ISSN : 2349-7521, IMPACT FACTOR - 9.0, DOI 10.5281/zenodo.14599030 (Peer Reviewed, Refereed, Indexed, Multidisciplinary, Bilingual, High Impact Factor, ISSN, RNI, MSME), Email - aksharwartajournal@gmail.com, Whatsapp/calling: +91 8989547427, Editor - Dr. Mohan Bairagi, Chief Editor - Dr. Shailendrakumar Sharma
Friday, August 14, 2020
Wednesday, August 12, 2020
हिन्दी के पाणिनि : आचार्य किशोरीदास वाजपेयी
हिन्दी के पाणिनि कहे जाने वाले आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ( 15.12.1998- 12.8.1981) का जन्म कानपुर के बिठूर के पास रामनगर नामक गांव में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा गांव में, संस्कृत की शिक्षा वृंदावन में और आगे की शिक्षा बनारस तथा पंजाब में हुई. कुछ वर्ष तक उन्होंने हिमांचल प्रदेश में अध्यापन का कार्य किया और उसके बाद वे स्वतंत्र वृत्ति से कनखल ( हरिद्वार ) में अत्यन्त आर्थिक असुविधाओं के साथ जीवनयापन करते रहे. उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा के कोश विभाग में भी कार्य किया. वाजपेयी जी अत्यंत स्वाभिमानी और अक्खड़ स्वभाव के व्यक्ति थे. निर्भीकता, स्पष्टवादिता और स्वाभिमान उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे. अपनी निर्भीकता के कारण वे "अक्खड कबीर" और स्वाभिमान के कारण "अभिमान मेरु" कहाये जाने लगे थे.
वाजपेयी जी ने खड़ी बोली हिन्दी के व्याकरण की निर्मिति में मुख्य भूमिका निभाई है. उन्होंने हिन्दी को परिष्कृत करके उसे आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाया. इसके पूर्व आधुनिक हिन्दी का प्रचलन तो हो चुका था किन्तु उसके व्याकरण का कोई सुव्यवस्थित और मानक रूप नहीं बन सका था. वाजपेयी जी ने हिन्दी को परिष्कृत भी किया और उसका मानक व्याकरण भी बनाया.
वाजपेयी जी को अपनी स्थापनाओं पर इतना विश्वास था कि वे किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते थे. पं. सकलनारायण शर्मा का एक लेख ‘माधुरी’ में छपा था जिसमें हिन्दी व्याकरण पर टिप्पणी के साथ ही हिन्दी व्याकरण सबंधी अनेक जिज्ञासाएं भी प्रकट की गई थीं. वाजपेयी जी ने उसका जवाब देते हुए ‘माधुरी’ में एक लेख लिखा जिसका हिन्दी जगत पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा और उसके बाद व्याकरणाचार्य के रूप में वे प्रतिष्ठित हो गए. वाजपेयी जी ने भाषा विज्ञान, व्याकरण, साहित्य- समालोचना एवं पत्रकारिता आदि सभी क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है. फिर भी उनकी मुख्य देन ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ ही है.
वाजपेयी जी की हिन्दी भाषा और व्याकरण संबंधी अन्य पुस्तकों में ‘ब्रजभाषा का व्याकरण’, ‘राष्ट्रीय भाषा का प्रथम व्याकरण’, ‘हिन्दी निरुक्त’, ‘हिन्दी शब्द –मीमांसा’, ‘भारतीय भाषा विज्ञान’, ‘हिन्दी की वर्तनी तथा शब्द विश्लेषण’, ‘ब्रजभाषा का प्रौढ़ व्याकरण’, ‘अच्छी हिन्दी’, ‘अच्छी हिन्दी का नमूना’, सरल शब्दानुशासन, राष्ट्रभाषा का इतिहास, ‘लेखन कला’, ‘साहित्य- निर्माण की शिक्षा’, ‘साहित्य मीमांसा’ ‘संस्कृति का पांचवां अध्याय’, आदि प्रमुख हैं.
‘हिन्दी शब्दानुशासन’ उनकी सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित पुस्तक है. इसकी पूर्वपीठिका में हिन्दी की उत्पत्ति, विकास-पद्धति, प्रकृति और विकास आदि के अतिरिक्त नागरी लिपि, खड़ी बोली का परिष्कार आदि पर बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से विचार किया गया है। पूर्वार्ध के सात अध्यायों में वर्ण, शब्द, पद, विभक्ति, प्रत्यय, संज्ञा, सर्वनाम, लिंग-व्यवस्था, अव्यय, उपसर्ग, यौगिक शब्दों की प्रक्रियाएं, कृदंत और तद्धित शब्द व समास, क्रिया-विशेषण, वाक्य संरचना, वाक्य भेद, पदों की पुनरुक्ति, विशेषणों के प्रयोग, भावात्मक संज्ञाओं और विशेषण आदि पर विचार किया गया है.
