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Monday, May 18, 2020

डॉo सत्यवान सौरभ की रचनायें

(1)योद्धा बनें,आज वतन की आस !!


लोग सभी खामोश हैं, दुबके सभी प्रधान !
सरकारी सेवक बनें, सब के दयानिधान !!

कोरोना से लड़ रहे, भूलें आज थकान !
जज्बा इनका देखकर, ईश्वर है हैरान !!

कामचोर जिनको कहा, माना सदा दलाल !
खड़े साथ हैं आपके, देखो वो हर हाल !!

द्वारे-द्वारे हैं खड़े, सिविल सेवादार !
जीत-जीतकर मोर्चे,  सांस रहे वो हार !!

नेता के दौरे नहीं, सड़कें हैं सुनसान !
आकर तुमसे पूछते,अब वो सेवक ध्यान !!

जिनको तुमने फाँसने, करतब किये हज़ार !
बचा रहें हैं आज वो, सपनों का संसार !!

सौरभ हर पल लड़ रहे, विपद काल के शाह !
दिखा रहे तुमको सही, वक्त पड़े की राह !!

नर-नर रोया दुःख में, कोय न बैठा पास !
कोरोना योद्धा बनें,आज वतन की आस !!

कोरोना योद्धा सभी, करें यही अरदास !
सौरभ अब तो मानिये, उनके किये प्रयास !!

✍ #सत्यवान #सौरभ

 

 

(2)  देख हाल मजदूर का,है सौरभ अफ़सोस

बदले सबके रूप है, बदले सबके रंग
मगर रहे मजदूर के, सदा एक से ढंग

देख हाल मजदूर का, है सौरभ अफ़सोस
चलता आये रोज पर,  दूरी उतने कोस

जब-जब बदले कायदे, बदली है सरकार
मजदूरों की पीर में, खूब हुई भरमार

बांध-बांध कर थक गए, आशाओं की डोर
आये दिन ही दुख बढे, मिला न कोई छोर

चूल्हा ठंडा है पड़ा, लगी भूख की आग
सुना रही सरकार है, मजदूरों के राग

रूप विधाता दोस्तों, होता है मजदूर
जग को सदा सुधारता, चाहे हो मजबूर

मजदूरों के हाथ हैं, सपनों की तस्वीर
इनसे सौरभ जुड़ी, हम सबकी तकदीर

 ✍ सत्यवान सौरभ

 

(3)   सोता हूँ माँ चैन से,जब होती हो पास!! 

नारी मूरत प्यार की,ममता का भंडार!
सेवा को सुख मानती,बांटे खूब दुलार!!

 तेरे आँचल में छुपा,कैसा ये अहसास!
 सोता हूँ माँ चैन से,जब होती हो पास!!  

 बिटिया को कब छीन ले,ये हत्यारी रीत !
घूम रही घर में बहू,हिरणी-सी भयभीत !!

 अपना सब कुछ त्याग के,हरती नारी पीर !
फिर क्यों आँखों में भरा,आज उसी के नीर !!

 नवराते मुझको लगे,यारों सभी फिजूल !
नौ दिन कन्या पूजकर,सब जाते है भूल !!

 रोज कहीं पर लुट रही,अस्मत है बेहाल !
खूब मना नारी दिवस,गुजर गया फिर साल !!

 थानों में जब रेप हो, लूट रहे दरबार !
तब सौरभ नारी दिवस, लगता है बेकार !!

 जरा सोच कर देखिये, किसकी है ये देन !
अपने ही घर में दिखें, क्यों नारी बेचैन !!

 रोज कराहें घण्टिया, बिलखे रोज अजान !
लुटती नारी द्वार पर, चुप बैठे भगवान !!


 नारी तन को बेचती, ये है कैसा दौर !
मूर्त अब वो प्यार की, दिखती है कुछ और !!

 

(4)   बच पाए कैसे सखी, अब भेड़ों का गाँव !!

 

नई सुबह से कामना, करिये बारम्बार!
हर बच्चा बेखौफ हो, पाये नारी प्यार !!

 छुपकर बैठे भेड़िये, देख रहे हैं दाँव !
बच पाए कैसे सखी, अब भेड़ों का गाँव !!

 मोमबत्तियां छोड़कर, थामों अब तलवार !
दिखे जहाँ हैवानियत, सिर दो वहीं उतार !!

 जीवन में आनंद का, बेटी मंतर मूल !
इसे गर्भ में मारकर, कर  ना देना भूल !!

 बेटी कम मत आंकिये, गहरे इसके अर्थ !
कहीं लगे बेटी बिना, तुम्हे ये सृष्टि व्यर्थ !!

 बेटी होती प्रेम की, सागर एक अथाह !
मूरत होती मात की, इसको मिले पनाह !!

 छोटी-मोटी बात को, कभी न देती तूल !
हर रिश्ते को मानती, बेटी करें न भूल !!

 बेटी माँ का रूप है, मन ज्यों कोमल फूल !
कोख पली को मारकर, चुनों न खुद ही शूल !!

 बेटी घर की लाज है, आँगन शीतल छाँव !
चलकर आती द्वार पर, लक्ष्मी इसके पाँव !!

 बेटी चढ़े पहाड़ पर, गूंजे नभ में नाम !
करती हैं जो बेटियाँ, बड़े -बड़े सब काम !!

 बेटी से परिवार में, पैदा हो सम-भाव !
पहले कलियाँ ही बचें, अगर फूल का चाव !!

 बिन बेटी तू था कहाँ, इतना तो ले सोच !
यही वंश की बेल है, इसको तो मत नोच !!

 हर घर बेटी राखिये, बिन बेटी सब सून !
बिन बेटी सुधरे नहीं, घर, रिश्ते, कानून !!

 सास ससुर सेवा करे, बहुएं करतीं राज ।
बेटी सँग दामाद के, बसी मायके आज ।।

 आये दिन ही टूटती, अब रिश्तों की डोर !
बेटी औरत बाप की, कैसा कलयुग घोर !!

 (5)   लड़कियां,

 

कभी बने है छाँव तो, कभी बने हैं धूप !
सौरभ जीती लड़कियां, जाने कितने रूप !!

 जीती है सब लड़कियां, कुछ ऐसे अनुबंध !
दर्दों में निभते जहां, प्यार भरे संबंध !!

 रही बढाती मायके, बाबुल का सम्मान !
रखती हरदम लड़कियां, लाज शर्म का ध्यान !!

 दुनिया सारी छोड़कर, दे साजन का साथ !
बनती दुल्हन लड़कियां, पहने कंगन हाथ !!

 छोड़े बच्चों के लिए, अपने सब किरदार !
बनती है माँ लड़कियां, देती प्यार दुलार !!

 माँ ,बेटी, पत्नी बने, भूली मस्ती मौज !
गिरकर सम्हले  लड़कियां, सौरभ आये रोज !

 नींद गवाएँ रात की, दिन का खोये चैन !
नजर झुकाये लड़कियां, रहती क्यों बेचैन !!

 कदम-कदम पर चाहिए, हमको इनका प्यार !
मांग रही क्यों लड़कियां, आज दया उपहार !!

