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Monday, August 10, 2020

   हम न मरैं मरिहैं संसारा : कबीर

       किसी व्यक्ति को कमज़ोर करना हो तो उसका चारित्रिक हनन कर दिया जाय, व्यक्ति खुद गिर जाएगा। जिसका नैतिक मूल्य ही निराधार हो, जिसके बारे में सिर्फ अफ़वाह फैलाई जा रही हो, जहाँ उसका इतिहास इस तरह से पेश किया जा रहा हो जो केवल किवदंती मात्र बनकर रह जाए, वैज्ञानिकता का दूर- दूर तक कोई संबंध ही न हो, उसकी बात कोई क्यों मानेगा! सांस्कृतिक बनावट किसी भी विचारधारा की रीढ़ होती है जिसके आधार पर वह टिका रहता है, यही काम हुआ कबीर के मरने के बाद। कबीर अपने समय के एक ऐसे युगदृष्टा थे जिन्होंने समाज के उपेक्षित वर्गों की लड़ाई लड़ी, उन्हें सही राह दिखाने की कोशिश की, सही और ग़लत में फ़र्क देखने का नज़रिया विकसित किया, जो एक सच्चे सामाजिक नागरिक होने का फ़र्ज़ निभा रहे थे, उनके बारे में हमें आज अगर कुछ पता है तो सिर्फ़ अफ़वाफ। उनके जन्म, मृत्यु, संप्रदाय एवं गुरु सब कुछ अफवाहों के आधार पर पेश किया गया। यह बात यहीं नहीं रुकी, कबीर को समझने की जो सबसे ज़रूरी और अहम मुद्दा है उनकी रचनाएं उन्हें तक नहीं छोड़ा गया, जिसमें कबीर के नाम से क्या- क्या नहीं लिखा गया। कभी 'कबीरा' और 'होरी' के नाम पर अश्लीलता फैलाई जा रही है तो कभी उनको वैष्णव धर्म और रामानंद का शिष्य बताया गया, कबीर के नाम से कई ऐसे दोहे बनाए गए जो कबीर के चरित्र को पूरी तरह से शंशय में डाल देते हैं जिसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। बचपन से हम एक ऐसे महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ अफ़वाह सुनते अा रहे हैं जिसका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी से हुआ, जिसको रामानंद ने आशीर्वाद दिया था। यह बात एक ऐसे साहित्यकार ने लिख कर घोषित कर दिया जिसको पहली बार एक मुकम्मल हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का गौरव प्राप्त है। जब हम चरित्रों के बारे में जानना शुरू किए उस उम्र में इस महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ कपोल कल्पना परोसी गई है। यह ज्ञान यहीं नहीं रुका है बल्कि विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं तक यही मान्यता प्रचलित है और उसी के आधार पर छात्रों और नौजवानों का भविष्य तय किया जाता है।
             जिस कबीर के बारे में ब्रिटेन के अखबारों में १८१२ में ही चर्चा शुरू हो गई और १८४१ तक उनके बारे में गंभीरता पूर्वक लेख प्रकाशित होने लगे थे, उसी कबीर के बारे में उनके अपने देश के लोगों ने बहुत देर में जानने का प्रयास किया। सबसे पहला प्रयास श्यामसुंदर दास ने कबीर की मूल हस्तलिपियों के आधार पर 'कबीर ग्रंथावली' के माध्यम से १९२८ में किया जिनमें कबीर के दोहे सम्मिलित हैं, लेकिन कबीर के व्यक्तित्व से संबंधित किसी मुकम्मल किताब के आने में और भी समय लगा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने १९४० में 'कबीर' लिखा। इन दोनों लेखकों ने आम जन के बीच कबीर के प्रति जागरूकता पैदा की और अलोचकीय दृष्टि से उनका विश्लेषण किया, लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ बातों को उन्होंने अपने पूर्वर्ती साहित्य इतिहासकार से ही स्वीकार कर ली, उदारहरण के लिए उनका पंथ वैष्णव संप्रदाय का होना। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का 'हिंदी साहित्य का इतिहास' एक ऐसा ग्रंथ है जिसके आधार पर कई परवर्ती आलोचकों और इतिहासकारों ने उनके दिए गए उद्धरण को सहर्ष स्वीकार कर लिया, खुद से उन पर विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई। कबीर से संबंधित सबसे तार्किक लेखन हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद अगर किसी ने किया है तो वह हैं डॉ. धर्मवीर। डॉ. धर्मवीर ने कबीर पर कई किताबें लिखी और उनके सत्य को तलाशने की कोशिश की। इससे पहले १९१५ में कबीर के सौ दोहों का अंग्रेजी अनुवाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'कबीर्स पोयम्स' नाम से किया। हालांकि उसमें कबीर के कुछ दोहे प्रक्षिप्त बताए जाते हैं, लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति कबीर के उन्हीं दोहों की वजह से हुई। तत्कालीन ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों में रविन्द्र नाथ टैगोर की साहित्यिक दुनिया में खूब चर्चा हुई, इसमें मिस इवेलिन अंडरहिल और मैकमिलन का सहयोग रहा। 
           आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी किताब 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (पृष्ठ ४९) में कबीर के बारे में लिखा है - "कहते हैं कि आरम्भ से ही कबीर में हिन्दू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाले माता- पिता न दबा सके। वे 'राम राम' जपा करते थे और कभी- कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे।" वहीं दूसरी तरफ (पृष्ठ ५०) लिखा कि "अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था।" श्यामसुन्दर दास की 'कबीर ग्रंथावली' के अनुसार रामानंद की मृत्यु १४१०ई. में हो चुकी थी, साथ ही रेवरेंड जी. एच. वेस्टकॉट ने प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ रामानंद की मृत्यु १४०० ई. ही मानी है। कबीर के जन्म के बारे में शुक्ल जी ने भी लिखा है और कबीरपंथी भी मानते हैं कि उनका जन्म १३९८ -९९ ई. में हुआ था। अगर इन तिथियों को देखें तो पता चलता है कि कबीर के जन्म लेने और रामानंद की मृत्यु के बीच में जो फासला है वह मात्र १२ वर्ष का था। इतनी छोटी सी अवधि में रामानंद ने कबीर को ऐसा कौन सा ज्ञान पिला दिया जिससे उनके गुरु हो गए जिसके बारे में कबीर ने कुछ लिखा ही नहीं है, और शुक्ल जी ने लिखा भी है कि अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था। कबीर की उम्र जो देखते हुए यह बात तो और भी असत्य लगती है। दरअसल रामानंद सिर्फ कबीर के ही गुरु नहीं थे, कबीर के समकालीन और परवर्ती जितने भी प्रगतिशील संत कवि थे उनके भी गुरु थे जिसमें बनारस के समकालीन संत रविदास, राजस्थान के संत पीपा, मुंबई के संत धन्ना जाट और गुजरात के संत दादू आदि शामिल हैं। इनके कार्यकाल पर गौर करें तो हम पाते हैं कि रामानंद का कार्यकाल कई सदियों तक चलता रहा। जबकि विचारधार को ध्यान दिया जाए तो सभी उनसे भिन्न और विरोधी थे। "समय और विचार की खाई को परखने की संभवत सबसे पहली कोशिश डॉ राकेश गुप्ता ने की थी जिन्होंने 1944 में सम्मेलन पत्रिका में 'क्या कबीर रामानंद के शिष्य थे?' शीर्षक से लेख लिखकर इस संबंध में गंभीर सवाल उठाया।" (कबीर हैं कि मरते नहीं पृष्ठ ५१,५५) इस आधार पर कबीर को रामानंद का शिष्य नहीं माना जा सकता। कबीर को रामानंद का शिष्य घोषित करने के लिए भक्तमाल में कई किवदंतियाँ लिखी गई जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई मेल जोल नहीं है। वे सारी किवदंतियाँ चमत्कार मात्र पर आधारित हैं जो सत्य हो ही नहीं सकती। कबीर के बारे दोहा भी प्रचलित किया गया - 'हम काशी में प्रकट भए, रामानंद चेताय।' जबकि कबीर की चेतना 'ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहि' की रही है।
             कबीर को रामानंद का समकालीन साबित करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए गए उनके जन्म को लेकर। कबीर का जन्म १३९८ माना जाता है। उनके समकालीन नानक और पूर्ववर्ती गोरखनाथ के बारे में कई जानकारी स्पष्ट मिल जाएगी लेकिन उनसे ज्यादा प्रखर, स्पष्ट और प्रगतिशील कवि के बारे में सब कुछ किवदंती मात्र बनाकर रख दिया गया है। कबीर के जन्म के बारे में कई दोहे देखने को मिलते हैं जिनमें उनका समय अलग- अलग बताया गया है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। कबीर के प्रभाव का एक उदाहरण यह भी माना जा सकता है कि कबीर की प्रसिद्धि सुनकर ही नानक ने उनसे मुलाकात की। निर्विवाद सत्य है कि नानक का जन्म १४६९ ई. में हुआ था, जन्म के २७ साल बाद वे कबीर से मिले, जाहिर है १४९६ तक कबीर जीवित रहे होंगे। कबीर का सिकंदर लोदी के साथ भी जिक्र आता है, सिकंदर लोदी ने बनारस के पास शर्की शासक हुसैन शाह (१४९३- १५१८) को पराजित किया और छ: महीने तक जौनपुर में रहा। नानक ने भी लिखा है की सिकंदर लोदी (१४८९- १५१७) हर वर्ष जौनपुर घूमने आता था। कबीर के बारे में एक कहानी यह भी मिलती है कि उनकी शादी तीस वर्ष की उम्र में हुई, उनकी बीस वर्षीय पुत्री ने कबीर को एक पंडित से मिलवाया, उस समय कबीर की उम्र ५० साल रही होगी। अगर इसे सही मान लिया जाए तब कबीर से संबंधित सिकंदर लोदी और नानक का प्रसंग ही छूट जाएगा। कबीर के जन्म के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है लेकिन कुछ विदेशी अखबार और चिन्तक कबीर का जन्म इस प्रकार मानते हैं - जी. एच. वेस्टकॉट ने कबीर का समय १४४० से १५१८ई. माना है, न्यूयार्क टाइम्स ने बुनकर कबीर को मुसलमान दम्पत्ति द्वारा १४४०ई. में पैदा हुआ बताया है, एस. ए. ए. रिजवी ने कबीर का जीवनकाल १४२५ से १५०५ई. माना है। तात्कालिक समय को देखा जाय तो (१३९८- १५१८) १२० साल किसी भी समाज सुधारक का जीवन नहीं रहा, उस पर भी कबीर जैसे विद्रोही चेतना वाले कवि का, जिसको सिकंदर के द्वारा कई बार मारने के प्रयासों का भी जिक्र मिलता है। इसको देखते हुए कबीर के जन्म के बारे में दो समय प्राप्त होते हैं - १३९८- १५२० ई. और १४४०- १५१८ ई.।
