ०5,श्लोक 18


‘ज्ञानी विद्या और विनययुक्त ब्राहमण मंे तथा गौ, हाथी, कुत्ते, और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।‘ गाय को माता इसलिए कहा गया है कि वह हमें दूध पिलाती है और ऐसे बछडेे़ जनती है जो हमारा साथी बनकर कृषि और वाणिज्य में सहायक होता है। गाय हिन्दू जीवन की अहिंसकता और सादगी की प्रतीक है। जीवों पर दया करनी चाहिए, सब मनुष्य बराबर हैं।
तीर्थस्थलों में जहाँ मनुष्य ध्यान और भगवत चिन्तन की आशा रखता है वहाँ उसे इनमें से कुछ नहीं मिलता । यदि ध्यान की जरूरत हो तो वह अपने अंतर से पाना होगा।


सर्वभूत सर्वात्मा-
सर्वभूतस्थम्, आत्मानम्, सर्वभूतानि च आत्मनि
             ईक्षते, योगयुक्तात्मा, सर्वत्र, समदर्शनः अ०6,श्लोक 29 


‘सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप  योग से युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है।‘


गाँधी जी सम्पूर्ण प्राणी मात्र को समान भाव से देखते थे। वे जाति पांति की दीवारों को मानव जाति की प्रगति के लिए अभिशाप मानते थे। उनका कहना था कि केवल जन्म के कारण कोई व्यक्ति अछूत नहीं माना जा सकता । उनकी दृष्टि में स्वराज्य का अर्थ था- देश के हीन से हीन लोगों की आज़ादी। वे हरिजनों की बस्ती मेें जाकर रहे उन्होंने कहा-
‘मैं अश्पृश्यता के कलंक से अपने को मुक्त करके आत्मशद्धि के अर्थ में हरिजन कार्य में लगा हुआ हूँ।‘


आत्मा की अमरता में विश्वास-
गीता, आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध जोड़ने वाली एक कड़ी है। गीता में कहा गया है कि आत्मा अज़र अमर और शाश्वत है। गाँधी जी कहते थे कि जन्म और मृत्यु दो भिन्न स्थितियाँ नहीं हैं परन्तु एक ही स्थिति के दो अलग-अलग पहलू हैं। मृत्यु नवजीवन और पुराने चोले का संधि स्थल है- गीता में कहा गया-
वासंासि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहयाति नरः अपराणि
तथा शरीराय विहाय जीर्णानि
               अन्यानि, संयाति, नवानि देही अ०2,श्लोक 22
‘जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीर को प्राप्त होता है। आत्मा का विकास करने का अर्थ है, चरित्र का निर्माण करना, ईश्वर का ज्ञान पाना, आत्मज्ञान प्राप्त करना।‘
अपनी आत्मा की आवाज़ पर कार्य करना चाहिए। आत्मा मनुष्य को सही और गलत का ज्ञान कराती है। अपनी अंतरात्मा के निर्देशों का पालन करते हुए यदि कोई अपना जीवन जीता है तो उसको किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं होता क्योंकि आत्मा कभी गलत कार्य के लिए प्रेरित नहीं करती।


