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Saturday, June 6, 2020

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संत कबीर दास जयंती एवं विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में वेबिनार का आयोजन 

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संत कबीर दास जयंती एवं विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में वेबिनार का आयोजन 

 

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा दिनांक 5 जून 2020 को संत कबीर दास जयंती एवं विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में दो सत्रों में विडियो चर्चा का आयोजन किया गया | कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार, राष्ट्र किंकर के संपादक, डॉ. विनोद बब्बर द्वारा की गयी । प्रथम सत्र में डॉ. करुणा शर्मा, साहित्यकार एवं लेखिका द्वारा “संत कबीर के काव्य में भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति" विषय पर प्रकाश डाला गया तथा द्वितीय सत्र में श्री मिथिलेश कुमार सिंह, लेखक एवं तकनीकी विशेषज्ञ ने “जैव विविधता का संरक्षण" विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया । दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के अधिकारियों/ कर्मचारियों तथा अन्य लोगों ने वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग द्वारा कार्यक्रम में भाग लिया ।


प्रथम सत्र में डॉ. करुणा शर्मा ने संत कबीर दास जी के दोहों का व्याख्यान करते हुए उनके जीवन परिदृश्य का विस्तृत दर्शन करवाया तथा तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध उनके द्वारा मानव चेतना को जगाने हेतु दिए गए योगदान का भी उल्लेख किया । वक्ता ने अपने वक्तव्य में विषय  पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता जीवन में सरलता और आडम्बरों का विरोध किया गया है I

द्वितीय सत्र में श्री मिथिलेश कुमार सिंह ने स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्ता  ग्रेटा थुनबर्ग का उदाहरण देते हुए कहा कि पर्यावरण के संरक्षण हेतु वह हमारी प्रेरणा श्रोत होनी चाहिए । उन्होंने श्रोताओं को बताते हुए कि किस प्रकार मानव क्रियाओं के प्रभाव से अनेक जीव जंतु लुप्त हो चुके हैं और अनेकों लुप्त होने की कगार पर हैं सभी से जैव संरक्षण हेतु आवाज़ उठाने और क्रियाशील होने का आह्वाहन किया ।

डॉ. विनोद बब्बर द्वारा दोनों विषयों पर प्रकाश डालते हुए श्रोताओं से कबीर दास जी के दोहों से सीख लेते हुए कर्तव्य पथ पर चलने तथा पर्यावरण का संरक्षण करने हेतु अनेक वृतांतों के माध्यम से प्रेरित किया ।

अंत में श्री आर. के. मीणा, वरिष्ठ पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी, दि.प.ला. द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ ।


Friday, June 5, 2020

कबीर प्रेम की पीर के विलक्षण कवि हैं – प्रो शर्मा  कबीर के बहुमुखी अवदान पर एकाग्र राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी सम्पन्न  संत कबीर जयंती पर आयोजित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में अनेक राज्यों के अध्येताओं ने भाग लिया

कबीर प्रेम की पीर के विलक्षण कवि हैं – प्रो शर्मा 

कबीर के बहुमुखी अवदान पर एकाग्र राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी सम्पन्न 

संत कबीर जयंती पर आयोजित राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में अनेक राज्यों के अध्येताओं ने भाग लिया

 

उज्जैन। राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन द्वारा संत कवि कबीर जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के अध्येताओं ने भाग लिया। आयोजन के प्रमुख अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा थे। प्रो शर्मा ने अपने व्याख्यान में कहा कि कबीर प्रेम की पीर के विलक्षण कवि हैं। उन्होंने प्रेम तत्त्व को इस संसार के लिए परम आवश्यक माना है। वे लोक की पीड़ा से व्यथित थे, इसलिए उन्हें नींद कैसे आ सकती थी। प्रेम के व्यावहारिक और आध्यात्मिक मर्म को उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। वे स्वयं तो प्रेम रस में निमग्न थे ही, संसार को भी इस सरस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनकी रचनाएं लोक ग्राह्य रूपकों के माध्यम से प्रेम पंथ की चुनौतियों और महिमा को व्यक्त करती हैं। आज विश्व मानवता का उद्धार प्रेम की पीर के माध्यम से संभव है। शुष्क ज्ञान  नहीं, प्रेम के माध्यम से संसार को बदला जा सकता है। सामाजिक विषमता, अलगाव और हिंसा का जवाब कबीर के प्रेम तत्त्व में है।