 बेटी से चिड़िया कहे, मत फैलाना पाँख!
आँगन-आँगन घूरती, अब बाजों की आँख !!

 लुटे रोज अब बेटियां, नाच रहे हैवान !
कली-कली में खौफ है, माली है हैरान !!

 आज बढ़े-कैसे बचे, बेटी का सम्मान !
घात लगाए ढूंढते, हरदम जो शैतान !!

 दुष्कर्मी बख्सों नहीं, करे हिन्द ये मांग !
करनी जैसी वो भरे, दो फांसी पर टांग !!

 बेटी मेरे देश की, लिखती रोज विधान !
नाम कमाकर देश में, रचें नई पहचान !!

 बेटे को सब कुछ दिया, खुलकर बरसे फूल !
लेकिन बेटी को दिए, बस नियमों के शूल !!

 सुरसा जैसी हो गई, बस बेटे की चाह !
बिन खंजर के मारती, बेटी को अब आह !!

 झूठे नारो से भरा, झूठा सकल समाज!
बेटी मन से मांगता, कौन यहाँ पर आज!!

 बेटी मन से मांगिये, जुड़ जाये जज्बात !
हर आँगन में देखना, सुधरेगा अनुपात !!

 झूठे योजन है सभी, झूठे है अभियान !
दिल में जब तक ना जगे, बेटी का अरमान !!

 अब तो सहना छोड़ दो, परम्परा का दंश!
बेटी से भी मानिये, चलता कुल का वंश!

 बेटी कोमल फूल- सी, है जाड़े की धूप!
तेरे आँगन में खिले, बदल-बदलकर रूप !!

 सुबह-शाम के जाप में, जब आये भगवान !
बेटी घर में मांगकर, रखना उनका मान !!

 शिखर चढ़े हैं बेटियां, नाप रही आकाश !
फिर ये माँ की कोख में, बनती हैं क्यों लाश !!

 

(5)

 

माँ ममता की खान है, धरती पर भगवान !
माँ की महिमा मानिए, सबसे श्रेष्ठ-महान !!

 माँ कविता के बोल-सी,कहानी की जुबान !
दोहो के रस में घुली, लगे छंद की जान !!

 माँ वीणा की तार है, माँ है फूल बहार !
माँ ही लय, माँ ताल है,जीवन की झंकार !!

 माँ ही गीता, वेद है, माँ ही सच्ची प्रीत !
बिन माँ के झूठी लगे, जग की सारी रीत !

 माँ हरियाली दूब है, शीतल गंग अनूप !
मुझमे तुझमे बस रहा, माँ का ही तो रूप !!
 
माँ तेरे इस प्यार को, दूँ क्या कैसा नाम !
पाये तेरी गोद में, मैंने चारों धाम !!

 ✍सत्यवान सौरभ, 

 

(6)  मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए !!



 


 



कर दे जो मन को तृप्त  
ऐसा एक उपहार चाहिए !
बुझ जाये इस मन की प्यास ,
मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए !!

चाहता अब मन नहीं , झरने सा व्याकुल बहना !
चुभन काँटों की लिए , डूबा यादों में रहना !!

दर्द का जो स्वाद बदल दे
मुझे वो अहसास चाहिए !
बुझ जाये मन की प्यास ,
मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए !!

जब- जब तुझपे गीत लिखा ,  नाम तेरे मेरे मीत लिखा !
 कैसे भूले तुझको साथी , हार को  मैंने जीत लिखा !!

पास बैठकर बात करो तुम,
मुझे न अब इंतज़ार चाहिए !
बुझ जाये इस मन की प्यास ,
मुझे  तुम्हारा प्यार चाहिए !!

 उजड़ा-उजड़ा जीवन ये , घूँट पीड़ा के पी रहा !
 आकर देखो साथियाँ, कैसे हूँ मैं जी रहा !!

चहक उठे मेरा घर-आँगन ,
तेरे दुपट्टे की बहार चाहिए !!
बुझ जाये इस मन की प्यास ,
मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए !!

 

  ✍सत्यवान सौरभ,   

 

(7) दोहा गीत

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समय सिंधु में क्या पता, डूबे; उतरे पार !


छोटी-सी ये ज़िंदगी, तिनके-सी लाचार !!


★


सुबह हँसी, दुपहर तपी, लगती साँझ उदास !


आते-आते रात तक, टूट चली हर श्वास !!


पिंजड़े के पंछी उड़े, करते हम बस शोक !


जाने वाला जायेगा, कौन सके है रोक !!


★


होनी तो होकर रहे, बैठ न हिम्मत हार !


समय सिंधु में क्या पता, डूबे; उतरे पार !!


★


पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव !


कैसे पहुंचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव !!


रुको नहीं चलते रहो, जीवन है संघर्ष !


नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष !!


★


तपकर दुःख की आग में, हमको मिले निखार !


समय सिंधु में क्या पता, डूबे; उतरे पार !!


★


दुःख से मत भयभीत हो, रोने की क्या बात !


सदा रात के बाद ही, हँसता नया प्रभात !!


चमकेगा सूरज अभी, भागेगा अँधियार !


चलने से कटता सफ़र,चलना जीवन सार !!


★


काँटें बदले फूल में, महकेंगें घर-द्वार !


समय सिंधु में क्या पता, डूबे; उतरे पार !!


छोटी- सी ये ज़िंदगी, तिनके सी लाचार !!


★


•••••••••••••••••••✍ #सत्यवानसौरभ


स्वरचित/मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित


  

 

(8)पहले जैसा प्यार !!

मतलबी रिश्ते-मित्रता, होते नहीं खुद्दार !
दो पल सुलगे कोयले, बनते कब अंगार !!


आखिर किस पे अब यहाँ, करे स्व: ऐतबार!!
करते हो जब खास ही, छुपकर हम पे वार !!


घर में पड़ी दरार पर, करो मुकम्मल गौर !
वरना कोई झाँक कर, भर देगा कुछ और !!


रिश्तों में जब भी कभी, एक बने अंगार !
दूजा बादल रूप में, तुरंत बने जलधार !!


सुख की गहरी छाँव में, रिश्ते रहते मौन !
वक्त करे है फैसला, कब किसका है कौन !!


मित्र मिलें हर राह पर, मिला नहीं बस प्यार !
फेंक चलें सब बाँचकर, समझ मुझे अखबार !!


अब ऐसे होने लगा, रिश्तों का विस्तार !
जिससे जितना फायदा, उससे उतना प्यार !!


फ्रैंड लिस्ट में हैं जुड़े, सबके दोस्त हज़ार !
मगर पड़ोसी से नहीं, पहले जैसा प्यार !!


भैया खूब अजीब है, रिश्तों का संसार !
अपने ही लटका रहें, गर्दन पर तलवार !!


अब तो आये रोज ही, टूट रहें परिवार !
फूट-कलह ने खींच दी, आँगन बीच दीवार !!


कब तक महकेगी यहाँ, ऐसे सदा बहार !
माली ही जब लूटते, कलियों का संसार !!