नेताओं को श्रेष्ठ आचरण करना चाहिए- 
यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरः जनः
              अःयत् प्रमाणम् कुरूते लोकः अनुवर्तते अ०3,श्लोक 21
‘श्रेष्ठ पुरूष जो जो आचरण करता है अन्य पुरूष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लगता है।‘ मनुष्य का स्वभाव होता है कि जिसे वह श्रेष्ठ समझता है उसका अनुकरण करने का प्रयास करता है। उच्च, ख्याति प्राप्त लोगों को श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। लोकसेवा करने वालों को कभी कोई बहुमूल्य वस्तु भेंट स्वरूप नहीं स्वीकार करनी चाहिए। गाँधीजी को अफ्रीका में अनेक बहुमूल्य वस्तुएं उपहार में मिली मगर उन्हांेने सब वापस कर दीं। गाँधी जी ने यह भी कहा कि अफसरांे को बिगाड़ने में नागरिकों का भी हाथ होता है। क्या कारण हैं कि जो अंग्रेज अफसर स्वेज के उस पार भलामानस होता है यहाँ आकर कुछ दिनों में अभद्र हो जाता है। गाँधी जी के इन विचारों का यदि पालन हो जाए तो इस देश से भ्रष्टाचार, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी, जैसी बुराइयाँ स्वतः मिट जाएं। आज बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अपना झूठा दम्भ दिखाने के चक्कर में नेता मंचों पर सार्वजनिक रूप से नोटों की माला पहनते हैं जो लोकतंत्र में भ्रष्टाचार का सबसे निकृष्टतम् रूप है। उनके येनकेन प्रकारेण से प्राप्त किए गए पद, झूठेदम्भाचरण को देखकर दूसरे लोग भी वैसा ही करने का प्रयास करते हैं जिससे अनीति को ही बढ़ावा मिलता है। यह संसार नीति पर टिका हुआ है । नीति मात्र का समावेश सत्य में है।


धार्मिक मन्थन- गाँधी जी ने विलायत में रहकर पढ़ाई के अतिरिक्त गीता, बुद्धचरित, और बाइबिल का अंग्रेजी अनुवादांे के माध्यम से अध्ययन किया। कार्लाइल लिखित वीर पैगम्बर (हज़रत मुहम्मद) निबंध को ध्यान से पढ़ा। थियोसोफी रहस्य नामक पुस्तक पढ़कर अपने धर्म के प्रति उत्साह अनुभव किया। वहीं रहकर हिन्दू धर्म का गहरा अध्ययन किया और निष्पक्ष भाव से विचार कर पाया कि हिन्दू धर्म में जो सूक्ष्म और गूढ़ विचार हैं, आत्मा का निरीक्षण है, दया है, वह दूसरे धर्मों में नहीं। हिन्दू धर्म की त्रुटियों पर मनन किया और लगा कि यदि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अंग है तो वह सड़ा हुआ और बाद में जुड़ा हुआ अंग जान पड़ा।
टालस्टाय की पुस्तक स्वर्ग तेरे हृदय में तथा रस्किन की अनटू द लास्ट पुस्तक ने उनके हृदय को सर्वाधिक प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त पंचीकरण, मणि रत्नमाला, योग वाष्ठिका, मुमुक्ष प्रकरण, हरिभाद्र सूरिका, षड़दर्शसमुच्चय पुस्तकंे भी पढ़ीं।


सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर उन्होंने पाया कि वे हिन्दू हैं और उन्हंे हिन्दु धर्म ही श्रेष्ठ लगा क्योंकि कोई धर्म ऐसा नहीं जिसमें सारी अच्छाई हो तथा कोई धर्म ऐसा नहीं जिसमें केवल बुराइयाँ हों। गीता में कहा गया-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
                स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः अ०3,श्लोक 35
‘अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। इसलिए-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
               स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्  अ०18,श्लोक 47
‘अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।‘
वे सम्पूर्ण धर्मों का आदर करते थे परन्तु हिन्दू धर्म में उनकी अगाध श्रद्धा थी क्योंकि वे जन्म से हिन्दू ही थे।


त्याग की भावना- 
आसक्ति अनभिष्वअः पुत्रदार गृहादिषु
               नित्यम् च समचित्वम् इष्टा निष्टोंपपत्तिपु  अ०13,श्लोक 1
‘पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना।‘
गाँधी जी सारी जनता को पुत्रवत मानते थे। दक्षिण अफ्रीका के स्कूल में उनके बच्चों को दाखिला देने को तैयार थे परन्तु गाँधी जी ने यही सोचकर अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा कि शिक्षा का अधिकार समान रूप से मिलना चाहिए। भले ही इससे उनके बच्चों की विधिवत शिक्षा नहीं हो सकी। वह कहते थे सबै भूमि गोपाल की फिर स्थान का मोह क्यों ?


