Impact Factor - 7.125

Saturday, February 15, 2020

लघुकथा राष्ट्र अर्चन में गणेश परिक्रमा है-डॉ उमेश कुमार सिंह

लघुकथा राष्ट्र अर्चन में गणेश परिक्रमा है-डॉ उमेश कुमार सिंह


लघुकथा का  प्राचीनतम स्वरूप उपनिषदों में मिलता है -डॉ बिनय राजाराम

भोपाल | लघुकथा राष्ट्र अर्चन में गणेश परिक्रमा है ,हमारे सृजन में नकारात्मकता आ रही है इसे सकारात्मकता की और मोड़ना साहित्यकारों की बड़ी जबावदारी है ,यह कहना है साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ उमेश कुमार सिंह का वे मुख्य अतिथि के रूप में लघुकथा शोध केंद्र भोपाल द्वारा आयोजित लघुकथा प्रसंग के अंतर्गत विमर्श में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे है ,दुष्यंत स्मारक पांडुलिपि सभागार में आयोजित लघुकथा रचना पाठ के आयोजन की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बिनय राजाराम ने कहा कि लघुकथा हमें उपनिषदों में मिलती है इसके माध्यम से गूढ़ से गूढ़ रहस्य भी बहुत कम शब्दों में व्यक्त किये जा सकते हैं इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कथाकार श्री हीरा लाल नागर ने कहा कि एक लघुकथकार को बड़ी कहानियां भी लिखना चाहिए,लघुकथाओं का दायरा व्यापक होना आवश्यक है | कार्यक्रम में आधार वक्तव्य एवम स्वागत भाषण शोध केंद्र की निदेशक कांता रॉय ने देते हुए विस्तार से आयोजन की रूप रेखा पर प्रकाश डाला | घनश्याम मैथिल अमृत ने गोष्ठी का संचालन किया इस अवसर पर डॉ मौसमी परिहार ने 'बन्द पड़े लिफाफे ', सतीशचन्द्र श्रीवास्तव ने 'उम्र के समाचार ', गोकुल सोनी ने 'शांतिपूर्ण थाना क्षेत्र ', मुज़फ्फर इकबाल सिद्दीकी ने 'फालतू', शाइस्ता जहां ने 'भांति भांति के आवारा कुत्ते ', इसके साथ ही सरिता बघेल,मधुलिका श्रीवास्तव, विनोद जैन ,डॉ राजेश श्रीवास्तव ,अशोक धमेनिया,मेघा मैथिल, डॉ मालती बसन्त ,आनंदकुमार तिवारी ने भी अपनी श्रेष्ठ लघुकथाओं का पाठ किया कार्यक्रम।के अंत में विपिन बिहारी वाजपई ने सभी का आभार व्यक्त किया |


मैं समय हूं

मैं समय हूं


 

 मैं समय हूँ 

फिर लौट कर आऊंगा 

सब गमों को चीरकर 

और ख़ामोशी से

 सबको चुप करवा जाऊंगा। 

 

 मैं समय हूं 

 सब जानता हूं 

 इसीलिए घबराता नहीं 

 चुपचाप सुनता हूं

 किसी को सुनाता नहीं।

 

 मैं समय हूं 

बीत कर भी मैं

 फिर वापस भी आ जाता हूं 

 और जब आता हूं

 तो सब कुछ 

 अच्छा बुरा दिखा जाता हूं। 

 

 मैं समय हूं 

 कभी रुकता नहीं 

थकता भी नहीं 

 फिर भी सब कुछ 

 बदल देता हूं अपने आगोश में। 

 


समय का सदुपयोग 

समय का सदुपयोग 


 

          समय न रुकता है न थकता है। बस हर पल चलता रहता है। समय के न पांव है न कोई पहिया है। फिर भी बड़ी रफ्तार से दौड़ता है। बहुत सारे लोग समय का सही उपयोग कर पाते हैं तो बहुत सारे नहीं भी।अक्सर लोग बस इसी सोच विचार में ही अपना समय खराब कर देते हैं। मैंने यह कार्य करना है या नहीं? मगर वे कभी नहीं विचार करते की जितना समय वो सोचने में निकल देते है। उतने में उस कार्य का सही समय भी निकल जाता है। और जब सही समय निकल जाता है तो सही मौका,सही इंसान और सही चीज भी हाथों से निकल जाती है। 