✍ सत्यवान सौरभ


 

 

 

(9)   बापू बैठा मौन

 

बल रहे रिश्ते सभी, भरी मनों में भांप !

ईंटें जीवन की हिली, सांस रही हैं कांप !!


बँटवारे को देखकर, बापू बैठा मौन !
दौलत सारी बांट दी, रखे उसे अब कौन !!


नए दौर में देखिये, नयी चली ये छाप !
बेटा करता फैसले, चुप बैठा है बाप !!


पानी सबका मर गया, रही शर्म ना साथ !
बहू राज हर घर करें, सास मले बस हाथ !!


कुत्ते बिस्कुट खा रहे, बिल्ली सोती पास !
मात-पिता दोनों करें, बाहर आश्रम वास !!


चढ़े उम्र की सीढियाँ, हारे बूढ़े पाँव !
आपस में बातें करें, ठौर मिली ना छाँव !!


कैसा युग है आ खड़ा, हुए देख हैरान !
बेटा माँ की लाश को, नहीं रहा पहचान !!


कोख किराये की हुई, नहीं पिता का नाम !
प्यार बिका बाजार में, बिल्कुल सस्ते दाम !!


भाई-भाई से करें, भीतर-भीतर जंग !
अपने बैरी हो गए, बैठे गैरों संग !!


रिश्तों नातों का भला, रहा कहाँ अब ख्याल !
मात-पिता को भी दिया, बँटवारे में डाल !!


कैसे सच्चे यार वो, जान सके ना पीर !
वक्त पड़े पर छोड़ते, चलवाते हैं तीर !!




Sunday, May 17, 2020

असमाप्त लिप्सा और दोहन से उपजे कोविड संकट से मुक्ति की राह है भारत - प्रो शर्मा  अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में व्याख्यान दिया प्रो शर्मा ने 

उज्जैन। शोध धारा शोध पत्रिका, शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान, उरई, उत्तर प्रदेश एवं भारतीय शिक्षण मंडल, कानपुर प्रान्त के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के समापन दिवस पर  व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की। यह संगोष्ठी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और भारत राष्ट्र : चुनौतियां संभावनाएं और भूमिका पर केंद्रित थी। 

संगोष्ठी में व्याख्यान देते हुए प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि वर्तमान विश्व मनुष्य की असमाप्त लिप्सा और अविराम दोहन से उपजे संकट को झेल रहा है। अंध वैश्वीकरण, असीमित उपभोक्तावाद और अति वैयक्तिकता की कोख से उपजे कोविड - 19 संकट ने भारतीय मूल्य व्यवस्था और जीवन शैली की प्रासंगिकता को पुनः नए सिरे से स्थापित कर दिया है। मनुष्य की जरूरतों की पूर्ति के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं। प्रकृति के साथ स्वाभाविक रिश्ता बनाते हुए अक्षय विकास के मार्ग पर चलकर ही इस संकट से उबरा जा सकता है। कोई भी महामारी तात्कालिक नहीं होती, उसके दीर्घकालीन परिणाम होते हैं। इस दौर में उपजे बड़ी संख्या में विस्थापन, भूख, बेरोजगारी और बेघर होने के संकट को सांस्थानिक और सामुदायिक प्रयासों से निपटना होगा। अभूतपूर्व विभीषिका के बीच यह सुखद है कि हम भारतीय जीवन शैली, पारिवारिकता और सामुदायिक दृष्टि के अभिलाषी हो रहे हैं।

व्याख्यान सत्र में गोरखपुर के प्रो सच्चिदानंद शर्मा, पर्यावरण वेत्ता एवं दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर के वनस्पति विज्ञान विभाग के आचार्य डॉ अनिलकुमार द्विवेदी एवं डॉ संतोषकुमार राय, झांसी थे। प्रारम्भ में संगोष्ठी संयोजक डॉ राजेश चन्द्र पांडेय ने अतिथि परिचय एवं स्वागत भाषण दिया।

संचालन डॉ श्रवणकुमार त्रिपाठी ने किया। रिपोर्ट का वाचन डॉ नमो नारायण एवं डॉ अतुल प्रकाश बुधौलिया, उरई एवं आभार प्रदर्शन डॉ राजेश चन्द्र पांडेय ने किया।


'मैं तेरा बेटा हूँ' (कविता

क्या किसी ने ईश्वर को देखा है 

सच तो यह है कि ईश्वर वही है जहां माँ है

 ईश्वर वही है जहां वह रसोई में पसीने से भीगी मेेरे लिए भोजन पकाती है 

और वहां भी जब बुखार में रात भर मेरी पट्टियां बदलती है

 मेरे चोट में मरहम लगाते हुए आंसू बहाते फूँक मारती है 

और वहां जब देर होने पर बाहर की चाबी अपने पास छुपाती है 

मां तू कैसे समझ जाती है मेरे मन के भीतर की उदासी तू कैसे याद रख लेती है मेरी पसंद और नापसंद 

तू कैसे जान लेती है हर चीज छुपाने की जगह 

मां तू कैसे नहीं भूलती मुझे रोज दवा खिलाना

 मेरे थक कर घर आते ही जल्दी से पानी पिलाना 

इस प्रगति और विकास ने मुझे तुझसे बहुत दूर कर दिया है

मुझे अकेले रहने पर मजबूर कर दिया है 

अब मैं तेरे बिना थपकी के आंख मूँदता हूं 

होटल के खाने में वह सुखी रोटी का स्वाद ढूंढता हूं स्कूल जाते समय मेरा सामान मुझे बहुत आसानी से मिल जाते थे माँ 

आज दफ्तर की जल्दबाजी में भी एक रुमाल खोजता हूं

 जब तू पास थी तो मैं दूर भागता

 अब तेरी याद में कई-कई रात जागता हूं 

मैंने जब चलना सीखा तूने ऊँगली थाम 

मुझे सहारा दिया 

आज देख ले कैसा बेटा हूं तेरे लड़खड़ाने के वक्त में तुझे लाठी थमा तुझसे दूर भागता हूं

 मैं जानता हूं तू आज भी दुआ मेरे लिए माँगती है

 मेरे सुख में हंसती दुख में आंसू बहाती है 

तेरा कर्ज चुकाने के लिए यह दिन कुछ कम पड़ेंगे 

तुझे पाने के लिए और एक जनम मांगता हूं

 

श्रीमती रामेश्वरी दास

पता- हरिओम सदन, विकास विहार कॉलोनी, महादेव घाट रोड ,निर्मल हॉस्पिटल के पास, रायपुरा, रायपुर(छत्तीसगढ़)


मरुस्थल सा मैं

मरुस्थल  सा  जीवन  है मेरा,पूर्णतया  निराशा  भरा,

फिर भी कभी-कभी कुछ ओश की बूंदों से मिलता हूँ।

 

सोचता  हूँ  ,  समेट  लू  सबको  अपनी  आगोश  में,

मेरे गर्म एहसास से मिलकर बूंदे भाँप बन उड़ जाती है।

 