धन का संचय उन्होंने जीवन में किया नहीं वरन् वकालत जो उनकी आजीविका थी उसके लिए भी उन्हेें अपने मुवक्किल से फीस लेना अच्छा नहीं लगता था।
विषया विनिवर्तन्ते निराहरस्य देहिनः
               रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवां निवर्तते अ०2,श्लोक 59
‘इंद्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरूष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरूष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत हो जाती है।‘


गाँधी जी का कहना था कि मनुष्य को अपने आहार पर संयम रखना चाहिए,व्रत, उपवास रखने से मन में कुछ संयम की भावना अवश्य आती है। उपवास की सच्ची उपयोगिता वहीं होती है जहाँ मनुष्य का मन भी देह दमन मेें साथ होता है। तात्पर्य यह है कि मन मंे विषय भोग के प्रति विरक्ति आनी चाहिए। विषय की जड़ें मन में रहती हैं। उपवास आदि साधनों से यद्यपि बहुत सहायता मिलती है, फिर भी वह अपेक्षाकृत कम ही होती है। कहा जा सकता है कि उपवास करते हुए भी मन विषयासक्त रह सकता है। पर बिना उपवास के विषयासक्ति को जड़ मूल से मिटाना संभव नहीं। अतएव ब्रह्यमचर्य के पालन में उपवास अनिवार्य अंग है। ब्रहमचर्य का अर्थ है, मन-वचन क्रम से समस्त इंद्रियों का संयम। आत्मार्थी के लिए रामनाम और रामकृपा ही अंतिम साधन है। गाँधी जी शाकाहारी भोजन को ही उत्तम मानते थे। उनका कहना था कि अपने मुख केे स्वाद के लिए किसी जीव की हत्या करना पाप है। गीता में भी कहा गया है कि-
आयुः सत्व बलारोग्य सुखप्रीति विवर्धनाः
              रस्याःस्निग्धाःस्थिराःहृद्या आहाराःसात्विकप्रियाः अ०17,श्लोक 8
‘आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय ऐसे आहार अर्थात भोजन सात्विक पुरूष को प्रिय होते हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी यह सिद्ध किया है कि शाकाहारी भोजन ही श्रेष्ठ होता है।‘


सेवा की भावना- अपनी आत्म कथा में गाँधी जी ने लिखा-
मैंने सेवाधर्म अपना लिया क्योंकि मेरी समझ से ईश्वर साक्षात्कार का यही एक उपाय था। मेरी दृष्टि में लोकसेवा भारत माता की सेवा थी। सेवा करनेवाले साधक का सिद्धान्त वाक्य होता है- ‘मोहि कहाँ विश्राम‘।
सेवा की अभिरूचि कुकुरमुत्ते की तरह बात की बात में उत्पन्न नहीं होती। उसके लिए इच्छा चाहिए और बाद में समय। दिखावे या लोकलाज से सेवाधर्म अपनाने से साधक की प्रगति रूक जाती है और उसका मन भर जाता है। सेवा मंे आनन्द का अनुभव न हुआ तो सेवा और सेव्य में से किसी का कुछ भला नहीं होता। लेकिन मन से सेवा की जाए तो सेवक को ऐसा आनन्द आता है कि अन्य सब प्रकार की सम्पदा और सुख भोग फीके पड़ जाते हैं।


गाँधी जी के अफ्रीका में दक्षिण टंªासवाल मंे 14 अगस्त 1908.......................के दिन का सत्याग्रह का वर्णन एक विदेशी ने यूँ किया -
‘तेरह हज़ार निशस्त्र प्रवासी भारतीय एक शक्तिशाली सरकार को चुनौती दे रहे थे। प्रवासी भारतीय के अस्त्र शस्त्र हैं सत्याग्रह और भगवान के न्याय में विश्वास। जिनके लिए मनुष्यता, नैतिकता और ईश्वरीय न्याय की व्यवस्था संसार से उठ नहीं गई है उन्हें इन अस्त्र शस्त्रों की सामथ्र्य में इतना विश्वास है।‘ दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी के सत्याग्रह की विजय की टिप्पणी में प्रोफेसर गिल्बर्ट मरे ने लिखा था-
‘अत्याचारियों को सावधान होकर सीख लेनी चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का सामना करना कठिन है, जिसे इंद्रियों के भोग, धन, दौलत सुविधा की रंचमात्र परवाह नहीं है और जो सत्य पर आसक्त रहने का दृढ़ निश्चय कर लेता है । उससे लड़ना खतरनाक होता है ।उसके शरीर पर हावी हुआ जा सकता है लेकिन उसकी आत्मा पर नहीं।‘ 