               समय का सही प्रयोग सिर्फ किसी कार्य के लिए नहीं होता।समय का सदुपयोग रिश्तो के लिए भी होता है,इंसानों के लिए भी होता है और ईश्वर के लिए भी होता है। जिस प्रकार एक विद्यार्थी परीक्षा नजदीक आने पर भी। अपने कार्य के प्रति सजग न होकर। परीक्षा की तैयारी नहीं करता तो वह समय का सदुपयोग नहीं कर पाता और अंत में परीक्षा में उत्तीर्ण ही नहीं हो पाता।उसी प्रकार अगर हम सही समय पर रिश्तो की देखरेख और परख नही कर पाते तो अच्छे इंसान और अच्छे रिश्ते भी हमारे हाथों से निकल जाते हैं। 

 

          आज के आधुनिक समय में माता-पिता अपने बच्चे के लिए समय निकालकर अच्छी शिक्षा और नैतिक गुणों को उसमें नहीं भर पाते तो। आगे चलकर वह कभी इस बात के लिए किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकते कि उनका बच्चा गलत संगति में पड़ा हुआ है या नशे जैसी बुरी आदतों से जुड़ा हुआ है। उसके लिए समाज नहीं बच्चा नहीं सबसे पहले स्वयं उसके माता-पिता दोषी है कि उन्होंने समय का सदुपयोग न कर अपने बच्चे में उन गुणों को उजागर नहीं किया जिससे वह एक श्रेष्ठ सामाजिक प्राणी बन सके।

 

            अंत में मैं यही कहूंगा कि अगर हम समय का सदुपयोग कर पाते हैं तो हम एक श्रेष्ठ सामाजिक प्राणी बन पाएंगे क्योंकि जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है। वह हर कार्य को बड़ी श्रेष्ठता कर पाता है। हर रिश्ते के प्रति सजग हो पाता है और उनको निभा पाता है।



 

 हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक) (भाषा अध्यापक) गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा। पिन कोड 176029 Rajivdogra1@gmail.com 9876777233 7009313259  




मौन-व्रत (व्यंग्य)

पहले हमारा उपवास में कोई विश्वास नहीं था, लेकिन जब से नया युग शुरू हुआ है, हमने इन परिस्थितियों से निपटने के लिए उपवास रखने शुरू कर दिये हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि यदि किसी युग की धारणा व विचारधारा को समझना है, तो उस युग के महा प्रवचनों को व्यावहारिक रूप से आत्म सात करके ही समझा जा सकता है। अतः हमने अपनी समकालिक स्थितिओं को समझने को लिये ही उपवास रखने शुरू किये हैं। उपवास से यहाँ हमरा अर्थ खाने वाले खाद्य पदार्थों का त्याग नहीं है। वैसे भी, नए-युग के समर्थकों ने खाद्य व स्वादिष्ट पदार्थों पर प्रतिबंध लगा कर उपवास जैसी स्थिति तो पहले से ही बना रखी है। दूसरा, भाई हम भोजन के बिना तो जीवत नहीं रह सकते क्योंकि खाने को देख कर हम से कंट्रोल नहीं होता, इस लिए हम ने उपवास तो रखा है लेकिन उस को मौन-व्रत के रूप में रखा है।

अब, जब चारों ओर शोर शराबा हो रहा है, तो आप में से कोई सज्जन पूछ सकता है कि अब कौन मौन-व्रत रखता है? यह तो आउट डेटेड फैशन है क्योंकि यह कौन-सा महात्मा गांधी का युग है कि हम उपवास करके या मौन रहकर अपना विरोध प्रगट करें? लेकिन भई हम तर्क से सिद्ध कर सकते हैं कि आज भी भारत में मौन-व्रत उतना ही कारगर हथियार है जितना कि ब्रिटिश सरकार के समय था।