गर्म रेतीले मरुस्थल सा मौन जीवन के साथ चल रहा है।

कभी-कभी शाम की ठंडी हवा के मुखर झोंके से मिलता हूँ।

 

अक्सर सोचता हूँ,तोड़ दू सारी बंदिशे अपने मरुस्थल होने की,

बस इन गुदगुदाती ठंडी मुखर हवाओ में अविरल बहता जाओं।

 

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

Saturday, May 16, 2020

‘नावेल टेक्नोलाॅजी एंड जाॅब अर्पाचुनिटी आफ्टर कोविड-19‘ विषय वेबिनार में   डाॅ. बैरागी को मिला आनॅलाईन कोविड प्रमाणपत्र

उज्जैन। एक तरफ जहाँ सारी दुनिया कोराना नामक बीमारी तथा कोविड 19 नामक वायरस से लड़ रही है तो वहीं इस महामारी से बचाव तथा मानव जीवन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव से सारी दुनिया चिंतित है। दुनियाभर की सरकारी तथा निजी संस्थाओं द्वारा इस पर शोधकार्य किया जा रहा है। इसी तारतम्य में 15 मई 2020 को राजस्थान के अलवर स्थित सनराईज विश्वविद्यालय द्वारा ‘नावेल टेक्नोलाॅजी एंड जाॅब अर्पाचुनिटी आफ्टर कोविड-19‘ विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के विद्वानों ने आनलाईन सहभागिता की। उज्जैन से डाॅ. मोहन बैरागी ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये तथा इस महामारी तथा इसके चलते जाॅब अर्पाचुनिटी पर कहा कि भारतीय तकनीकों को अपनाकर आत्मनिर्भर होकर स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाया जाना चाहिये। तथा महामारी की रोकथाम के हर संभव उपाय अपनाना चाहिये। वेबिनार की अध्यक्षता सनराईज विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. अनुप प्रधान ने की तथा मुख्य उदबोधन फार्मेसी विभाग विभागाध्यक्ष डाॅ. योगेन्द्र सिंह ने दिया। वेबिनार के उपरांत सभी प्रतिभागियों को आनॅलाईन प्रमाणपत्र का प्रेषण किया गया।



 रमणिका गुप्ता के काव्य में आदिवासी विमर्श

 रमणिका गुप्ता के काव्य में आदिवासी विमर्श

 

अजय प्रकाश यादव, 

सहायक शिक्षक,

विद्याभारती माध्यमिक विद्यालय,

अमरावती,

 

●  प्रस्तावना:-

          साहित्य जीवन की सहज अभिव्यक्ति हैं। साहित्य जीवन को कितना प्रभावित करता है। यह विचारणीय हो सकता हैं, परंतु साहित्य जीवन से ही ऊर्जा और जीवन-शक्ति प्राप्त करता हैं। यह निर्विवाद हैं । सामान्यतः कवियों या लेखकों का जीवन प्रवाह उतार-चढ़ाव का होता हैं। जीवन में आए उतार-चढ़ाव से उनकी सर्जनात्मकता प्रभावित होती हैं। हिन्दी साहित्य में आदिवासी समाज की सभ्यता एवं संस्कृति के बारे में जो भी साहित्य लिखा गया है वह बहुत कम हैं। वर्तमान समय में आदिवासी साहित्य काफी मात्रा में लिखा जा रहा है और उसकी समिक्षा भी हो रही है। आदिवासी इस धरती के मूल निवासी हैं। आदिवासी समाज एक विशिष्ट समाज हैं। नगरीय जीवन से दूर प्रकृति की गोद में उनकी सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ। जो अपने आप में अनोखी हैं। आदिवासियों का रहन-सहन, रीति-रिवाज, संगीत-नृत्य आदि सभ्य समाज से भिन्न हैं। प्रकृति के प्रति उन्हें अपार श्रद्धा एवं प्रेम है, प्रकृति ही उनके जीवन का आधार हैं। 

           “दलित तथा आदिवासियों के आस-पास की सांस्कृतिक चौखट एवं वातावरण भिन्न हैं। आदिवासियों की संस्कृति की अपनी एक चौखट हैं। उनकी संस्कृति में मिट्टी की सोंधी महक हैं। इस कारण आदिवासी साहित्य दलित साहित्य की नकल न बनकर, उसकी अपनी एक शैली तथा संरचना होनी चाहिए।“1 वैसे तो दलित साहित्य के अंतर्गत ही आदिवासी साहित्य का अध्ययन आज तक होता रहा है। स्वयं रमणिका गुप्ता जी भी आदिवासी साहित्य को दलित साहित्य का अभिन्न अंग मानती हैं। बावजूद इसके कुछ आलोचक तथा विद्वान आदिवासी साहित्य को दलित साहित्य से भिन्न बताते हैं। दलित साहित्य के अंतर्गत आदिवासी साहित्य का अध्ययन इसिलिए होता रहा है क्योंकि दलित हो, या आदिवासी हो दोनों वर्गों को दला गया है अर्थात दबाया गया है, उनका शोषण हुआ है। रमणिका गुप्ता जी ने अपना समग्र जीवन दलित, आदिवासी तथा स्त्री जाति के लिए समर्पित किया हैं। आदिवासी जनजीवन की अभिव्यक्ति उनके साहित्य में विशेषतः कविता में प्रखर रूप से सामने आती हैं। पहले आदिवासियों को दलितों में समाविष्ट किया गया था। इतना ही नहीं, उनके साहित्य को दलित साहित्य ही कहा जाता था। वैसे देखा जाए तो आदिवासी और दलित दोनों सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दोनों समाज से कटे हुए थे, मगर आजादी के बाद दलित मुख्यधारा में मिल गए और आदिवासी मुख्यधारा से कटे रहे और आज भी अलग-थलग रह रहे हैं। जिसके कारण आदिवासी साहित्य एक अलग चिंतन और विमर्श का विषय बन गया हैं। मुख्यतः हिन्दी में 'आदिवासी विमर्श' को गति देने का काम झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्र हजारीबाग से 1987 में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'युध्दरत आम आदमी' और उसकी संपादिका रमणिका गुप्ता ने किया। इसी पत्रिका के  तेलुगू, गुजराती और पंजाबी दलित साहित्य पर केंद्रित अंकों के जरिए दलित-विमर्श या आदिवासी विमर्श के कैनवास को और व्यापक किया। आदिवासी जीवन संघर्षों को शब्दबद्ध करती हुई रमणिका गुप्ता लिखती है "जंगल माफ़िया कीमती पेड़ उससे सस्ते दामों पर खरीदकर, ऊँचे दामों पर बेचता है और करोड़पति बन जाता है। पेड़ काटने के आरोप में आदिवासी दंड भरता है या जेल जाता है। सरकार की ऐसी ही नीतियों के कारण आदिवासी ज़मीन के मालिक बनने के बजाए पहले मज़दूर बने फिर बंधुआ मज़दूर।"2