उत्तरार्द्ध में कुल पाँच अध्याय हैं. इसमें क्रिया से जुड़े तत्वों, उपधातुओं के भेद, संयुक्त क्रियाएँ, नामधातु और क्रिया की द्विरुक्ति का विवेचन है. इसके परिशिष्ट में हिन्दी की बोलियाँ और उनमें एकसूत्रता आदि का विश्लेषण है. इसमें राजस्थानी, ब्रजभाषा, कन्नौजी या पाञ्चाली, अवधी, भोजपुरी (मगही) और मैथिली बोलियों के विभिन्न अवयवों पर विचार किया गया है. इसके अलावा इसमें पंजाबी भाषा एवं व्याकरण और भाषाविज्ञान पर भी विचार किया गया है.
सबसे पहले वाजपेयी जी ने ही घोषित किया कि हिन्दी एक स्वतंत्र भाषा है. वह संस्कृत से अनुप्राणित अवश्य है किन्तु अपने क्षेत्र में वह सार्वभौम सत्ता रखती है. यहां उसके अपने नियम कानून लागू होते हैं.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार अभी तक हिन्दी के जो व्याकरण लिखे गए, वे प्रयोग निर्देश तक ही सीमित हैं. “हिन्दी शब्दानुशासन” में पहली बार व्याकरण के तत्वदर्शन का स्वरूप स्पष्ट हुआ है.
‘ब्रजभाषा व्याकरण’ नामक वाजपेयी जी की पुस्तक भी बहुत महत्वपूर्ण है. इसमें केवल व्याकरण ही नहीं, ब्रजभाषा के उद्भव, विकास और उसके स्वरूप का भी गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की स्थापनाओं में से एक महत्वपूर्ण स्थापना यह भी है कि भारतीय आर्यभाषाओं का विकास संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश के क्रमिक विकास के रूप में (वंशवृक्ष की तरह) नहीं हुआ है और न तो संस्कृत, सारी भारतीय आर्यभाषाओं की जननी ही है. वास्तव में भाषाओं का विकास नदी की धारा की तरह होता है जैसे गंगा के समुद्र में मिलने से पूर्व मार्ग में बहुत सी छोटी बड़ी नदियां मिलती जाती है, उसी तरह से छोटी- छोटी भाषाएं भी बड़ी भाषाओं में समाहित होती जाती हैं. दुनिया में भाषाएं सिर्फ मर रही हैं. समाज के ऐतिहासिक विकास-क्रम में लघु जातियों की भाषाएं महाजातियों की भाषाओं में समाहित होती जाती हैं. रामविलास शर्मा ने अपनी स्थापना की पुष्टि में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को उद्धृत किया है. वे लिखते हैं,
“1953 में प्रकाशित एक लेख में मैने संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश वाली मंजिलों का विरोध किया था. इस सिलसिले में श्री नामवर सिंह ने अपने गवेषणापूर्ण ग्रंथ ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ में लिखा है, “ किन्तु कुछ विद्वानों को भारतीय आर्यभाषा के विकास में संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश वगैरह इतनी मंजिलें गिनाना असंगत प्रतीत होता है.” डॉ. चाटुर्ज्या से जो उद्धरण पहले दिए गए हैं, उनसे स्पष्ट है कि इन मंजिलों की असंगति स्वीकृत पद्धति के भाषा- वैज्ञानिकों को भी मालूम हुई है. श्री किशोरीदास वाजपेयी ने अपने ग्रंथ हिन्दी शब्दानुशसन में इस मंजिल को स्वीकार नहीं किया. इस दोनो विद्वानों के ग्रंथ पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा और भी दृढ़ हो गयी कि यह मंजिलों की कल्पना अवैज्ञानिक है.“ ( भाषा और समाज, पृष्ठ-203)
भाषा विज्ञान और व्याकरण के अलावा भी साहित्यशास्त्र सहित दूसरे विविध विषयों पर उनकी अनेक आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं. इनमें ‘काव्य प्रवेशिका’, ‘साहित्य की उपक्रमणिका’, ‘काव्य में रहस्यवाद’, ‘रस और अलंकार’, ‘साहित्य प्रवेशिका’, ‘अलंकार मीमांसा’, ‘आचार्य द्विवेदी और उनके संगी साथी’, ‘साहित्यिक जीवन के संस्मरण’, ‘वैष्णव धर्म और आर्य समाज’, ‘वर्ण व्यवस्था और अछूत’, ‘स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री सुभाषचंद्र बोस’, ‘राष्ट्रपिता लोकमान्य तिलक’, ‘कांग्रेस का संक्षिप्त इतिहास’, ‘मानव धर्म मीमांसा’, ‘मेरे कुछ मौलिक विचार’, ‘संस्कृत शिक्षण कला और अनुवाद विषय’ आदि प्रमुख है.