जब मौन शब्द के साथ व्रत शब्द जुड़ जाता है तो यह एक नए अर्थ में प्रवेश कर जाता है। जिस तरह विज्ञापनों में छोटा-सा सितारा 'शर्तें लागू' कहकर सच मुच दिन में तारे दिखा देता है उसी तरह, मौन के साथ व्रत शब्द जुड़ कर कड़े नियमों में प्रवेश कर जाता है। जिस में 'मन की मौत' की घोषणा भी शामिल होती है। हालांकि हमने लम्बी चुप्पी साध रखी है, लेकिन हमारे मन की मृत्यु नहीं हुई है! जैसे कि आम तौर पर मौन-व्रत रखने से होता है कि मन में जो संकल्प-विकल्प उठते हैं, उन पर नियंत्रण हो जाता है। पर भाई मन तो मन है जो हर समय नामुमकिन को मुमकिन बनाने के लिए हमेशा संघर्षशील और चलायमान रहता है।

जिस क्षण से हम ने मूक रहने का दृढ़ संकल्प लिया है, उस दिन से ही कई बार हमारी चुप्पी पर सर्जिकल स्ट्राइक हो चुके हैं लेकिन मजाल है जो हमने अपनी चुप्पी तोड़ी हो। पहले, हम समझते थे कि हमारे पड़ोसी ही हमारी चुप्पी को लेकर दुखी रहते हैं, लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस नए दौर में सारा देश ही हमारी चुप्पी से खफ़ा है, हमें लगता है कि हमारी चुप्पी का राष्ट्रीकरण हो चुका रहा है। कभी-कभी हमें यह भी लगता है कि हमारी चुप्पी का वैश्वीकरण किया जा रहा है। चूंकि अब तो विदेशों में भी लंबे चौड़े लेख केवल हमारी चुप्पी पर ही प्रकाशित होते हैं। आफ्टर आल हम भी भाई ग्लोबल नागरिक हैं और थोड़ी बहुत खबर तो हमें भी रखनी ही पड़ती है।

हमारी प्यारी पत्नी तो हमारी चुप्पी से बेहद दुखी हो गई. पहले तो हमारे बीच नोक-झोक का तीसरा महा युद्ध चलता ही रहता था। कभी-कभी तो संसदीय हंगामा भी हो जाता था। लेकिन अब उसकी हालत बहुमत वाली विजेता पार्टी की तरह हो गई है, जहाँ विरोध की सभी संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। इन परिणामों के आकलन के बाद उन्होंने कई बार शीत युद्ध का प्रस्ताव रखा है, परंतु हमने उसका जवाब ही नहीं दिया क्योंकि हमने तो मौन-व्रत रखा हुआ है।

आजकल हमारी चुप्पी पर कई तरह की बातें की जा रही हैं। कल ही की तो बात है कि हमारे पड़ोसी हम से कहने लगे क्या बात है बड़बोला राम जी आजकल बहुत गुम-सुम से रहने लगे हो? हम क्या बताते कि आंतरिक और बाहरी दबाव के कारण हमारी बोलती बंद है। हम ने उनको कोई जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गए क्योंकि हम ने तो 'एक चुप सौ सुख' मंत्र धारण कर रखा था।

चूंकि हम चुप हैं इसलिए हमें अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी प्रार्थना सभा में शामिल होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हमें इस बात का ज्ञान हो गया है कि जब तक हम चुप हैं हम सुरक्षित हाथों में हैं, हम देश प्रेमी हैं, देशभक्त हैं और देश के विकास में चुप रह कर हम बहुत बड़ा योगदान दे रहे हैं क्योंकि हमारा मानना है के यह योगदान भी किसी 'शुभ दान' या 'गुप्त दान' से कम नहीं है। इधर हमने अपना मुँह खोला नहीं; उधर से आक्रमण शुरू हुए नहीं कि यह देश-द्रोही है, गद्दार है, देश के विकास में बाधा डालता है, अन्यथा हमें नक्सली समर्थक ही कहना शुरू कर देंगे।

भले ही हम महात्मा गांधी के शांति संदेश से बहुत प्रभावित और प्रेरित हैं, लेकिन अब हमने शांति का प्रचार करना भी बंद कर दिया है, क्योंकि हमें अब डर लगता है कि पता नहीं कब हमें कोई यह कह दे कि ऐसी बातें करनी है तो भाई साहिब आप पाकिस्तान चले जाओ, वहाँ आप की ज़्यादा ज़रूरत है। इस लिए तो भई हमने मौन-व्रत रखा है। लेकिन चुप्पी के साथ साथ; हमारी सूक्ष्म दृष्टि में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। अब हम जगह-जगह सरकारी बोर्डों का अर्थ खूब समझने लगे हैं, जैसे 'बचाव में ही बचाव है' , 'आपकी सुरक्षा परिवार की रक्षा' आदि।

