( १ ) हमारे वर्तमान की त्रासदी..
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Sunday, April 4, 2021
कविताएं
हास्य व्यंग्य- -कोरोना है कि मानता नहीं
हास्य व्यंग्य-
-कोरोना है कि मानता नहीं- मदन गुप्ता सपाटू
- बुरा हो जी इस कलमुहे कोरोना का। दो साल से होली नहीं खेलने दे रहा। होली पर दूरियां मिटाई जाती हैं इसने उल्टा बढ़वा दी। इसकी मेहरबानी से मुंह पर मास्क और दो गज की दूरी । हाय ! हाय !ये मजबूरी! इस बार होली पर दो गज की दूरी से ,हमने बलम पिचकारी जो उनको मारी.....पंगा पै गया। जब हम अपनी ‘ उनको’ जल्द बाजी में रंग लगा आए तो बाद में पता चला कि जिस मास्कधारिका को रंग आए ‘वो’ , वो नहीं , उसकी मम्मी थी। हमें तो इस कोरोना के मार्च 20 टू मार्च 21 के इनडायरेक्ट इफैक्ट का अब पता चला कि कोरोना में बाबे के काढ़े ने कैसे काया कल्प करके 50 की मम्मी को 25 की टम्मी बना दिया।
कभी कभी हमारे दिल में भी ये ख़्याल आता है कि यह कोराना ही है या किसी दिलजले का दिल जो आज भी मानता ही नहीं । हर रोज किसी न किसी, नए रंग में रंग जाता है। कभी मन की लहर बन कर दूसरी तीसरी लहर की तरह लहराने लगता है। बड़ा बहरुपिया है। कुछ दिनों बाद अपना सर नेम ही बदल लेता है। हर हफ्ते टीवी पर इसका नया नाम सुनाई देता है जो अगले हफ्ते, पिछला वाला भूल जाता है। जनता का मूड देखकर वायरस अपना वेरियंट बदल लेता है।कभी दूसरी लहर बन जाता है तो कभी तीसरी । और चौथी बनकर चौथा करवाने पर तुल गया है। वैसे हमारे बहुत से पंजाबी और बंगाली भाईयों का तो आज भी यही मानना है कि कोरोना हुंदा ही नहीं । ये तो सरकारी स्टंट है। चुनाव जीतने का । अगर होता तो दिल्ली बार्डर पर क्यों नहीं दिखा ? नन्दीग्राम क्यों नहीं गया ?
जै हो कोराना बाबा। तुसीं ग्रेट नहीं, ग्रेटेस्ट हो, इतिहास में बिल्कुल लेटेस्ट हो।
तुम 16 कला संपूर्ण हो । कितने रंग बदलते हो ? 2019 में कुछ थे । इसीलिए तुम्हारे अभिभावकों ने तुम्हारा प्याला सा नाम कोविड- 19 रख दिया। जैसे बीमारी न हो कार का मॉडल हो। मैच की तरह तुम टवेंटी - टवेंटी कहलाने लगे। बड़े नटखट हो। 2021 में नया रुप धारण कर लिया। तारक मेहता का उल्टा चश्मा बन गए। बस चले जा रहे हो ...चले ही जा रहे हो । हर हफ्ते एपीसोड में नया टविस्ट आ जाता है। बड़ी पालिटिक्स खेल रहे हो। पंजाबी में बोले तो - साडडे् नाल वडड्ा वितकरा कर रहे हो। जहां तुम्हारी पसंद की सरकार नहीं , वहां तबाही मचा रहे हो। सरकारें कन्फयूज्ड हैं कि लॉक डाउन का पंगा दोबारा लिया जाए या नहीं। या यूं ही धमका धुमका के काम चल जावेगा! पंजाबी पूछ रहें है- अस्सी कोई तेरे मांह पुटटे ने ?