अहिंसा-
  अहिंसा,सत्यम्, अक्रोधः, त्यागः, शान्तिपैशुनम्
              दया, भूतेष्वलोलुप्त्वं्, मार्दवं, हृीरचापलम् अ०16,श्लोक 2
मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्रकार किसी को भी कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना उपकार करने वाले पर भी क्रोध न होना, कर्माें में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अंतःकरण की उपरति अर्थात चित्त की चंचलता का अभाव, किसी की भी निन्दा न करना, सब भूत प्राणियांे में हेतुरहित दया इंद्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र के विरूद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। सत्य की शोध के मूल मंे ऐसी अहिंसा है। जब तक ऐसी अहिंसा हाथ नहीं आती तब तक सत्य नहीं मिल सकता। व्यवस्था या पद्धति के विरूद्ध झगड़ा करना शोभा देता है, पर व्यवस्थापक के विरूद्ध झगड़ा करना तो अपने विरूद्ध झगड़ने के समान है क्योंकि हम सब एक ही कूंची से रचे गए हैं, एक ही ब्रहमा की संतान हैं। व्यवस्थापक में अनन्त शक्तियाँ निहित हैं। व्यवस्थापक का अनादर या तिरस्कार करने से उन शक्तियोें का अनादर होता है और वैसा होने पर व्यवस्थापक को और संसार को हानि पहुँचती है।
चम्पारन में रहकर गाँधी जी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह आंदोलन किया था, जो सफल रहा। गाँधी जी ने लिखा-
‘चम्पारन में मैंने ईश्वर का, अहिंसा का, और सत्य का साक्षात्कार किया। जब मैं इस साक्षात्कार के अपने अधिकार की जाँच करता हूँ तो मुझे लोगों के प्रति प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। इस प्रेम का अर्थ है, प्रेम अथवा अहिंसा के प्रति मेरी अविचल श्रद्धा।‘
अहिंसा व्यापक वस्तु है । हम हिंसा की होली के बीच घिरे हुए पामर प्राणी हैं। अहिंसा की तह में ही अद्वैत भावना निहित है। प्राणि मात्र में जो भेद है, तो एक के पाप का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है, इस कारण भी मनुष्य हिंसा से बिलकुल अछूता नहीं रह सकता। समाज में रहने वाला मनुष्य समाज की हिंसा में, अनिच्छा से ही क्यों न हो, साझेदार बनता है। दो राष्ट्रों के बीच युद्ध छिड़ने पर अहिंसा में विश्वास रखने वाले व्यक्ति का धर्म है कि वह युद्ध को रोके। आज सम्पूर्ण विश्व ऐसे युद्ध के ढेर पर बैठा है जिसमें  एक  चिंगारी  सम्पूर्ण विनाश  करने  के लिए काफी है। आज अपनी बात मनवाने के लिए जरा-जरा सी बात में हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। हड़ताल करना, तोड़-फोड़ करना, आगजनी करना, इन सब से नुकसान तो जनता का ही होता है। फिर जनता कोई और तो नहीं । चीजें भी किसी और की नहीं। यह सब हमारी ही चीजें हैं, हमारे ही पैसे से, इन्कम टैक्स, सेल टैक्स, रोड़ टैक्स से ही तो सरकार बनवाती है। ऐसी हिंसा से जनता की गाढी कमाई का ही अहित होता है। हर व्यक्ति यदि शांत भाव से सोचे तो समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी।
यदि राष्ट्रों के बीच अहिंसा का भाव जन्म ले तो युद्ध की संभावना ही नहीं होगी। महाविनाश स्वतः टल जाएगा।
सत्य-
अभयम् सत्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
              दानम्,दमः,च,यज्ञः,च,स्वाध्यायः,तपः,आर्जवम् अ०16,श्लोक 1