व्याकरणाचार्य के साथ- साथ किशोरीदास वाजपेयी एक सुधी समीक्षक भी थे. ‘बिहारी सतसई और उसके टीकाकार’ लेखमाला के प्रकाशित होने के बाद एक सुधी आलोचक के रूप में भी उनकी पहचान हो गई थी. उन्होंने ‘तरंगिणी’ में ओजस्वी कविताएं भी लिखीं जिसके कारण उन्हे जेल भी जाना पड़ा था.
आचार्य वाजपेयी की पुस्तक ‘भारतीय भाषाविज्ञान की भूमिका’ में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है, “आचार्य वाजपेयी हिन्दी के व्याकरण और भाषा विज्ञान पर असाधारण अधिकार रखते हैं. वे मानो इन्ही दो विधाओं के लिए पैदा हुए हैं....... मेरा बस चलता तो वाजपेयी जी को अर्थचिन्ता से मुक्त करके, उन्हें सभी हिन्दी (आर्य भाषा वाले) क्षेत्रों में शब्द-संचय और विश्लेषण के लिए छोड़ देता. उन पर कोई निर्बंध (कार्य करने की मात्रा) न रखता. जिसके हृदय में स्वत: निर्बंध है, उसे बाहर के निर्बंध की आवश्यकता नहीं.”
विष्णुदत्त राकेश ने ‘आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रंथावली’ का छह खण्डों में संपादन किया है.
12 अगस्त 1981 को कनखल ( हरिद्वार) में इस महान वैयाकरण का निधन हो गया. उनकी पुण्यतिथि पर हम हिन्दी भाषा, साहित्य और समाज क क्षेत्र में उनके महान योगदान का स्मरण करते हैं और श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.
( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)
हिन्दी साहित्य का इतिहास : अध्ययन की नयी दृष्टि
तीसरा व्याख्यान : गाँधीवाद और हिन्दी साहित्य - राजीव रंजन गिरि
चौथा व्याख्यान : मार्क्सवाद और हिन्दी साहित्य - वैभव सिंह
वाणी डिजिटल : शिक्षा शृंखला और प्रभाकर सिंह, बीएचयू वाराणसी की ओर से आयोजित हिन्दी साहित्य का इतिहास : अध्ययन की नयी दृष्टि, विचारधारा और विमर्श का दूसरा पड़ाव में चौथे व्याख्यान का आरम्भ हुआ।
हिन्दी साहित्य का इतिहास : अध्ययन की नयी दृष्टि, विचारधारा और विमर्श व्याख्यानमाला के तीसरे व्याख्यान में "गाँधीवाद और हिन्दी साहित्य" विषय पर युवा आलोचक और गाँधीवादी समीक्षक राजीव रंजन गिरि ने कई प्रमुख बातें कीं। गाँधीवाद पर बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि गाँधीजी ख़ुद गाँधीवाद जैसी चीज़ को स्वीकार नहीं करते थे। गाँधीजी के अनुसार वाद एक निकम्मी चीज़ है। ‘हरिजन’ पत्रिका में गाँधी जी ने अपने लेखों के माध्यम से यह बताया कि सत्य के लिए विचारों का ग्रहण और त्याग ज़रूरी है। वह अपने विचारों को समय के साथ बदलने और अग्रसर होने के हिमायती थे। गाँधी के विचारों का इन्द्रधनुषी रूप अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ,शरीर, श्रम, भय वर्जन आदि से मिलकर बनता है। हिन्दी साहित्य में दूसरे और तीसरे दशक में गाँधी जी पर ख़ूब लिखा गया। विश्व साहित्य में फ्रांसीसी लेखक रोमा रोला और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाँधी जी के ऊपर लिखा। बीसवीं सदी के गाँधी उन विरल लोगों में से हैं जिनके ऊपर ख़ूब लिखा गया। कविता में माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, पन्त, दिनकर, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, हरिवंश राय बच्चन से होते हुए समकालीन कवि अरुण कमल और लीलाधर मंडलोई ने उन पर बेहतरीन कविताएँ लिखी। प्रेमचंद तो गाँधी जी से अपना रिश्ता जोड़ते हुए कहते हैं मैं तो गाँधी का कुदरती चेला हूँ। 