           कबीर के माता- पिता और धर्म को लेकर तमाम तरह की विसंगतियाँ हैं जिनमें कई दोहे एक दूसरे के विरोधी ठहरते हैं 'काशी का मैं वासी बाम्हन, मेरा नाम परवीना' - 'तू बाम्हन मैं काशी का जुलाहा'। कबीर के माता- पिता और धर्म सभी को जोड़कर उन्हें ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया जाना कोई अनायास बात नहीं हो सकती। उस समय धार्मिक आडंबरों के केंद्र में ब्राह्मणवाद का विस्तार था, हर ज्ञानी पुरुष का जन्म सिर्फ ब्राह्मण कुल में ही हो सकता था। क्योंकि ब्राह्मण जाति ही सबसे श्रेष्ठ जाति थी, निचली जाति में पैदा होकर कोई ज्ञानी कैसे हो सकता है। इसलिए कबीर को ब्राह्मण के रूप में दिखाने की कोशिश की गई। जबकि कबीर ने अपने कई दोहों में स्वयं को जुलाहा और कोरी कहा है। उनके दोहों का जो स्वर है वह किसी भी पाखंडी संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखता। 'जाति जुलाहा मतिकौ धीर,  हरषि- हरषि गुन रमै कबीर'/ मेरे राम की अभै पद नगरी कहै जुलाहा कबीर/ हरि को नांव अभै- पद- दाता, कहै कबीरा कोरी। कोरी जाति धर्मपरिवर्तन करके जुलाहा जाति में शामिल हुई थी यह बात आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी मानते हैं। किंवदंतियों को ध्यान से देखा जाए तो कबीर का पूरा परिवार नदी में बहता हुआ मिला था। कबीर को नीरू- नीमा ने तालाब में पाया था जब कबीर बहते हुए चले अा रहे थे। कबीर की पत्नी लोई जो ऊन की लोई में लिपटी हुई नदी में एक वैरागी को मिली थी। जिसके आधार पर उसका नाम लोई रखा गया। एक कहानी में कबीर और उनके गुरु शेख तकी नदी के किनारे टहल रहे थे, नदी में एक मेरे हुए बच्चे की लाश अाई, कबीर उसके कान में कुछ कहा और बच्चा जीवित हो उठा, कबीर ने उसका नाम कमाल रख दिया।  इन भ्रामक पाखंडियों का वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं है लेकिन सच यही है कि कबीर के बारे में अगर कुछ जुटा कर रखा गया है बाद के लोगों को जानने के लिए तो सिर्फ़ अफ़वाह और लगातार यही प्रचारित भी हो रहा है। जिन पाखंडियों के सामने कबीर झुके नहीं, जिसने हिंसा, मंदिर- मस्जिद, मूर्तिपूजा, वाह्य आडंबर, ऊँच- नीच, छुआ- छूत आदि का विरोध किया उसे तोड़ने के लिए दुनिया भर के मिथक बनाए गए, उनके बारे में कोई सही जानकारी उपलब्ध ही नहीं है। कबीर के जन्म या मृत्यु के इन चमत्कारिक आख्यानों को विदेश के किसी भी समाचार पत्र या लेखक ने नहीं माना है।
             कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध दर्शन का प्रभाव था। जिस प्रकार कबीरपंथी निम्न जातियों से संबंधित हैं उसी प्रकार गोरखनाथ के अनुयायी भी उन्हीं जातियों से आते हैं। लोगों को जाति हीनता की कीलें चुभा- चुभाकर इतना त्रस्त कर दिया गया कि उन्हें किसी दूसरे पंथ की शरण में जाना ही पड़ा, जहाँ उन्हें सम्मान मिल सके और जहाँ उनके मन को शांति, जहाँ पर ज्ञान की वर्षा मात्र से ही सुकून मिलता हो, किसी पुराण का पाठ या मंदिर के दर्शन से नहीं। कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध धर्म का प्रभाव इसलिए भी स्वीकरा जा सकता है कि उनके विचारों का मेल उनसे अक्सर होता दिखाई देता है। ब्राह्मणवाद का जो छद्म चारित्रिक दावा कबीर को अपने खेमे में मिलाने के लिए किया गया उसका कोई भी मेल नहीं है- 'मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ होइ'। कई जगह कबीर और गोरख नाथ के विचार एकदम नज़दीक देखे जा सकते हैं। गोरखनाथ - 'वेदे न सास्त्रे कतेब न कुरांने पुस्तके न बांच्या जाई,/ ते पद जांनां बिरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई।' वहीं कबीर कहते हैं - 'पोथी पढ़- पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय,/ ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' 
              बौद्ध, सिद्ध और नाथ के पंथ की प्रवृतियों को देखकर तथा कबीर के मूल काव्य रचना का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि उनके ऊपर बौद्ध दर्शन और गोरखनाथ का प्रभाव था न कि वैष्णव संप्रदाय का। विरोध में उन्होंने कट्टरपंथियों और मुल्लाओं को चेताने की कोशिश की है। उन पर रामानंद का बिल्कुल भी प्रभाव नहीं था। हर धर्म के रक्षकों को यह डर होता है कि उनके पंथ के लोग किसी दूसरे धर्म में परिवर्तित न हो जाएं और धर्म के रक्षक वही बने हैं जो जाति श्रेष्ठता में ऊँचे हैं अगर इसी तरह परिवर्तित होते रहे तो उनकी गुलामी कौन करेगा क्योंकि जातीय हीनता से त्रस्त होकर धर्मांतरण निम्न जाति के लोग ही करते हैं। धार्मिक नफरत फैलाने का एक मतलब यह भी हो सकता है कि दूसरे धर्म के बारे में इतनी नफ़रत भर दी जाए कि व्यक्ति को तात्कालिक धर्म में जाति हीनता के कारण जीना भले ही दूभर हो जाए लेकिन वह धर्म परिवर्तन करने के लिए सोचे ही न। यही कारण है कि गोरखनाथ और कबीर के अनुयायी वही लोग हुए जो जाति हीनता के आधार पर कुचले गए थे। कबीर ने एक ऐसी प्रथा को नकारा जहाँ पढ़ने का अधिकार शूद्रों को नहीं था, उनके ज्ञान का रास्ता सिर्फ सुनने तक सीमित था, इसलिए कबीर ने उनके लिए यह रास्ता अपनाया और उनको अपनी बानियों के माध्यम से सही गलत का फ़र्क समझाया। पाखंडों के नाम पर शोषण की तरफ़ आगाह किया।
              इतिहास में भारतीय नवजागरण का दौर एक ऐसा समय था जब सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक आदि प्रकार के सुधार हुए। जिसके आधार पर समाज में फैली कुरीतियाँ, ढोंग, पाखंड, आदि को उखाड़ फेकने की एक मुहिम चली। उस आंदोलन में लोगों ने अपने आप को पूरी तरह से समर्पित किया। उनका चरित्र उनके काम से अलग नहीं था। यही रूप हम कबीर में देखत हैं। समाज की भलाई के लिए उन्होंने अपने जीवन संघर्ष में कभी किसी चीज से समझौता नहीं किया, उन्होंने जो बोला वही किया, कबीर के विचार इतने क्रांतिकारी थे कि उनको सच बोलने में किसी की परवाह नहीं थी, उन्होंने अपनी कविता का प्रयोग समाज की भलाई के लिए किया। जो लोग भी आडंबरों के नाम पर शोषित, पीड़ित थे उनके हक में लड़ाई लड़ी। 'लिखी लिखा की है नहीं देखा देखी बात की'। कबीर के विचार हर एक विषय पर स्पष्ट थे। उनके भगवान निर्गुण राम थे जिनको कभी देखा नहीं जा सकता, जिनको मंदिरों ,मस्जिदों और मूर्तियों में स्थापित नहीं किया जा सकता। प्रेम के विषय में उनकी स्थापना एकदम अचूक थी, उन्हें पता था समाज में समरसता सिर्फ़ प्रेम के जरिए ही लाया जा सकता है - 'कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहि/ प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।' कई जगह कबीर को स्त्री विरोधी दिखाने की कोशिश की गई, ऐसा लगता है कबीरपंथियों ने उन्हें स्त्री विरोधी दर्शाने की सबसे अहम भूमिका निभाई जिसका उल्लेख 'कबीर कसौटी' में मिलता है। जबकि कबीर ने जिन विषयों को छुआ उन सभी में तात्कालिक दृष्टियों के आधार पर वे प्रगतिशील रहे - 'नारी निंदा ना करो, नारी रतन की खान। नारी से नर होत हैं, साधु, संत, सुजान।।'
               'कबीर हैं कि मरते नहीं' किताब कबीर के ऊपर लगाए आरोपों का जवाब है। परंपरागत रूप से जो अफवाह पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित किया जाता रहा है उसे इतिहास, समाचार पत्रों, पूर्ववर्ती आलोचकों और साहित्य इतिहास लेखकों के हवाले से सच को उघाड़ने की कोशिश की गई है। कबीर की प्रक्षिप्त रचनाओं को उनकी भाषा और दर्शन के आधार पर चिन्हित किया जा सकता है। कबीर की वही चेतना जो जन मानस को सचेत करने की कोशिश करती है, जो तमाम आडंबरों का विरोध करती है, सच मायने में वही उनका साहित्य है। इसमें कबीर की सच्चाई से रूबरू कराने के लिए कई सारे विदेशी समाचार पत्र और विदेशी लेखकों के तार्किक और दोषमुक्त उद्धरणों को शामिल किया गया है। कबीर के लगभग उन सभी पक्षों पर बात की गई है जो उनसे संबंधित है। आधुनिक काल में कबीर के ऊपर किया गया यह एक वैज्ञानिक शोध है, जिससे कबीर के विचारों में स्पष्टता मिलेगी। भक्ति काल में समाज की उन्नति, सभी वर्गों में समन्वय, समरसता और वैज्ञानिक नज़रिए का विकास निर्गुण संत काव्य धारा में होता है लेकिन भक्ति काल के ज्यादातर आलोचकों ने उसका श्रेय लोगों की भावना के आधार पर सगुण भक्ति को दिया। जिन्होंने खुद को समर्पित करके आडंबरों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई उनके साथ चारित्रिक छेड़- छाड़ करके उनको कमज़ोर बनाया गया। बुद्ध को बुद्धू और गोरखनाथ को गोरखधंधा के नाम से दुष्प्रचारित किया गया। लेकिन जिनका नज़रिया स्पष्ट है, जिनका उद्देश्य स्पष्ट है उनको कभी मारा नहीं जा सकता वे समाज में तब तक जिंदा रहेंगे जब तक उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन की ज़रूरत वर्तमान रहेगी। 
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पुस्तक - कबीर हैं कि मरते नहीं
लेखक - सुभाष चन्द्र कुशवाहा
प्रकाशक - अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज 
प्रकाशन वर्ष - २०२०
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परिचय____
जुगेश कुमार गुप्ता
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(आधुनिक हिन्दी रंगमंच के विकास में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का योगदान) विषय पर शोधरत
 बनास जन, शिवना साहित्यिकी, रचना उत्सव, सुबह की धूप, पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख।