 

राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ रचनाकार श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई ने की। उन्होंने कहा कि कबीर अहिंसा प्रेमी और मानवतावादी कवि थे। आज के संकटकालीन दौर में उनके सन्देशों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। संगोष्ठी में डॉक्टर शहाबुद्दीन  नियाज मोहम्मद शेख, अहमदनगर, डॉक्टर प्रभु चौधरी, वरिष्ठ कवि श्री राकेश छोकर, श्री जितेंद्र पांडे, नई दिल्ली आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। 

 

आयोजन में दिल्ली के वरिष्ठ कवि श्री राकेश छोकर, डॉ संजीव कुमारी, पानीपत, पुनीता कुमारी, नई दिल्ली, डॉ रूपाली चौधरी, पुणे, डॉ सुशीला पाल, मुम्बई, डॉ विवेक मिश्र, कोटा, डॉ स्नेहलता शर्मा, संजीव पाटिल, पुणे, कवयित्री श्रीमती दीपिका सुतोदिया, गुवाहाटी, महिमा जैन मुरैना, प्रभा बैरागी, उज्जैन, डॉक्टर बलिराम धापसे, औरंगाबाद, डॉ जितेंद्र पाटिल, संगमनेर, डॉ श्वेता पंड्या, पायल परदेशी, महू, डॉ सागर चौधरी, डॉ  श्रीराम सौराष्ट्रीय, डॉ कविता सूर्यवंशी, तारा वाणिया, प्रियंका परस्ते आदि सहित देश के अनेक राज्यों के शिक्षाविद, साहित्यकार और अध्येताओं ने भाग लिया।

 

प्रारंभ में आयोजन की रूपरेखा एवं स्वागत भाषण संस्था अध्यक्ष डॉक्टर प्रभु चौधरी ने प्रस्तुत किया। शुरुआत में सरस्वती वंदना कवयित्री श्रीमती रागिनी शर्मा, इंदौर ने की।

 

राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का संचालन रागिनी शर्मा, इंदौर ने किया। आभार साहित्यकार श्री सुंदर लाल जोशी, नागदा ने माना। 


 

कविता. मन का चैन

कविता. मन का चैन


झील गहरी आंखों का जादू करें मन को बैचेन। 

अधर मुस्कराये नयन की बोली से मन को चैन।।

सुरमई शाम छिप रहा सूरज आ रही मद भरी रैन।

कुसुम पंखुड़ियों में बंद मधुप रसास्वादन करे सारी रैन।। 

सूरज की किरणें कुसुम पे पडे मधुप भागे कर बैचेन। 

मधुप का इंतजार करते राह तकते तकते थक गए नैण।। 

बदली देख पपीहा मांगे नीर बूंद खोल के नैण। 

घटायें बरसे पपीहा तरसे न मिले नीर बूंद मन हो बैचेन।। 

तेरी सुरीली आवाज की खनक कर दे दिल मन बैचेन।। 

बन संवर के इठलाये गहरी नजर कर दे मन को बैचेन।। 

 

हीरा सिंह कौशल गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी


Vyakhyan.........


विश्व पर्यावरण दिवस(5 जून) एवं कबीर जयंती पर विशेष रचना

विश्व पर्यावरण दिवस(5 जून) एवं कबीर जयंती पर विशेष रचना

 

   धरती की करुण पुकार

 

पर्यावरण के सामने  , संकट है गंभीर

प्रदूषित हो गए है आज हवा,थल,नीर ।।

 

चला रहें पेडों पर अॉरी,कुल्हाड़ी,तीर

स्वार्थ में  खो गए,न जानी इनकी पीर ।।

 

जंगल से गायब हो गए हाथी,शेर और मोर 

रहे ये कैसे जब न हो पेड,पक्षियों का शोर ।।

 

धरती रही पुकार बचा लो मुझे नंदकिशोर

पेडों में है मेरे प्राण , पेड लगाओं चहुँओर ।।

 

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 मन  का  आइना ,  दोहा  मन  की  पीर ।