'रंगभूमि' का सूरदास गाँधीवादी चेतना से युक्त नायक है। महादेवी वर्मा के गद्य में भी गांधीवाद का प्रभाव है। फणीश्वर नाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ और गिरिराज किशोर के ‘पहला गिरमिटिया’ में गाँधी के विचारों का प्रभाव है। आज़ादी के बाद भारत के आंतरिक उपनिवेशन की प्रक्रिया पर कई विचारकों और समाजशास्त्रियों ने गांधी को प्रासंगिक माना। नई सदी में गांधी का विचार नये रूप में विकसित हो रहा है। गाँधी अपने दुख में सब का दुख देखते थे और सत्य के उस रूप की हिमायत करते थे जो समय के अनुकूल हो और सर्वजन हिताय हो।
चौथा व्याख्यान : मार्क्सवाद और हिन्दी साहित्य - वैभव सिंह
वाणी डिजिटल मंच की ओर से आयोजित हिन्दी साहित्य का इतिहास : अध्ययन की नई दृष्टि विचारधारा और विमर्श व्याख्यानमाला का चौथा व्याख्यान चर्चित युवा आलोचक वैभव सिंह ने दिया। "मार्क्सवाद और हिन्दी साहित्य" विषय पर बोलते हुए वैभव जी ने मार्क्सवाद की व्याप्ति के बारे में बताया कि हिन्दी में बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मार्क्सवाद का आगमन होता है। मार्क्सवाद ने साहित्य पर दो रूपों में असर डाला। एक ओर साहित्यिक संगठन में इसका स्वरूप दिखाई देता है, दूसरे रचनाकारों और रचनाओं में यह सृजनात्मक रूप से दर्ज होता है। दूसरा रूप ज़्यादा महत्वपूर्ण है। यों मार्क्सवाद को जिन साहित्यकारों ने जीवन संदर्भों के साथ जोड़कर और विकसित दृष्टि के साथ ग्रहण किया उनकी रचनाओं में मार्क्सवाद का सार्थक रूप दिखाई देता है। हिन्दी साहित्य में मार्क्सवाद की उपस्थिति कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना सभी जगह दिखाई देती है । हिन्दी में जिन रचनाकारों के ऊपर मार्क्सवाद का असर सबसे अधिक है उनमें प्रेमचंद, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा का नाम लिया जा सकता है। यों प्रगतिशील कविता और साहित्य में तो मार्क्सवाद है ही लेकिन मार्क्सवाद अपनी जन पक्षधर छवि के साथ प्रयोगवाद, नई कविता और समकालीन कविता में भी दिखाई देता है । यहां तक कि अस्मितामूलक विमर्श में जो जनपक्ष की आवाज है उसका मार्क्सवाद से गहरा रिश्ता है। साहित्य में मार्क्सवाद एक विचारधारा की तरह विकसित हुआ है । समय के साथ परिवर्तित यथार्थ की छवियों के साथ मार्क्सवाद की छवि में भी परिवर्तन आया है। हिन्दी में बहुत से साहित्यकारों ने अपने स्थानीय परिवेश के साथ मार्क्सवाद से अपना रिश्ता कायम किया। यहाँ तक कि उत्तर आधुनिकता जैसे वैचारिक मूल्य में भी मार्क्सवाद की उपस्थिति को देखा जा सकता है। मार्क्सवाद एक साथ स्थानीय और सार्वभौमिक अथवा वैश्विक दोनों के महत्त्व को विकसित करने की बात करता है । साहित्य में उत्तर आधुनिकता को लेकर जो बौद्धिक घोटाला चल रहा है उसके समानान्तर मार्क्सवाद के साहित्यिक टूल्स हमारे साहित्य और समाज को अधिक प्रासंगिक और जन पक्षधर बनाते हैं। मार्क्सवाद के साहित्यालोचन को टेरी ईगल्टन, लुकास और फ्रेडरिक जेमसन जैसे विचारकों ने अधिक ज़मीनी रूप में विकसित किया है यों साहित्य में मार्क्सवाद की अति से भी हमें बचना चाहिए। वह साहित्यकार जो जीवन की गहरी संवेदना के साथ जुड़कर मार्क्सवाद से रिश्ता कायम करता है वह मार्क्सवाद को बेहतर साहित्यिक रूप में रूपांतरित कर पाता है।
वाणी प्रकाशन के बारे में...