 


 


Sunday, August 2, 2020

प्रेमचंद का भाषा चिन्तन : सुझावों की नोटिस नहीं ली गई

आज भी प्रेमचंद (31.7.1880-8.10.1936) सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले हिन्दी के लेखकों में हैं. बड़े-बड़े विद्वानों के निजी पुस्तकालयों से लेकर रेलवे स्टेशनों के बुक स्टाल तक प्रेमचंद की किताबें मिल जाती है. प्रेमचंद की इस लोकप्रियता का एक कारण उनकी सहज सरल भाषा भी है. किन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि जहाँ विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं की ओर से प्रेमचंद के साहित्य पर अनेक संगोष्ठियाँ आयोजित होती रहती हैं वहीं उनके भाषा चिन्तन पर कहीं किसी संगोष्ठी के आयोजन की खबर सुनने में नहीं आती।


आज भी कहा जा सकता है कि इस देश की राष्ट्रभाषा के आदर्श रूप का सर्वोत्तम उदाहरण प्रेमचंद की भाषा है.  प्रेमचंद का भाषा- चिन्तन जितना तार्किक और पुष्ट है उतना किसी भी भारतीय लेखक का नहीं है. ‘साहित्य का उद्देश्य’ नाम की उनकी पुस्तक में भाषा- केन्द्रित उनके चार लेख संकलित हैं जिनमें भाषा संबंधी सारे सवालों के जवाब मिल जाते हैं.  इन चारो लेखों के शीर्षक है, ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएं’, ‘कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार’, ‘हिन्दी –उर्दू की एकता’ तथा ‘उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी’.  ‘कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार’ शीर्षक निबंध वास्तव में बम्बई में सम्पन्न राष्ट्रभाषा सम्मेलन में स्वगताध्यक्ष की हैसियत से 27 अक्टूबर 1934 को दिया गया उनका व्याख्यान है. इसमें वे लिखते है, “ समाज की बुनियाद भाषा है. भाषा के बगैर किसी समाज का खयाल भी नहीं किया जा सकता. किसी स्थान की जलवायु, उसके नदी और पहाड़, उसकी सर्दी और गर्मी और अन्य मौसमी हालातें, सब मिल-जुलकर वहां के जीवों में एक विशेष आत्मा का विकास करती हैं,  जो प्राणियों की शक्ल-सूरत, व्यवहार, विचार और स्वभाव पर अपनी छाप लगा देती हैं और अपने को व्यक्त करने के लिए एक विशेष भाषा या बोली का निर्माण करती हैं. इस तरह हमारी भाषा का सीधा संबंध हमारी आत्मा से हैं. …….. मनुष्य में मेल- मिलाप के जितने साधन हैं उनमें सबसे मजबूत असर डालने वाला रिश्ता भाषा का है. राजनीतिक, व्यापारिक या धार्मिक नाते जल्द या देर में कमजोर पड़ सकते हैं और अक्सर बदल जाते हैं. लेकिन भाषा का रिश्ता समय की, और दूसरी विखरने वाली शक्तियों की परवाह नहीं करता और इस तरह से अमर हो जाता है. ( साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ-118)


पिछले कुछ वर्षों से बोली और भाषा के रिश्ते को लेकर बहुत बाद-विवाद चल रहा है. भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि कुछ हिन्दी की बोलियां हिन्दी परिवार से अलग होकर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की माँग कर रही हैं. इस संबंध को लेकर प्रेमचंद लिखते हैं, “जैसे जैसे सभ्यता का विकास होता जाता है, यह स्थानीय भाषाएं किसी सूबे की भाषा में जा मिलती हैं और सूबे की भाषा एक सार्वदेशिक भाषा का अंग बन जाती हैं. हिन्दी ही में ब्रजभाषा, बुन्देलखंडी, अवधी, मैथिल, भोजपुरी आदि भिन्न- भिन्न शाखाएं हैं, लेकिन जैसे छोटी- छोटी धाराओं के मिल जाने से एक बड़ा दरिया बन जाता है, जिसमें मिलकर नदियाँ अपने को खो देती हैं, उसी तरह ये सभी प्रान्तीय भाषाएं हिन्दी की मातहत हो गयी हैं और आज उत्तर भारत का एक देहाती भी हिन्दी समझता है और अवसर पड़ने पर बोलता है. लेकिन हमारे मुल्की फैलाव के साथ हमें एक ऐसी भाषा की जरूरत पड़ गयी है जो सारे हिन्दुस्तान में समझी और बोली जाय, जिसे हम हिन्दी या गुजराती या मराठी या उर्दू न कहकर हिन्दुस्तानी भाषा कह सकें, जैसे हर एक अंग्रेज या जर्मन या फ्रांसीसी फ्रेंच या जर्मन या अंग्रेजी भाषा बोलता और समझता है. हम सूबे की भाषाओं के विरोधी नहीं हैं. आप उनमें जितनी उन्नति कर सकें करें. लेकिन एक कौमी भाषा का मरकजी सहारा लिए बगैर एक राष्ट्र की जड़ कभी मजबूत नहीं हो सकती. “ ( वही, पृष्ठ-121)  


प्रेमचंद चिन्ता व्यक्त करते हैं, “अंग्रेजी राजनीति का, व्यापार का, साम्राज्यवाद का हमारे ऊपर जैसा आतंक है, उससे कहीं ज्यादा अंग्रेजी भाषा का है. अंग्रेजी राजनीति से, व्यापार से, साम्राज्यवाद से तो आप बगावत करते हैं लेकिन अंग्रेजी भाषा को आप गुलामी के तौक की तरह गर्दन में डाले हुए हैं.  अंग्रेजी राज्य की जगह आप स्वराज्य चाहते हैं. उनके व्यापार की जगह अपना व्यापार चाहते हैं, लेकिन अंग्रेजी भाषा का सिक्का हमारे दिलों पर बैठ गया है. उसके बगैर हमारा पढ़ा- लिखा समाज अनाथ हो जाएगा. “( वही, पृष्ठ-121) प्रेमचंद अंग्रेजी जानने वालों और अंग्रेजी न जानने वालों के बीच स्तर-भेद का तार्किक विवेचन करते हुए कहते हैं, “ पुराने समय में आर्य और अनार्य का भेद था, आज अंग्रेजीदाँ और गैर-अंग्रेजीदाँ का भेद है. अंग्रेजीदाँ आर्य हैं. उसके हाथ में अपने स्वामियों की कृपादृष्टि की बदौलत कुछ अख्तियार है, रोब है, सम्मान है. गैर-अंग्रेजीदाँ अनार्य हैं और उसका काम केवल आर्यों की सेवा- टहल करना है और उसके भोग- विलास और भोजन के लिए सामग्री जुटाना है.  यह आर्यवाद बड़ी तेजी से बढ़ रहा है, दिन दूना रात चौगुना........  हिन्दुस्तानी साहबों की अपनी विरादरी हो गयी है, उनका रहन- सहन, चाल- ढाल, पहनावा, बर्ताव सब साधारण जनता से अलग है, साफ मालूम होता है कि यह कोई नई उपज है.” ( वही, पृष्ठ-122) प्रेमचंद हमें आगाह करते हैं, “ जबान की गुलामी ही असली गुलामी है. ऐसे भी देश, संसार में हैं जिन्होंने हुक्मराँ जाति की भाषा को अपना लिया. लेकिन उन जातियों के पास न अपनी तहजीब या सभ्यता थी और न अपना कोई इतिहास था, न अपनी कोई भाषा थी. वे उन बच्चों की तरह थे, जो थोड़े ही दिनों में अपनी मातृभाषा भूल जाते हैं और नयी भाषा में बोलने लगते हैं. क्या हमारा शिक्षित भारत वैसा ही बालक है ? ऐसा मानने की इच्छा नहीं होती, हालाँकि लक्षण सब वही हैं. “ ( वही, पृष्ठ- 124)


कौमी भाषा के स्वरूप पर प्रेमचंद ने बहुत गंभीरता के साथ और तर्क व उदाहरण देकर विचार किया है. वे कहते हैं, “ सवाल यह होता है कि जिस कौमी भाषा पर इतना जोर दिया जा रहा है, उसका रूप क्या है ? हमें खेद है कि अभी तक उसकी कोई खास सूरत नहीं बना सके हैं, इसलिए कि जो लोग उसका रूप बना सकते थे, वे अंग्रेजी के पुजारी थे और हैं. मगर उसकी कसौटी यही है कि उसे ज्यादा से ज्यादा आदमी समझ सकें. हमारी कोई सूबेवाली भाषा इस कसौटी पर पूरी नही उतरती. सिर्फ हिन्दुस्तानी उतरती है, क्योंकि मेरे ख्याल में हिन्दी और उर्दू दोनो एक जबान है. क्रिया और कर्ता, फेल और फाइल जब एक है तो उनके एक होने में कोई संदेह नहीं हो सकता. उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है, जिसमें फारसी- अरबी के लफ्ज ज्यादा हों, इसी तरह हिन्दी वह हिन्दुस्तानी है, जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों. लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लैटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या ऐंग्लोसेक्सन, दोनो ही अंग्रेजी है, उसी भाँति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों में मिल जाने से कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती. साधारण बातचीत में तो हम हिन्दुस्तानी का व्यवहार करते ही हैं. “ ( वही, पृष्ठ-124)