              आदिवासी विमर्श एक ऐसा विषय है जिसमें समाज के रहन-सहन,उनकी संस्कृति,परंपराएं,अस्मिता,साहित्य और अधिकारों के बारे में विस्तृत चर्चा की जाती हैं। आदिवासी समाज सदियों से जातिगत भेदों, वर्ण व्यवस्था,विदेशी आक्रमण अंग्रेजों और वर्तमान में सभ्य कहे जाने वाले समाज द्वारा दूर-दराज जंगलों और पहाडों में खदेडा गया हैं। अज्ञानता और पिछड़ेपन के कारण यह समाज सदियों से मुख्यधारा से कटा रहा,दूरी बनाता रहा। आदिवासी साहित्य के कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपना भोगा हुआ सत्य और साथ ही अपने समाज की सामाजिक वैयक्तिक जीवन संघर्ष की समस्याओं को व्यक्त किया हैं।

            रमणिका गुप्ता हिन्दी की उन कुछ कवयित्रीयों मे से एक हैं जिन्होनें आदिवासी समाज की समृध्द सांस्कृतिक परंपरा और संघर्ष को लगातार समझने का प्रयत्न किया है बल्कि वे शायद हिन्दी की अकेली रचनाकार हैं जिन्होनें झारखंड के आदिवासियों के साथ कदम से कदम मिलाकर लड़ाइयाँ लड़ी,जेल गई,माफिया से मुकाबला किया और अपने इन्हीं अनुभवों को कविता में ढाला। उनके द्वारा लिखित पूर्वांचल-एक कविता यात्रा, विज्ञापन बनता कवि, आदिम से आदमी तक, आदिवासी कविताएं,तिल तिल नूतन,अब मूरख नहीं बनेंगे हम आदि कविता संग्रह में रमणिकाजी आदिवासियों के संघर्ष को जुबान देते हुए उनकी पहचान, उनके मूल्य, उनके जीवट व संकल्पों से परिचित कराती हैं।

                रमणिका गुप्ता द्वारा लिखित काव्य संग्रह 'पूर्वांचल-एक कविता यात्रा' की कविता 'नागा' में भारत के पूर्वोत्तर छोर विशेषकर असम, नागालैण्ड, म्यांमार आदि भागों में पाई जाने वाली 'नागा' प्रजाति के संदर्भ मे अपने विचार व्यक्त करते हुए कहती हैं कि ये नागा अपने-अपने पोखरों(घरों) के भीतर से जाग-जागकर बाहर निकलने लगे हैं । वे अभी तक अपनी खोह में आराम कर रहे थे। उनकी पत्नियाँ चरखे पर पूनी से सूत कातने में व्यस्त हैं,वहीं दूसरी ओर यतिम्बा(नागा लोगों की चावल से बनी शराब) ऊबल रही हैं। इनके इबो-इबे(लड़का-लड़की) घरों के आस-पास हमें देखते ही एकत्र हो गए हैं।

                "अंदर ही अंदर

                कहीं फुन्कार रहा 'नागा'!

                फण उठाये-विष उगलता

                अपनी खोह से बाहर आ गया!

                'यतिम्बा' की सफेद फेण पुरे ऊबाल पर

                करघे पर धागे सफेद पूरे कसाव पर

                चरखे पर पूनी के सूत तन गए

                'इबो घर' और 'इबे घर' पूरे सज गये।"3

          रमणिकाजी ने पूर्वांचल की यात्रा के दौरान नागा प्रजाति की जो भी दिनचर्या स्वयं की आंखों से देखी यहाँ उसे लेखनी के माध्यम से सजीव वर्णन करने का सफल प्रयत्न किया है।

          इसी काव्य संग्रह ‘पूर्वांचल-एक कविता यात्रा’ की एक अन्य कविता 'इतिहास के मुकाबिल' में कवयित्री इसी 'नागा' प्रजाति के जीवन-यापन के लिए की जाने वाली शिकार की परंपरा का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है, शरीर ढकने के लिये केवल एक लुंगी व शाल, शिकार के लिए हाथों में भालें, मृदंग लेकर जंगल-जंगल भटकना इनकी नियती बन गई हैं वे लिखती है-

                 "जंगलों में पेड़ों पर

                 अपने दुर्ग चिनता

                 खेतों की मेढ़ो को दीवारें मानता

                 अपनी टोलियों को

                 करघे में बुन-बुन बाँधता

                 'फनेक' को कमर में कसे

                 'इनफी' को कन्धों पर डाले

                 भालों पर तोरण टांके

                 मृदंग की ताल पर

                 धरती की टोह में चलता

                इतिहास के मुकाबिल हैं।"4

           रमणिकाजी ने अपने जीवन में जो कुछ भी देखा और भोगा उसका ही कविता के माध्यम से चित्रांकन किया। उनके 'विज्ञापन बनता कवि' नामक एक अन्य काव्य संग्रह की कविता 'वे बोलते नहीं थे' में उन्होंने आदिवासी समाज की दशा दुर्दशा का मार्मिक वर्णन किया हैं। कवयित्री लिखती है कि ये आदिवासी समुदाय बोलना या बहस करना नहीं जानता,वे केवल कर्म पर विश्वास रखते हैं। वे जंगल में पाई जानेवाली विविध जिवनावश्यक वस्तुओं के सहारे अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, रमणिकाजी लिखती है-

                  "लकड़ियां काटते हल नाधते

                   रोपनी निकोनी कटनी करते

                   झूम सजाते महुआ चुनते

                   सखुए के बीज बटोरते

                   कुसुम फूल बीनते

                   सीझाते

                   बासों का जंगल का जंगल

                   सूपों और टोकरियों में

                   बिन डालते

                   पर वे बोलते नहीं थे।"5

              रमणिकाजी के काव्य संग्रह 'अब मूरख नहीं बनेंगे हम' की कविता 'दिलावन- दिलावन' में भी कवयित्री ने आदिवासी समुदाय की व्यथा को उजागर किया है। उनका कहना है कि ये आदिवासी समुदाय गुफाओं से निकलकर आज भी जंगलों में जीवन जी रहे हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की लिपि या शाब्दिक ज्ञान नही दिया जाता। उन्हें तो बस मशीनों की तरह काम कराने हेतू ताकतवर मनुष्य बताकर अपने साथ ले जाते हैं। जबकि इन आदिवासी समुदाय की संवेदनाओं को कोई नही समझता या समझना ही नहीं चाहता। रमणिकाजी लिखती है-

                      “गुफाओं से निकले

                       तभी से वहीं हो

                       जंगल में जिन्दा रहते अभी हो

                       तेरी नुमाइश

                       'उत्सव' लगाते

                       पिछड़ी लकीरों का

                       गौरव बताते

                       न भाषा सिखाते

                       न लिपियाँ बताते

                       पीछे समय से

                       तूझे ले ले जाते

                       'जंगल का मानुष'