कभी हाथ का दीप हैं ,कभी बने शमशीर ।।

 

बहता तो दोनो जगह ,नदी,नयन में नीर ।

एक बुझाता प्यास को,एक बहाता पीर ।।

 

दर्द सिंधु - सा हो गया , गहन  और  गंभीर ।

तब गीतों में बूँद - भर, छलका उसका नीर ।।

 

कष्ट  चुनौती  मानिये , कहते  पीर , फकीर ।

मरने कभी न दीजिए ,निज आँखों का नीर ।।

 

दोहा - गीत के फेर में ,  उलझें  राँझा-हीर ।

अर्थ  प्रेम  का  बाँचने ,आओं पुनः कबीर ।।

 

हमने   नापी  उम्र-भर , शब्दों  की  जागीर ।

ढाई आखर लिख हुए ,जग में अमर कबीर ।।

 

पीड़ा जब मन में बसी ,तन-मन हुए अधीर ।

रोम - रोम गाने लगा , बनकर  दास कबीर ।।

                  गोपाल कौशल

              नागदा जिला धार म.प्र.


Thursday, June 4, 2020

कविता...

(1)कविता...

 

उस स्याह काली रात की दास्तान आखिर

कौन लिखेगा...??? 

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जब हम मरने लगे और

आंकड़ों में सिमटने लगे 

ये उस समय की बात है

जब मजदूर बहुत ही 

आडे वक्त से गुजर रहा था 

जिसने इस देश को बनाया, 

रचाया, सजाया था !! 

 

जब, तुम सोते थे तब हम 

जगते थें. तुम अपनी मुकम्मल

नींद पूरी करो इसके लिए हम 

जगते रहे!! 

 

सोचा, कभी तुम भी हमारे लिए 

जगोगे, लेकिन, नहीं, तुम अपनी

नींद सोते रहे और सुनहरे ख्वाब

देखते रहे तुम्हारे सपनों के लिए 

भी हमें जगना था!! 

इसलिए भी हम जगते रहे!! 

 

फिर, एक स्याह- काली रात 

में हम पटरियों पर थककर

सो गये तो सोचा तुम हमें

जगाओगे!! 

 

बहुत दिनों से जगते आ रहे थें

इसलिए गहरी नींद आ गयी  

और, हम गहरी नींद सो गए!! 

 

सुबह , हम सोकर नहीं उठे

क्योंकि, तुमने हमें जगाया

ही नहीं!! 

 

मरने के बाद हम 

आंकड़े बन गए, लोग- बाग 

दुखी होकर कहते कि कल 

रात सोलह मजदूर ट्रेन से 

कटकर मर, गये, कि उसके

अगले दिन 24 मजदूर कंटेनर

दुर्घटना में मर गये. तो कहीं 

हृदय गति रुक

जाने से कोई मजदूर मर गया!! 

 

हम सारे देश को पालते रहे

लेकिन, देश ने दो महीनों में

अपनी औकात दिखा दी . 

 

हम भूखे थे, हम पैदल चले, हमारे

बच्चे भूख से बिलबिलाते रहे !! 

कभी  ट्रेन से कटकर ,कभी पैदल, 

चलते हुए, तुम्हें स्वाभिमानी बनाने

के लिए हम ने अपना सबकुछ 

दांव पर लगा दिया!! 

 

इस देश का जी. डी. पी.

बढाने के लिए हमने आपना

खून -पसीना जला दिया!! 

 

आखिर, वो कौन सा हाकिम था 

जिसे हमने बीसियों बार फोन 

किया लेकिन उसने हमारी कोई

खबर ना ली

और ना ही  हमें,  सकुशल 

अपने घर भिजवा पाया!! 

 

हाकिम भी मालिक की तरह सोता

रहा, अपने एयर कंडीशन कमरे 

में, क्योंकि हाकिम की जगह हम 

जगते रहे, देश को गढने के लिए!! 

 

लेकिन, इन सोलह मौतों की गवाह

वो स्याह काली रात है, वो पटरियां हैं

वो रोटियां हैं , वो 

पटरियों पर फैले खून

के धब्बे हैं!! 

 

क्या हमारी मौत का मुकदमा भी 

किसी अदालत में चलेगा..?? 