प्रेमचंद ने उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी,  भाषा के तोनों रूपों का अलग अलग उदाहरण दिया है.  उनके द्वारा दिया गया हिन्दुस्तानी का उदाहरण निम्न है, 


“ एक जमाना था, जब देहातों में चरखा और चक्की के बगैर कोई घर खाली न था. चक्की-चूल्हे से छुट्टी मिली, तो चरखे पर सूत कात लिया. औरतें चक्की पीसती थी. इससे उनकी तन्दुरुस्ती बहुत अच्छी रहती थी, उनके बच्चे मजबूत और जफाकश होते थे. मगर अब तो अंग्रेजी तहजीब और मुआशरत ने सिर्फ शहरों में ही नहीं, देहातों में भी कायापलट दी है. हाथ की चक्की के बजाय अब मशीन का पिसा हुआ आटा इस्तोमाल किया जाता है. गावों में चक्की न रही तो चक्की पर का गीत कौन गाए ? जो बहुत गरीब हैं वे अब भी घर की चक्की का आटा इस्तेमाल करते हैं. चक्की पीसने का वक्त अमूमन रात का तीसरा पहर होता है. सरे शाम ही से पीसने के लिए अनाज रख लिया जाता है और पिछले पहर से उठकर औरतें चक्की पीसने बैठ जाती हैं. “


उक्त उदाहरण देने के बाद प्रेमचंद लिखते हैं, “ इस पैराग्राफ को मैं हिन्दुस्तानी का बहुत अच्छा नमूना समझता हूँ, जिसे समझने में किसी भी हिन्दी समझने वाले आदमी को जरा भी मुश्किल न पड़ेगी. “ (वही, पृष्ठ-125)


किन्तु प्रेमचंद अपने समय के यथार्थ को भली- भाँति समझते थे. उन्होंने लिखा है, “एक तरफ हमारे मौलवी साहबान अरबी और फारसी के शब्द भरते जाते है, दूसरी ओर पंडितगण, संस्कृत और प्राकृत के शब्द ठूँस रहे है और दोनो भाषाएं जनता से दूर होती जा रही हैं. हिन्दुओं की खासी तादाद अभी तक उर्दू पढ़ती आ रही है, लेकिन उनकी तादाद दिन प्रति -दिन घट रही है. मुसलमानों ने हिन्दी से कोई सरोकार रखना छोड़ दिया. तो क्या यह तै समझ लिया जाय कि उत्तर भारत में उर्दू और हिन्दी दो भाषाएं अलग- अलग रहेंगी ? उन्हें अपने- अपने ढंग पर, अपनी- अपनी संस्कृति के अनुसार बढ़ने दिया जाय. उनको मिलने की और इस तरह उन दोनों की प्रगति को रोकने की कोशिश न की जाय ? या ऐसा संभव है कि दोनो भाषाओं को इतना समीप लाया जाय कि उनमें लिपि के सिवा कोई भेद न रहे. बहुमत पहले निश्चय़ की ओर है. हाँ, कुछ थोड़े से लोग ऐसे भी है जिनका ख्याल है कि दोनो भाषाओं में एकता लायी जा सकती है और इस बढ़ते हुए फर्क को रोका जा सकता है. लेकिन उनका आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज है. ये लोग हिन्दी और उर्दू नामों का व्यवहार नहीं करते, क्योंकि दो नामों का व्यवहार उनके भेद को और मजबूत करता है. यह लोग दोनों को एक नाम से पुकारते हैं और वह हिन्दुस्तानी है.” ( वही, हिन्दी –उर्दू एकता शीर्षक निबंध, पृष्ठ-139)


कहना न होगा, प्रेमचंद द्वारा प्रस्तावित हिन्दुस्तानी को नकार कर और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाने के 70 साल बाद भी, प्रेमचंद द्वारा दिए गए उक्त उद्धरण में सिर्फ दो शब्द ( जफाकश और मुआशरत ) ऐसे हैं जिनको लेकर हिन्दी वालों की थोड़ी मुश्किल हो सकती है. किन्तु भाषा की सरलता आज भी विमुग्ध करने वाली है. प्रेमचंद और गाँधीजी के सुझाव न मानकर हमने एक ही भाषा को हिन्दी और उर्दू में बाँट दिया, उन्हें मजहब से जोड़ दिया और इस तरह दुनिया की सबसे समृद्ध, बड़ी और ताकतवर हिन्दी जाति को धर्म के आधार पर दो हिस्सों में बाँटकर कमजोर कर दिया और उनके बीच सदा- सदा के लिए अलंघ्य और अटूट चौड़ी दीवार खड़ी कर दी.


हमने राजभाषा हिन्दी और अपने साहित्य की भाषा को भी जिस संस्कृतनिष्ठता से बोझिल बना दिया है उससे आगाह करते हुए प्रेमचंद ने उसी समय कहा था,


“हिन्दी में एक फरीक ऐसा है, जो यह कहता है कि चूंकि हिन्दुस्तान की सभी सूबेवाली भाषाएं संस्कृत से निकली हैं और उनमें संस्कृत के शब्द अधिक हैं इसलिए हिन्दी में हमें अधिक से अधिक संस्कृत के शब्द लाने चाहिए, ताकि अन्य प्रान्तों के लोग उसे आसानी से समझें. उर्दू की मिलावट करने से हिन्दी का कोई फायदा नहीं. उन मित्रों को मैं यही जवाब देना चाहता हूं कि ऐसा करने से दूसरे सूबों के लोग चाहे आप की भाषा समझ लें, लेकिन खुद हिन्दी बोलने वाले न समझेंगे. क्योंकि, साधारण हिन्दी बोलने वाला आदमी शुद्ध संस्कृत शब्दों का जितना व्यवहार करता है उससे कहीं ज्यादा फारसी शब्दों का. हम इस सत्य की ओर से आँखें नहीं बन्द कर सकते और फिर इसकी जरूरत ही क्या है कि हम भाषा को पवित्रता की धुन में तोड़- मरोड़ डालें. यह जरूर सच है कि बोलने की भाषा और लिखने की भाषा में कुछ न कुछ अन्तर होता है, लेकिन लिखित भाषा सदैव बोलचाल की भाषा से मिलते- जुलते रहने की कोशिश किया करती है. लिखित भाषा की खूबी यही है कि वह बोलचाल की भाषा से मिले.” ( वही, पृष्ठ 128)


इस संबंध में महात्मा गाँधी की प्रशंसा करते हुए प्रमचंद ने लिखा है, “ कितने खेद की बात है कि महात्मा गाँधी के सिवा किसी भी दिमाग ने कौमी भाषा की जरूरत नहीं समझी और उसपर जोर नहीं दिया. यह काम कौमी सभाओं का है कि वह कौमी भाषा के प्रचार के लिए इनाम और तमगे दें, उसके लिए विद्यालय खोलें, पत्र निकालें और जनता में प्रोपेगैंडा करें. राष्ट्र के रूप में संघटित हुए बगैर हमारा दुनिया में जिन्दा रहना मुश्किल है. यकीन के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता कि इस मंजिल पर पहुँचने की शाही सड़क कौन सी है. मगर दूसरी कौमों के साथ कौमी भाषा को देखकर सिद्ध होता है कि कौमियत के लिए लाजिमी चीजों में भाषा भी है और जिसे एक राष्ट्र बनना है उसे एक कौमी भाषा भी बनानी पड़ेगी.” ( वही, पृष्ठ-132)


प्रेमचंद ने लिपि के सवाल पर भी गंभीरता के साथ विचार किया है और साफ शब्दों में अपना मत व्यक्त किया है. “ प्रान्तीय भाषाओं को हम प्रान्तीय लिपियों में लिखते जायँ, कोई एतराज नहीं, लेकिन हिन्दुस्तानी भाषा के लिए एक लिपि रखना ही सुविधा की बात है, इसलिए नहीं कि हमें हिन्दी लिपि से खास मोह है बल्कि इसलिए कि हिन्दी लिपि का प्रचार बहुत ज्यादा है और उसके सीखने में भी किसी को दिक्कत नहीं हो सकती. लेकिन उर्दू लिपि हिन्दी से बिलकुल जुदा है और जो लोग उर्दू लिपि के आदी हैं, उन्हें हिन्दी लिपि का व्यवहार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अगर जबान एक हो जाय तो लिपि का भेद कोई महत्व नहीं रखता.” ( वही, पृष्ठ-132) और अन्त में निष्कर्ष देते हैं,


“ लिपि का फैसला समय करेगा. जो ज्यादा जानदार है वह आगे आएगी. दूसरी पीछे रह जाएगी. लिपि के भेद का विषय छेड़ना घोड़े के आगे गाड़ी को रखना होगा. हमें इस शर्त को मानकर चलना है कि हिन्दी और उर्दू दोनो ही राष्ट्र-लिपियां हैं और हमें अख्तियार है, हम चाहे जिस लिपि में उसका ( हिन्दुस्तानी का ) व्यवहार करें. हमारी सुविधा हमारी मनोवृत्ति और हमारे संस्कार इसका फैसला करेंगे. “ ( वही, पृष्ठ-133) किन्तु प्रेमचंद को विश्वास है कि “ हम तो केवल यही चाहते हैं कि हमारी एक कौमी लिपि हो जाय.”  दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास के चतुर्थ दीक्षान्त समारोह में दीक्षान्त भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि “ अगर सारा देश नागरी लिपि का हो जाएगा तो संभव है मुसलमान भी उस लिपि को कुबूल कर लें. राष्ट्रीय चेतना उन्हें बहुत दिन तक अलग न रहने देगी. “ ( साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 117)


प्रेमचंद के सुझावों पर अमल न करके हमने देश की भाषा नीति को लेकर जो मार्ग चुना उसके घातक परिणाम आज हमारे सामने हैं. अंग्रेजी के वर्चस्व के नाते हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी और गाँवों की छुपी हुई प्रतिभाएं अनुकूल अवसर के अभाव में दम तोड़ रही हैं.  देश में मौलिक चिन्तन चुक गया है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद हम सिर्फ नकलची बनकर रह गए हैं.