अब आप कहेंगे हम बहुत विरोधाभासी बातें कर रहे हैं। लेकिन जब यह युग ही विरोधी विचारधारा का है, तो हम इसके प्रभाव से कैसे मुक्त हो सकते हैं! लेकिन हमने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से आप के मन की बात भी जान ली है कि आप हम से क्या पूछना चाहते हैं। अरे महाराज! भूल गए! हमने तो मौन-व्रत रखा हुआ है। 


 

अक्षरवार्ता शोध पत्रिका के ई संस्करण हेतु शोधलेख/संस्मरण/यात्रा वृतांत/इंटरव्यू/शैक्षणिक समाचार/कविता/कहानी/लघुकथा आदि लेखक आमंत्रण सूचना

ई संस्करण हेतु शोधलेख/संस्मरण/यात्रा वृतांत/इंटरव्यू/शैक्षणिक समाचार/कविता/कहानी/लघुकथा आदि लेखक आमंत्रण सूचना --


अक्षरवार्ता शोध पत्रिका के इंटरनेट प्लेटफार्म एवं वेबसाइट के लिए शोधलेख/संस्मरण/यात्रा वृतांत/इंटरव्यू/शैक्षणिक समाचार/कविता/कहानी/लघुकथा आदि आमंत्रित है। --ई संस्करण में प्रकाशन निशुल्क है। --ई संस्करण के लिए अपनी रचना यूनिकोड फॉन्ट में अक्षरवार्ता के ईमेल पर भेजे। --ई संस्करण के लिए भेजे गए ईमेल के विषय में स्पष्ट उल्लेख करें कि सामग्री ई संस्करण के लिये भेजी गई है। तथा अपना नाम,स्थायी पता,मोबाइल नं. अवश्य लिखे। --लेखन सामग्री केवल ईमेल पर ही भेजें। ई संस्करण में प्रकाशन पर किसी भी प्रकार का शुल्क देय नहीं है। --


संपादक डॉ. मोहन बैरागी


अक्षरवार्ता शोध पत्रिका


ईमेल-aksharwartasahitya@gmail.Com 


https://aksharwartajournal.page/


नोट:-कृपया अक्षरवार्ता के इस ई संस्करण/वेबसाइट की लिंक सोशल मीडिया पर शेयर करें।


Wednesday, February 12, 2020

साक्षात्कार के अंश...

फिल्म-संगीत-जगत में समय-समय पर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई है, जो आज हमारे लिए अनमोल धरोहर बन गए हैं। एक ऐसा ही गीत 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में रचा गया था। यूँ तो इस फिल्म के सभी गीत अपने समय में हिट हुए थे, किन्तु फिल्म का एक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' कई कारणों से फिल्म-संगीत-इतिहास के पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इस गीत की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार किसी वरिष्ठ शास्त्रीय गायक (पण्डित भीमसेन जोशी) और फिल्मी पार्श्वगायक (मन्ना डे) ने मिल कर एक ऐसा युगल गीत गाया, जो राग बसन्त बहार के स्वरों में ढला हुआ था। यही नहीं, फिल्म के प्रसंग के अनुसार राज-दरबार में आयोजित प्रतियोगिता में नायक गोपाल (भारतभूषण) को गायन में दरबारी गायक के मुक़ाबले में विजयी होना था। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि दरबारी गायक के लिए भीमसेन जी ने और नायक के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। फिल्म से जुड़ा तीसरा रेखांकन योग्य तथ्य यह है कि फिल्म की संगीत-रचना में सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पण्डित रामनारायण का उल्लेखनीय योगदान था।