जहां भीड़ भड़क्का है, रैलियां है, वहां जाने से तुम्हें डर लगता है। पिस्सू पड़ जाते हैं। जो अच्छे भले लोग सोसायटियों, साफ सुथरी जगह आराम से बैठै हैं , वहां तुम उन्हें सीधे अस्पताल पहुंचा रहे हो । वैक्सीन लगवाने के बाद भी तुम गुर्रा रहे हो। कहीं ऑड - इवन का फार्मूला अपना रहे हो । संडे को जाउंगा...मंडे को नहीं। किसान रैली और चुनाव रैलियों से डर लगता है?।
खैर ! तुम्हारे कारण कई पुराने पंसारियों , पुराने वैद्यों , नए कैमिस्टों की बंद किस्मतों के ताले खटाक से खुल गए। कइयों के फटाक से बंद हो गए। पिक्चर हाल वाले अपनी बेहाली पर आज तक रो रहे हैं। बड़ी कंपनियों के हाथ अलादीन चिराग छोड़ कर खुद खेलने लगा है। वैक्सीन वैक्सीन खेल रहा है। जनता को वैक्सीन, कोवी शील्ड , फाईजर वाली, तेरी वैक्सीन - मेरी वाली ,भाजपा वाली, सजपा वाली , त्रिमूल वाली , हरी वाली या लाल वाली , किसकी वाली खेल रही हैं। मल्टी नेशनल कंपनियों को वर्क फ्राम होम का फामूर्ला हाथ लग गया है। हींग लगे न फटकड़ी रंग भी चोखा। घर ही दफ्तर , किराया कोई नहीं ।
यह अलग बात है कि बच्चे एंज्वाय कर रहे हैं। मां बाप खुश हैं कि बरखुरदार के पहले 33 परसेंट आते थे अब 93 परसेंट आ रहे हैं। लफंडर से लंफडर भी मेरिट में आ रहे हैं। वो तो दुआ कर रहे हैं- कोरोना बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ। मास्क और सेनेटाइजर वाले पार्टटाइम भैया भी यही चाहते हैं कि जुगाड़ चलता रहे।
कोरोना तुम तो बाला जी के सीरियलों से भी आगे हो गए जिसकी कहानी वही रहती हेै पर हर हफ्ते एक टविस्ट आ जाता है। हर हफ्ते तुम्हारा भी नाम बदल जाता है पर काम वही रहता है।
हां ! तुम्हारी कृपा से हर रोज फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया, अखबारों वगैरा में जाने अनजाने , कभी कभी पहचाने लोग वैक्सीन लगवाते हुए फोटो खिंचवाना नहीं भूलते। इतने गर्व से फोटो खिंचवाते हैं मानो राष्ट्र्पति उन्हें अशोका हाल में सम्मानित कर रहे हों। कई तो पूछ रहें हैं भइया फोटू खिंचवाना भूल गए ....वैक्सीन असर तो करेगी न ? बेशक आधार कार्ड ले जाना भूल जाएं पर एक अदद कैमरा मैन या मोबाइल मैन को साथ ले जाना नहीं भूलते।
बहरहाल तुम कितनी जिंदगियों का लॉकडाउन कर चुके हो। पूरी दुनिया करोड़ों के नीचे आ गई है। कब अपना मुंह काला करवाओगे ? कोरोना तुम कब जाओगे ?
-- मदन गुप्ता सपाटू, मो- 9815619620
Wednesday, November 18, 2020
गलत और भ्रामक अनुवाद हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों पर पड़ रहा भारी
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अन्य संवैधानिक संस्थाओं के मुकाबले यूपीएससी विवादों से मुक्त रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से यूपीएससी की परीक्षा पद्धति पर हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों द्वारा सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह परीक्षा हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों के लिए टेढ़ी खीर बनती जा रही है।
हिंदी अनुवाद को लेकर विवाद
दरअसल विभिन्न विषयों के प्रश्न-पत्र मूल रूप से अंग्रेजी में बनते हैं, फिर उनका हिंदी में अनुवाद किया जाता है। इन प्रश्नों के हिंदी अनुवाद को लेकर ही विवाद खड़ा हुआ है। पहले भी सामान्यतया प्रश्न-पत्र अंग्रेजी में ही बनते थे, फिर उनका हिंदी में अनुवाद होता था, लेकिन लगता है कि अनुवाद में अब तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है और इसीलिए गड़बड़ियां हो रही हैं।
अंग्रेजी की वाक्य रचना हिंदी से काफी अलग
अनुवाद में तकनीक का उपयोग कई तरीकों से हो सकता है। एक तो मशीनी या कंप्यूटराइज्ड ट्रांसलेशन, जिसे गूगल ट्रांसलेशन भी कहते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि इस अनुवाद में कई बार वाक्यों और शब्दों का सही अर्थ नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि अंग्रेजी की वाक्य रचना हिंदी से काफी अलग होती है।
अंग्रेजी वाक्यों के मशीनी ट्रांसलेशन में हिंदी में अर्थ कई बार स्पष्ट नहीं हो पाता
हिंदी की वाक्य रचना में कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रम होता है (राम घर जाता है), जबकि अंग्रेजी में कर्ता, क्रिया और कर्म (राम गोज होम)। यह उदाहरण अत्यंत सरल और छोटे वाक्य का है, इसलिए इसे समझना कठिन नहीं, लेकिन जटिल और बड़े अंग्रेजी वाक्यों के मशीनी ट्रांसलेशन में हिंदी में अर्थ कई बार स्पष्ट नहीं हो पाता, जिसका खामियाजा हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों को भुगतान पड़ता है।