भय का सवर्था अभाव, अंतकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्वज्ञान के लिए ध्यान, योग में निरन्तर दृढस्थिति और सात्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरूजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेदशास्त्रों का पठन पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्मपालन के लिए कष्ठ सहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता।
जहाँ सत्य की ही साधना और उपासना होती है वहाँ भले परिणाम हमारी धारणा के अनुसार न निकले, फिर भी जो अनपेक्षित परिणाम होता है, वह अकल्यााणकारी नहीं होता और कई बार अपेक्षा से अधिक अच्छा होता है।‘
लोकसेवा के माध्यम से सत्य की आराधना की जा सकती है । सत्य एक विशाल वृक्ष है ज्यों-ज्यों उसकी सेवा की जाती है त्यों-त्यों उस पर नए-नए फल आते हैं  जिनका कोई अन्त नहीं । सत्य एक ऐसी खान के समान है जिसमें जितना गहरा पैठा जाए उतने ही रत्न गहराई मंे दिखाई देते हैं जिनके आलोक मंे सेवा के नए-नए मार्ग सूझ जाते हैं।
मानवीय मूल्यांे पर पूर्ण आस्था-मन को यदि वश में कर लिया जाए तो दुःखों का स्वतः नाश हो जाएगा
यो न हृष्यति ने द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स में प्रियः।।
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता ह,ै न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त पुरूष मुझको प्रिय है।
समः शत्रौ च मित्रे तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदः खेषु समः सग्ङविवर्जितः
जो शत्रु-मित्र मेें और मान अपमान में सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखदि द्वन्द्वों मंे सम है और आसक्ति से रहित है।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।
जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही सन्तुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है-वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरूष मुझको प्रिय है।
गाँधी जी ने मित्र और शत्रु दोनों का भेद मिटा दिया। उनका कहना था- पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। सम्पूर्ण जीवन त्याग और बलिदान का उदाहरण रहा। गाँधी जी के समय मेे हमारे देश मे अत्याधिक निर्धनता थी, लोगों के पास पहनने को कपड़े तक नहीं थे। चम्पारन में रहकर उन्होंने गरीबी की पराकाष्ठा देख उन्होंने यह व्रत लिया कि जब तक सम्पूर्ण देशवासियों के पास तन ढंकने के लिए वस्त्र नहीं हो जाएगंे वे सिर्फ एक धोती में ही तन को ढकूंगा। देश की आज़ादी के बाद भी उन्होंने कोई पद नहीं लिया। हिन्दु-मुस्लिम एकता, अछतुोद्धार पर जीवन भर निःस्वार्थ भाव से लगे रहे।
उनके मन में किसी प्रकार की कामना नहीं थी, वह प्राणियों के दुःखों का निवारण चाहते थे।
न त्वम् कामये राज्यम् स्वर्गम् न पुर्नभवम्।
कामये दुःख तत्वानां प्राणी नामाशाय नाशनम्।।
गीता में कहा गया है-
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मांन सृजाम्यहम्।।
जब जब धर्म की हानि और अर्धम की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।
वह परत्रन्त्रा की बेडियों में जकडी मातृभूमि को आज़ाद कराने तथा लोगों के मन में वैचारिक क्रान्ति जगाने आए थे। महात्मा गाँधी के जीवन को यदि हम यूँ कहें कि उन्होंने गीता को चरितार्थ किया तो अतिश्योक्ति न होगी। उनका जीवन दर्शन गीता का दर्शन था। 
                                    
स्नेह लता
लेखाधिकारी (उ०रे०)
1/309,विकास नगर,लखनऊ



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