बहरहाल, आज कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के दिन हम इस महान लेखक के रचनात्मक योगदान तथा उनके भाषा संबंधी चिन्तन का स्मरण करते हैं और समाज के प्रबुद्ध जनों से उसपर अमल करने की अपील करते करते हैं. 



हिन्दी के योद्धा :   राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन  

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन (1.8.1882- 1.7.1962) का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण ही हुआ. 17 फ़रवरी 1951 को मुजफ्फरनगर 'सुहृद संघके 17 वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर टण्डन जी ने कहा था- "हिन्दी के पक्ष को सबल करने के उद्देश्य से ही मैंने कांग्रेस जैसी संस्था में प्रवेश कियाक्योंकि मेरे हृदय पर हिन्दी का ही प्रभाव सबसे अधिक था और मैंने उसे ही अपने जीवन का सबसे महान व्रत


 बनाया....... हिन्दी साहित्य के प्रति मेरे (उसी) प्रेम ने उसके स्वार्थों की रक्षा और उसके विकास के पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया." 


राजर्षि में बाल्यकाल से ही हिन्दी के प्रति अनुराग था. इस प्रेम को बालकृष्ण भट्ट और मदन मोहन मालवीय जी ने प्रौढ़ता प्रदान करने की. 10 अक्टूवर 1910 को काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन महामना मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ और टण्डन जी सम्मेलन के मंत्री नियुक्त हुए. तदनन्तर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी की अत्यधिक सेवा की. टण्डन जी ने हिन्दी के प्रचार- प्रसार के लिए हिन्दी विद्यापीठ प्रयाग की स्थापना की. इस पीठ की स्थापना का उद्देश्य हिन्दी शिक्षा का प्रसार और अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करना था. सम्मेलन हिन्दी की अनेक परीक्षाएँ सम्पन्न करता था. इन परीक्षाओं से दक्षिण में भी हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ. सम्मेलन के इस कार्य का प्रभाव महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भी पड़ाअनेक महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम को मान्यता मिली. वे जानते थे कि सम्पूर्ण भारत में हिन्दी के प्रसार के लिए अहिन्दी भाषियों का सहयोग अपेक्षित है. शायद उनकी इसी सोच का परिणाम था सम्मेलन में गाँधी का लिया जाना. आगे चलकर 'हिन्दुस्तानीके प्रश्न पर टण्डन जी और महात्मा गाँधी में मतभेद हुआ. गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे. उन्होंने गुजरात शिक्षा सम्मेलनभड़ौच में 20 अक्टूबर 1917 को दिए गए अपने भाषण  में कहा है, “ऐसी दलील दी जाती है कि हिन्दी और उर्दू दो अलग अलग  भाषाएं हैं. यह दलील सही नहीं है. उत्तर भारत में मुसलमान और हिन्दू दोनो एक ही भाषा बोलते हैं. भेद पढ़े लिखे लोगों ने डाला है.  इसका अर्थ यह है कि  हिन्दू शिक्षित वर्ग ने हिन्दी को केवल संस्कृमय बना दिया है. इस कारण कितने ही मुसलमान उसे समझ नहीं सकते.  लखनऊ के मुसलमान भाइयों ने उर्दू में फारसी भर दी है और उसे हिन्दुओं के समझने के अयोग्य बना दिया है.  ये दोनो केवल पंडिताऊ भाषाएं हैंऔर उनको जनसाधारण में कोई स्थान प्राप्त नहीं है.  ( संपूर्ण गाँधी वाँग्मयखण्ड-14, प्रकाशन विभागभारत सरकार, 1965, पृष्ठ-20-20)


      इस विषय पर लम्बे समय तक टण्डन जी और महात्मा गाँधी के बीच पत्र व्यवहार होता रहा.  टंडन जी हिन्दी के समर्थक थे- अपेक्षाकृत संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के. डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार तो  काँग्रेस की बैठक में होने वाले मतदान में 78 के मुकाबले 77 वोटों से हिन्दुस्तानी हार गई और वह एक वोट सभाध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद का था. डॉ. अम्बेडकर ने अपने एक व्याख्यान में कहा हैं, “भारतीय संविधान के प्रारूप पर विचार करते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकृत किए जाने के प्रश्न पर कांग्रेस पार्टी मीटिंग में क्या हुआयदि मैं इस बात को अब जनता को बताऊं तो शायद रहस्योद्घाटन का दोष मुझे नहीं दिया जाएगा. इस प्रश्न से संबंधित धारा 15 से अधिक विवादास्पद कोई दूसरी धारा नहीं थी. इससे अधिक विरोध किसी धारा का नहीं हुआ. इससे अधिक गरमागरमी किसी धारा पर नहीं हुई. एक लम्बे विवाद के बाद जब इस प्रश्न पर मतदान हुआदोनो पक्ष में 78 मत थे. राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी को स्थान एक मत से मिला. ये तथ्य मैं अपनी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर सामने रख रहा हूँ. प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काँग्रेस पार्टी में मेरा स्वाभाविक प्रवेश था.”( अम्बेडकर भीमरावथाट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्सडॉ. बाबा साहेब अंबेडकर राइटिंग्स एण्ड स्पीचेजखण्ड-1, सं. बसंत मूनएजूकेशन डिपार्टमेंटगवर्नमेंट ऑफ महाराष्ट्र, 1989, पृष्ठ-148) यद्यपि इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस की जिस मीटिंग का उल्लेख डॉ. अम्बेडकर ने किया है वह किस तारीख को और कहाँ हुई थी. जे. आर. कपूर ने तो यहाँ तक लिखा है कि कांग्रेस की इस तरह की किसी मीटिंगं की कोई प्रामाणिक सूचना नहीं मिलती जिसमें हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर मतदान हुआ हो. देयर बीइंग प्रेक्टिकल यूनानिमिटी ऑन द क्वेश्चन ऑफ हिन्दी वीइंग द ऑफिशियल लैंग्वेज ऑप द यूनियन, देयर वाज नेवर एनी ऑकेजन फॉर इट दू बी पुट टू वोट इन एनी कांस्चूयेन्ट असेम्बली कांग्रेस पार्टी मीटिंग.”( www.wikipedia.org/hindi and hindustani).


 इसके बाद जैसे जैसे आजादी करीब आती गई दो राष्ट्रों के सिद्धांत को बल मिलता गया और साम्प्रदायिकता बाढ़ की तरह उफनती गई. मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार किया. जुलाई 1947 में कांग्रेस ने देश विभाजन को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया. ऐसी दशा में हिन्दी और हिन्दुस्तानी के मसले को नए ढंग से देखा जाने लगा. नेताओं ने उर्दू को भी विभाजन को बढ़ावा देने वाली भाषा के रूप में देखा और इस तरह हिन्दी और उर्दू को हिन्दू और मुस्लिम से जोड़कर देखने वालो की संख्या बढ़ती गई. अंतत: गाँधी जी के समन्वय और धर्मनिरपेक्षतावादी दृष्टिकोण के पक्ष में आवाजें मंद पड़ती गईं और 17 जुलाई 1947 को संविधान सभा के बाहर कांग्रेस की मीटिंग में हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर मतदान हुआ जिसमें 32 के मुकाबले 63 वोटों से हिन्दी की जीत हुई. एक दूसरे मतदान में देवनागरी के पक्ष में 63 और विरोध मे 18 मत पड़े. जाहिर है सन् 1949 में 11 से 14 सितंबर तक चलने वाली बैठक में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया. भाषा संबंधी इस मुद्दे को ऐतिहासिक परिणति तक पहुँचाने में राजर्षि टण्डन की भूमिका अन्यतम थी.


 टंडन जी को गाँधी जी ने 25.05.1945 को लिखे अपने पत्र में कहा है, “मेरे पास उर्दू में खत आते हैंहिन्दी में आते हैं और गुजराती में. सब पूछते हैं किमैं कैसे हिन्दी साहित्य सम्मेलन में रह सकता हूँ और हिन्दुस्तानी भाषा में भी वे कहते हैंसम्म्लन की दृष्टि में हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है. जिसमें नागरी लिपि को ही राष्ट्रीय स्थान दिया जाता है. जब मैं सम्मेलन की भाषा  और नागरी लिपि को पूरा राष्ट्रीय स्थान नहीं देता हूँ तब मुझे सम्मेलन में से हट जाना चाहिए.. ऐसी दलील मुझे योग्य लगती है. इस हालत में क्या सम्मेलन से हटना मेरा फर्ज नहीं होता है ऐसा करने से लोगों को दुविधा न रहेगी  और मुझे पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ. जवाब में टण्डन जी ने 8.05.1945 को गाँधी जी को लिखा, “पूज्य बापूजीआप का 25 मई का पत्र मुझे मिला. आप को  स्वयं हिन्दी साहित्य सम्मेलन का सदस्य रहते हुए लगभग 27 वर्ष हो गए. इस बीच आपने  हिन्दी प्रचार का काम राष्ट्रीयता की दृष्टि से किया. वह सब काम गलत थाऐसा तो आप नहीं मानते होंगे. राष्ट्रीय दृष्टि से हिन्दी का प्रचार वांछनीय हैयह तो आप का सिद्धांत है ही. आप के नए दृष्टिकोण के अनुसार उर्दू-शिक्षण का भी प्रचार होना चाहिए. यह पहले काम से भिन्न एक नया काम हैजिसका पिछले काम से कोई विरोध नहीं है.