                       बताते बेजोड़,

                       दिलावन-दिलावन आयु-बाबाहोड!"6

                 कवयित्री रमणिका गुप्ता द्वारा लिखित काव्य संग्रह 'आदिवासी कविताएँ' में उन्होनें आदिवासी जनजाति की दिनचर्या,मानवीय भावना,प्रकृति प्रेम,भोलापन आदि बातों को सुन्दरता से दर्शाया है। इस काव्य संग्रह की  कविता 'भाग्य का बंधुआ' मे उन्होनें आदिवासी समुदाय द्वारा सदियों से जंगलों में भटकते-भटकते आधा पेट भोजन कर, अधनंगा रहकर संस्कृति का जतन करने की परंपरा को मोहक रूप से चित्रित किया है, रमणिकाजी लिखती हैं-

            "दूर...कहीं...दू...र

             जहाँ रास्तें खत्म हो गये

             जहाँ जंगलों में

             मानव और वन्य पशु

             एक हो गये

             मैं अधढका-सा

             कुछ खाया-कुछ भूखा-सा

             संस्कृति की डाली पर

             धर्म की डोली में

             सभ्यता की अनदेखी

             अनछुई दुल्हन को

             बिना छुए सदियों से ढ़ोता हूँ

             मैं भाग्य का बंधुआ हूँ।"7

           इसी ‘आदिवासी कविताएं’ काव्य संग्रह की एक अन्य कविता 'घुमक्कड आदमी की नस्ल कहां गई' में रमणिकाजी ने प्रकृति प्रेम के साथ नष्ट होते जंगल और भटकते आदिवासियों की व्यथा पर प्रश्नचिन्ह खींचा हैं, रमणिकाजी लिखती है-

              "कहां है वह

              चुप-सी चुप्पी

              पहाड़-सी शान्ती प्रकृति सी सुबह

              चिड़ियों सी मासूमियत

              चिन्घारते शेरों के बीच घूमती निर्भय-निडर

              घुमक्कड़ आदमी की नस्ल

              कहां हैं?कहां हैं?कहां हैं???"8

          ‘आदिवासी कविताएं’ काव्य संग्रह की एक अन्य कविता 'लोहे का आदमी' में कवयित्री ने भोलेपन में विकास के नाम पर आदिवासियों द्वारा स्वयं अपना घर(जंगल) नष्ट करने तथा उन्हीं की आनेवाली पीढ़ी को दर-दर भटकने के लिए छोड़ देने की भावना का सजीव और मार्मिक वर्णन करते हुए लिखती है-

             "उसने विकास के नाम पर काटी 'लाइफ-लाइन'

              भूख के नाम पर भरे गोदाम

              पेड़ नहीं काटी अपनी ही टाँगे

              वह टहनियां नहीं छाटता रहा

              अपनी ही पीढियों के हाथ-पाँव

              छाटता रहा नाती-पोती की ऊंगलियां,नख-दन्त

              आंखो की पलकें और पुतलियां

              पत्तों के नाम पर!"9

 

● निष्कर्ष:-

              आदिवासी साहित्य की अनेक पुस्तकों का सम्पादन तथा अपने उपन्यासों, कहानीयों, कविताओं आदि में आदिवासियों के जीवन, उनके संघर्ष की गाथा स्वयं उनके साथ उनके बीच रहकर भोगे हुए पलों का जीवित चित्रांकन रमणिका गुप्ताजी ने बखूबी किया हैं। कहते हैं 'लिक-लिक गाड़ी चले,लीकहि चलै कपूत, लीक छाडी तीनहि चलै, शायर,शेर,सपूत।' रमणिका गुप्ता का साहित्य एवं सम्पूर्ण जीवन इस उक्ति का उदाहरण हैं। रमणिका गुप्ता का संपूर्ण जीवन दलित, आदिवासी और स्त्री के लिए समर्पित हैं। वे जीवनभर इनकी ही पक्षधर बनकर लड़ती रहीं हैं। उनका नाम स्वयं एक संघर्षशील नारी का प्रतिक है। उनका संपूर्ण साहित्य सदियों से कुचले गए शोषित समाज की आवाज़ है। संपन्न सिख परिवार में जन्मी रमणिकाजी ने राजसी जीवन जीने की उपेक्षा कर दक्षिण-बिहार के जंगलों-पहाडों में आदिवासियों  के बीच 'परहित सरिस धरम नहीं भाई,परपीड़ा सम नहीं अधमाई ' को वास्तविक रूप में चरितार्थ करते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया। राजनीति में सक्रिय रहते हुए बिहार के कोयला खदानों मे काम करनेवाले मजदूर तथा वहाँ के किसानों पर हो रहे शोषण, विशेषकर दलित, शोषित, पीड़ित आदिवासी एवं वहाँ की महिलाओं के अधिकारों हेतू संघर्ष करती रही। उनकी छवि स्त्री विमर्श और दलित चेतना की सजग प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में रही। वे एक संघर्षशील नारी का प्रतिक थी। उन्होने अपने जीवन में जो भी संघर्ष किया,स्वयं जो भोगा उसे ही लेखनी के माध्यम से कागज पर उतारा। वे आधुनिक युग की अत्यंत सजग एवं संवेदनशील रचनाकार थी। उनके साहित्य में सहजता, सरलता,स्पष्टता,सत्यता,और अनिष्ट रुढ़ियों के खिलाफ विषमता के खिलाफ विद्रोह मिलता हैं।

• संदर्भ संकेत :-

1)      आदिवासी स्वर और नई शताब्दी,रमणिका गुप्ता,पृ 23

2) आदिवासी विकास से विस्थापन,सं.रमणिका गुप्ता,पृ 12

3) पूर्वांचल-एक कविता यात्रा,रमणिका गुप्ता,पृ 20

4) पूर्वांचल-एक कविता यात्रा,रमणिका गुप्ता,पृ 21-22

5) विज्ञापन बनता कवि,रमणिका गुप्ता,पृ 41

6) अब मूरख नहीं बनेंगे हम,रमणिका गुप्ता,पृ 42

7) आदिवासी कविताएँ,रमणिका गुप्ता,पृ 38

8) आदिवासी कविताएँ,रमणिका गुप्ता,पृ 61

9) आदिवासी कविताएँ,रमणिका गुप्ता,पृ 74

Friday, May 15, 2020

कहानी...  शिकंजा.. 

अबकी बाबू साहेब कुछ जोर से चिल्लाए- "कहां मर गया रे बुधुआ मादर... कब से बुला रहे न रे बहन... सुनता काहे नहीं.. रे..! " 

बुधुआ जिसकी उम्र बारह-तेरह साल की थी. शरीर सूखे हुए पतले बांस की तरह. गहरे काले गढढों में धंसी हुई आंखें, सूखी हुई पसलियां, पपडियाये हुए होंठ, जिसे वो 

बार- बार जीभ से चाटता रहता, जिससे उसके होंठों पर 

गर्द की एक मोटी परत जम गई थी.एक मैले - कुचैले हाफ-पैंट और तार - तार हो चुकी बनियान में हाथ- बांधे

सिर झुकाए आकर खडा़ हो गया.