 

जिस हाकिम को बीसियों बार हमने

फोन किए, उस हाकिम के खिलाफ

कौन फैसला सुनाएगा .!!??? 

 

एक हाकिम दूसरे हाकिम 

के खिलाफ कैसे फैसला देगा  !!?? 

 

इन सोलह मौतों के गवाह हैं वो 

स्याह काली रात, वो चांद, वो 

रोटियां, वो पटरियों पर पडे

खून के घब्बे ,  !! 

 

क्या इनकी गवाही काफी होगी 

हाकिम को कटघरे में खडा करने 

के लिए??

 

आखिर, उस स्याह 

काली रात की दास्तान

कौन लिखेगा...??? 

 

(2)कविता...

 

इन सबकी एक भाषा होती है...!! 

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दुख, में जब हम होते हैं

तो उसकी कोई

अलग भाषा नहीं होती!! 

 

भूख की तकलीफ भी

लगभग एक जैसी

होती हैं!! 

 

मजबूर लोगों

की बेकसी भी लगभग

एक जैसी होती है  !! 

 

प्रेम के स्वरुप भी

लगभग एक जैसा होता है

लोगों के दिलों में  !! 

 

चीखते वक्त भी हम 

एक ही तरह चीखते हैं! 

 

इस तरह से देखा जाए तो

उदासी के लम्हें भी

एक से होते हैं  !! 

 

इंतजार का समय भी

लगभग एक जैसा होता है  !! 

 

इबादत में अपने इष्ट

को हम एक तरह से याद करतें 

हैं!! 

 

दुख, भूख, मजबूरी, प्रेम, 

चीखें, उदासी, इबादत और इंतजार, 

ये ऐसी चीजें हैं जिनको पहचाने के लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं होती !! 

 

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(3)कविता.. 

 

जैसपर रीड

और मुकेश तुम्हें अनेकों  साधुवाद... 

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तुम आए

थे सात समुन्दर 

पार से करने को 

व्यापार, लेकिन थे

तो तुम भी इंसान  !! 

 

ऐसे मुश्किल वक्त में 

जब राजनीतिक लोग

राजनीतिक रोटियां 

सेंकने में लगे थें!! 

 

लोग बस - बस 

खेल रहे थें! 

और मजदूर 

उनके लिए 

बन गये थे सिरर्दर्द!! 

 

सचमुच, उस समय

भूख

भूख और भूख ही था

मजदूरों के दिमाग में!! 

 

मजदूर मानसिक 

रूप से भी पीड़ित थें

और शारीरिक रूप से ,

भी   !! 

 

तुमने हरियाणा रोडवेज

को दस बसें भी दीं

ताकि, मजदूर अपने

घरों तक जा सकें!! 

 

कैसे शुक्रिया अदा करूँ

तुम्हारा मेरे पास शब्द

नहीं हैं, तुम्हारे लिए!! 

 

तुम्हें और मुकेश के दिल 

में चोटिल मजदूरों के प्रति

जो दया की भावना थी 

और जो कुछ तुमने  उन 

बेघर लोगों को लिए किया.

 

वो सचमुच तुम्हारे लिए

हम भारतीय के दिलों में

तुम्हारे प्रति श्रद्धा के भाव

पैदा करता है  !! 

 

लाकडाउन के पहले 

हफ्ते से तुमने 30

लोगों को खाना खिलाना

शुरू किया, सांतवे -आठवें 

सप्ताह तक छह हजार लोगों 

को खाना खिलाने लगे.

 

दो - सौ लोगों को रोज

कच्चा राशन किट 

मुहैया करवाते रहे  !! 

 

तुम अकेले नहीं थें

इस मुहिम में उन

अज्ञात 

इक्कीस देशों को भी 

शुक्रिया!!

 

जिन्होनें

दो करोड़ रुपये देकर 

हमारी मदद की थी 

उनके लिए भी हम भारतीय

सदैव तुम्हारे ऋणी रहेंगें!! 

 

मेरे पास अलफ़ाज़ नहीं हैं

जैसपर  , और मुकेश!! 

तुम हमेशा मेरी कविता

और हम भारतीयों के दिलों 

में रहोगे!! 

कविता....

कविता....

 

(1)घर-2...... 