सम्मेलन हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानता है. उर्दू को वह हिन्दी की एक शैली मानता हैजो विशिष्टजनों में प्रचलित है. स्वयं वह हिन्दी की साधारण शैली में काम करता हैउर्दू शैली का नहीं. आप हिन्दी के साथ उर्दू को भी चलाते हैं. सम्मेलन उसका तनिक भी विरोध नही करता. किन्तुराष्ट्रीय कामों में अंग्रेजी को हटाने में वह उसकी सहायता का स्वागत करता है. भेद केवल इतना ही है कि आप दोनो चलाना चाहते हैं. सम्मेलन आरंभ से केवल हिन्दी चलाता आया है. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सदस्यों को हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सदस्य होने से रोक नहीं है. हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से निर्वाचित प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी एकैडमी के सदस्य हैं और हिन्दुस्तानी एकैडमी हिन्दी और उर्दू दोनो शैलियाँ और लिपियाँ चलाती है. इस दृष्टि से मेरा निवेदन है कि मुझे इस बात का कोई अवसर नहीं लगता कि आप सम्मेलन छोड़ें. ..... मुझे जो बात उचित लगीऊपर निवेदन किया किन्तु यदि आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं और आप की आत्मा यही कहती है कि सम्मेलन से अलग हो जाऊं तो आप के अलग होने की बात पर बहुत खेद होते हुए भी नतमस्तक हो आप के निर्णय को स्वीकार करूंगा.


विनीतपुरुषोत्तमदास टण्डन (उद्धृतहिन्दी राष्ट्रभाषा से राजभाषा तकविमलेश कान्ति वर्मापृष्ठ-43) 


गाँधी जी ने टण्डन जी के उक्त पत्र का विस्तार से जवाब अपने 13.06.1945 को लिखे पत्र में दिया इसके बाद फिर टंडन जी ने लगभग पाँच पृष्ठ का पत्र गाँधी जी को लिखा. इस तरह लम्बे पत्राचार के बाद अन्तत:  सेवाग्राम  से 25 जुलाई 1945 को गाँधी जी को लिखना पड़ा, “आप का ता. 11.7.45 का पत्र मिला. मैने दो बार पढ़ा. बाद में भाई किशोरीलाल को दिया. वे स्वतंत्र विचारक हैंआप जानते होंगे. उन्होंने जो लिखा है सो भी भेजता हूँ. मैं तो इतना ही कहूंगाजहां तक हो सका मैं आप के प्रेम के अधीन रहा हूँ. अब समय गया है कि वही प्रेम मुझे आप से वियोग कराएगा. मैं अपनी बात नहीं समझा सका हूँ. यही पत्र आप सम्मेलन की स्थाई समिति के पास रखें. मेरा ख्याल है कि सम्मेलन ने मेरी हिन्दी की व्याख्या अपनायी नहीं है.  अब तो मेरे विचार इसी दिशा में आगे बढ़े हैं.  राष्ट्रभाषा की मेरी व्याख्या में हिन्दी और उर्दू लिपि और दोनो शैलियों का ज्ञान आता है.  ऐसा होने से ही दोनो का समन्वय होने का है तो हो जाएगा. मुझे डर है कि मेरी यह बात सम्मेलन को चुभेगी. इसलिए मेरा स्तीफा कबूल किया जाय. हिन्दुस्तानी प्रचार सभा का कठिन काम करते हुए मैं हिन्दी की सेवा करूँगा और उर्दू की भी. “( उद्धृतउपर्युक्तपृष्ठ- 50)


और इस तरह हिन्दुस्तानी और हिन्दी के विवाद में महात्मा गाँधी का दशकों पुराना संबंध हिन्दी साहित्य सम्मेलन से टूट गया.


हिन्दी के स्वरूप को लेकर उन दिनों काँग्रेस के भीतर ही दो गुट हो गए- एक गाँधीजी की हिन्दुस्तानी का पक्षधर और दूसरा टण्डन जी की हिन्दी का. राजर्षि टण्डन के संघर्ष का ही परिणाम था कि गाँधीनेहरूमौलाना अबुलकलाम आजाद आदि द्वारा हिन्दुस्तानी के समर्थन के बावजूद काँग्रेस की बैठक में होने वाले मतदान में 78 के मुकाबले 77 वोटों से हिन्दुस्तानी हार गई. इसके बाद जैसे जैसे आजादी करीब आती गईदो राष्ट्रों के सिद्धांत को बल मिलता गया और साम्प्रदायिकता बढ़ती गई.  स्वाभाविक था हिन्दी और उर्दू को हिन्दू और मुस्लिम से जोड़कर देखने वालों की संख्या बढ़ती गई और अंतत: गाँधी जी के समन्वय और धर्मनिरपेक्षतावादी दृष्टिकोण के पक्ष में आवाजें मंद पड़ती गईं. इस बीच देश विभाजित हो चुका था और पाकिस्तान उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित कर चुका था. जाहिर है सन् 1949 में 11 से 14 सितंबर तक लगातार चलने वाली बहस के बाद संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया.


प्रसिद्ध साहित्यकार लक्ष्मीनारायण सुधांशु हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति राजर्षि टण्डन के योगदान का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- ‘‘उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य क्षेत्र में कोर्इ सर्जनात्मक कृति नहीं दी हैकुछ तुकबन्दियों तथा लेखों के अतिरिक्त उन्होंने और कुछ नहीं लिखा. लेकिन उनकी वास्तविक कृति है अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का संगठन. इसके द्वारा उन्होंने हिन्दी साहित्य की परीक्षाओं का जो संचालन कियाउससे साधारण जनता में हिन्दी साहित्य के प्रति अभिरुचिसाहित्य की जानकारी और लोक साहित्य में जागृति की भूमिका बनी. सम्मेलन की परीक्षाओं का जाल सम्पूर्ण भारत में बिछ गया. सन् 1910-1950 के मध्य राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का श्रेय टण्डन जी को है. इसीलिए लोग उन्हें राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्राण कहा करते थे.’’


सन् 1949 में जब संविधान सभा में राजभाषा सम्बंधी प्रश्न उठाया गया तो उस समय एक विचित्र स्थिति थी. पं० नेहरूअबुलकलाम आजाद जैसे अनेक नेता हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे. वहाँ गाँधीजी का बार -बार हवाला दिया गया. मो. इस्माइल ने गाँधी जी के एक लेख का हिस्सा उद्धृत किया,  भारत के करोड़ो ग्रामीणों को पुस्तकों से कोई मतलब नहीं है. वे हिन्दुस्तानी बोलते हैं जिसे मुस्लिम उर्दू में लिखते हैं तथा हिन्दू उर्दू लिपि या नागरी लिपि में लिखते हैं. अतएव मेरे और आप जैसे लोगों का कर्तव्य है कि दोनो लिपियों को सीखें. ( संविधान सभा में 14 सितंबर को दिए गए भाषण से ) परन्तु टण्डन जी झुके नहीं. 11,12,13,14 दिसम्बर 1949 को गरमागरम बहस के बाद हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर सदन में मतदान हुआ और अन्तत: देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी संघ की राजभाषा घोषित हुई.


      ‘हिन्दी राष्ट्रभाषा क्यों’, ‘मातृभाषा की महत्ता’, ‘भाषा का सवाल’, ‘गौरवशाली हिन्दी’, ‘हिन्दी की शक्ति’, ‘कवि और दार्शनिक’ आदि विषयों पर टण्डन जी के निबंध प्रकाशित हैं.


पुरुषोत्तमदास टण्डन के बहु आयामी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को देखकर उन्हें 'राजर्षिकी उपाधि से विभूषित किया गया. 15 अप्रैल सन् 1948 की संध्यावेला में सरयू तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संत देवरहा बाबा ने उन्हें 'राजर्षिकी उपाधि से अलंकृत किया.


भारत सरकार ने उन्हें देश का सर्वोत्तम सम्मान भारत रत्न’ से विभूषित किया.



आओ हिंदी-हिंदी खेलें।

विश्व में जितनी संस्थाएं हिंदी की सेवा के लिए बनी हुई हैंउतनी संस्थाएँ किसी अन्य भाषा के लिए नहीं हैं। जितने संवैधानिक प्रावधान, अधिनियम, नियम आदि और संसदीय समिति सहित तरह-तरह की समितियां, संगठन और हिंदी के विकास व प्रसार के लिए संघ सरकार और विभिन्न राज्यों में भाषा के लिए पूरे विभाग, देश के विभिन्न राज्यों में हिंदी की अकादमियाँ, भाषा के लिए इतना बड़ा ढांचा विश्व में शायद कहीं नहीं। संघ सरकार के स्तर पर, राज्य सरकारों और उनके  विभिन्न संस्थानों आदि द्वारा जितने कार्यक्रमप्रतियोगिताएँपरिचर्चाएँसंगोष्ठियाँसम्मेलनबैठकें और नृत्य, गीत-संगीत के कार्यक्रम आदि हिंदी के लिए होते हैं, विश्व में कहीं नहीं।
 लेकिन दूसरी तरफ इन सबके बावजूद भी आज भी देश में थोड़ा बहुत हिंदी का इस्तेमाल भले ही होता हो लेकिन अधिकांश कार्य अंग्रेजी में ही होता है। स्वतंत्रता के समय देश की 99% से भी बहुत अधिक लोग मातृभाषा में ही पढ़ते थे। लेकिन अब छोटे-छोटे गांवों तक अंग्रेजी माध्यम पसर चुका है। हिंदी को देश-विदेश में फैलाने वाली हिंदी फिल्में और धारावाहिक आदि भी अब हिंदी के चलते-फिरते जीवित शब्दों के स्थान पर जमकर अंग्रेजी के शब्दों को स्थापित कर रहे हैं। यही नहीं अब तो अनेक समाचार पत्रपत्रिकाएं और चैनल आदि भी देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का प्रयोग भी करने लगे हैं। स्कूलों से हिंदी के विद्यार्थी तेजी से घटते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी का केंद्र माने जाने वाले राज्य में भी हिंदी में फेल होने वाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत बड़ी है। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की कमी के चलते हिंदी विभाग बंद हो रहे हैं या विद्यार्थी जुटाने का दायित्व भी प्राध्यापकों के सिर आ पड़ा है। विदेशों में भी अनेक विश्वविद्यालयों में अब हिंदी विभाग बंद किए जा रहे हैं।
 