1949 की फिल्म 'बरसात' से अपनी हलकी-फुलकी और आसानी से गुनगुनाये जाने वाली सरल धुनों के बल पर सफलता के झण्डे गाड़ने वाले शंकर-जयकिशन को जब फिल्म 'बसन्त बहार' का प्रस्ताव मिला तो उन्होने इस शर्त के साथ इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया कि फिल्म के राग आधारित गीतों के गायक मन्ना डे ही होंगे। जबकि फिल्म के नायक भारतभूषण के भाई शशिभूषण सभी गीत मोहम्मद रफी से गवाना चाहते थे। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। शंकर-जयकिशन ने फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के स्थान पर किसी और पार्श्वगायक को लेने से साफ मना कर दिया। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे मुकेश की आवाज़ को पसन्द करते थे, परन्तु वो इस विवाद में तटस्थ बने रहे। निर्माता आर. चन्द्रा भी पशोपेश में थे। मन्ना डे को हटाने का दबाव जब अधिक हो गया तब अन्ततः शंकर-जयकिशन को फिल्म छोड़ देने की धमकी देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी।


फिल्म 'बसन्त बहार' में शंकर-जयकिशन ने 9 गीत शामिल किए थे, जिनमें से दो गीत- 'बड़ी देर भई...' और 'दुनिया न भाए मोहे...' मोहम्मद रफी के एकल स्वर में गवा कर उन्होने शशिभूषण की बात भी रख ली। इसके अलावा उन्होने मन्ना डे से चार गीत गवाए। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित 'भयभंजना वन्दना सुन हमारी...' (एकल), राग पीलू पर आधारित 'सुर ना सजे...' (एकल), लता मंगेशकर के साथ युगल गीत 'नैन मिले चैन कहाँ...' और इन सब गीतों के साथ शामिल था राग बसन्त बहार के स्वरों में पिरोया वह ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही...', जिसे मन्ना डे ने पण्डित भीमसेन जोशी के साथ जुगलबन्दी के रूप में गाया है। इस आलेख की आरम्भिक पंक्तियों में हम फिल्म के उस प्रसंग की चर्चा कर चुके हैं, जिसमें यह गीत फिल्माया गया था। आइए, अब कुछ चर्चा इस गीत की रचना-प्रक्रिया के बारे में करते हैं। संगीतकार शंकर-जयकिशन फिल्म के इस प्रसंग के लिए एक ऐतिहासिक गीत रचना चाहते थे। उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण को आमंत्रित किया और यह दायित्व उन्हें सौंप दिया। इसके आगे की कहानी आप स्वयं पण्डित भीमसेन जोशी की जुबानी सुनिए, इस रिकार्डिंग के माध्यम से। पण्डित भीमसेन जोशी पर निर्मित वृत्तचित्र का यह एक अंश है, जिसमें गीतकार गुलज़ार, पण्डित जी से सवाल कर रहे हैं।



पण्डित भीमसेन जोशी से की गई गीतकार गुलज़ार की बातचीत का एक अंश


 



 पण्डित जी ने बातचीत के दौरान जिस 'गीत लिखने वाले' की ओर संकेत किया है, वो कोई और नहीं, बल्कि गीतकार शैलेन्द्र थे। दूसरी ओर शंकर-जयकिशन ने जब इस जुगलबन्दी की बात मन्ना डे को बताई तो वे एकदम भौचक्के से हो गए। मन्ना डे ने यद्यपि कोलकाता में उस्ताद दबीर खाँ और मुम्बई आकर उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया था, किन्तु पण्डित जी के साथ जुगलबन्दी गाने का प्रस्ताव सुन कर उनकी हिम्मत जवाब दे गई। मन्ना डे की उस समय की मनोदशा को समझने के लिए लीजिए, प्रस्तुत है- उनके एक साक्षात्कार का अंश-



मन्ना डे के एक साक्षात्कार का अंश


 