वाणी प्रकाशन, ग्रुप 57 वर्षों से 32 साहित्य की नवीनतम विधाओं से भी अधिक में, बेहतरीन हिन्दी साहित्य का प्रकाशन कर रहा है। वाणी प्रकाशन, ग्रुप ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और ऑडियो प्रारूप में 6,000 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। वाणी प्रकाशन ने देश के 3,00,000 से भी अधिक गाँव, 2,800 क़स्बे, 54 मुख्य नगर और 12 मुख्य ऑनलाइन बुक स्टोर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है।
वाणी प्रकाशन, ग्रुप भारत के प्रमुख पुस्तकालयों, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, ब्रिटेन और मध्य पूर्व, से भी जुड़ा हुआ है। वाणी प्रकाशन की सूची में, साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत 25 पुस्तकें और लेखक, हिन्दी में अनूदित 9 नोबेल पुरस्कार विजेता और 24 अन्य प्रमुख पुरस्कृत लेखक और पुस्तकें शामिल हैं। वाणी प्रकाशन को क्रमानुसार नेशनल लाइब्रेरी, स्वीडन, रशियन सेंटर ऑफ आर्ट एण्ड कल्चर तथा पोलिश सरकार द्वारा इंडो, पोलिश लिटरेरी के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध विकसित करने का गौरव सम्मान प्राप्त है। वाणी प्रकाशन ने 2008 में ‘Federation of Indian Publishers Associations’ द्वारा प्रतिष्ठित ‘Distinguished Publisher Award’ भी प्राप्त किया है। सन् 2013 से 2017 तक केन्द्रीय साहित्य अकादेमी के 68 वर्षों के इतिहास में पहली बार श्री अरुण माहेश्वरी केन्द्रीय परिषद् की जनरल काउन्सिल में देशभर के प्रकाशकों के प्रतिनिधि के रूप में चयनित किये गये।
लन्दन में भारतीय उच्चायुक्त द्वारा 25 मार्च 2017 को ‘वातायन सम्मान’ तथा 28 मार्च 2017 को वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक व वाणी फ़ाउण्डेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी को ऑक्सफोर्ड बिज़नेस कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में ‘एक्सीलेंस इन बिज़नेस’ सम्मान से नवाज़ा गया। प्रकाशन की दुनिया में पहली बार हिन्दी प्रकाशन को इन दो पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। हिन्दी प्रकाशन के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना मानी जा रही है।
3 मई 2017 को नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘64वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समारोह’ में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा ‘स्वर्ण-कमल-2016’ पुरस्कार प्रकाशक वाणी प्रकाशन को प्रदान किया गया। भारतीय परिदृश्य में प्रकाशन जगत की बदलती हुई ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन, ग्रुप ने राजधानी के प्रमुख पुस्तक केन्द्र ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर के साथ सहयोग कर ‘लेखक से मिलिये’ में कई महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम-शृंखला का आयोजन किया और वर्ष 2014 से ‘हिन्दी महोत्सव’ का आयोजन सम्पन्न करता आ रहा है।
वर्ष 2017 में वाणी फ़ाउण्डेशन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के साथ मिलकर हिन्दी महोत्सव का आयोजन किया। व वर्ष 2018 में वाणी फ़ाउण्डेशन, यू.के. हिन्दी समिति, वातायन और कृति यू. के. के सान्निध्य में हिन्दी महोत्सव ऑक्सफोर्ड, लन्दन और बर्मिंघम में आयोजित किया गया ।
‘किताबों की दुनिया’ में बदलती हुई पाठक वर्ग की भूमिका और दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन ने अपनी 51वी वर्षगाँठ पर गैर-लाभकारी उपक्रम वाणी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की। फ़ाउण्डेशन की स्थापना के मूल प्रेरणास्त्रोत सुहृदय साहित्यानुरागी और अध्यापक स्व. डॉ. प्रेमचन्द्र ‘महेश’ हैं। स्व. डॉ. प्रेमचन्द्र ‘महेश’ ने वर्ष 1960 में वाणी प्रकाशन की स्थापना की। वाणी फ़ाउण्डेशन का लोगो विख्यात चित्रकार सैयद हैदर रज़ा द्वारा बनाया गया है। मशहूर शायर और फ़िल्मकार गुलज़ार वाणी फ़ाउण्डेशन के प्रेरणास्रोत हैं।