शब्दों के अर्थ का अनर्थ होने की आशंका
मशीनी ट्रांसलेशन की दूसरी समस्या है कि शब्दों के अर्थ का अनर्थ होने की आशंका रहती है। इसका कारण यह है कि शब्दों के अर्थ अपनी संस्कृति और संदर्भ से भी निकलते हैं। उदाहरण के लिए कई बार अंग्रेजी के ‘बिग ब्रदर’ का अनुवाद ‘बड़ा भाई’ कर दिया जाता है।
‘बिग ब्रदर’ अंग्रेजी में नकारात्मक अर्थो में प्रयुक्त
समझना जरूरी है कि जॉर्ज ऑरवेल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘1984’ से चर्चित; हुआ मुहावरा ‘बिग ब्रदर’ अंग्रेजी में नकारात्मक अर्थो में प्रयुक्त होता है, जहां इसका अर्थ है डराने-धमकाने वाला व्यक्ति या देश, जबकि इसके उलट भारत में बड़ा भाई का प्रयोग अत्यंत सकारात्मक अर्थो में होता है।
मशीनी या गूगल अनुवाद भ्रामक हो सकता है
भारतीय संदर्भो में बड़ा भाई संरक्षक और अभिभावक होता है। कहने का आशय यह है कि हिंदी या भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय संदर्भ को ध्यान में न रखने से मशीनी या गूगल अनुवाद भ्रामक हो सकता है। इसी तरह का एक और उदाहरण है अंग्रेजी शब्द ‘हॉट पोटैटो’। इसका अर्थ होता है एक विवादास्पद विषय या असहज करने वाला विषय, लेकिन इसका गूगल ट्रांसलेशन ‘गर्म आलू’ मिलता है, जो कहीं से भी मूल अर्थ को संप्रेषित नहीं करता।
डिलीवरी शब्द का अनुवाद परिदान किया गया
अनुवाद में तकनीक के उपयोग से होने वाली गड़बड़ी का एक अन्य आयाम यह है कि यूपीएससी अथवा विभिन्न एजेंसियों के अनुवादक मानक शब्दकोशों जैसे कि गृह मंत्रलय के राजभाषा विभाग द्वारा जारी ई-महाशब्दकोश की जगह अन्य वेबसाइटों के आधार पर अनुवाद कर देते हैं। जैसे इसी साल सिविल सेवा के प्रारंभिक परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न में अंग्रेजी के डिलीवरी शब्द का अनुवाद परिदान किया गया है। राजभाषा विभाग द्वारा जारी ई-महाशब्दकोश के अनुसार इसका अर्थ वितरण या सुपुर्दगी है।
परिदान शब्द का अर्थ भी थोड़ा भ्रामक
परिदान शब्द न केवल अप्रचलित है, बल्कि इसका अर्थ भी थोड़ा भ्रामक है। इसी तरह अंग्रेजी के सिनेरियो का अनुवाद दृश्यलेख कर दिया गया है, जो सही नहीं है। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि अगर हिंदी अनुवाद गलत या भ्रामक है, तो परीक्षाíथयों को मूल अंग्रेजी पाठ देख लेना चाहिए, लेकिन प्रारंभिक परीक्षा में समय इतना कम होता है कि बार-बार हिंदी और अंग्रेजी, दोनों पाठों में मिलान करना मुमकिन नहीं।
अनुवाद में अर्थ का अनर्थ भी कर दिया जाता है
दुबरेध, अबोधगम्य और भ्रामक अनुवाद के अतिरिक्त कई बार अनुवाद में अर्थ का अनर्थ भी कर दिया जाता है। जैसे 2020 की ही प्रारंभिक परीक्षा में सिविल डिसओबेडिएंस मूवमेंट अर्थात सविनय अवज्ञा आंदोलन को असहयोग आंदोलन अनूदित कर दिया गया, जो नितांत गलत है। इन सबका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी पिछड़ते जा रहे हैं। गलत और भ्रामक अनुवाद के कारण न केवल उनके उत्तर गलत हो जाते हैं, बल्कि भ्रामक अनूदित शब्दावलियों में उलझकर परीक्षा के दौरान उनका सीमित बहुमूल्य समय भी बर्बाद होता है।
गलत अनुवाद अवसर की समानता से भी वंचित करता है
जिस कठिन परीक्षा में एक-एक अंक के लिए संघर्ष होता हो, जहां एक-एक क्षण मूल्यवान हो, वहां जटिल, भ्रामक, दुबरेध और गलत अनुवाद हिंदी माध्यम के लोगों को अवसर की समानता से भी वंचित करता है। पिछले कुछ वर्षो से हिंदी माध्यम से सफल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या में जो खासी गिरावट आई है, उसका एक बड़ा कारण इस तरह के अनुवाद भी हैं। यूपीएससी को समझना होगा कि अच्छे अनुवाद के लिए जरूरी है कि मशीनी अनुवाद का न्यूनतम सहारा लिया जाए।
अनुवादक को विषय का भी सम्यक ज्ञान हो
साथ ही अनुवाद के इस बुनियादी सिद्धांत को ध्यान में रखा जाए कि अनुवादक को न केवल दोनों भाषाओं अर्थात स्रोत भाषा (जिस भाषा से अनुवाद किया जा रहा है) और लक्ष्य भाषा (जिस भाषा में अनुवाद किया जा रहा है) का ठीक-ठाक ज्ञान हो, बल्कि विषय का भी सम्यक ज्ञान हो। भ्रामक अनुवाद से हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों के साथ अन्याय हो रहा है, जो परीक्षा के उद्देश्य के विपरीत है। भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी, यूपीएससी जैसी प्रोफेशनल संस्था से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)
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