इस गीत को गाने से बचने के लिए मन्ना डे चुपचाप पुणे चले जाने का निश्चय कर चुके थे, लेकिन पत्नी के समझाने पर उन्होने इस प्रकार पलायन स्थगित कर दिया। पंकज राग द्वारा लिखित पुस्तक 'धुनों की यात्रा' में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि- मन्ना डे अपने संगीत-गुरु उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ के पास मार्गदर्शन के लिए भी गए थे। इसके अलावा मन्ना डे के गाये हिस्से में राग बसन्त के साथ राग बहार का स्पर्श दिया गया और लय भी थोड़ी धीमी की गई थी। पण्डित रामनारायण ने मन्ना डे को कुछ ऐसी तानें सीखा दी, जिससे फिल्म का नायक विजयी होता हुआ नज़र आए। साक्षात्कार में मन्ना डे ने स्वीकार किया है कि उनके साथ गाते समय पण्डित जी ने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया था। अन्ततः पण्डित भीमसेन जोशी, पण्डित रामनारायण, मन्ना डे और शैलेन्द्र के प्रयत्नों से फिल्म 'बसन्त बहार' का ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' की रचना हुई और फिल्म संगीत के इतिहास में यह गीत सुनहरे पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। लीजिए, अब आप पूरा गीत सुनिए।



फिल्म – बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...’ : पण्डित भीमसेन जोशी और सुर गन्धर्व मन्ना डे


 



बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। कुछ विद्वान इसे ‘छायालग राग’ कहते हैं। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। राग बसन्त और बहार में मुख्य अन्तर यह है कि बहार में कोमल गान्धार और दोनों निषाद तथा बसन्त में कोमल ऋषभ व कोमल धैवत के साथ शुद्ध गान्धार का प्रयोग होता है। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है।


Friday, February 7, 2020

कविता, मुक्तक माला

 

कविता

विविध मुक्तक माला।।।।।।।

1,,,,,,,

।।।आंतरिक शक्ति।।।।।।।। 

।।।।।।।।।।मुक्तक।।।।।।।।।।।

मत  आंकों     किसी  को    कम ,

कि सबमें कुछ बात होती है।

 

भीतर छिपी प्रतिभा कीअनमोल,

  सी    सौगात     होती   है।।

 

जरुरत है तो  बस उसे पहचानने,

और फिर निखारने  की।

 

तराशने  के बाद  ही  तो  हीरे से,

मुलाकात    होती     है।।

 

रचयिता।।।।एस के कपूर श्री हंस

बरेली।।।।।।।।।।। ।।।।।।।।।।।।

मोब  9897071046।।।8218685464।।।।।।।।

2,,,,,,

।। सफलता का सम्मान।।।।।।।।।।।।।।।।

।।।।।।।।।।।।मुक्तक।।।।।।

 

नसीबों  का   पिटारा   यूँ    ही

कभी खुलता नहीं है।

 

सफलता का सम्मान जीवन में

 यूँ ही घुलता नहीं है।।

 

बस कर्म  ही लिखता है  हाथ

की   लकीरें  हमारी ।

 

ऊँचा  हुऐ बिना  आसमाँ  भी

कभी झुकता नहीं है।।

 

रचयिता।।।।।एस के कपूर

श्री हंस।।।।।।बरेली।।।।।।

मोब  9897071046।।।।।

8218685464।।।।।।।।।।

3,,,,,

सत्य कभी मरता नहीं है।।।।

।।।।।।।।।मुक्तक।।।।।।।।।।

 

सच  कभी    मरता    नहीं

हमेशा  महफूज़   होता है।

 

ढेर में दब कर  भी जैसे ये 

चिंगारी और फूस होता है।।

 

लाख छुपा ले कोई उसको

काल  कोठरी   के  भीतर।

 

सात  परदों के पीछे से भी

जिंदा   महसूस   होता  है।।

 

रचयिता।।।।एस के कपूर श्री

हंस।।।।।।बरेली।।।।।।।।।।।

मोब  9897071046।।।।।।

8218685464।।।।।।।।।।।

4,,,,

सत्य कभी मरता नहीं है।।।।

।।।।।।।।।मुक्तक।।।।।।।।।।

 

सच  कभी    मरता    नहीं

हमेशा  महफूज़   होता है।

 

ढेर में दब कर  भी जैसे ये 

चिंगारी और फूस होता है।।

 

लाख छुपा ले कोई उसको

काल  कोठरी   के  भीतर।

 

सात  परदों के पीछे से भी

जिंदा   महसूस   होता  है।।

 

रचयिता।।।।एस के कपूर श्री

हंस।।।।।।बरेली।।।।।।।।।।।

मोब  9897071046।।।।।।

8218685464।।।।।।।।।।।

Aksharwarta's PDF

Aksharwarta International Research Journal - October - 2026 Issue