वाणी फ़ाउण्डेशन भारतीय और विदेशी भाषा साहित्य के बीच व्यावहारिक आदान-प्रदान के लिए एक अभिनव मंच के रूप में सेवा करता है। साथ ही वाणी फ़ाउण्डेशन भारतीय कला, साहित्य तथा बाल-साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय शोधवृत्तियाँ प्रदान करता है। वाणी फ़ाउण्डेशन का एक प्रमुख दायित्व है दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा हिन्दी को यूनेस्को भाषा सूची में शामिल कराने के लिए विश्व स्तरीय प्रयास करना।
वाणी फ़ाउण्डेशन की ओर से विशिष्ट अनुवादक पुरस्कार दिया जाता है। यह पुरस्कार भारतवर्ष के उन अनुवादकों को दिया जाता है जिन्होंने निरन्तर और कम से कम दो भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक और भाषाई सम्बन्ध विकसित करने की दिशा में गुणात्मक योगदान दिया है। इस पुरस्कार की आवश्यकता इसलिए विशेष रूप से महसूस की जा रही थी क्योंकि वर्तमान स्थिति में दो भाषाओं के मध्य आदान-प्रदान को बढ़ावा देने वाले की स्थिति बहुत हाशिए पर है। इसका उद्देश्य एक ओर अनुवादकों को भारत के इतिहास के मध्य भाषिक और साहित्यिक सम्बन्धों के आदान-प्रदान की पहचान के लिए प्रेरित करना है, दूसरी ओर, भारत की सशक्त परम्परा को वर्तमान और भविष्य के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित करना है।
वाणी फ़ाउण्डेशन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है भारतीय भाषाओं से हिन्दी व अंग्रेजी में श्रेष्ठ अनुवाद का कार्यक्रम। इसके साथ ही इस न्यास के द्वारा प्रतिवर्ष डिस्टिंगविश्ड ट्रांसलेटर अवार्ड भी प्रदान किया जाता है जिसमें मानद पत्र और एक लाख रुपये की राशि अर्पित की जाती हैं। वर्ष 2018 के लिए यह सम्मान प्रतिष्ठित अनुवादक, लेखक, पर्यावरण संरक्षक तेजी ग्रोवर को दिया गया है।
Tuesday, August 11, 2020
विज्ञान एवं अध्यात्म के माध्यम से तनाव मुक्ति पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, गृह मंत्रालय, भारत सरकार एवं दादा रामचंद बाखरू सिंधु महाविद्यालय का संयुक्त उपक्रम देश के लगभग हर राज्य से प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया
विज्ञान एवं अध्यात्म के माध्यम से तनाव मुक्ति पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, गृह मंत्रालय, भारत सरकार एवं दादा रामचंद बाखरू सिंधु महाविद्यालय का संयुक्त उपक्रम
देश के लगभग हर राज्य से प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया
नागपुर। किसी भी तरह की आपदा हो उसका सर्वाधिक विपरीत प्रभाव बच्चों पर ही पड़ता हैं, कोविड -19 की इस अभूतपूर्व विकट स्थिति के दौरान सामने आई सभी अद्वितीय चुनौतियों पर चर्चा करने एवं उनसे निपटने के उद्देश्य से तथा इन परिस्थितियों की वजह से लोगों में उत्पन्न तनाव को विज्ञान एवं अध्यात्म दोनों का एक साथ प्रयोग कर कैसे कम किया जा सकता है, इन विषयों पर चर्चा हेतु बाल केन्द्रित आपदा जोखिम न्यूनीकरण (सीसीडीआरआर) केंद्र, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, गृह मंत्रालय, भारत सरकार एवं दादा रामचंद बाखरू सिंधु महाविद्यालय, नागपुर के संयुक्त तत्वावधान में दि. 08/08/2020 को एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार "विज्ञान एवं अध्यात्म के माध्यम से तनाव मुक्ति - बच्चें, शिक्षक एवं पालकों के सन्दर्भ में" का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का आयोजन एनआईडीएम के कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल मनोजकुमार बिंदल एवं सिंधी हिंदी विद्या समिती के अध्यक्ष श्री एच.