हिंदी साहित्य के नाम पर अब अधिकांश विधाएँ अब लुप्त होती जा रही है हैं। अगर मोटे तौर पर देखें तो हिंदी साहित्य के नाम पर अधिकांशतः कविता। कविता के नाम पर अधिकांशतः  हास्य कविता और हास्य कविता के नाम पर अधिकांशतः सोशल मीडिया पर चलने वाले चुटकुले और हास-परिहास। हिंदी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर हैं। अंग्रेजी माध्यम के चलते हिंदी समाचार पत्रों की दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। हिंदी भाषियों के घरों से हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाएँ लुप्त होते जा रही हैं। हर तरफ चल रहा है हिंदी का खेल और हर मोर्चे पर हिंदी हो रही है फेल।
 इस संबंध में कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
·   भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा (संघ की अधिकृत भाषा) का स्थान दिए जाने के बावजूद क्या संविधान, अधिनियम,नियम आदि की दृष्टि से अंग्रेजी के पास भारत की राजभाषा यानी अधिकृत भाषा के रूप में हिंदी से कम अधिकार है या अधिक?
·   वह कौनसी भाषा है जो संघ में भी मान्य है और सभी राज्यों में भी ?
·   वे कौन-कौन से अधिकार हैं जो हिंदी के पास तो हैं लेकिन अंग्रेजी के पास नहीं?
·   उच्च शिक्षा, रोजगार और संपन्नता से जुड़े सभी संसाधनों की ढलान अंग्रेजी की तरफ है या हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की तरफ ?
·   देश के विभिन्न कानूनों के अंतर्गत में कौन-कौन से कार्य हैं जो केवल हिंदी में ही किए जा सकते हैं ?
·   भारत की वह कौन सी भाषा है जो संघ सरकार और राज्य सरकारों कंपनियों, संगठनों व अन्य संस्थाओं आदि द्वारा पूरे देश की जनता के साथ पत्राचार सहित सभी उद्देश्यों के लिए अधिकृत पत्राचार के लिए प्रयोग में लाए जाने के लिए अधिकृत है ?
·   वह कौन सी भाषा है जिसके माध्यम से न्यायपालिका के निचले स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक न्याय प्राप्त किया जा सकता है ?
·   क्या संघ की राजभाषा अथवा राज्यों में राज्यों की राजभाषा के माध्यम से न्यायपालिका के निचले स्तर से लेकर उच्च उच्चतम स्तर तक न्याय प्राप्त
  किया जा सकता है ?
·   आपके घर में प्रतिदिन जो सामान आता है उसमें ग्राहक कानूनों के अंतर्गत जो जानकारी दी जाती हैवह प्रायः किस भाषा में होती है, क्या वह हमारी भाषा में देना आवश्यक है?  क्या किसीको दिखता नहीं कि कानूनन हमें दी जानेवाली जानकारी भी हमें हमारी भाषाओं में नहीं मिलती ?  
·   आपका सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों और बीमा कंपनियों आदि में जाना होता ही होगा वहाँ कौन सी ऐसी भाषा है जो आपको हर जगह मिलेगीऔर कौन सी वह भाषा है जो कहीं मिलेगीकहीं नहीं मिलेगी या ढूंढने और माँगने पर मिलेगी कितने लोगों को आज तक अपनी पासबुक हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषाओं में मिली है?
·   हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी माध्यम के और अन्य राज्यों में मातृभाषा के कितने प्रतिशत स्कूल खुले हैं? देश में जितने भी हिंदी या भारतीय भाषा प्रेमी है वे वर्तमान परिस्थितियों को देखकर कितने लोग अपने बच्चों या नाती पोतों को हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा माध्यम में पढ़ाने की सोच पाते हैं?


राज - किसीको मिला ताज, किसीको मिला राज। 


मैंने तो केवल कुछ बिंदुओं की तरह ही ध्यान आकर्षित किया है। ऐसे अनेक बिंदु गिनवाए जा सकते हैं। लेकिन अब आप पलट कर देखिए कि हिंदी को लेकर प्रतिवर्ष होने वाली हजारों वार्ताओं,  सम्मेलनों,  संगोष्ठियों, बैठकों,  संवादों आदि से क्या उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन आ रहा है? संविधान लागू होने से अब तक जो परिवर्तन आया है या आ रहा है, वह हिंदी के पक्ष में जा रहा है या अंग्रेजी  के पक्ष में जा रहा है?
जितने कथित प्रयास अब तक किए गए हैं, इससे तो अब तक देश में हिंदी का समुद्र भर गया होता‌। कहीं कोई दूसरी भाषा दिखती ही नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे प्रयास कुछ ऐसे हैं जैसे कि हम छलनी में पानी भर रहे हों। देश में हिंदी के नाम पर जो कानूनी ढांचा है उसमें इतने छेद हैं कि आप पानी भरते जाइए, लगे रहिए और थोड़ी देर बाद छलनी जैसी थीवैसी ही खाली की खाली।
यदि आपके घर के बाहर सड़क बनवाई गई, उसका ढलान इंजीनियर ने मिस्त्री से उधर नहीं करवाया जहाँ सब चाहते थे, समझा दिया सब ठीक हो जाएगा। तो क्या होगा?  आप कितना भी परिश्रम करें, पानी को दूसरी तरफ ले जाएंपानी पलक झपकते ही वापस उधर की तरफ जाने लगेगा जिस तरफ ढलान है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि संसाधनों की ढलान हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं के पक्ष में नहीं बल्कि अंग्रेजी की तरफ ही बनी या बनाई गई। शायद इंजीनियर या ठेकेदार ने अनजाने में नहीं जानबूझ कर ऐसा किया। अब पानी भरते ही आप लग जाते हैं उसे निकालने में। अगले दिन फिर वही हालत, वही कवायद। आप भी थक चुके हैं। अगर उस ढलान को ठीक नहीं करेंगे तो हम कितने भी प्रयास कर लेंप्रतिदिन लाखों संगोष्ठियाँ कर लें,  लाखों लोगों को समझा लें। अंततः तो पानी ढलान की तरफ ही जाएगा। जहाँ उच्च शिक्षा, रोजगार, संपन्नता, सुविधा और न्याय आदि की सब व्यवस्थाएँ होंगीसामाजिक प्रतिष्ठा मिलेगी। चाहे - अनचाहे सबको वही जाना पड़ेगा, सब वही जा रहे हैं। हो सकता है कुछ लोग कुछ अपवाद बता देंलेकिन अपवादों से तो सिद्धांत नहीं बदलते। एक बार एक ऐसे ही व्याख्यान के बाद एक बुजुर्ग खड़े हुए और उन्होंने छाती ठोक कर कहा, मैंने तो अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में पढ़वाया है। मैंने पूछा और अब आप के पोते-पोती किस माध्यम में पढ़ रहे हैं तब अचानक उनका जोश ठंडा पड़ गया और वे मुस्कुराने लगे। गलती उनकी नहीं है, धीरे-धीरे ढलान और गहरी की गई है, अंग्रेजी की ओर।
 मैं प्रतिदिन हिंदी के विकास व प्रचार-प्रसार और प्रयोग बढ़ाने को लेकर होने वाले तमाम प्रयासों को देखता हूँ। अनेक संवादों में भाग लेता हूँ। इनमें से 90% संस्थाएँ तो केवल कहानी, कविता में ही लगी हुई हैं। हिंदी के नाम पर बनी तमाम अकादमियाँ भी कहानी-कविता में ही व्यस्त हैं। भाषा बचे न बचे, जब तक जितनी बची है अपना काम तो चल ही रहा है। और जो लोग और संस्थाएँ हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं,  उनमें से कुछ विदेशों में हिंदी को बढ़ाने में लगी हैं। और जो प्रयास हो रहे हैं उनमें भी अक्सर इस प्रकार के सुझाव और कार्य देखने में आते हैं जैसे कि कोई पत्तों पर पानी छिड़कने की कोशिश कर रहा हो। जब तक आप वृक्षों की जड़ों में लगे रोग को दूर करने के उपाय नहीं करेंगे अगर पानी की कमी है तो आप जड़ों को नहीं सींचेंगे तो क्या होगा  क्या केवल पत्तों पर कुछ बूंदे छिड़कने से वृक्षों की रक्षा हो सकेगी जिस प्रकार के हिंदी सेवा के कथित प्रयास होते हैं उनमें से ज्यादातर से तो यह लगता है कि हम इन प्रयासों के नाम पर हम अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं। कोई नाम कमा रहा हैकोई धन कमा रहा है,  कोई प्रतिष्ठा पा रहा है, कोई बड़ा पद पा रहा है। हिंदी के खेल में सबको बड़ा मजा आ रहा है। उसमें भी कोई कठिनाई नहीं, पर यह तो देखें कि हिंदी का जहाज कहाँ जा रहा है।
हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के वृक्षों की जड़े तो भारत की भूमि में हैं। यहीं से फलीभूत हो कर कुछ टहनियां विदेशों में भी पहुंची गई हैं। क्या यह संभव है कि भारत में भारतीय भाषाओं का वृक्ष सूखता रहे और विदेशों में उसकी टहनियाँ, पत्तियाँ और फूल खिले रहें। अनेक लोगों ने भारतीय भाषाओं के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रहे हैं। लेकिन अनेक लोग हिंदी और भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रकार के प्रयास दिखाई देते हैं, उनमें प्राय: जड़ों के उपचार का कोई ठोस कार्य या विचार  मुझे नहीं दिखता।
 अगर हमें अपने प्रयासों का मूल्यांकन करना है तो किस रूप में करें कि हमारे प्रयासों से वह कौन सा बड़ा परिवर्तन हुआ जिससे कि अब अंग्रेजी के बजाय कोई काम हिंदी में होने लगेगा। छलनी के वे छेद जिनसे परिश्रम का सारा पानी निकल जाता था क्या वे भरे गए? आप मुझे निराशावादी कर सकते हैं क्षमा कीजिए मुझे तो नहीं दिखता। हमारी पीढ़ी और हम से पहले वाली पीढ़ी में मातृभाषाओं और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी प्रेमियों की बहुत बड़ी संख्या होती थी। एक बड़ा जनसमुदाय अपनी भाषा के लिए खड़ा होता था, अपनी भाषा की माँग करता था। लेकिन शिक्षा और रोजगार की नीति में जिस प्रकार के परिवर्तन हुए उसके चलते अब हिंदी प्रेमियों के घरों में भी अंग्रेजी के सेनानियों की फौज खड़ी हो चुकी है। अंग्रेजी माध्यम से निकली यह अंग्रेजी की इतनी बड़ी सेना व्यवस्था के हर हिस्से में अपनी गहरी पैठ बना चुकी है। अब आगे कौन लड़ेगा, कौन खड़ा होगा अपनी भाषाओं के लिए।
आज किसी बैंक, कंपनी या कार्यालय में कोई सुविधा हिंदी या भारतीय भाषाओं में दे भी दे तो उससे क्या बदलेगा उसके प्रयोग में न आने से कुछ दिनों बाद फिर केवल अंग्रेजी में हो जाएगी। अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा से माँग अंग्रेजी की पैदा होगी या हिंदी की अगर आपने हिंदी की मांग की भी तो आप उपहास का पात्र बन कर रह जाएँगे। नक्कारखाने में आपकी आवाज तूती बन कर रह जाएगी।
याद कीजिए एक हिंदी विश्वविद्यालय बनाया गया। इसलिए बनाया गया कि वहाँ हिंदी के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शिक्षा दी जाए। बिना किसी डोनेशन के अच्छे पाठ्यक्रमों में दाखिला मिलने पर भी उसे कितनी सफलता मिली हम जानते हैं। वे लाखों विद्यालय जो कल तक जो हिंदी माध्यम के या मातृभाषा माध्यम के विद्यालय थे, अब वे भी अंग्रेजी माध्यम में बदल चुके हैं। आप तमाम नौकरियाँ देंगे अंग्रेजी से, उच्च शिक्षा देंगे अंग्रेजी से और बात करेंगे मातृभाषा की? क्या यह विरोधाभास नहीं ?
आपको याद है न कश्मीर में शांति लाने के लिए क्या-क्या नहीं किया गया। शांति के लिए कैसे-कैसे प्रयास नहीं किए गए। कश्मीरी युवाओं को देश भर में घुमाया जाता था। आतंकियों को भी नौकरी और धन दे कर समझाया जाता था। मुख्यधारा में लाने के लिए तमाम नाटक-नौटंकी। सद्भाव के लिए अनेक धारावाहिक और फिल्में भी बनीं। लेकिन कुछ बदला क्या?  उस सब के बावजूद लाखों हिंदुओंसिक्खों आदि को कत्लेआम बलात्कार आदि के माध्यम से वहां से बाहर कर दिया गया।
लेकिन जब सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए में परिवर्तन किया और इसके अतिरिक्त अन्य नीतिगत निर्णय लिए तो सब छिपी बीमारियां सामने आने लगींसमाधान सामने आने लगे और हालात नियंत्रण में आने लगे। यहाँ भी व्यवस्था बदलने से ही कुछ बदलेगा। केवल चर्चाओं-परिचर्चाओं, संगोष्ठियों और सम्मेलनों और छिटपुट प्रयासों से नहीं। कब तक ढलान के प्रतिकूल पानी को लाएँगे। कुछ माँगे पूरी होने से हमें खुशी तो होती है लेकिन जैसे पत्तों पर पानी डालने से कुछ नहीं बदलता, थोड़ी सी धूप में पत्तों का पानी उड़ जाएगा। आखिर तो जड़ों का पानी ही काम आएगा।
मुझे ऐसा लगता है कि जब तक विधि व्यवस्था और इच्छा शक्ति के माध्यम से हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए मौजूद छिद्र बंद नहीं होंगेसत्ता के मिस्त्री जब तक संसाधनों की ढलान ठीक नहीं करेंगे। भारतीय भाषाओं की जड़ों में लगे रोग का सही इलाज नहीं होगाकुछ बदलेगा, मुझे तो नहीं लगता। अगर बदलेगा भी तो वह हिंदी या भारतीय भाषाओं के पक्ष में तो नहीं होगा। ऐसे में भी हिंदी का यह खेल तो चलता रहेगा। 