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खांसते-खांसतें

आज जब सांसें

फूलने लगी तो मैं

भी उठकर चला गया

वेशिन पर 

थूकने अपना बलगम !! 

 

तभी, बहुत सालों

के बाद पिता याद आए! 

 

वही पिता जिनको

ठंढ से बड़ी

तकलीफ होती! 

 

सर्दियों के दिनों

में उनकी तकलीफ

और,बढ जाती ! 

 

वो भी खांसते

खांसते  अचानक

से उठकर 

वेशिन के पास

आकर खड़े हो

जाते! 

 

और, 

थूकते उसमें ढेर 

सारा बलगम! 

 

किसी एक सर्दियों

के सालों

में  ही पिता ने बताई

थी मुझे एक बात 

कि मेरे मरने के बाद 

भी तुम दोनों भाई कभी 

अलग मत

होना घर से! 

 

कि घर को बनाने में 

कुछ महीने या साल

लगते हैं! 

 

लेकिन, घर को बसाए 

रखना बहुत मुश्किल है! 

 

उस समय मैं, बहुत 

छोटा था, 

उनकी बात समझ

नहीं पाया था! 

 

सालों की सर्दियां बीतीं

ये समझने में कि घर

बनाने और बसाने 

में  क्या अंतर  है ! 

 

इस, बीच पिता

नहीं रहे ! और, बड़े

भाई अलग -थलग

रहने लगे!

 

(2)कविता...

 

हादसे का धर्म.... 

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एक छोटे से बच्चे

के मुंह से सुनकर 

मैं अवाक रह गया! 

 

जब उसने कहा

कि क्या हुआ 

जो किसी विमान 

हादसे में

100 लोग मारे गये! 

 

ये हादसा हमारे देश 

में तो नहीं हुआ ना  ! 

 

वैसे भी वो मुस्लिम 

देश है!

 

मैं सोच रहा था 

कि मरने के बाद लोगों का

धर्म क्या होता होगा!!?? 

 

जरुरी नहीं कि मरने वाले

सारे लोग मुसलमान ही

रहें हो , उसमें कुछ हिंदू

सिख ,पारसी, जैनी भी रहें

होंगे , 

 

या कुछ यहुदी, ईसाई,

या बौद्धिष्ट भी रहें होंगे! 

 

कि क्या मरने वाले लोगों

के परिजनों की भावनाएं

भी अलग- अलग रही 

होंगीं?? 

 

कि क्या उनकी 

आंसूओं का खारा पन 

भी अलग -अलग रहा

होगा..!!?? 

 

पता नहीं कौन इन

बच्चों में इतना 

जहर भर रहा है  ! 

 

कुछ भी हो हमें

बचाना होगा बच्चों 

को इस जहर से  !!

 

नहीं तो आने वाली

नस्लें बर्बाद हो जाएंगे!! 

 

(3)कविता....

 

दंगें में जली दुकानें  ! 

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दंगें की खबरें

जिन इलाकों में सुनाई  पडतीं है

वो इलाका कर्फ्यू के हवाले

हो जाता है!

 

और बंद हो जाती है

 दुकानें! 

 

इसमें मारे जाते हैं

निरीह लोग.. 

जलाई जाती हैं

दुकानें! 

 

कत्ल कर दिए जाते हैं 

बेतहाशा लोग, 

बच्चे, बूढ़े, और जवान! 

 

दंगाई जलाते समय 

नहीं सोचते कि 

कितनी कुर्बानियों

के बाद एक दुकान

खडी़ की जाती है! 

 

कभी- कभी 

दुकान खडी़ करने में

बिक जाते हैं

आडे वक्त में काम 

आने वाले गहने! 

 

कि तैयार करने में

किसी दुकान को 

अपनी कई-कई

जरूरतों

को आज की जगह

कल पर टाला जाता है! 

 

कि पेट काट - काटकर 

थोडे़ थोडे़ पैसे से 

खडी़ की जाती है दुकान! 

 

दुकानें आसरा होतीं हैं

रोटी की जुगाड़ के लिए! 

 

जिसके, पीछे पलते हैं 

 परिवार!! 

 

महेश कुमार केशरी

C/O-मेघदूत मार्केट फुसरो 

 बोकारो झारखंड

पिन -(829144)

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Aksharwarta International Research Journal - October - 2026 Issue