आर. बाखरू के मुख्य संरक्षण में किया गया. वेबिनार का उदघाटन करते श्री एच.आर. बाखरू ने आयोजन की आवश्यकता एवं उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विज्ञान एवं अध्यात्म के संगम से लोगो को तनाव से निश्चित रूप से राहत प्राप्त हो सकेगी. मुख्य वक्ता आर्ट ऑफ़ लिविंग के वरिष्ठ शिक्षक एवं जाने-माने प्रेरक वक्ता श्री नीरज अग्रवाल ने कहा कि विज्ञान एवं अध्यात्म हमेशा एक दुसरे के पूरक रहें हैं, दोनों में कभी किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं रहा हैं. किसी समस्या से निपटने के लिए यदि विज्ञान एवं अध्यात्म दोनों का सहारा लिया जाए तो समस्या को जड़ से समाप्त किया जा सकता है. श्री नीरज अग्रवाल ने जीवन के सात स्तर, ध्यान, योग एवं आहार-विहार मानव के अंतर्मन पर किस तरह से प्रभाव डालते है तथा इनके संतुलन से मानसिक तनाव को कैसे कम किया जा सकता हैं इस बारे में विस्तार से मार्गदर्शन किया. दुसरे सत्र की वक्ता मनोवैज्ञानिक सलाहकार कु. नम्रता शर्मा ने तनाव प्रबंधन हेतु विभिन्न तकनीकों को बड़ी सरलता से समझाया. इस अवसर पर कार्यक्रम के प्रेरणा स्त्रोत प्रो. संतोषकुमार, एनआईडीएम, सिंधी हिंदी विद्या समिती के चेयरमैन डॉ. विंकी रूघवानी एवं महासचिव डॉ. आई.पी. केसवानी ने भी विशेष रूप से मार्गदर्शन किया. वेबिनार का आयोजन डीआरबी सिंधू महाविद्यालय के कार्यकारी प्राचार्य डॉ. संतोष कसबेकर के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ. वेबिनार में देश के लगभग हर राज्यों से प्रतिनिधियों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लेकर लाभ प्राप्त किया। वेबिनार संयोजक डॉ. कुमार राका, कार्यक्रम अधिकारी, सीसीडीआरआर, एनआईडीएम एवं वेबिनार संयोजक श्री नवीन महेशकुमार अग्रवाल, रजिस्ट्रार, दादा रामचंद बाखरू सिंधू महाविद्यालय ने वेबिनार का संचालन किया. कार्यक्रम की सफलता हेतु एनआईडीएम एवं डीआरबी सिंधू महाविद्यालय के सभी सदस्यों ने प्रयास किया.
Monday, August 10, 2020
कविताएं सिर्फ शब्द नहीं हैं..
बदलता हुआ वक्त
वक्त के पन्नों पर
सब कुछ बदल जाएगा
जो लिखा है नसीब में
वो भी मिल जाएगा।
सोचा न था जो कभी
वो भी कुछ-कुछ
खोकर मिल ही जाएगा।
संभाल सकते हो तो
संभाल लेना उस वक्त को
जो खोने वाला है।
क्योंकि खोए हुए
वक्त के साथ
अपने भी खो जाते हैं
और पराए भी
अपने बन जाते हैं।
मगर याद रखना
बदलते हुए
वक्त के साथ
तुम भी बदल मत जाना,
पकड़ा है
जो हाथ हमारा
छोड़ कर किसी और के
न हो जाना ।
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
आंधे की माक्खी राम उड़ावै हमारी बोलचाल, प्यार, उलाहनों और कहावतों में रचे बसे है श्रीराम
हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ हिम्मत सिंह के अनुसार हरियाणा के आम जनमानस में बरसात होने पर रामजी खूब बरस्या या बरसात न होने पर रामजी बरस्या कोनी का उलाहना सुनने को मिलेगा। किसी से अच्छा प्यार-पहचान जताने के लिए उस गेल्यो बढ़िया राम-राम है या अनजानापन जताने के लिए उसतै तो मेरी राम-राम बी कौना, इस्तेमाल करते हैं। यहां सांग में राम के प्रसंग जुड़े हैं तो भजनों में भी राम का जिक्र मिलता है। लाड्डू राम नाम का खाले नै हो ज्यागा कल्याण.. या मनै इब कै पिलशन मिल जा मैं तो ल्याऊ राम की माला... जैसे हरियाणवी भजन हिट रहे हैं। किसी को सांत्वना देने के लिए राम भली करैगा या आंधे की माक्खी राम उड़ावै जैसी कहावतें हैं।