जिस प्रकार संविधान सभा से लेकर अब तक अंग धीरे-धीरे सावधानी से चतुराई से अंग्रेजी के लिए ढलान बनाई गई वैसी ही हमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए प्रयास करने होंगे। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत अब केवल प्राथमिक शिक्षा हिंदी में दिए जाने की नीति से कोई बड़ा परिवर्तन आएगा, ऐसा तो नहीं लगता क्योंकि बाद में तो सबको अंग्रेजीदां बनना ही होगा। लेकिन अगर इतना भी हो तो भारतीय जनमानस रूपी महावृक्ष की जड़ों में कुछ बूंदें तो मातृभाषा की होंगी, कहीं बचपन के किसी कोने में कविताओं में मातृभाषा में कहीं कोयल तो कूकेगी। इससे हम कुछ तो भारतीय रह पाएँगे। क्षेत्रीय संस्कृति और देश-प्रेम को बचाने की आशा रख सकेंगे। लेकिन अब देखना यह है कि कितने राज्य अपनी मातृभाषा के माध्यम को स्वीकारेंगे और कितने ऐच्छिक बना कर इसकी हवा निकाल देंगे। अगर यह चयन स्कूलों और अभिभावकों पर छोड़ दिया तो इसका हश्र क्या होगा, सबको पता है। देखिए क्या होता है। आइए तब तक हम सब मिलकर हिंदी-हिंदी खेलें।


     डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'


लघुकथा - 15 अगस्त पर माँ की आश

          पंकज की दादी 15 अगस्त की सुबह जल्दी से ही तैयार हो गयी थी।जैसा कि उसे मालूम था कि 15 अगस्त पर सभी टीवी के समाचार चैनलों पर भारत देश के सैनिकों को दिखाया जाता है।हर बार की तरह वह भी अपने पोते पंकज की एक झलक पाने के लिए टीवी के सामने बैठ गई। 65 साल की दादी को यह उम्मीद थी कि किसी ने किसी चैनल पर सैनिकों के इंटरव्यू के बीच में उसके फौजी पोते पंकज की झलक भी उसको दिखाई देगी और उसी इंतजार में उन्होंने सुबह से ही टीवी चला लिया।

 

          अचानक पंकज के पिता उनके कमरे में आए और उन्होंने अपनी मां की तरफ गुस्से से देखा और बिना कुछ कहे काफी गुस्से के साथ कमरे से बाहर निकल गए।पंकज की दादी का अभी पूरी तरह टीवी पर ही ध्यान था।कुछ समय बाद पंकज के पिता फिर कमरे में आए।इस बार अपनी मां से वह गुस्से से बोले क्या माँ तुम 26 जनवरी और 15 अगस्त पर टीवी चला कर बैठ जाती है।क्यों बार-बार भूल जाती हो कि तुम्हारा पोता पंकज दो साल पहले बॉर्डर पर दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो चुका है।

 

          यह कहते हुए पंकज के पिता की आँखों में आंसू आ गए और पंकज की दादी की आँखे भी काफी नम थी।लेकिन पंकज की दादी ने कहा बेटा मुझे टीवी पर जो भी सैनिक दिखाई देता है।मुझे उसमें अपना पोता ही दिखाई देता है और उन्होंने बड़े प्यार से अपने बेटे को गले से लगा लिया।इसके बाद माँ और बेटे दोनों ही नम आँखों से टीवी में आ रहे समाचार देखने लगे।

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

फ़ौजी की राखी

फ़ौजी की राखी
बहना इसकी बाट जोहे, ये कब राखी पर घर आता है!
तीज त्यौहार सब हुए बेगाने, कब रक्षाबंधन मनाता है!!
माथे पर मेरे भी हो तिलक, और मुँह में मेरे  मिठाई हो!
राखी बांधे बहना मेरी भी, सूनी ना कभी मेरी कलाई हो!
परिवार के बीच रह पाऊं, हर त्यौहार की भी बधाई हो!
मन इसका भी तो ये सोचे,  कभी ना कोई रुसवाई हो!
सपनों में ही सोचकर ये सब, बस ये फ़ौजी सो जाता है!
बहना इसकी बात जोहे ये कब राखी पर घर आता है!!


देखकर अपनी सुनी कलाई, दिल इसका भी तो रोता है!
सीमा की हलचल झेल, देश मे बीज शांति का बोता है!
दुश्मन के आगे डटा रहे, ये कब नींद चैन की सोता है!
बस इतना ही काफी नही, ये अपनी जान भी खोता है!
मौन रहकर सब सहता ये, इसका ना दिल बैठा जाता है!
बहना इसकी बाट जोहे, ये कब राखी पर घर आता है!!


और कुछ कर ना पाएं, तो निकले दुआ हमारे दिलों से!
जान इनकी रखना सलामत, सामने खड़े कातिलों से!
आपस मे प्यार बना रहे, दूर रहे ये हर शिकवे गिलो से!
हार का ना मुँह देखे कभी, लौटें जीतकर हर किलों से!
अपना मन रखने को ये, कईबार खुद से भी बतियाता है!
बहना इसकी बाट जोहे ये कब राखी पर घर आता है!!


सुषमा मलिक "अदब"
रोहतक (हरियाणा)



"कुदरत की पनाहें"

"कुदरत की पनाहें"

 

आओ कि बाहें खोल दी हैं कुदरत ने ,

हमारे, तुम्हारे, हम सबके लिए ,

सारे विक्षोम, विषाद- अवसाद के,

 स्याह धुएं  को तिरोहित कर ,

  यहां सुकूं- शांति की यहां शुद्ध सांस लें,

 कुदरत की अद्भुत

 कारीगरी हमें भी, देना सिखा जाएगी।

 

 

 

अगवानी में यह पलक पांवड़े बिछाए,

  सुमनों से लक-दक सुंदर तरुवर ,

आगत पर बरसने, बिखरने, 

स्वागत -अभिनंदन को हो रहे आतुर,

इन राहों पर चल के तो देखो ,

मुस्कुराहटों की कलियां खिल पड़ेगी।

 

 

आनंद की सृष्टि अगर कहीं है,

 बस कुदरत के सानिध्य में ,

 इस नेमत को दिल में उतारो ,

संवारो और निखारो तो सही,

पंचमहाभूत से बनी प्रकृति को,

 प्रकृति में ही प्रतिष्ठित कर ही,

 असीम आनंद - ऊर्जा की 

मंजिलें करीब आ जाएंगी।

 

@अनुपमा अनुश्री

साहित्यकार ,कवयित्री ,रेडियो -टीवी एंकर, समाजसेवी

 भोपाल