 

गोया वो आदमी का बच्चा नहीं कोई रोबोट हो, जिसके पुर्जे ढीले हो चुके हों. बुधुआ को सामने पाकर एक बार फिर दहाड़ उठे बाबू साहेब-" आंए रे स्साला! तुमको हम कितना देरी से बुला रहे हैं. सुनता काहे नहीं था, रे... कान में ठेपी लगइले था का ...? " 

 

" न... न...नहीं मालिक! भूसा घर से भूसा निकाल रहे थे." मालिक का गुस्सा देखकर थर-थर कांपते हुए बुधुआ

घिघियाते हुए बोला. मानो उसकी आवाज को कोई भीतर से धकेल रहा हो.

तभी, बाबू साहेब की नजर उसके मुंह पर गई, जहां किसी

चीज का जूठन लगा था. फिर, दहाड़ते हुए बोले - " आएं रे, स्याला ! अभी क्या खा रहा था तू रे..? झूठे बोल रहा था कि भूसा निकाल रहे थे. सच - सच बता नहीं तो आज, तेरी चमड़ी उधेड़ दूंगा."

 

सामने ही, बबूआइन मोढे पर बैठकर चावल चुन रही थी.

बुधुआ के खाने वाली बात को सुनकर उसने आंखें तेरेरते हुए कहा - " इस मुए का पेट है कि भरसांय . जब देखो कुछ न कुछ खाता रहता है. इसके चलते ही घर में दरिदर

का बास हो गया है. भगवान करे इसके पेट में बज्जर पडे. इसका शरीर गल- गलकर चला. मुंहझौंसे की अरथी उठे." 

इतनी, लानत - मलामत के बाद भी बाबू साहेब को संतोष नहीं हुआ.सामने पडा़ सोंटा उठाकर वो बुधुआ की तरफ लपके और लगे उसको पीटने. बुधुआ चिल्लाता रहा, गिड़गिड़ाता रहा - " नहीं, बाबू साहेब , अब कुच्छो नहीं खाएंगे.... "

धूल में लोटते हुए वो लगातार चिल्लाए जा रहा था -" नहीं बाबू साहेब! माई किरिया ( कसम) बाबू साहेब... अब नहीं खाएंगे.... बाप किरिया बाबू साहेब, जब बुलाइएगा

तब सुनेंगे, पितर किरिया बाबू साहेब, छोड़ दीजिये बाबू साहेब..! "

चिल्लाने के क्रम में उसके मुंह से गाजनुमा थूक बाहर आने लगा था. सोंटे की मार से बचने के लिए वो कभी लोटते हुए दायीं ओर को मुड जाता तो कभी बायीं ओर को ! 

अंत में जब सोंटा टूट गया तो बाबू साहेब हांफते हुए लात - घूँसों से उसकी धुनाई करने लगे. लगभग अधमरा करके ही बाबू साहेब ने बुधुआ को छोडा़, फिर बबुआइन से बोले - " स्याला बहुत जब्बर है ..! इसकी मतारी के ये नीच 

लोग साले बहुत चाईं होते हैं! " 

 

इस बात पर बबुआइन बिहंसती हुई बोली -" पता नहीं मरदुए क्या-क्या खाते हैं. गाय- सूअर तक तो छोडते ही नहीं!  "

 

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इतनी मार पडने के बाद बुधुआ का पोर - पोर दुखने लगा था. उसे अब सांस लेने में भी कठिनाई हो रही थी. उसका 

लगभग प्रत्येक अंग सूज गया था. उसने करवट लेने की कोशिश की, लेकिन एक तीव्र वेदना उसके पूरे वजूद में 

फैल गई. 

 

जब दिनभर खेत में काम करने के बाद वो घर लौटा था, तो खाना खत्म हो चुका था. जाकर बबुआइन से बोला कि -"  मालकिन, मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को है तो दीजिये! " 

 

तब, बबुआइन लगभग झल्लाते हुए बोली थी - " जाओ जाकर पहले बैलों को सानी- पानी दे दो, तब जाकर खाते रहना." 

 

गोया आदमी के खाने से पहले जानवर का खाना 

जरूरी हो. जब, वो खली - भूसी सानकर नांद के करीब गया, तो उसे बासी रोटी का एक अधजला टुकडा नांद के भीतर दिखा, जिसे देखकर पहले उसने चोर - नजरों से चारों तरफ देखा, फिर आहिस्ता से उस रोटी के टुकड़े को 

उठाकर देखने लगा, मानों कि उसे रोटी का टुकड़ा न मिला हो कोई कीमती चीज मिल गई हो. नांद में नमी के

कारण रोटी  गूंधे हुए आटे का शक्ल अख्तियार कर चुकी थी. फिर भी बुधुआ ने उस रोटी के टुकड़े को हसरत भरी नजरों से देखा और कुछ देर तक अपलक देखता रहा था.

फिर वो उसे खाने लगा था, तभी बाबू साहेब ने उसे हांक

लगाई थी.

 

बुधुआ एक बार फिर दर्द और भूख के दोहरे प्रहार से 

कसमसाया. उसे लगा जैसे कि उसकी अंतड़ियों को कोई जोर जोर से उमेठ रहा है! भूख और दर्द की लहरों पर सवार वो लगभग चेतनाशून्य- सा हो चला था! फिर, धीरे

- धीरे  बुधुआ के स्मृतियों के बादल का झुटपुटा साफ होने लगा था.उन बादलों के बहुत सारे टुकडों में बुधुआ भी था और उसके गांव- जवार के उसके संगी- साथी भी.

बुधुआ उर्फ बुधन दुसाध वल्द फेंकू दुसाध उस समय मात्र

आठ वर्ष का था, जब उसके पिता ने उसे बाबू साहब के यहां बंधक रख दिया था, उसकी बड़ी बहन पशुपतिया 

के विवाह में दहेज देने के लिए.

 जिस समय गाँव के बाल वृंद खेतों की ऊबड़- खाबड़ पगडंडियों पर छोकडे चलाते, गाँव के तालाब नाले से मछलियाँ पकडकर आग में भूनकर खाते, गर्मियों में आम के बगीचे में आम के मोजरों पर गुलेल से निशाना लगाने का खेल- खेलते थे, उस समय बुधुआ या तो अपने मालिक के खेतों में काम कर रहा होता या फिर ढोर - डांगर चरा रहा होता. उसे बहुत धुंधली- धुंधली सी याद है. जब वो बाबू साहेब की कोठी में आने को हुआ था, तब उसकी महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी थी.

करीब चार- पांच साल तो हो ही गये उसे बाबू साहेब की तामीरदारी करते. उसे उस वक्त थोड़ा आश्चर्य भी हुआ था, जब उसकी माँ विलाप करते हुए बार - बार एक ही 

बात को दुहरा रही थी -" मत, ले जा हो बाबू साहेब हमरा बेटा के . ई चिराग जइसन लइका हम कहाँ से लाइब... हम जानत हईं ई अब दुबारा इंहा न आई, एक बार बिकाइल चीज कहीं वापस होला ! "

 

तब, पशुपतिया के बाबू उसकी माँ को समझने लगे थे-" ना रे पशुपतिया के माई, पशुपतिया के बियाह के साल - छव  महीना के बाद धीरे- धीरे करके कर्जा उतार दीहल

जाई."