रामायण पर चार पीएचडी करवा चुके 90 वर्षीय डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा कहते हैं कि सन् 1999 तक हिंदी भाषी क्षेत्रों में राम व रामायण पर 150 से ज्यादा शोध थे। अब इनकी संख्या 250 से ज्यादा होगी। गैर हिंदी प्रदेशों में भी काफी शोध हुए हैं। हरियाणा व हिंदी भाषी क्षेत्र में राम के लोकजीवन में रचने बसने का श्रेय कई संतों व कवियों और आर्य समाज को जाता है। कबीर को निम्न जाति का मानते हुए उस काल में मंदिरों में नहीं जाने देते थे। तब कबीर ने राम को निर्गुण मानते हुए प्रचार किया।
पहले आदि कवि वाल्मीकि, संत रविदास, नामदेव ने निर्गुण रूप का प्रचार किया। हरियाणा में आर्य समाज का काफी प्रभाव रहा है और आर्य समाज ने राम को आदर्श पुरुष माना है। प्रदेश में कबीरपंथ का प्रचार करने के लिए डेरे भी हैं। कबीर के दोहों में रा को छत्र और म को माथे की बिंदी माना है। यानी सभी को रक्षा व सम्मान का प्रतीक माना है। हरियाणा के पुराने सांगों में राम के प्रसंगों का खूब जिक्र होता रहा है, इस वजह भी पीढ़ी दर पीढ़ी राम की असर जनमानस है, जबकि कुरुक्षेत्र जैसी धर्मनगरी समेत प्रदेश में कहीं भी श्रीराम के प्राचीन मंदिर नहीं हैं।
हरियाणा के डॉ. रोहताश ने राम व रामायण पर दो शोध किए हैं। एक रामराज्य की कल्पना व दूसरा रामायण में नैतिक मूल्य व राजनीतिक दर्शन पर है। राजनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली आया राम-गया राम की कहावत भी हरियाणवी राजनीति से निकली है। जब 1967 में एक विधायक ने एक ही दिन में 3 बार में दल-बदल किया था। हरियाणा के गांव मुंदडी में लव-कुश ने रामायण कंठस्थ की थी और सीवन गांव में माता सीता समाई थी
कैथल दडी में भगवान राम व सीता के पुत्रों लव-कुश ने महर्षि वाल्मीकि से इसी तीर्थ पर रामायण को कंठस्थ कर दिया था, जिसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने मौन धारण कर दिया था। इससे ही गांव का नाम मुंदडी हो गया। इस तीर्थ पर शिव, हनुमान व लव-कुश के मंदिर हैं। मंदिर के गर्भगृह की भित्तियों पर राम, लक्ष्मण को कंधे पर बैठाए हुए हनुमान, गोपियों के साथ कृष्ण, रासलीला व गणेश इत्यादि के चित्र बने हुए हैं। नारद पुराण के अनुसार चैत्र मास की चतुर्दशी को इस तीर्थ में स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मंदिर के सरोवर की खुदाई से कुषाणकाल (प्रथम-द्वितीय शती ई.) से लेकर मध्यकाल 9-10वी शती ई. के मृदपात्र एवं अन्य पुरावशेष मिले थे। जिससे इस तीर्थ की प्राचीनता सिद्ध होती है। यहां महर्षि वाल्मीकि संस्कृत यूनिवर्सिटी भी बनाई जा रही है।
वहीं, कैथल के गांव सीवन या शीतवन को जनमानसे जनकनंदिनी सीता जी से संबंधित मानती है। प्रचलित विश्वास के अनुसार सीता इसी स्थान पर धरती में समा गई थीं। इसीलिए इस तीर्थ को स्वर्गद्वार के नाम से भी जाना जाता है। इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत एवं वामन पुराण के अतिरिक्त पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण, कूर्म पराण, नारद पुराण तथा अग्नि पुराण में भी पाया जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि यही शीतवन अपभ्रंश हो कर परवर्ती काल में सीतवन के नाम से विख्यात हो गया। वामन पुराण में इस तीर्थ को मातृतीर्थ के पश्चात् रखा गया है।
राममंदिर आंदोलन के पलों को हरियांवासी कभी भूल नहीं सकते, जब गांव-गांव राममंदिर के लिए रामशिलाएं आई और देश के असंख्य लोग कारसेवा के लिए अवधपुरी की तरफ कूच कर गए थे। आधुनिक भारत का राममंदिर सत्य, अहिंसा और न्यायप्रिय भारत की अनुपम भेंट है। देश के प्रधानमंत्री के अनुसार यह सर्वसत्य है कि यह मंदिर तप, त्याग और संकल्प का प्रतीक बनेगा। ये शाश्वत मंदिर आस्था और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा। वास्तव में हमें जब भी कोई काम करना हो तो हम भगवान राम की ओर देखते हैं। भगवान राम की जय बोलते हैं। राम हमारे मन में बसे हैं। राम हमारी संस्कृति के आधार हैं।
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