 

लेकिन, जब बाबू साहेब के मुंडेर के नीचे बुधन के पिता पहुंचे थे तब बुधन का मन कैसा तो होने लगा था, और उसके बाबूजी तो फफक- फफक कर रो ही पडे थे! 

बोलने की कोशिश में शब्द उनके गले में अटक- अटक से पडते थे. तब बड़ी मुश्किल से वो बोल पाए थे- "बबुआ हमरा के माफ............. " और वे भरभरा रो ही तो पडे थे.उन छलछलाई- पानीदार आंखों में उसे अपने बाप की बेचारगी साफ झलक रही थी.

 

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वो दिन था, और आज का दिन है. फिर खुशी क्या चीज होती है, बुधुआ को आज तक पता नहीं चला. बाबू साहेब

के यहां आने के बाद उस पर रोज- रोज, नए- नए अत्याचार होने लगे.इन चार- पांच सालों में वो चार पांच

हजार मौतें मरा होगा, लेकिन उसके अंदर का स्वाभिमान नहीं मरा था. प्रतिरोध के तेवर उसके अंदर मौजूद थे. फिर उम्र भी उसकी कोई खास नहीं थी. इसलिए, ज्यादातर वो नाफरमानी ही करता और इस कारण पिटता भी दमभर के बाबू- बबुआइन से.

एक बार वो कभी रामदेई पासवान का भाषण सुनने गया था. उनके बारे में उसने सुन रखा था कि वो कोई बुद्धि जीवी- कम्यूनिस्ट हैं.शहर से पढकर उन जैसे लोगों की 

समस्याओं को जानने समझने के लिए ही वे उसके गांव आए हैं. क्या-क्या तो बताते रहे थे वो, हां याद आया, वो कोई किरान्ती- ऊरांती की बात कर रहे थे. कहते थे अब हम लोगों को डरने की जरूरत नहीं है.अब हम अपने ऊपर कोई अत्याचार बर्दाश्त नहीं करेंगे! बहुत कर चुके हम राजपूत- भूमिहारों की गुलामी, अब हमें जागना होगा! नहीं तो ये लोग फिर से हम पर राज करने लगेंगे.

 

और.... और क्या बता रहे थे. हां याद आया कह रहे थे कि जब तुम्हारे ऊपर अत्याचार अधिक बढ रहा है तो तुम लोग नक्सली बन जाओ.तब उन लोगों में से ही किसी ने पूछा था कि, ई नक्सली का होता है भईया....? "

 

तब रामदेई पासवान ने बताना शुरू किया था -" नक्सली माने हक के लिए लडने वाला...., अत्याचार को बर्दाश्त नहीं करने वाला......सबको एक्के- छिप्पा में बैठाकर खाने- खिलाने की व्यवस्था करनेवाला....... रणबांकुरों की तरह धांय- धांय गोलियां चलाने वाला... " 

 

उस दिन वो चौंक सा पडा़ था. उसे आखिर वाली दो- चार  बातें समझ में नहीं आई थीं. ई कैसे हो सकता है कि राजपूत- दुसाध एक्के छिप्पा में बैठकर खाना खाएं  . जबकि बाबू साहेब तो उसे अपने घर में घुसने तक नहीं देते . वो पास वाले गोहाल, घर के बगल में बने ओसारे में सोता था . उसकी खाट के आसपास तो कोई फटकता  तक नहीं था.और गोली - बंदूक...... बाप- रे- बाप! उसे एक बार की घटना याद आयी.जब बभनौटी में किसी बात को लेकर आपस में ही झड़प हो गई थी, तो गोलियों की गरज से पूरी दुसाध टोली थर्रा गई थी.उस रात उसके बाबूजी ने उन लोगों को सख्त हिदायत दी थी कि खबर दार..... चाहे जो हो जाए, घर से बाहर कोई नहीं निकलेगा! 

 

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फिर बाबू साहेब के यहाँ आने के चार - पांच महीने बाद बप्पा आया था.टसटस पियर धोती और सगुन का मुरैठा बांधे! तब उसे वापस अपने साथ ले जाने के लिए बहुत चिरौरी- मिन्नत की थी उसने बाबू साहेब की. लेकिन, बाबू साहेब टस से मस  नहीं हुए थे. फिर, हाथगोड जोडकर भकुवा- भकुवा कर रोने लगा था बप्पा.तब जाकर कहीं बाबू साहेब ने उसके घर के कागज को अपने पास गिरवी रखकर बुधुआ को वापस उसके गाँव जाने दिया था! 

 

गांव पहुंचने के बाद उसे अपने पहले का घर पहचान में ही नहीं आ रहा था.घर के पिछवाडे की दीवार और एक कमरा एक सिरे से गायब थे. वहां अब साव जी की बछिया बंधी हुई थी. और उनके घर का दरवाजा पहले से 

कुछ ज्यादा ही चौड़ा दिखाई दे रहा था. जिस दिन सगुन हुआ  , उस दिन माडौ पर की मेहरारू लोग आपस में बतिया रही थी -" बाप है कि कसाई, बछिया ( पशुपतिया) को अपने जैसे उम्र के आदमी से ब्याह रहा है! "

तब, सुगनी बुआ ने उन लोगों को समझाते हुए कहा था -" क्या अनाप - शनाप तुम लोग बके जा रही हो. बेचारे की

हैसियत होती तो वो किसी अच्छे घर में रिश्ता न करता! खैर,  बाबा बलेसरनाथ किसी तरह पार - घाट लगाएं, जो होना था सो हुआ."

तब बुधुआ ने भी सोचा था कि भोज- भात और जात बिरादरी के चक्कर में बप्पा बेकार ही पडा़ नहीं तो उसकी जिंदगी की मिट्टी- पलीद काहे को होती! 

 

बुधुआ ने एकबार फिर करवट लेने की कोशिश की, लेकिन दर्द ने फिर दूने वेग से हमला किया! ....... बहुत दिनों से उसके भीतर कुछ रेंग रहा है.... लम्हा-दर -लम्हा........ रफ्ता- रफ्ता...... हौले- हौले...... और आज उसे पकड़ लिया है उसने...! 

 

सहसा, उसने फर्श पर थूक दिया है... थूक का एक मोटा चकता..! फिर, वो घोड़े पर सवार हो गया है... और... घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा है..! वो, सामने जंग के मैदान में देखता है कि सामने बाबू साहेब भी खड़े हैं.  उसी रोबीली मुस्कान के साथ मोटी-मोटी मूंछों को ऐंठते  हुए. अरे ये उसके हाथ में फरसा कहाँ से आया , देखो तो कैसा चमक रहा है. लगता है जैसे अभी -अभी उस पर सान चढाया गया है.और इसके साथ ही उसने फरसा खींच कर चलाया है. और बाबू साहेब का सिर धड़ से अलग हो गया है... !!!! 

 

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महेश कुमार केशरी

 C/O -श्री बालाजी स्पोर्ट्स सेंटर

मेघदूत मार्केट फुसरो

बोकारो झारखंड -829144

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Aksharwarta International Research Journal - October - 2026 Issue